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शामली से ग्राउंड रिपोर्ट: मदरसे की छत पर तिरंगा था, मगर दिखावा नहीं था

कैराना में गन्ना बहुत उगाया जाता है. इस जमीन पर कभी एक बेहद मीठी आवाज उगी थी, जिसकी कई शाखाएं निकलीं. उस्ताद अब्दुल करीम खान. किराना घराने के संस्थापक. कैराना से किराना नाम वाले इस घराने में बाद में सवाई गंधर्व, रोशन आरा बेगम, गंगूबाई हंगल और भीमसेन जोशी फले-फूले.

लेकिन पिछले कुछ वक्त से कैराना और आस-पास से जुड़ी कसैली खबरें ही सामने आईं. कैराना जाते हुए हम कांधला सब्जी मंडी गए, जो शामली विधानसभा में है. वहां मिले ज्यादातर लोग मुस्लिम थे. वो नोटबंदी से नाराज हैं. कहते हैं कि शहरों में भले कुछ दिन में हालात सामान्य हो गए हों, लेकिन किसान जो उस टाइम पर सब्जियां नहीं बो पाए, उसका असर आज तक इस मंडी में दिखता है. वो मुजफ्फरनगर दंगों पर गुस्सा हैं. वो कांग्रेस के विधायक और उम्मीदवार पंकज मलिक से नाराज हैं. कहते हैं कि पंकज मलिक की जगह कोई और खड़ा होता तो उसकी जीत पक्की थी या सपा किसी और को खड़ा कर देती, तो उसकी जीत पक्की थी. वो कहते हैं कि जो मुस्लिम वोट पंकज मलिक को मिलता, वो अब बंटेगा, लेकिन सामने कोई अच्छा विकल्प नहीं है. सपा से टिकट की उम्मीद टूटने के बाद निर्दलीय लड़ रहे मनीष चौहान का भी जोर बताया गया है. लेकिन कई लोग मानते हैं कि पंकज मलिक इतने भी कमजोर नहीं हैं.

खैर, इस सब्जी मंडी में ज्यादातर आढ़ती मुस्लिम हैं, लेकिन मंडी के अध्यक्ष एक हिंदू हैं. वजह ‘सामाजिक सौहार्द और दूसरी जगहों पर अच्छा संदेश देना’ बताई जाती है. कोई कारण नहीं है, लेकिन ऐसी बातों पर यकीन नहीं होता कि इस मकसद से ऐसा किया गया होगा.

वहीं पर हमें मुजफ्फरनगर के नसीम अहमद मिले, जो दंगों की वजह से भाग आए थे. उन्होंने थोड़ा-बहुत कैमरे पर भी बोला. लेकिन ऑफ कैमरा जो बोला, वो दिमाग को सुन्न कर देने वाला था. उन्होंने जो बोला, वो किसी कहानी का हिस्सा होता, तो वो कहानी कालजयी हो सकती थी, लेकिन ये हकीकत का हिस्सा था. उन्होंने बताया कि जब वो दंगों से डरकर भागे, तो उनके साथ एक बच्ची थी. बच्ची रो रही थी. उन्होंने बच्ची का मुंह दाब दिया. मन में ख्याल था कि बच्ची मर गई तो यहीं फेंककर चले जाना है. वो बता रहे थे कि ऐसे हालात में आदमी क्या से क्या हो जाता है और ये क्या से क्या होना किसी दूसरे के लिए नहीं, अपनों के लिए था.

वहीं एक रास्ते पर सड़क के कमोबेश बराबर डिवाइडर बनाया जा रहा है. डिवाइडर यानी दो चीजों को बांटने वाला. इस डिवाइडर को देखकर बंदर बांट वाली कहानी याद आती है. जो बांटने के चक्कर में खुद ही हज़म कर जाता है. वैसे ही ये डिवाइडर सड़क के साथ में कर रहा है.

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कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को भाजपा से टिकट मिला है. हसन परिवार के नाहिद हसन, जो अभी विधायक भी हैं, को सपा से टिकट मिला है. खुद को टिकट न दिए जाने से नाराज होकर भाजपा छोड़ने वाले हुकुम सिंह के भतीजे और मृगांका के चचेरे भाई अनिल चौहान को रालोद से टिकट मिला है. नाहिद हसन बहुत कम उम्र के हैं और उनकी छवि ज्यादा अच्छी है. हुकुम सिंह पलायन वाली लिस्ट लाकर पूरे देश में चर्चित हो चुके हैं. उनका भी जोर कम नहीं है, लेकिन भतीजे अनिल चौहान के अलग होने की वजह से उनकी मुश्किलें बढ़ गई हैं. रालोद से टिकट और हुकुम सिंह से अलग छवि की वजह से अनिल चौहान का भी एक वोट बेस है. हालांकि साफ बढ़त नाहिद हसन को दिखती है, फिर भी लोग कहते हैं कि हुकुम सिंह बहुत घाघ हैं, रातों-रात कुछ भी करके बाजी पलट सकते हैं.

हम हुकुम सिंह, नाहिद हसन से मिलना चाहते थे, लेकिन हमें मिले उनके 3-4 नंबरों पर घंटी तक नहीं गई. मुझे नहीं पता कि हमारे पास उनके सही नंबर थे या नहीं. लेकिन मैं ये सोचता हूं कि कितने लोगों के पास उनके जनप्रतिनिधियों के फोन नंबर होते हैं, जिन पर वो अपनी किसी दिक्कत/जरूरत को बता सकें. किसी जन का जनप्रतिनिधि तक पहुंचना इतना मुश्किल क्यों होता है?

कैराना से निकलने के बाद एक जगह केवल कई बच्चे दिखाई देते हैं. मैं बच्चों से बात करने जाता हूं. पता चलता है कि वहां मदरसा है. मदरसे में जाने पर अंदर तिरंगा लहराता दिखता है. ये तिरंगा बाहर से नहीं दिखता. यहां देशभक्ति का दिखावा नहीं है. मदरसे में कम बच्चे हैं. कम उम्र के बच्चे हैं. मदरसे के कर्ता-धर्ता मौलाना बताते हैं कि 52 बच्चे थे. आज छुट्टी की वजह से कुछ इधर-उधर गए हैं. ये बच्चे दंगा झेलने वालों के बच्चे हैं. उन लोगों के बच्चे हैं, जो दंगे के बाद से अपने घर-बार से कहीं अलग रह रहे हैं, कहीं अलग काम कर रहे हैं. मदरसे को कोई सरकारी मदद नहीं मिलती. कुछ लोगों से चंदा मिलता है. तिरंगे के अलावा मदरसे में कोई झंडा नहीं था. मौलाना कहते हैं कि बच्चों को पता होना चाहिए कि ये क्या है, कहां से आया है, इसके लिए हम सबके पुरखों ने जान की बाजी लगाई.

हम थाना भवन पहुंचते हैं. रालोद की सभा हो रही है. कहा जा रहा है कि इतना नल चलाओ कि हाथी फिसल जाए, साइकिल धंस जाए और फूल का तो पता भी न चले. न जाने किस प्रेमवश एक फलवाले भाई अपने बगल बिठाकर केले खिलाने लगे. बहुत मजेदार आदमी थे. बताया कि उन्होंने 7-8 बार अलग-अलग चुनावों में वोट दिए हैं. और ऐसा हर बार हुआ है कि उन्होंने जिसको वोट दिया, वो हार गया. यहां से सपा-कांग्रेस के उम्मीदवार का जोर नहीं है, लेकिन वो अखिलेश के फैन हैं, इसलिए बाकी किसी को वोट दे दें, उसको वोट नहीं देंगे. कहीं हार न जाए!

थाना भवन से कई चुनावों में बहुत नजदीकी मुकाबला रहा है और इस बार भी ऐसी ही संभावना बन रही है. हालांकि भाजपा विधायक और उम्मीदवार सुरेश राणा के वैसे बयान आने शुरू हो गए हैं, जिसके लिए एक विधायक को देश का बड़ा हिस्सा जानने लगा है. फिर भी रालोद और जाट रिजर्वेशन का फिर से शुरू होना उनके लिए कुछ मुश्किल कर सकता है. उनके लिए आसानी वाली बात ये है कि रालोद और बसपा के कैंडीडेट एक ही बिरादरी से आते हैं.

हम सुरेश राणा के चुनावी कार्यालय पहुंचते हैं. वहां से पता चलता है कि वो कहां मिलेंगे. उनके चुनावी कार्यालय के सामने की इमारत पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और अन्धता निवारण का बोर्ड दिखता है.

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हम सुरेश राणा से मिलने गोहरनी जाते हैं. एक सीमा के बाद आगे का रास्ता नहीं दिखता. रेल पटरी के नीचे से रास्ता बन रहा है, लेकिन बारिश में पानी भरने की वजह से वो बंद है.

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हीरा (गाड़ी) को वहीं छोड़कर हम पटरी पार करके गोहरनी पहुंचते हैं. सुरेश राणा एक दिन पहले ही बोल चुके हैं कि वो हारेंगे तो देवबंद में जश्न मनेगा और जीतेंगे तो कई जगह कर्फ्यू लगेगा. लेकिन पलायन में सांप्रदायिकता या कानून-व्यवस्था की गड़बड़ी के सवाल पर वो राज्य सरकार और गुंडों को कोसते हैं, लेकिन सांप्रदायिकता का जिक्र नहीं करते. वो बीजेपी की सरकार बनने पर दंगों की फिर से जांच की बात करते हैं (मुजफ्फरनगर दंगों की.) बातचीत खत्म होने से पहले ही भारत माता की जय के जोरदार नारे लगते हैं और एक आदमी मुझसे पूछ के तसल्ली भी करता है कि ये आ गया है न, यानी कैमरे में रिकॉर्ड तो हो गया है न. कई नेताओं के मुंह से जवाब ऐसे निकलता है कि मन करता है उनका गला टटोलकर देखूं, कहीं कोई कैसेट या सीडी तो फिट नहीं है!

हम थाना भवन लौटते हैं और रालोद के जावेद राव से मिलने जाते हैं. अंदर-बाहर से झख सफेद मकान. जावेद राव पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं. कैमरे पर ये पूछने पर कि जाट आपको वोट देंगे, वो कहते हैं कि जाट क्या होता है, वो कोई अलग होता है क्या, सब एक हैं टाइप की बातें करते हैं. कैमरे से इतर फोन पर किसी को तसल्ली देते हुए बताते हैं कि कल जिन नौ गांवों में वो गए थे, उसमें से इतने जाटों के ही थे.हेलीकॉप्टर से प्रचार करेंगे. कहते हैं कि गाड़ी से कहां तक कहां-कहां जाएंगे. कहते हैं कि अजित सिंह ने भिजवाया है.

मैंने उनसे कहा कि कमरे के एक कोने में गमले में जो नकली पेड़ लगा है और उसके बगल में एयर प्यूरीफायर लगा है, तो असली पेड़ लगा देते, एयर प्यूरीफायर की जरूरत नहीं रह जाती. उन्होंने कहा कि वो तो यहां रहते भी नहीं, वो तो सारा दिन गांवों में भटकते हैं. यहां बैठकर लोग बीड़ी-सिगरेट पीते हैं और वो उनको मना नहीं करते, इस खातिर लगवाया है. जनता की सेवा को लेकर वो बहुत तत्पर नजर आए. बोले कि हार गया तो और सेवा करूंगा, ताकि जनता अगली बार मौका दे.

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कहते हैं कि एक बार मन्ना डे जब कैराना आए, तो उस्ताद अब्दुल करीम खान, किराना घराना और घराने से जुड़े लोगों के सम्मान में जूते उतारकर अपने हाथ में ले लिए थे. जूते उतारकर हाथ में लेना हमेशा सम्मान के लिए ही नहीं होता.

चुनावी किस्से

लल्लनटॉप शो भी आ रहा है

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