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बागपत से ग्राउंड रिपोर्ट : यहां विधायक बनते हैं, सड़क नहीं बनती

शहर का किनारा. उसे छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था.
वहीं एक ट्रक खड़ा था. उसे देखते ही यकीन हो जाता था, इसका जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार करने के लिए हुआ है. जैसे कि सत्य के होते हैं, उस ट्रक के भी कई पहलू थे. पुलिसवाले उसे एक ओर से देखकर कह सकते थे कि वह सड़क के बीच में खड़ा है, दूसरी ओर से देखकर ड्राइवर कह सकता था कि वह सड़क के किनारे पर है. चालू फैशन के हिसाब से ड्राइवर ने ट्रक का दाहिना दरवाजा खोलकर डैने की तरह फैला दिया था. इससे ट्रक की खूबसूरती बढ़ गई थी; साथ ही यह खतरा मिट गया था कि उसके वहां होते हुए कोई दूसरी सवारी भी सड़क के ऊपर से निकल सकती है.
– श्रीलाल शुक्ल की किताब राग दरबारी की शुरुआती पंक्तियां


हम उत्तर प्रदेश के चुनाव का जायजा लेने निकले हैं. हम चार. मैं, रजत, हमारी गाड़ी हीरा और हीरा को हांकने वाले जरनैल. इस हीरा को मोती से मिलना है. बनारस में. वो बनारस, जहां लमही है. प्रेमचंद का गांव. जिनकी कहानी ‘दो बैलों की कथा’ से हमने हीरा और मोती नाम लिए.

दिल्ली से बागपत जाने के लिए उत्तर प्रदेश की जिस पहली सड़क पर हम उतरे, वो पुस्ता रोड है. ये इलाका लोनी, गाजियाबाद का है. उत्तर प्रदेश में घुसते ही मुझे राग दरबारी की शुरुआती पंक्तियां याद आईं. हालांकि ये आज लिखी जाती तो शुरुआत कुछ यूं होती – शहर का किनारा, जिसे छोड़ते ही एक और शहर का महासागर शुरू हो जाता है.

बहुत पहले इस इलाके में कभी बाढ़ आई होगी, जिससे बचाव के लिए बहुत ऊंचा तटबंध बनाया गया. ये सड़क इसी तटबंध पर है. गड्ढो से बनी इस सड़क पर दो गाड़ियां अगल-बगल सही-सलामत गुजर जाएं, तो बड़ी बात है. रोमांच का रोमांच कि गाड़ी नीचे नहीं गिरी.

सड़क खत्म होते ही सामने एक थाना दिखता है. थाने का नाम है ट्रोनिका सिटी. इसी सड़क के सामने का थाना. न्यूयॉर्क या लॉस एंजेलेस का थाना नहीं. मुझे आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के फुल पेज चमकदार ऐड याद आते हैं, जिसकी खूब खबरें और विज्ञापन छापे गए और जो अभी तक कायदे से न पूरा बना है, न शुरू हुआ है.

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सड़क के खत्म होते ही एक ओर सड़क के लिए संघर्ष कर रही समिति का बोर्ड दिखा. कई नस्लें सड़क के लिए यूं ही संघर्ष करके खत्म हो जाएंगी. इस समिति के कर्ता-धर्ता सुरेंद्र विश्वकर्मा मिले. उन्होंने इस सड़क के लिए हस्ताक्षर अभियान से लेकर बसपाई विधायक और भाजपाई सांसद तक को चिट्ठियां लिखने के सारे काम किए हैं.

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सुरेंद्र खुद भाजपाई हैं. उन्होंने बताया कि एक बार सांसद वीके सिंह से किसी और काम से मिलने गए. मौका मिलने पर इस सड़क की बात उठा दी. वीके सिंह ने कहा कि उन्होंने ये ये किया है. इन्होंने कहा कि मैंने RTI डाली थी, उसमें ऐसा कुछ नहीं है कि आपने कुछ किया हो. तो वीके सिंह जिला परिषद और न जाने क्या-क्या बताने लगे. उन्होंने बताया कि कुछ लोगों की निजी मदद से कभी-कभार इस पर थोड़ा-बहुत मरम्मत का काम भी कराया गया है.

“मैं चाहता हूं कि जिस तरह सरकारें अधबनी सड़कों के फुल पेज ऐड छाप देती हैं, वैसे ही जनता चंदा जमाकर टूटी सड़कों के फुल पेज ऐड छपवा दे.”

इस एक सड़क पर इतनी बातें क्यों? ये सड़क दिल्ली आने-जाने वाले लोगों से अटी पड़ी रहती है. ऐसी न जाने कितनी सड़के हैं, जिन पर ज्यादातर लोग रोज सुबह-शाम आते-जाते होंगे. क्या इस बात का कहीं कोई लेखा-जोखा होगा कि जितना समय लोगों ने खराब सड़क की वजह से आने-जाने में ज्यादा लगाया, उतने में वो क्या-क्या कर सकते थे? इस कर लेने में एक्स्ट्रा काम से लेकर घर-परिवार और यार-दोस्तों के साथ सुकून से बैठने तक कुछ भी हो सकता है, बजाय उस सड़क पर झख मारने के.

अद्भुत तकनीक से बनी सड़क

उससे अगली सड़क का दृश्य तो अद्भुत समावेशी वाला दिखा. ये स्टेट हाइवे 57 है. सड़क के बीचोबीच खड़ंजा! खड़ंजा माने केवल ईंटें जोड़कर बना दी जाने वाली सड़क. कच्ची सड़क से पक्की सड़क की यात्रा के बीच खड़ंजा एक अहम कड़ी है. भला उसकी कैसे उपेक्षा की जा सकती है. इसी सड़क पर दो तरह के डिवाइडर की छटा निराली है. एक तो जैसे डिवाइडर सड़क के बीच होते हैं, वैसे ही हैं. बस उनके बीच झाड़-झंखाड़ उगाने के लिए पर्याप्त मेहनत की गई होगी. दूसरी जगह पर डिवाइडर है ही नहीं, बल्कि डिवाइडर वाली जमीन बाकी सड़क से थोड़ा नीचे और न जाने किस विधि से ऊबड़-खाबड़ है. यकीनन ये तकनीक दुनिया में सबसे कम बजट में डिवाइडर बनाने वाली तकनीकों में से एक होगी.

बागपत के शहरी (अगर शहरी कहा जा सके तो) इलाके में बात करने पर ज्यादातर लोगों ने बताया कि भाजपा उम्मीदवार योगेश धामा (जो कि पहले रालोद में थे) का जोर ज्यादा है, उन्हें कुछ टक्कर बसपा उम्मीदवार अहमद हमीद देंगे, जिनके पिता नवाब कौकब हमीद पिछली बार रालोद से दूसरे नंबर पर रहे थे और रालोद के खतौली से विधायक और बागपत से उम्मीदवार करतार सिंह भड़ाना रेस में नहीं हैं. लेकिन जोर लगाने पर वोट काटने का काम कर सकते हैं. सपा-कांग्रेस के कुलदीप उज्ज्वल का कहीं कोई नाम नहीं आता. एक फेसबुक लाइव की तैयारी में थे कि बिना नंबर वाली कार से गुजरते हुए एक भाई साहब बोल गए कि योगेश धामा ही जीतेगा.

बात गांव की भी 

गांव के जिन इलाकों में हम गए, वहां अगर पहले नंबर पर योगेश धामा को नहीं बताया जाता, तो दूसरे पर जरूर बताया जाता. चुनाव को लेकर एक बहुत सामान्य नियम काम करता है. मान लीजिए कि क, ख, ग और घ चुनाव लड़ रहे हैं. अलग-अलग जगहों पर चारों को जोरदार बताया जाता है, लेकिन दूसरे नंबर पर हर जगह घ को बताया जाता है, तो घ के जीतने की संभावना ज्यादा होती है. इस लिहाज से यहां योगेश धामा की संभावना ज्यादा है. हालांकि हर कोई मानता है कि करतार सिंह भड़ाना के पास पैसे की ताकत ज्यादा है, इसमें भी उनके समर्थकों का मानना है कि भड़ाना को पैसों का लालच नहीं, राजनीति में उन्हें संतोष मिलता है! नवाब कौकब हमीद पांच बार विधायक रह चुके हैं, लेकिन अब उनकी उम्र हो चली है और उनके बेटे मैदान है. नवाब की इमेज अच्छी थी, लेकिन वो रालोद से थे और उनके बेटे बसपा से आए हैं. बसपा ने यहां पिछला चुनाव जीता था, इसलिए बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता.

इस इलाके में बसपा की विधायक हेमलता चौधरी का एकमात्र जो काम दिखा (हो सकता है कि उन्होंने और काम कराया हो) वो एक निहायत ही टूटी-फूटी सड़क के किनारे पटेल स्मृति द्वार है, जिसकी तस्वीर न लेने का मुझे अफसोस है. स्मृति बहुत जरूरी है और द्वार भी. ऐसा द्वार कितना मनमोहक है, जिसमें न तो कोई दरवाजा लगा हो और न ही चारों तरफ कोई दीवार हो.

एक कोल्हू पर काम करने वाली कुछ लड़कियां-औरतें मिलीं. बारिश की वजह से कोल्हू बंद था. उन्हें ये नहीं पता था कि वहां से कौन-कौन खड़ा है. उनका ये जानना भी इस लोकतंत्र की मजबूती बढ़ाएगा. उन्होंने बातें की, लेकिन कैमरे पर कुछ बोलने के लिए उन्हें किन्हीं पुरुषों की इजाजत लेनी थी, जो उस वक्त वहां नहीं थे.

ढिकौली यहां रालोद का गढ़ है. बागपत से पिता-पुत्र (चरण सिंह-अजित सिंह) के 9 बार सांसद रहने के बावजूद मैंने अब तक की यात्रा में केवल यहीं पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का आदमकद पोस्टर लहराते देखा. यहां लोग काफी मुखर थे, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में. एक-आध दबी जुबान में कहते हैं कि अपने कैंडीडेट को कोई हारता हुआ नहीं कहता, लेकिन योगेश धामा में कुछ जोर है, गया तो वो रालोद से ही है न.

लोग नोटबंदी की आलोचना करते हैं. ये पूछने पर कि नोटबंदी न होती, तो क्या बीजेपी को वोट देते, वो इनकार करते हैं. इस गांव में कोई फैक्टर या किसी उम्मीदवार का जोर नहीं है, यहां रालोद का नाम ही काफी है. पता चलता है कि रालोद उम्मीदवार करतार सिंह भड़ाना आने वाले हैं. हम इंतजार करने लगते हैं. हमारी ‘सपेसल खातिरदारी’ में चाय बताकर हमें दूध पिला दिया जाता है.

लौटते हुए एक खेत में गए. ठंड में कई जोड़ी नंगे पांव कीचड़ में. मजदूरी करने वाली सभी औरतें. 100 रुपए पर पूरे दिन मजदूरी करने वाली औरतें. मेथी काटती हुई. काटी हुई मेथी में से नीचे का एक हिस्सा अपनी बकरी के लिए रख लेने वाली औरतें. शुरू में कुछ कहने से झिझकती हैं. फिर सवाल पर एक दूसरे से ठिठोली करते हुए खुलती हैं और उनके दुखों की पोटली खुलती है. जो बस कह देने के लिए नहीं था.

जान लीजिए कि हम कब आएंगे आपके शहर

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