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अरुण जेटली को कोसने वाला वो भाजपाई नेता, जिसने मंत्री पद को ठोकर मार दी थी

दी लल्लनटॉप आपके लिए यशवंत सिन्हा की पूरी कहानी लेकर आया है ताकि आप यशवंत की आलोचना और भाजपा के लिए उसके नतीजों को तथ्यों की रोशनी में पढ़ सकें.

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दो दिसम्बर 1989. 9वीं लोकसभा के नतीजे आ चुके थे. कांग्रेस ने अब तक के इतिहास में आपातकाल के बाद दूसरे सबसे निचले आंकड़े को छुआ था. हालांकि 197 सीट के साथ वो अब भी सदन की सबसे बड़ी पार्टी थी. विपक्ष राजीव गांधी के खिलाफ़ लामबंद था. राष्ट्रीय मोर्चा नाम से नया गठबंधन बना. 143 सीट के साथ जनता दल इसका नेतृत्व कर रही थी. बीजेपी के 85 और लेफ्ट के 52 सांसद इस जनता दल का बाहर से समर्थन कर रहे थे. कुल मिलाकर यह आंकड़ा 280 पर पहुंचा था. 272 के जादुई आंकड़े से महज़ आठ ज्यादा.

चंद्रशेखर के साथ यशवंत सिन्हा (फोटो: दी हिन्दू )
चंद्रशेखर के साथ यशवंत सिन्हा (फोटो: दी हिन्दू )

सुबह से ही राष्ट्रपति भवन में रौनक थी. देश के सातवें प्रधानमंत्री के तौर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह को शपथ लेनी थी. शपथ ग्रहण समारोह में एक बात सबको अखर रही थी. सत्तारूढ़ होने जा रही पार्टी का महासचिव वहां मौजूद नहीं था. इस आदमी का नाम था यशवंत सिन्हा. यशवंत सिन्हा अपनी आत्मकथा Confessions of a Swadeshi Reformer में पूरे वाकये को कुछ इस तरह से दर्ज करते हैं,

“आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को निर्णायक हार का सामना करना पड़ा. वीपी सिंह के नेतृत्व में नई पार्टी बनाई गई. इसे बीजेपी और लेफ्ट दोनों का समर्थन हासिल था. बतौर पार्टी महासचिव, मुख्य प्रवक्ता, केन्द्रीय कार्यालय का इंचार्ज और चीफ कैम्पेन मैनेजर के तौर पर मैंने जनता दल की जीत में अहम भूमिका निभाई थी. दुर्भाग्य से मेरे साथ काम करने वाले हर कार्यकर्ता को वीपी सिंह ने अपनी कैबिनेट में जगह दी लेकिन मुझे राज्यमंत्री बनने का ऑफर दिया गया. 

यह प्रस्ताव मेरे लिए स्वीकार करने लायक नहीं था. इस वजह से मैंने राष्ट्रपति भवन में चल रहे शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बना ली. यहां तक कि चंद्रशेखर को भी लगता था कि वीपी सिंह ने मेरे साथ ज़्यादती की है. उन्होंने मेरे सरकार में शामिल न होने के निर्णय को ठीक ठहराया.”

दस महीने बाद वीपी सिंह की सरकार गिर गई और कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर देश के नए प्रधानमंत्री बने. यशवंत सिन्हा को कैबिनेट में जगह मिली. आज़ादी के बाद सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे देश में उन्हें वित्त मंत्रालय की कमान सौंपी गई. पटना के एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार से आए एक शख्स के लिए, जिसे राजनीति में पांच साल भी नहीं हुए थे, यह एक लंबी सियासी छलांग थी.

यशवंत सिन्हा की सियासी पारी जिस तेजी से बढ़ी वो चौंकाने वाली थी.
यशवंत सिन्हा की सियासी पारी जिस तेजी से बढ़ी वो चौंकाने वाली थी.

6 नवंबर, 1937 को पैदा हुए यशवंत सिन्हा ने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास में ग्रेजुएशन किया. यहीं से राजनीति विज्ञान में मास्टर्स किया. साल था 1958. पढ़ाई खत्म करने के बाद बैचलर कोर्स के छात्रों को राजनीति विज्ञान पढ़ाते रहे और सिविल सर्विसेज की तैयारी करते रहे. 1960 में उनका सलेक्शन भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में हो गया. उनकी पहली नियुक्ति एसडीओ के तौर पर हुई गिरडीह सब डिविजन में. गिरडीह उस समय हज़ारीबाग जिले का हिस्सा हुआ करता था.

अपने 24 साल के प्रशासनिक करियर में वो बिहार सरकार में वित्त और कॉमर्स मंत्रालय के डिप्टी सेकेट्री रहे. 1971 में उन्हें बतौर फर्स्ट सेकेट्री जर्मनी भेजा गया. 1973 में उनकी नियुक्ति जर्मनी में भारत के काउंसल के तौर पर हुई. यहां से वो लौटे 1974 में. 1980 से 1984 तक वो भूतल परिवहन मंत्रालय में जॉइंट सेकेट्री के तौर पर काम करते रहे.

यशवंत सिन्हा राजनीति में पहले चंद्रशेखर और बाद में आडवानी के सहारे आगे बढ़ते रहे
यशवंत सिन्हा राजनीति में पहले चंद्रशेखर और बाद में आडवानी के सहारे आगे बढ़ते रहे

1984 का साल भारत में राजनीतिक उथल-पुथल वाला था. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में चुनाव हो रहे थे. कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की जबरदस्त लहर थी. ऐसे गाढ़े समय में यशवंत सिन्हा ने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. वो चंद्रशेखर के साथ पहले से संपर्क में थे. उन्हीं के प्रभाव में सिन्हा ने जनता पार्टी की सदस्यता ले ली. उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया.

1984 के लोकसभा चुनाव में उन्हें जनता पार्टी की तरफ से हज़ारीबाग से मैदान में उतारा गया. नतीजों के हिसाब से कहा जाए तो यह अच्छी शुरुआत नहीं थी. वो महज 10727 लेकर तीसरे स्थान पर रहे. 1986 में यशवंत सिन्हा को जनता पार्टी के टिकट पर राज्यसभा भेज दिया गया.

10 नवंबर 1990. जनता दल टुकड़ों में बंट गया. कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर ने नई सरकार बनाई. यशवंत सिन्हा उस समय राज्यसभा के सदस्य थे. यह खाड़ी युद्ध का दौर था. दुनिया के कई देश क्रूड ऑयल के बढ़ते दामों की वजह से आर्थिक संकट से जूझ रहे थे. भारत भी ऐसे ही देशों में था. ऐसे में वित्त मंत्रालय की कमान सौंपी गई यशवंत सिन्हा को. सिन्हा अपनी आत्मकथा Confessions of a Swadeshi Reformer में लिखते हैं,

“10 नवम्बर 1990 के रोज़ चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. उनके कैबिनेट को एक दिन बाद शपथ दिलवाई गई. इस देरी की वजह थी कैबिनेट मंत्रियों के नाम पर चल रही सिरदर्दी भरी समझौता वार्ताएं. सुब्रमण्यम स्वामी वित्त मंत्री बनने पर अड़े हुए थे. दूसरे लोग उनके वित्त मंत्री बनने के खिलाफ़ थे. ऐसे में उन्हें दो पोर्टफोलियो सौंपे गए, पहला कॉमर्स और दूसरा लॉ एंड जस्टिस. मेरी प्राथमिकता विदेश मंत्रालय था लेकिन चंद्रशेखर चाहते थे कि मैं वित्त मंत्रालय लूं. नतीजतन विदेश मंत्रालय गया वीसी शुक्ला के खाते में और मुझे मिला वित्त मंत्रालय.” 

लालकृष्ण आडवानी, यशवंत सिन्हा और वैंकया नायडू
लालकृष्ण आडवानी, यशवंत सिन्हा और वैंकया नायडू

1998 का साल था. बीजेपी के स्टार प्रचारक लाल कृष्ण आडवाणी हज़ारीबाग में चुनावी सभा करने आए हुए थे. सभा के दौरान उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में वोट मंगाते हुए कहा,

“आप यशवंत सिन्हा को ज्यादा से ज्यादा वोट देकर जिताइए. अगर हमारी सरकार बनती है तो हम उन्हें वित्त मंत्री बनाएंगे.” 

1984 में जनता पार्टी से सियासी पारी शुरू करने वाले यशवंत सिंह ने महज़ 12 साल में खेमा बदल लिया था. समाजवादी विचारधारा वाली पार्टी से सीधा दक्षिणपंथी पार्टी की शरण में. आखिर वफादारी में यह बदलाव आया कैसे. वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत सेन बताते हैं,

“1991 में कांग्रेस की सरकार आने के बाद यशवंत सिन्हा हाशिए पर चले गए थे. इस दौरान वो लाल कृष्ण आडवाणी के संपर्क में आए और उनके मार्फ़त अटल बिहारी के. अटल को यशवंत पसंद आए. 1996 में उन्होंने आडवाणी के प्रभाव में बीजेपी की सदस्यता ले ली. उन्हें उस समय पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया.”

आडवाणी के भाषण का असर पड़ा. यशवंत सिन्हा तीन लाख 23 हज़ार 283 वोट लेकर इस सीट पर पहले नंबर पर रहे. उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी थे सीपीआई के भुवनेश्वर प्रसाद मेहता. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में नई सरकार बनी. आडवाणी ने अपना वादा निभाया और यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री बनाए गए.

अटलबिहारी वायपेयी और यशवंत सिन्हा.
अटलबिहारी वायपेयी और यशवंत सिन्हा.

17 अप्रैल, 1999 को अन्नाद्रमुक के समर्थन वापस लेने के बाद केंद्र की अटल बिहारी सरकार एक वोट से गिर गई. अक्टूबर 1999 में फिर से चुनाव हुए. बीजेपी फिर से सरकार में आई. यशवंत सिन्हा हज़ारीबाग से फिर से चुनाव जीते और वित्त मंत्री के पद पर बने रहे. जुलाई 2002 के कैबिनेट बदलाव में उन्हें विदेश मंत्री का पद दिया गया. 2004 तक वो इस पद पर बने रहे.

हाशिए पर पहुंचने की कहानी 

13 मई 2004, लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए. इंडिया शाइनिंग धोखा साबित हुआ. अगले दिन के अखबार में चुनाव हारने वाले बड़े चेहरों में सबसे पहला नाम था यशवंत सिन्हा का. वो सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. हज़ारीबाग से सीपीआई के भुवनेश्वर प्रसाद मेहता ने उन्हें 105329 वोट से धूल चटाई थी. यह यशवंत सिन्हा के लिए बड़ा झटका था. हालांकि संगठन में उनकी हैसियत जस की तस बनी रही. 2009 के लोकसभा चुनाव में यशवंत सिन्हा फिर से हज़ारीबाग से सीट चुनावमें उतरे. वो अपनी सीट फिर से जीतने में कामयाब रहे लेकिन बीजेपी सत्ता सेबाहर ही रही. हार की जिम्मेदारी लेते हुए यशवंत सिन्हा ने पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

2013 में आडवाणी एक और मौक़ा चाहते थे. इधर नरेंद्र मोदी को और इंतजारगवारा नहीं था. लिहाजा पार्टी के भीतर सत्ता के लिए संघर्ष हुआ. यशवंत सिन्हा गलत खेमे में खड़े थे. नरेंद्र मोदी के पास कार्यकर्ताओं का समर्थन और संघ का आशीर्वाद दोनों था. वो आडवाणी खेमे के अहम सिपहसालार माने जाते थे. ऐसे में मोदी खेमे की तरफ से उन्हें दरकिनार किया जाना शुरू किया गया. हालांकि अब तक उनकी सियासी हैसियत इतनी बड़ी हो चुकी थी कि उन्हें पूरी तरह से हाशिए पर लगाना अमित शाह के बस की बात नहीं थी. ऐसे में राजनीतिक पुनर्वास के चलते उनके बेटे जयंत सिन्हा को हज़ारीबाग से बीजेपीका टिकट दिया गया. जयंत सिन्हा पिता से विरासत में मिली सीट को बचा ले जाने में कामयाब रहे. फिलहाल वो केंद्र सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं.


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