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रायबरेली में भी अंग्रेजों ने एक जलियांवाला बाग किया था

15241815_1148838425171579_5356888738034959841_nद लल्लनटॉप की दो टीमें हीरा और मोती  यूपी चुनाव की सबसे लल्लनटॉप खबरें आप तक पहुंचाने के लिए पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा कर रही हैं. हमारे रीडर प्रशांत ने अपने शहर रायबरेली के इतिहास का एक किस्सा द लल्लनटॉप के लिए भेजा है. आप भी पढ़िए और ऐसा ही किस्सा आपकी नज़र में हो तो lallntopmail@gmail.com पर हमें लिख भेजिए.


राजनीति में रायबरेली की स्थिति के विषय में कुछ वर्ष पहले रायबरेली के ही मशहूर शायर मुन्नवर राणा ने अपने अंदाज़ में कहा, “रायबरेली वह शहर है जहां की नालियों से होकर सियासत गुजरती है”.

इसी रायबरेली में 1921 में एक वीभत्स हत्याकांड भी हुआ था.  जैसे सन् 1919 का जलियांवाला बाग़ गोलीकांड इतिहास में काले अध्याय के रूप में शामिल है,  वैसा ही एक काला अध्याय रायबरेली के इतिहास में भी मौजूद है. अंग्रेजों के शासनकाल में रायबरेली जमींदारों एवं कोटेदारों का खासा वर्चस्व था, जो किसानों को जमीन मुहैया कराकर उनसे अंग्रेजो के लिए कर वसूलते थे. जब किसान शोषण के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध दर्ज कर रहे थे उन्हें भी जलियांवाला बाग कांड की तरह गोली का शिकार होना पड़ा.

बात 5 जनवरी 1921 की है जब किसान, तत्कालीन तालुकेदार के अत्याचारों से तंग आकर अमोल शर्मा और बाबा जानकीदास के नेतृत्व में चंदनिहां में एक जनसभा कर रहे थे. दूर-दूर के गांवों के किसान भी सभा में भाग लेने आए थे. इस जनसभा को असफल बनाने के लिए तालुकेदार ने तत्कालीन जिलाधीश ए.जी. शॉरिफ से मिलकर दोनों नेताओं को फर्जी आरोपों में लखनऊ जेल भेज दिया, वहां उन पर मुकदमा चला. गिरफ़्तारी के अगले ही दिन रायबरेली में लोगों के बीच यह अफवाह तेज़ी से फैल गई कि लखनऊ के जेल प्रशासन द्वारा दोनों नेताओं की जेल में हत्या करवा दी गई है. जिसके चलते जनवरी 7, 1921 को मुंशीगंज (रायबरेली) में सई नदी के एक छोर पर अपने नेताओं के समर्थन में एक विशाल जनसमूह एकत्रित होने लगा.

तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मार्तंड वैध को पहले ही किसी बड़ी अनहोनी की भनक लग चुकी थी. उन्होंने फ़ौरन तार भेजकर द्वारा मोतीलाल नेहरु तक खबर पहुंचवाई लेकिन दुर्भाग्यवश, या किसी और वजह से मोतीलाल रायबरेली नहीं पहुंच सके. हालांकि इसके बाद जवाहर लाल नेहरु ने रायबरेली में किसानों से मिलने का आश्वासन भी दिया.

उधर किसानों के भारी विरोध को देखते हुए नदी किनारे प्रशासन ने भारी पुलिस बल बुला लिया था.
जवाहर लाल नेहरू को नदी किनारे पहुंचने के पहले ही नज़रबंद कर लिया गया और नदी किनारे नहीं पहुंचने दिया. जानकार बताते हैं. अंग्रेज़ पहले ही गोलीकांड की योजना बना चुके थे. नेहरू को सिर्फ इसलिए नज़रबंद कर लिया था कि कहीं नेहरू को गोली लग गई तो मामला ज़्यादा बिगड़ जाएगा.

प्रशासन के हुकुम से सभा में मौजूद सैकड़ों निहत्थे किसानों पर सेना द्वारा गोलियों की बौछार कर दी गई. जिसके बाद सई नदी की धारा किसानों के खून से रक्त-रंजित हो उठी. कहा जाता है कि करीब 700 किसान मारे गए थे, और ये हत्याकांड जलियांवाला बाग के बाद हुआ गुलाम भारत का सबसे बड़ा हत्याकांड है. शहर में रहने वालों बूढ़े बुजुर्गों का आज भी कहना है कि दमन के उस गोलीकांड में सई नदी का पानी किसानों के खून से लाल हो गया था.

शहीदों की याद में बना स्मारक
शहीदों की याद में बना स्मारक

हत्याकांड की खबर मिलते ही जवाहर लाल नेहरु रायबरेली स्टेशन से रायबरेली कलेक्ट्री कचहरी तक ही पहुंचे थे कि प्रशासन द्वारा उन्हें वापस जाने के सख्त निर्देश दे दिए गए, जिसको नज़रंदाज़ करते हुए वे घटनास्थल की ओर चल दिए. उन्होंने घटना का वीभत्सता का वर्णन कुछ ऐसे किया-

“…1921 के जनवरी आरंभ की बात है मैं नागपुर कांग्रेस से लौटा ही था कि मुझे रायबरेली से तार मिला की जल्दी आओ क्योंकि वहां उपद्रव की आशंका थी…”
“…जैसे ही मैं नदी तक पहुंचा कि दूसरे किनारे पर से गोलियों की आवाज़ सुनाई दी, मुझे पुल पर ही पुलिस वालों ने रोका. गोलीकांड में बहुतरे आदमी मारे गए, किसानों ने तितर-बितर होने या पीछे हटने से इंकार कर दिया. मगर यों वो बिलकुल शांत बने रहे थे…”

“गांव में जहां-जहां गया, वहां मुझे कई लोग मिले फायरिंग का दुखड़ा रोते हुए, वापसी में मैंने लाशें देखीं जो एक तांगे पर  बेतरतीब ढंग से एक साथ पड़ी थी. यह तांगा मुंशीगंज सई नदी के पुल के पास खड़ा था. इन लाशों पर कपड़ा पड़ा था लेकिन टांगे निकली थी. मेरे ख्याल से एक दर्ज़न टांगे निकली रही होंगी, यह भी मुमकिन है कि दस रही हों या चौदह.”

-पं. जवाहर लाल नेहरु


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