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कांग्रेस ने लोहिया की पार्टी को हराने के लिए आखिर क्या साज़िश की थी?

राम मनोहर लोहिया पर ये आर्टिकल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान लिखा गया था, जिसे हम आपको उनकी बरसी के मौके पर पढ़ा रहे हैं.

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”पहले फरक बाद में बात, इसका नाम फर्रुखाबाद”

फर्रुखाबाद का इतिहास किसी हीरे की तरह जितना चमकदार है, वर्तमान उतना ही धुंधला है. यह समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया की कर्मभूमि है. यहां से सांसद बनकर लोहिया ने इस जमीन को दुनिया के नक्शे पर ला दिया, लेकिन इतनी ‘दौलत’ होने के बावजूद इस शहर का दामन विकास के नाम पर खाली है. आज पार्टियां अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए स्टार प्रचारकों की सभाएं कर रही हैं. प्रत्याशी गली-गली खाक छान रहे हैं. इतना ही नहीं जातिवाद और सांप्रदायिकता का जहर घोलने की कोशिशें हो रही हैं. इसके अलावा भी तरह-तरह के फंडे आजमा रहे हैं. बात समाजवाद के पुरोधा डॉ. लोहिया के ऐतिहासिक चुनाव की.

सिर्फ दो सभा ही काफी हैं

डॉ. राममनोहर लोहिया ने वर्ष 1963 में मात्र दो सभाएं कर फर्रुखाबाद में समाजवाद का परचम बुलंद कर दिया था. कांग्रेस के सांसद पं. मूलचंद्र दुबे की मौत के बाद 1963 में हुए उपचुनाव में डा. राममनोहर लोहिया फर्रुखाबाद से मैदान में उतरे थे. 1962 में चीन से मिली हार के बाद देश में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश का माहौल था. 1963 के उप-चुनाव के वक्त सोशलिस्ट पार्टी की फर्रुखाबाद में पकड़ भी मजबूत नहीं थी. कुछ लोग ही उनकी पार्टी के सदस्य थे. लेकिन उन्होंने उन कुछ सदस्यों की लगन को समझा और कांग्रेस से ताल ठोंक दी. डॉ. लोहिया ने पहली सभा शहर के सरस्वती भवन में की थी. इसमें पांच से छह हजार लोगों की भीड़ जमा हुई थी. उन्होंने लोगों से अपने लिए वोट मांगे, साथ ही चुनाव खर्च के लिए खुद ही चंदा इकट्ठा करने को कहा था. इस सभा के बाद देश के कई प्रांतों से समाजवादी कार्यकर्ता यहां पहुंच गए थे. इसमें केरल की सरस्वती अपनी तीन बहनों, पिता और भाई के साथ आई थीं.

लोहिया
लोहिया

लखनऊ की हबीबा बानो ने भी डेरा डाल दिया था. इनके साथ स्थानीय कार्यकर्ता श्यामा गुप्ता की पत्‍‌नी रमा देवी और उनकी भाभी लक्ष्मी देवी भी प्रचार में जुट गई थीं. मतदान से कुछ दिन पूर्व डॉ. लोहिया ने शहर के लालगेट पर दूसरी सभा की थी. डॉ. लोहिया के करीबी रहे श्यामा गुप्ता बताते हैं कि वह चुनाव के समय कुल चार-पांच दिन ही फर्रुखाबाद रुके थे. मतदान के एक दिन पूर्व ही वे दिल्ली चले गए थे. चुनाव जीतने के बाद वह गंगापार में लोगों से मिलने गए थे. इसके बाद से ही उन्होंने घटियाघाट पर पुल बनवाने के प्रयास शुरू कर दिए थे.

इससे पहले लोहिया 1962 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर क्षेत्र से प्रधानमंत्री नेहरू के खिलाफ लड़े, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

धर्म के सहारे सोशलिस्टों का सफाया

देशबंधु में छपी रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 1967 में जब समाजवाद के मसीहा डॉ. राममनोहर लोहिया कन्नौज से लोकसभा का दोबारा चुनाव लड़ रहे थे, तो उनके विरोधी और कांग्रेस के नेताओं ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान एक मौलवी से शरारतपूर्ण ढंग से ये सवाल पूछवाया कि मुसलमानों में चार बीवियां रखने के बारे में उनकी क्या राय है? डॉ. राममनोहर लोहिया का सीधा और सपाट जवाब था, “पति के लिए भी पत्नीव्रता होना जरूरी है. एक से अधिक बीवियां कतई नहीं होनी चाहिए.” इस बेबाक जवाब का खामियाजा सोशलिस्ट पार्टी को भुगतना पड़ा. और इलाहाबाद से लेकर बरेली तक उसका पूरा सफाया हो गया. पर लोहिया चुनाव जीत गए.


दी लल्लनटॉप के लिए ये आर्टिकल आदित्य प्रकाश ने लिखा था. 


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