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यूपी का वो मुख्यमंत्री जिसके आम पूरी दुनिया में फर्स्ट प्राइज लाए थे

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उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं. 14 करोड़ वोटरों वाला ये राज्य यूरोप के कई देशों के बराबर है. केंद्र सरकारों के लिए ये राज्य जीतना बहुत जरूरी हो जाता है. अगर केंद्र में सरकार बनाना वर्ल्ड कप जीतने जैसा है तो यूपी का चुनाव जीतना भारत-पाक सीरीज जीतने जैसा है.

पर यूपी हमेशा उत्तर प्रदेश नहीं हुआ करता था. 

ब्रिटिश राज से पहले यूपी कोई राज्य नहीं था. छोटी-छोटी कई रियासतें थीं. ब्रिटिश राज में भी यही रवैया जारी रहा. 1857 की क्रांति में कई रियासतों के राजाओं ने हिस्सा लिया था. तो अंग्रेजों ने यूनिटी तोड़ने के लिए रियासतों को अपनी सुविधा से अलगा-अलग करना शुरू किया. दिल्ली को काट दिया. पंजाब की तरफ कर दिया. पंजाब में ज्यादा विद्रोह नहीं हुआ था 1857 में. अजमेर-मारवाड़ को राजपूताना और अवध के साथ मिला दिया गया. आगरा की रियासत तो थी ही. अब नये राज्य को नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज ऑफ आगरा और अवध कहा जाने लगा. 1902 में इस राज्य को यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा औऱ अवध कर दिया गया. तब से इसे यूनाइटेड प्रोविंसेज यानी यूपी कहा जाने लगा. 1 नवंबर 1937 को नाम हो गया यूनाइटेड प्रोविंसेज. 1950 में नाम हुआ उत्तर प्रदेश.

इसी दौर में उत्तर प्रदेश की राजनीति की नींव रखी जा रही थी

1920 में राज्य की राजधानी को इलाहाबाद से हटाकर लखनऊ कर दिया गया. हाई कोर्ट इलाहाबाद में ही रह गया. यूपी का रौला हुआ करता था. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और दारुल उलूम देवबंद जैसे संस्थान थे. बिस्मिल और आजाद जैसे क्रांतिकारी निकले थे. जिनसे पूरा देश प्रेरणा लेता था. यहीं से मोतीलाल नेहरु, जवाहर लाल नेहरु, मदन मोहन मालवीय और गोविंद बल्लभ पंत जैसे कांग्रेस के नेता निकले थे. किसानों का अलग आंदोलन शुरू हुआ था. स्वामी सहजानंद सरस्वती ऑल इंडिया किसान सभा के प्रेसिडेंट चुने गये थे.

इन सबके बीच यूपी अंग्रेजों के राज में ही एक राज्य की तरह डेवेलप हो रहा था. मंत्रिमंडल और प्रशासन की रूपरेखा तैयार हो रही थी. सब कुछ अंग्रेजों की अपनी सुविधा से हो रहा था. पर मजेदार ये था कि विरोध करते हुए इंडियन नेता इसी प्रशासन को समझकर जाने-अनजाने में आने वाले वक्त की तैयारी कर रहे थे. तो यूपी के बुलंदशहर और अलीगढ़ के बीच एक रियासत छतारी थी. यहां मुस्लिम राजपूत यानी लालखानी कहे जाने वाले नवाब थे. पहले ये रियासत इतनी छोटी थी कि यहां के जमींदार को कुंवर कहा जाता था. 1915 में नवाब कहा गया. रियासतों के नवाब उस वक्त अंग्रेजों की ताबेदारी करते थे. आंदोलन में साथ देने पर सब कुछ जनता को लुटा देने का डर था. ना देने पर अंग्रेजों के साथ लड़ने की चुनौती थी. वो कर नहीं सकते थे. तो उनके बनाये सिस्टम में पार्टिसिपेट करने लगे.

इसी में अंग्रेजों ने यूपी को पहला मुख्यमंत्री दे दिया था. नवाब मुहम्मद अहमद सैयद खान छतारी.

अरब से जुड़ी थी जड़ें, पर किस्मत यूपी की राजनीति में ला रही थी

सैयद खान के दादा मुहम्मद अली 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश राज में हिंदुस्तान में नहीं रहना चाहते थे. सऊदी अरब में बस गये थे. पर उनके बेटे-बहू यानी सैयद के अम्मी-अब्बा की मौत सऊदी अरब में ही हो गई. तो अपने पोते सैयद की परवरिश करने के लिए वो इंडिया वापस आ गये. पर जब सैयद 8 साल के थे तब दादा की भी मौत हो गई. रियासत तो थी ही. काम चलने लगा. किस्मत भी साथ थी.

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नवाब मुहम्मद अहमद सैयद खान छतारी

सैयद खान का दिमाग शॉर्प था. ये हाफिज बन गये थे यानी कुरान याद कर लिये थे. खयालात भी मॉडर्न थे. जिस वक्त जमीन की लड़ाई हुआ करती थी, ये कहा करते थे कि जमीन के बजाय मैं इंडस्ट्री लगाना पसंद करूंगा. 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के बाद अंग्रेजों ने भारतीयों को अपनी व्यवस्था में शामिल करना शुरू किया. जब इलेक्टेड डिस्ट्रिक्ट बोर्ड बने तब सैयद खान पॉलिटिक्स में आ गये. 1921 में इनके चेयरमैन बने. फिर वहीं से इनको यूपी लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए जमींदारों ने नॉमिनेट कर दिया. 1925 में होम मेंबर यानी मिनिस्टर टाइप की पोजीशन पर पहुंचे. बहुत ज्यादा पावर तो नहीं थी फिर भी रिकमेंड करने भर की पावर थी. तो इन्होंने एक बदलाव किया. उस वक्त नौकरियां सिफारिश पर लगती थीं.  तो इनका कहना था कि सिफारिश के बजाए क्लर्कों के लिए परीक्षा करा ली जाए. उस वक्त अहीर और कुर्मी जातियां नौकरियों से बाहर थीं. तो नवाब ने इनको प्रोसेस में शामिल करते हुए ओपन रिक्रूटमेंट की शुरूआत की. अभी ये छोटी बात लगती है. पर उस वक्त ये चीजें मॉडर्न और निष्पक्ष हुआ करती थीं. नवाब 17 मई 1923 से 11 जनवरी 1926 तक यूपी की कैबिनेट में मिनिस्टर रहे. मिनिस्टर ऑफ इंडस्ट्री रहते हुए नवाब को उत्तर प्रदेश में चीनी मिल और आटे की मिलों को बैठाने का श्रेय प्राप्त है.

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राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस

मोतीलाल नेहरू की बेटी को जेल में देख रो पड़े गवर्नर छतारी

नवाब छतारी ने पहले राउंड टेबल कांफ्रेंस में हिस्सा लिया था. इंडिया से मुस्लिम डेलिगेशन आगा खान, जिन्ना, मुहम्मद अली, जफरुल्ला के नेतृत्व में गया था. छतारी भी थे इसमें. फिर 1931 में नवाब मिनिस्टर ऑफ एग्रीकल्चर बने. 1933 में जब ये गवर्नर बने तब ये पहली बार हुआ था कि किसी इंडियन को गवर्नर बनाया गया था. अप्रैल-नवंबर 1933 तक ये इस पद पर रहे. ये किसानों के आंदोलन से भी जुड़े रहे. नेशनल एग्रीकल्चरल पार्टीज के लीडर चुने गए. फिर जब गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 आया तो नवाब को 1937 में यूपी का चीफ मिनिस्टर बनाया गया. बाद में नवाब ने चीफ मिनिस्टरी छोड़ दी. होम मिनिस्टर बन गये. 1937 में ही चुनाव हुए थे. चुनाव के बाद गोविंद बल्लभ पंत कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री बने थे. फिर दूसरे विश्व-युद्ध के चलते विधानसभा भंग कर दी गई.

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नवाब मुहम्मद अहमद सैयद खान छतारी एक मीटिंग में

गवर्नर के तौर पर नवाब एक बार जेल इंसपेक्शन करने गये थे. वहां उन्होंने विजयलक्ष्मी पंडित को देखा. मोतीलाल नेहरू की बेटी को देख रो पड़े थे. हिंदुस्तान के नेताओं की ये बड़ी ही रोचक दास्तान थी. एक साथ दो जिंदगियां जीते थे. कर्म से अंग्रेजों के साथ रहते. मन से हिंदुस्तानियों का दर्द जाता नहीं था. इस कॉन्फ्लिक्ट ने ही भारत की मॉडर्न राजनीति को जन्म दिया था.

जुलाई-अगस्त 1941 के बीच नवाब नेशनल डिफेंस काउंसिल के मेंबर बने. फिर यहां से छोड़कर वो हैदराबाद एग्जीक्यूटिव काउंसिल के प्रेसिडेंट बन गये. सरल शब्दों में निजाम के वजीर बन गये. 1 नवंबर 1947 तक वहां रहे. निजाम ने इनको सईद-उल-मुल्क का टाइटल दिया था. निजाम ने तो इंडिया से अलग होकर देश बनाने की पूरी कोशिश की थी. पर हो नहीं पाया था.

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वजीर का घर

नवाब के शौक और इनकी बातें भी मजेदार थीं

राजनीति से इतर भी इनके शौक थे. 1935 में लंदन में आमों का फेस्टिवल हुआ था. इंडिया की तरफ से नवाब गये थे. रहतौल आम लेकर. वहां पर फर्स्ट प्राइज जीते. दुनिया में सबसे अच्छा आम माना गया ये.

आजादी के बाद नवाब सोशल कामों में बिजी हो गए. ऑल इंडिया बॉय स्काउट्स असोशिएशन के चीफ स्काउट रहे. 1955 से 1982 में अपनी मौत तक. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर रहे. दिसंबर 1965 से जनवरी 1982 तक. अपनी आत्मकथा भी लिखी- याद-ए-अय्याम.

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इंदिरा गांधी के साथ

नवाब की जिंदगी से जुड़ा एक और रोचक किस्सा है. 1977 में नवाब ने आईएएस अफसरों को डिनर पर बुलाया था. संगे-साजो-सामान था. बातें हो रही थीं. नवाब ने अफसरों को तीन सीखें दीं-

1. किसी की अति बड़ाई मत करो. कुछ दिन बाद विचार बदलना भी पड़ता है.

2. गुस्सा कंट्रोल करो. ये छुआछूत की बीमारी है. फैल जाती है.

3. जहां काम करते हो, उनकी भाषा तो सीख ही लेना.

नवाब छतारी ने अंग्रेजों के दरबार से लेकर निजाम और फिर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के चांसलर तक का सफर तय किया. बदलते भारत के हर दौर में रहे थे नवाब. अगर देखा जाए तो एक छोटी सी रियासत से निकलकर इतनी सारी चीजें एक जिंदगी में करना बहुत बड़ी बात थी.

आगे हम आपको पढ़ाएंगे यूपी के बाकी मुख्यमंत्रियों के बारे में. सबने बस चुनाव हारा-जीता नहीं था. सबने जिंदगी भी जी थी.

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