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आडवाणी ने जिन्ना की तारीफ़ कर दी और पके फल की तरह अध्यक्ष पद राजनाथ की झोली में गिरा

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साल था 1976. इमरजेंसी का दौर था. यूपी की एक जेल थी. दो राजनीतिक कैदी थे. एक हाथ पसारे बड़े ध्यान से ऊपर देख रहा था. दूसरा हाथ पर देखते हुए कुछ सोच रहा था. हाथ देखने वाला थोड़ा उम्रदराज था. दिखाने वाला नौजवान. उम्रदराज ने कहा- बेटा, तुम एक दिन बहुत बड़े नेता बनोगे. जवान बोला- कितना बड़ा गुप्ता जी. उम्रदराज ने कहा- यूपी के सीएम जितना बड़ा. नौजवान हंसने लगा. 25 साल का था. उसकी पार्टी की ही हैसियत बहुत कम थी. सीएम कहां बनते. विधायक बनकर टिक जाएं वही बहुत था. पर बुजुर्ग की बात सच निकली. 24 साल बाद वो लड़का उन्हीं उम्रदराज इंसान को हटाकर यूपी का मुख्यमंत्री बना. आज वो लड़का देश का होम मिनिस्टर है. बात हो रही है राजनाथ सिंह की.


वो बुजुर्ग थे जनसंघी दौर के नेता रामप्रकाश गुप्ता. इमरजेंसी के दौर में वो यूपी के सबसे बड़े जनसंघी नेता थे. 1967 में जब यूपी में चौधरी चरण सिंह की सरकार बनी थी, तब वह डिप्टी सीएम थे. 1977 में जनता पार्टी के जीतने के बाद भी वह यूपी में कैबिनेट मंत्री बने. पर इसके बाद इनका कद छोटा होता गया. क्योंकि बीजेपी यूपी में सोशल इंजीनियरिंग कर रही थी. मंडल और कमंडल की पॉलिटिक्स शुरू हो गई थी. बीजेपी ने कल्याण सिंह को राम मंदिर और ओबीसी दोनों का पोस्टर बॉय बना दिया. पर राजनाथ सिंह जमे रहे. और यहीं से शुरू हो गई कल्याण सिंह से उनकी अदावत. यहीं से टिकट लेने-देने पर रुसने-फूलने वाली भाजपाई परंपरा भी शुरू हुई, जो इस बार के विधानसभा चुनाव में भी जारी है.

कहते हैं कि 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर मिर्जापुर-भदोही लोकसभा सीट से टिकट मांगी. मगर चौधरी चरण सिंह ने हिंद मजदूर किसान दल के फकीर अली को टिकट दिया. राजनाथ के हिस्से आया मिर्जापुर विधानसभा का टिकट, जहां से उन्होंने जीत हासिल की. इसके बाद राजनाथ लगातार कई चुनाव हारे. 1988 में उन्हें यूपी विधान परिषद भेजा गया. और इसी वक्त राजनाथ सिंह को गुरुमंत्र मिल गया था. कि राजनीति करनी है तो संघ और मीडिया को साथ लेकर चलना है. तब से आज तक दोनों ही जगह समान भाव से वो विद्यमान रहते हैं.

1991 में कल्याण सिंह की नेतागिरी में यूपी में प्रचंड बहुमत से बीजेपी की सरकार बनी. राजनाथ सिंह भी माध्यमिक शिक्षा के मंत्री बने. उसके पहले राजनाथ संगठन की राजनीति करते थे. युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे थे. फिर यूपी विधान परिषद पहुंच गए थे. पर 77 की जनता लहर में वह भी मिर्जापुर से विधायक बन गए थे. पर इस बार मौका मिला था. राजनाथ चूकने वाले नहीं थे. मशहूर हुए 1991 के नकल अध्यादेश से. इसमें नकलची विद्यार्थियों को परीक्षा हॉल से गिरफ्तार किया जाता था और जमानत कोर्ट से मिलती थी. उड़ाका दल या उड़नदस्ता घूमते थे परीक्षा के टाइम में. बिना बताए क्लासरूम में घुस आते. बात ही नहीं सुनते थे. पूरे प्रदेश में मुर्दघटिया  की शांति खिंच गई थी. नकल का नामोनिशान नहीं था. बहुत लोग फेल हुए. राजनाथ का ये काम तो यूपी में किंवदंती बन गया है. आज तक याद किया जाता है.

पर हिंदुत्व पर सवार भाजपा ने सत्ता की भी अनदेखी की. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. कानून-व्यवस्था न संभाल पाने के कारण कल्याण सिंह को इस्तीफा देना पड़ा. राष्ट्रपति शासन लग गया. फिर 1993 में यूपी में चुनाव हुए. सपा-बसपा गठबंधन ने बीजेपी को 213 के बहुमत आंकड़े से बहुत पीछे 177 पर रोक दिया.

खुद राजनाथ सिंह भी लखनऊ के पास की महोना सीट से चुनाव हार गए. कहा गया कि भाजपा को बाबरी की हाय लगी है और राजनाथ को छात्रों की.

पर राजनाथ इस हाय-बाय से रुकने वाले लोगों में से नहीं थे. दो साल में ही राज्यसभा सीट का बंदोबस्त कर लिया. शुद्ध हिंदी और संघ का आशीर्वाद. कौन रोकेगा? फिर यूपी लौटे तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनकर. 1996 में फिर विधानसभा चुनाव हुए. किसी को बहुमत नहीं मिला. पर कुछ दिनों की जोड़-तोड़ के बाद बसपा-भाजपा सरकार बनी. देश के इतिहास में पहली बार किसी राज्य के लिए छह-छह महीने मुख्यमंत्री वाला फॉर्मूला सामने आया. इसके बाद गठबंधन टूटा भी. पर कल्याण सिंह ने जुगत लगाकर सरकार बचा ली. इस पर अलग स्टोरी की गई है. कल्याण की जुगत पर राजनाथ पाले के विधायक नजर जमाए थे. गदर काटने लगे. तमाम तरह की बयानबाजी होने लगी. कल्याण अपनी ही सरकार में बेगाने हो गए. संघ और संगठन दोनों ही उनको दरकिनार करने लगे. कल्याण इतना खफा हुए कि मामला राजनाथ से हटकर कल्याण बनाम अटल बिहारी वाजपेयी हो गया. कल्याण सिंह कहने लगे – अटल जी एमपी बनेंगे, तभी पीएम बनेंगे ना. उस वक्त देश में अबकी बारी, अटल बिहारी की धूम थी. पर 1999 के चुनाव में वाजपेयी को लखनऊ सीट से लोकसभा चुनाव जीतने के लिए डेरा डालना पड़ गया. फिर अटल एमपी बने, पीएम भी. मगर कल्याण सिंह सीएम नहीं रहे.

लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा की हार हुई. 57 सीटों से 28 सीटों पर आ गई भाजपा. हार का ठीकरा कल्याण के सिर फूटा. पार्टी में सिर-फुटौव्वल की नौबत आ गई. कल्याण को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया. पर राजनाथ सिंह की ताजपोशी नहीं हुई. स्टोर रूम से निकालकर रामप्रकाश गुप्ता को लाया गया. जो कि राजनीति से दूर हो चुके थे. घर में बैठे कहानियां सुनाते थे. नई पीढ़ी ने उनका नाम तक नहीं सुना था. उन्होंने सबको सही साबित किया. यूपी के भुलक्कड़ सीएम के रूप में जाने गए. 11 महीने बाद उनको हटाकर 28 अक्टूबर 2000 को राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया गया. 24 साल बाद रामप्रकाश गुप्ता की भविष्यवाणी सच हुई.

राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री रहे. खूब ऐलान किए. इतने कि विपक्षी उन्हें घोषणा नाथ कहने लगे. इस दौरान उन्होंने अति पिछड़ों को आरक्षण में आरक्षण देने का मांझा लगाया. उनके कैबिनेट मंत्री और आजकल कैराना से सांसद हुकुम सिंह की सदारत में कमिटी बनी. उन्होंने अपनी तदबीर दे दी. मगर मामला कोर्ट में फंस गया. आरक्षण रुक गया.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह
गृह मंत्री राजनाथ सिंह

2002 में यूपी में फिर विधानसभा चुनाव हुए. राजनाथ की अगुवाई में भाजपा बुरी तरह हारी. 100 सीटें भी नहीं ला पाई. कुछ महीनों के बाद फिर बसपा से गठबंधन हुआ. मायावती मुख्यमंत्री बनीं. पर राजनाथ को कोई फर्क नहीं पड़ा. सबके दुलारे थे. अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में कृषि मंत्री बनकर दिल्ली पहुंच गए. पर इंडिया शाइनिंग के नारे पर सवार अटल सरकार 2004 में चली गई. आडवाणी प्रधानमंत्री तो नहीं बन पाए थे. पर अब डिप्टी प्राइम मिनिस्टरी भी चली गई. तो वो पार्टी अध्यक्ष बन गए. राजनाथ भी पीछे नहीं रहे. पार्टी के महासचिव बन गए.

कहते हैं कि बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की नियुक्ति में अटल बिहारी वाजपेयी के आशीर्वाद की अहम भूमिका थी. संघ की नजर में राजनाथ संयमी स्वयंसेवक रहे हैं. राजनाथ का कोई भी भाषण उठाकर देखिए उसमें संघ और अटल की प्रतिलिपिनजर आएगी. एक बार नागपुर में राष्ट्रीय परिषद को संबोधित करते हुए राजनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव के एक बाल स्वयंसेवक के रूप में जब मैंने कभी नागपुर देखा भी नहीं था, परंतु नागपुर के प्रति मेरे मन में एक अनन्य अनुराग और आस्था का भाव था.

तब तक एक वैचारिक हादसा हो गया. 2005 में आडवाणी पाकिस्तान गए. वहां इमोशनल होकर उन्होंने जिन्ना की तारीफ कर दी. यहां संघ के लोग भड़क गए. सोमनाथ से रथयात्रा निकालने वाले आडवाणी पाकिस्तान से लौटे और उनको पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा. नए सिरे से पार्टी अध्यक्ष की तलाश शुरू हुई. पर गली में छोरा, शहर में ढिंढोरा. कुछ दिन के बाद सबको लगा कि अरे, राजनाथ से बढ़िया कौन है. राजनाथ सिंह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. 2009 तक रहे. दो बार बने. 2009 में गाजियाबाद से लोकसभा भी पहुंच गए. पर आडवाणी की नेतागिरी में भाजपा 2009 के लोकसभा चुनाव में भी पीछे ही रही. अबकी राजनाथ को भी पद छोड़ना पड़ा. नितिन गडकरी को इम्पोर्ट किया गया.

rajnath

उस वक्त एक और बात थी. भाजपा के सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकेया नायडू जैसे आडवाणी के विश्वस्तों के सामने राजनाथ के पास अपना कहने को कोई नहीं था. हालांकि राजनाथ सिंह ने संघ को भरोसे में लेकर विनय कटियार, सुधांशु मित्तल और विजय गोयल जैसे नेताओं को जिम्मेदारियां देना शुरू कर दिया था. पर इसकी वजह से उनका पार्टी के बाकी लोगों से संघर्ष शुरू हो गया. चुनावों के समय उत्तरपूर्वी राज्यों के प्रभारी के तौर पर सुधांशु मित्तल को लेकर उनके और पार्टी महासचिव अरुण जेटली के बीच तनातनी सार्वजनिक हुई. पर चुनावों में हार के बाद राजनाथ के नेतृत्व पर उंगली उठाने वालों की फेहरिस्त लंबी होती गई.

पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने खत लिखा. जवाबदेही मांगी. तो राज्यसभा सांसद और शंकालु वैचारिकी मनुष्य अरुण शौरी ने राजनाथ को रेडियो एनाउंसर की आवाज वाला इंसान तो कहा लेकिन ‘एलिस इन ब्लंडरलैंड’ भी कहा. राजनाथ कभी तो चुप रहते, कभी बलिदानी-अभिमानी की मुद्रा में कह देते – ‘मैं पार्टी अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने को तैयार हूं.’

पर राजनाथ सिंह के इन चार सालों में लोकसभा चुनावों में हार के अलावा बीजेपी के लिए बाकी जगह लगभग ठीक-ठाक स्थिति ही रही. कई राज्यों में शानदार जीत हासिल हुई. पर इस जीत में स्थानीय नेतृत्व जैसे नरेंद्र मोदी और शिवराज चौहान आदि की कहीं ज्यादा भूमिका थी. वहीं यूपी में 2007 के विधानसभा चुनावों में भाजपा मात्र 51 सीटें जीत सकी, जो 1989 के उसके प्रदर्शन से भी बुरा था. लेकिन भाजपा पर संघ की पकड़ मजबूत हो रही थी. इस वजह से राजनाथ सिंह पर आंच नहीं आई. बीजेपी के संगठन मंत्री रहे गोविंदाचार्य के मुताबिक राजनाथ सिंह जिस पद पर पहुंचते हैं, उस पर ध्यान न देकर अगले लक्ष्य पर नजरें जमा लेते हैं. राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर उन्होंने संगठन मजबूत करने के बजाय एनडीए के बाकी दलों से संबंध विकसित करने पर ज्यादा जोर दिया.

पर तब तक देश की राजनीति बदलने लगी थी. 2-जी और कॉमनवेल्थ के साथ कोयले घोटाले में फंसी कांग्रेस सरकार पर अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे और विनोद राय ने हमला बोल दिया था. सबको देश में एक ताकतवर प्रधानमंत्री चाहिए था. तो भाजपा को एक काबिल पार्टी अध्यक्ष चाहिए था. नितिन का नाम फिर आया. पर 2014 लोकसभा के चुनाव से ठीक पहले इनका नाम ‘पूर्ति ग्रुप’ की गड़बड़ियों में भी आया. और इस बार पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी फिर से राजनाथ सिंह को मिली. उन्होंने नरेंद्र मोदी को जमकर सपोर्ट किया. किसी की नहीं सुनी. रोजाना खबरें आतीं कि ‘वे’ नाराज हो गए, ‘ये’ नहीं बोल रहे. पर राजनाथ का विश्वास अटल रहा. शुरू से एक ही नाम. मोदी, मोदी. फायदा भी हुआ. नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने केंद्र में सरकार बना ली. राजनाथ सिंह देश के होम मिनिस्टर बने.

1993 में विधानसभा चुनाव ही हार गए थे राजनाथ.
1993 में विधानसभा चुनाव ही हार गए थे राजनाथ.

पर लखनऊ में राजनाथ के बारे में सभी भविष्यवाणी करने में जुटे रहते थे. किसी को अंदाजा न था कि भाजपा को इतना बहुमत मिलेगा. लोग कहते कि अटलजी की लहर में भी इतना नहीं मिला था. इस बार कहां से मिलेगा. जोड़-तोड़ की सरकार बनेगी. मोदी के नाम पर दूसरी पार्टियां बिदक जाएंगी. नीतिश कुमार भड़क ही गए थे. तो भाजपा किसको प्रधानमंत्री बनाएगी. राजनाथ सिंह को गुरू और किसको! कुछ क्लेम करते कि राजनाथ की कुंडली देखी है हमने. राजयोग लिखा है. कोई माई का लाल रोक नहीं सकता.

राजनाथ सिंह ने फिजिक्स में एमएससी किया है. एक जनसभा में खुद राजनाथ ने चुहल करते हुए कहा था कि राजनीति पेंडुलम पर सवारी करने जैसी है, बराबर गतिशील लेकिन आखिर में कहीं नहीं ले जाती.

पर राजनाथ सिंह के केस में राजनीति उपरिगामी तरंग है.

2017 के यूपी चुनाव में भी राजनाथ सिंह पर दबाव बन रहा था कि 2002 का कौल अभी बाकी है. जनता आपको याद कर रही है. पर राजनाथ सिंह को पता है कि कहां जाना है. 1976 में, जेल में रामप्रकाश गुप्ता ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं शायद प्रधानमंत्री कहा होगा. बात पब्लिक में शायद नहीं आई होगी. राजनाथ सिंह की आलोचना होती थी कि जैसे-जैसे भाजपा गिरती है, राजनाथ आगे बढ़ते जाते हैं. खुद वो मात्र चार बार ही तो चुनाव जीते हैं. 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर में जीते, मुख्यमंत्री रहने पर उपचुनाव जीते, फिर विधानसभा जीते और फिर दो बार लोकसभा में जीते. पर संघ के दिल को हर बार जीता है. इनके विरोधी कहते हैं कि ये परिक्रमा का पराक्रम है. पर जंग लड़ने वाला ही जानता है कि कहां परिक्रमा करनी है, कहां मैदान छोड़ना है और कहां लड़ाई ही बदल देनी है. खुद राजनाथ भी तो अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी कविता पढ़ते रहते हैंः-

हार में या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं.

हम तो बस उनकी शुद्ध हिंदी के फैन हैं. ऐसा लगता है कि घर का कोई बड़ा बोल रहा है. प्यार से. आप सुनते रह जाएंगे. बस जवाब नहीं मिलेंगे.


 

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