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ग्राउंड रिपोर्ट वाराणसी साउथ : बनारस के चुनाव में वो मुद्दा ही नहीं है, जिसे बड़ा मुद्दा बताया जा रहा है

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तो मन्तरीजी, बूढ़ों-बुढ़ियों को मन्दिर का रास्ता दिखाओ. यह रास्ता उन्हें शान्ति की ओर, चैन की ओर, स्वर्ग की ओर, मुक्ति की ओर ले जाएगा. बाबा, माया मोह छोड़ो, हाय हाय छोड़ो. क्या मतलब दुनिया और झमेले से? बीसियों जगहें हैं यहां. लाखों देवी-देवता हैं. उनकी अलग-अलग खासियत है. कहीं रामकथा हो रही है, कहीं भागवत कथा चल रही है, कहीं यज्ञ हो रहा है, कहीं नवाह्न पारायण, कहीं रामलीला हो रही है – यानी, कोई ऐसी शाम नहीं जिसमें तुम्हारे ही मुहल्ले में दसियों जगह यह सब न हो रहा हो. जाओ, मोक्ष बनाओ. बहुत पाप कर लिए इस जीवन में. रह गए जवान और अधेड़.

– काशी का अस्सी, काशीनाथ सिंह
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2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव का आखिरी चरण. आखिरी चरण में सबसे अहम जगह बनारस. बनारस अहम क्यों? जैसे हर एक वोट बराबर है, वैसे ही सरकार बनने में हर एक सीट गिनती के लिहाज से बराबर है. बनारस अहम इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां से सांसद हैं. बनारस को अपना एक घर मानते हैं. घर में हार-जीत ज्यादा मायने रखती है. तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 19 मंत्रियों समेत 2-3 दिन बनारस में रहे. क्यों न रहें, उनका संसदीय क्षेत्र है. अखिलेश-राहुल ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. क्यों छोड़ें, चुनाव लड़ रहे हैं, करियर की बात है, हंसी-ठठ्ठा थोड़े न है.

सातवें चरण में कुल 40 सीटें हैं और इनमें से बनारस में 8 सीटें हैं, लेकिन जिस सीट की चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा हुई और जिसकी चर्चा नतीजे (चाहे जो हों) आने के बाद भी होगी, वो है वाराणसी साउथ यानी शहर दक्षिणी.

यहां से सात बार से यानी 1989 से लगातार श्यामदेव राय चौधरी भाजपा के टिकट पर जीतते रहे हैं, जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से दादा कहते हैं. भाजपा ने उनका टिकट काट दिया. कहा गया कि उनकी उम्र ज्यादा हो गई इसलिए टिकट काट दिया गया. लेकिन ये तर्क चला नहीं क्योंकि उनकी उमर के बराबर के सत्यप्रकाश अग्रवाल को मेरठ कैंट से टिकट दिया गया. और तो और, पिछली बार दादा से हारने वाले कांग्रेसी दयाशंकर मिश्र दयालु बीजेपी में शामिल हो चुके थे. माना जा रहा था कि दादा को टिकट न मिला, तो दयालु को ही मिलेगा. लेकिन मिला नीलकंठ तिवारी को.

श्यामदेव राय चौधरी
श्यामदेव राय चौधरी

कहा जाने लगा कि दादा को टिकट न मिलने की वजह से ये सीट बीजेपी हार जाएगी. दादा बाकी कई बागियों की तरह निर्दलीय या किसी दूसरी पार्टी से चुनाव तो नहीं लड़ने लगे, लेकिन उन्होंने अपनी नाराजगी को बहुत छिपाया भी नहीं. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनका हाथ पकड़कर विश्वनाथ मंदिर गए, जिसकी चर्चा हर तरफ हुई.

लेकिन क्या ये वाकई कोई बड़ा मुद्दा है?

इस सीट पर जितने भाजपा समर्थकों से हमारी बात हुई, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि टिकट उन्हें नहीं, किसी और को मिला है. फर्क किसी को नहीं पड़ता, लेकिन अलग-अलग तरीके से. जैसे दशाश्वमेध घाट पर मिलने वाले भाजपा समर्थक राज कुमार अग्रवाल कहते हैं कि उनके लिए बड़ा पद रखा गया है, उन्हें तो मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाया जाना है और ये बात अखबारों में आई थी. न जाने उनकी जानकारी का सोता कहां से फूटता है.

राजकुमार अग्रवाल
राजकुमार अग्रवाल

खैर, मैदागिन में जूस पीते हुए बड़ा गणेश के पुजारी और बीजेपी समर्थक अजय तिवारी दादा के बारे में कहते हैं – कौनो बड़का ऊ रहलैं का. मणिकर्णिका पर एक मल्लाह कहते हैं कि वोट तो मोदी जी को दे रहे हैं.

कुछ सालों में बनारस कितना बदला?

इसके तमाम जवाब विपरीत दिशाओं में जाते मिलते हैं. बहुत साल बाद वापस इस शहर में आने पर खुद को ये दिखता है कि गोदौलिया में जहां पहले तांगे और ऑटो खड़े होते थे, अब वहां ऑटो और ई-रिक्शा खड़े होते हैं. सड़कों पर जाम बढ़ता जा रहा है. रिक्शे से गोदौलिया से मैदागिन जाते हुए करीब डेढ़ किलोमीटर पौन-एक घंटे में पहुंचे.

तांगा स्टैंड
तांगा स्टैंड

बनारस मंद रफ्तार वाली जगह रही है, अभी भी है, लेकिन दोनों मंद रफ्तार में बड़ा फर्क दिखता है. घाट पर खंभे से लटके बोस के बड़े-बड़े स्पीकर दिखते हैं. शोर बढ़ता जा रहा है. शोर इतना है कि अपना नाम बड़ी प्यारी सी आवाज में बताने वाले कुटुर कहते हैं कि कभी-कभी वो इस शोर से तंग आकर घाट से भाग जाते हैं.

बनारस के लोग अपनी राय जरूर दे देते हैं. हम गोदौलिया से दशाश्वमेध घाट की तरफ बढ़े ही थे कि हाथ में कैमरा-माइक देखकर करीब पैंतीस साल का एक आदमी न्यूज़ ऐंकर्स की नकल करने लगा. नाम पृथ्वीराज सेठ. साड़ियों की दुकान. वो वोट मोदी को देने को कह रहे थे. उन्हें ये नहीं पता था कि उनका घर किस विधानसभा क्षेत्र में आता है. मैंने विधायक का नाम पूछा, तो जवाब नीलकंठ तिवारी मिला, जो अभी प्रत्याशी हैं. मैंने ये बताकर पूछा कि श्यामदेव चौधरी दादा हैं विधायक, तो उन्होंने कहा कि नहीं, वो तो पिछली बार थे. उनके सात बार से लगातार विधायक बनने के बारे में कुछ कहा, तो नीलकंठ ने कहा कि उन्हें इतना डीप नहीं पता है. दादा के टिकट कटने के बारे में वो कहते हैं कि सबका अपना-अपना खेल होता है.

मैदागिन में जूस पीने लगे, तो बगल में चाट का ठेला लगाने वाले सुरेंद्र लाल गुप्ता आए और जूस की दुकान वाले से बोले कि अब तुम्हारी दुकान फेमस हो जाएगी, जूस की दुकान वाले उन्हें बुरा-भला कहने लगे.

चाटवाले सुरेंद्र गुप्ता
चाटवाले सुरेंद्र गुप्ता

तब पता चला कि सुरेंद्र रोज जूसवाले के पास आते हैं और कुछ कहते हुए संतरा उठाकर खा लेते हैं, मैंने जूसवाले से कहा कि आप चाट खा लिया करिए, तो उन्होंने कहा कि चाटवाले लड़ने लगते हैं. चाट के ठेले पर गोलगप्पे खाने वाली एक महिला अखिलेश की तारीफ करती हैं और सपा को वोट देने को कहती हैं. नाम पूछने पर सपाट भाव से कहती हैं – मैं यादव हूं. ज्यादातर चर्चा राजेश मिश्रा बनाम नीलकंठ तिवारी होती है, बसपा उम्मीदवार राकेश त्रिपाठी की नहीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड-शो की छवि कैसी है?

बहुत से लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की कि भले ही उनका संसदीय क्षेत्र हो, लेकिन प्रधानमंत्री होते हुए उन्हें चुनाव के वक्त ऐसे रोड-शो नहीं करने चाहिए. लेकिन जिनके लिए ये किया गया था, वो क्या सोचते हैं? ऑटो चलाने वाले विजय कहते हैं – एक प्रधानमंत्री रोड-शो करके वोट मांग रहा है, किसी और प्रधानमंत्री ने भला किया है ऐसा!

सवारी बिठाए हुए एक ई-रिक्शा वाला चिल्लाते हुए गुजर जाता है – मोदी को जिताइए, देश को बचाइए.
एजाज कहते हैं कि दादा को अपने व्यवहार की वजह से कुछ मुस्लिमों का भी वोट मिलता था, जो कि इस बार नहीं मिलेगा.
माना जा रहा था कि आश्वासन गुरु के नाम से पहचाने जाने वाले कांग्रेस के राजेश मिश्र भाजपा के नीलकंठ पर भारी पड़ रहे हैं. फिर ये माना गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड-शो के बाद स्थिति बदली है. हालांकि मुझे ऐसा कोई नहीं मिला, जो रोड-शो से पहले राजेश मिश्र को वोट देने की सोचे हो और बाद में भाजपा को.
शीतल मुझसे सीधे पूछते हैं कि क्या वाकई मीडिया नेताओं के हाथों बिका हुआ है.

नीचीबाग से गुजर रहे थे कि चाय की एक दुकान पर एक शख्स ने इशारा करके बुलाया. दिलचस्प बात करने वाले लोग. लेकिन ज्यादातर केवल बोलने को आतुर. तमाम उलटबांसी भी देखने को मिली. जिन दादा के किस्से पूरा जमाना सुनाता है, उनसे लोग नाराज दिखे कि सात बार से जीतते रहने के बावजूद उन्होंने कोई खास काम नहीं किया है. व्यापारी वर्ग के कुछ लोग ये बोलते दिखे कि वो भाजपा को वोट देते थे, भाजपा के वोटर माने जाते हैं लेकिन इस बार नहीं देंगे. कोई कहता है कि सफाई है, तो कोई कहता है कि नहीं है. कोई कहता है कि गंगा पहले से साफ है, तो कोई कहता है कि गंगा निर्मल हो गई. जरा गौर से देखिए, तो सब दिख जाता है.
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देखि-देखि जिय अचरज होई यह पद बूझें बिरला कोई,
धरती उलटि अकासै जाय, चिउंटी के मुख हस्ति समाय.
बिना पवन सो पर्वत उड़े, जीव जन्तु सब वृक्षा चढ़े,
सूखे सरवर उठे हिलोरा, बिनु जल चकवा करत किलोरा.
बैठा पण्डित पढ़े कुरान, बिन देखे का करत बखान,
कहहि कबीर यह पद को जान, सोई सन्त सदा परबान.

– उलटबांसी, कबीर (जो जीवन भर काशी में रहे और मरने के वक्त मगहर चले गए)


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