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डेमोक्रेसी के लिए हमारा बार-बार अपहरण हो, इसी में लोकतंत्र की मज़बूती है

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ये सेकुलर शुकुल हैं. रोजी रोटी के लिए खबरनवीसी करते है. इनको किस्से कहानी कहना अच्छा लगता है. कुछ लिखी भी हैं, जो छपी भी हैं. छापते नहीं तो जाते कहां? कहानी में वजन रहता है, वजन समझते हैं? ‘लव स्टोरी वाया फ़्लैश बैक’ के लिए कथादेश पत्रिका का नंबर दो का इनाम भी मिला. दो फोटो भेजे थे उनमें से ये वाली हम लगा रहे हैं. दूसरी वाली में मुंह से बड़ा चश्मा था. ये कहानी बहुत पहले लग जानी थी.  देर से लगाने के लिए माफी चाहेंगे. देर का मतलब 8 महीने.


कैलाश गौतम ने अपनी सबसे मशहूर रचना अमौसा का मेला (ये कविता कुंभ मेले के बारे में लिखा गई थी कि ग्रामीण समाज किस मानसिक अवस्था में मेले में आता है) में लिखा था.

गुलब्बन कै दुलहिन चलै धीरे-धीरे
भरल नाव जैसे नदी-नदी तीरे-तीरे .

लेकिन, अब गुलब्बन की दुल्हन का धीरे-धीरे चलने से काम चलने वाला कहां है. पंचायत चुनाव कोई कुंभ का मेला थोड़ी है जहां मनै-मन छुहारा और मुनक्का होते हुए सोठऊरा का मसाला मोलना है. यहां सवाल तो बीडीसी मेंबरी के मोलभाव का है. और बीडीसी मेंबरी का मोलभाव कोई ऐसा थोड़ी है कि गुलब्बन खलीता में हाथ डालें और मोला लें. यहां तो मोलभाव में जरा सा चूक गए तो ब्लॉक प्रमुख बनने की इच्छा रखने वाले बोलेरो के बजाय बड़ी खूबसूरती से आपको हीरोहंडा मोटरसाइकिल में निपटा देंगे. वैसे पिछले चुनाव में हारने के बाद भी गुलब्बन खुद देश के पंचायती राज में अपना योगदान जारी रखने का प्रण किए हुए हैं. और समय-समय पर इलाके के लोगों को होली-दीवाली, ईद-बकरीद की मुबारकबाद देते रहे है. लेकिन आरक्षण ने नाश मार दिया और उनका वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हो गया.

गुल्लबन उर्फ गुलाब प्रसाद वैसे पिछले कई सालों से अपने इलाके को बता रहे थे कि वे कर्मठ हैं, योग्य हैं और ब्लॉक डेपलमेंट कौंसिल की मेंबरी के लिए उनसे ठीक कोई नहीं है. वो तो गुल्लबन पिछले साल ही बाजी मार देते, लेकिन पांडे जी ने इलाके के ब्राह्मणों को जनेऊ की सौगंध देकर उन लौंडों के वोट तोड़ लिए जो रॉयल स्टैग के कई कैरेट के सहारे गुल्लबन ने अपनी तरफ किए थे. नतीजा ये निकला की पांडे जी पछता रहे हैं और झलरा-रोटी खा रहे हैं और गुल्लबन भी 77 वोट से दूसरे नंबर पर आ गए.

पांडे जी का उल्लेख गांव के राजनीतिक विश्लेषक वोट कटवा के रुप में करते हैं. जीतने वाले भालचंद उर्फ भल्लू का ब्लॉक प्रमुखी के चुनाव के दौरान दो बार अपहरण हुआ. हालांकि ब्लॉक प्रमुख बनने की चाहत रखने वाले अपहरणकर्ता बड़े दयालु होते हैं. पहले उन्हें कार्तिनया घाट घुमाया और वहां के गेस्ट हाउस में उनकी जिंदगी का सबसे बेहतरीन खाना खिलाया. वहां से जब ये कसम देकर छूटे कि गांव के उनके टोले में पांच हैंडपंप और एक मोटरसाइकिल के बदले खुल्ला वोट बाबू जनतंत्र कुमार के पक्ष में ही जाएगा. तभी ग्रास रुट डेमोक्रेसी के दूसरे सेवक लोकतंत्र सिंह ने उन्हें सप्रेम अपहृत किया और ताजमहल दिखा कर यह कहा कि तुम मुझे वोट दो और मैं तुम्हें और तु्म्हारे गांव को वैसा प्यार दूंगा जैसे शाहजहां ने मुमताज को दिया था.

उन्होंने भल्लू को ये वादा भी दिया था कि सरकार किसी पार्टी की बने मुझे तो सरकार के साथ ही रहना है. भल्लू तुम गांव में नाली-खडंजों को लेकर खूब लट्ठ भांजो. तुम्हारे विरोधियों के साथ मैं वो सलूक करुंगा जो औरंगजेब ने अपने बाप शाहजहां के साथ किया था. लोकतंत्र सिंह जी ने भल्लू को समझाया था वे पंचायती राज के आधुनिक कृष्ण हैं. उनमें व्यक्तिव के विस्तार में शाहजहां से लेकर औरंगजेब तक हैं. हालांकि भल्लू ने जब मन बना लिया कि वोट लोकतंत्र सिंह जी को ही जाएगा. तो उन्हें एक मोटसाइकिल देकर वोट ले लिया गया.

जब भल्लू ने याद दिलाया कि पंचायती राज की सेवा के लिए उन्हें दो लाख रुपये का वादा और किया गया था तो लोकतंत्र सिंह के बंदूकुओं (लठैत -आज के युग में अप्रासंगिक हो गया है) ने उन्हें ज्ञान दिया था कि भल्लू -ई कोई एक-दो दिन की बात नहीं है. पूरे पांच साल हैं. साथै रहियो तो बहुत कुछ पईहौ. और खाली तु्म्हारेन वोट से भइया प्रमुखी नहीं जीते हैं. बखत-जरुरत काम अइहै. औ गांव में लड़ाई झगड़ा तुमरे होतै हैं. तीन-पांच करियो तो जेल जइहो और मारौ खइहौ. इस पूरे प्रकरण से वाकिफ होने के बाद गुल्लबन ने तय कर लिया था कि देश की पंचायती व्यवस्था के हित में भल्लू से ज्यादा काम करेंगे. और कम से कम तीन बार अपहृत होंगे. उन्होंने अपनी आर्थिक हालात मजबूत करने के लिए मार्फीन वगैरह की स्मगलिंग भी शुरु की. क्योंकि वे जानते थे पंचायत राज की मजबूती सिर्फ इसी में नहीं है कि आप बार-बार सप्रेम अपहृत हो ताजमहल और इमामबाड़ा देखते रहे.

पंचायत व्यवस्था में असली योगदान तब है जब तमाम सारे बीड़ीसी मेंबर आपसे कहने लगे कि प्रमुखी का चुनाव आ गए है गुल्लबन भाई हमका अगवा करिकै-ई बार गोवा देखाव दो. इसके लिए उन्होंने अपने वार्ड के मेंबर और अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी का बात-बेबात विरोध शुरु कर दिया. कभी पिटे तो कभी पीटा. पांडे जी से भी उन्होंने पंगा लेना शुरु किया और उनकी बिरादरी के लोगों को बड़ी लगन से हथियाए गए अपने देशी शराब के ठेके पर ठंडी बीयर और अंग्रेजी शराब पिलाना शुरु किया. भुल्लर के प्रकरण से उन्होंने सबक ले लिया था कि उन्हें अगवा नहीं होना है, बल्कि अगवा करना है. इसलिए अपने राजनीतिक चिंतन को उन्होंने पूरा आर्थिक दर्शन दिया. जिसके मुताबिक पंचायती राज में पैसे तभी आएंगे जब पहले निवेश की ताकत होगी वरना एक अदद मोटरसाइकिल लेकर रह जाएंगे.

लोकतंत्र सिंह को वोट देकर भुल्लर ने ब्लॉक प्रमुख बनाया था, लेकिन गुल्लबन उर्फ गुलाब भैया ने बड़ी तेजी से लोकतंत्र सिंह का सानिध्य प्राप्त कर लिया. कहा जाता है कि लोकतंत्र सिंह के एक राजनीतिक प्रतिद्धंदी जो निश्चित रुप से लोकतंत्र की ट्रिकल डाउन थ्योरी के मुताबिक डेमोक्रेसी को ग्रासरुट की खेत-मेड़ियों पर बरसने नहीं दे रहे होंगे, उनके राजनीतिक अंतिम संस्कार में सुपारी के जो पैसे लगे थे वो गुल्लबन के ही चोर जेब से निकले थे. गुलब्बन ने दूर की कौड़ी खेली और अपने काम में मंत्री जी के नालायक और अय्याश बेटे को मुफ़्त की पत्ती देकर अपने इलाके का ब्लॉक रिज़र्व कराने का वादा ले लिया.

बाबू जनतंत्र कुमार और लोकतंत्र सिंह को बड़ा धक्का लगा लेकिन अगड़ी जाति के मंत्री जी ने उनको ये कहके भगा दिया कि सालों हम पिछड़ों की राजनीति करते हैं. हालांकि मंत्री जी कहना चाह रहे थे कि सालों मेरे राजनितिक नासमझ लौंडे को तुम लोगों ने ही शराबी और अय्याश बना दिया. ब्लॉक प्रमुख का पद तो रिजर्व करा लिया लेकिन साला बीडीसी का पद महिला हो गया. लोगों ने कहा कि कोई बात नहीं गुल्लब्बन भैया चुनाव भौजी लड़िहय. गुलब्बन का विवाह बहुत छोटी उम्र में ही हो गया था. पत्नी को बड़ा प्रेम करते थे. ये सवाल सुनते ही उनके मन में ब्लॉक प्रमुख पद पर बैठी अपनी दुल्हन और बहुत काइयां जिले के प्रभारी मंत्री की छवि उभरी जो जिला योजना की बैठकों में या तो सोया करता था या महिला प्रतिनिधियों को ताका करता था.

लेकिन अगर चुनाव न लडे तो पांच साल के इन्वेस्टमेंट का होगा. और फिर पांडे जी की पतोह और भुल्लर के दोहजू मेहरारूउ तो लड़बै करी. फिर पोस्टर का मजमून बदला और बड़क्का फोटू गुलब्बन का और गौने वाला छोटा फ़ोटो उनकी दुलहिन शन्नो रानी का लगा. शन्नो रानी के नाम के पीछे पत्नी गुल्लबन भैया लिखा गया. बड़े भारी मन से निवेदक में जनतंत्र कुमार और लोकतंत्र सिंह ने भी अपना नाम लिखाया. गुलब्बन ने प्रचार शुरू किया और जाति बिरादरी के मुताबिक शराब का वितरण शुरू किया. जो मुर्गा बकरा खाते थे, पंचायती राज का नाम लेकर उनके लिए इन जानवरो की क़ुरबानी दी गई. जो शाकाहारी पियक्कड़ थे उनको तुलसी दल के साथ बोतल भेट की गई. जो सरकार के मद्य निषेध कार्यक्रम से प्रभावित थे उनको उतने ही पैसे भांग या गांजा पीने के लिए दिए गए.

धार्मिक लोगों को गंगा स्नान के लिए टिकट उपलब्ध कराए गए. इस तरह गुलब्बन की दुलहिन का प्रचार चल निकला. पंचायती राज की रक्षा के लिए राजनीति में बिलकुल भी दिलचस्पी न रखने वाली अपनी बीवी को चुनाव लड़ाना गुलब्बन की मज़बूरी थी लेकिन वे बाबू जनतंत्र और लोकतंत्र की चरित्रहीनता से वाकिफ थे. इसलिए उनको एक निश्चित रकम देकर सुनिश्चित किया गया कि वे चुनाव प्रचार में गुलब्बन की दुल्हिन के पीछे पीछे न चलें.

पांडे जी ने अपनी पतोहू और भल्लू ने अपनी दोहजू बीवी के लिए जोर लगाया लेकिन गुलब्बन के नोट फॉर वोट के नारे के आगे किसी की नहीं चली. शन्नो रानी बीडीसी बनी और प्रमुखी के लिए दावा ठोंक दिया. एक ज़माने में बीडीसी चुनाव ईमानदारी और बदलाव का वादा करके हारे गुलब्बन शन्नो को ब्लॉक प्रमुख बनाने के लिए सबको गोवा और लक्षद्वीप ले गए. उनके विपक्ष ने मेम्बरों के अपहरण का आरोप लगाया. लेकिन गुलब्बन के साथ गए मेंबरों ने चुनाव अधिकारी के सामने शपथ पत्र दिया कि अगर यही अपहरण है तो हमारा दो-चार बार और अपहरण हो. ग्रासरूट लेवल डेमोक्रेसी के लिए हमारा बार-बार अपहरण हो. इसी में लोकतंत्र की मज़बूती है. इसके बाद एक मामूली गोलाबारी. जिसमे तीन घायल हुए और एक मारा गया.

जिले के इतिहास के सबसे शांतिपूर्ण चुनाव में गुलब्बन की दुलहिन उर्फ़ शन्नो रानी ब्लॉक प्रमुख चुन ली गयी. गुलब्बन के गांव में जोरदार हर्ष फायरिंग हुई जिसमे तीन को गोली लगी. गुलब्बन ने उचित रकम से सभी का मुंह बंद किया. जब उन्होंने मुंह खोला तो कहा कि देश में पंचायती राज मज़बूत करने में गुलब्बन भैया और भौजी का बहुत योगदान रहा है. हम तो उनकी हर्ष फायरिंग में शहीद हो जाना चाहते थे लेकिन हमारा दुर्भाग्य था कि हम सिर्फ घायल हुए. इसके बाद शन्नो के दस्तख्त और गुलब्बन की हरकत से ब्लॉक प्रमुखी मजे से चलने लगी. जैसे गुलब्बन के दिन बहुरे वैसे सबके दिन बहुरे. बीडीओ आदि अपने हाथों में लिए अक्षत छिड़कने लगे.

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