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अजीत वाडेकर, वो कप्तान जिसने दुनिया जीती और फिर खो दी

बल्लेबाज, कप्तान, कोच और सलेक्टर रहे हैं वाडेकर.

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जब इंडियन क्रिकेट का सितारा डूबा: समर ऑफ 42

24 जून 1974.  क्रिकेट के मक्का लॉर्ड्स पर भारतीय पारी खुली ही थी कि भयानक एक्सीडेंट हुआ. क्रिकेटप्रेमी देश का आत्मविश्वास कुल 77 मिनट की पारी में रौंद दिया गया. पूरी टीम 42 पर खेत रही. हुआ क्या था, पूरा किस्सा आज लाया है ‘दी लल्लनटॉप’ आपके लिए.


वो अकल्पनीय चमत्कार करनेवाला कप्तान था. विजय मर्चेंट के निर्णायक वोट ने उसे लीडर बनाया था, और उसी जज्बे से टीम खेली थी उसकी वेस्ट इंडीज़ में. 70-71, नवेले चमकीले गावस्कर के सहारे पहले इंडीज़ में जीता, फिर क्रिकेट के गढ़ इंग्लैंड में. 71 की गर्मियों में एक हाथ में पोलियो वाले गेंदबाज़ चन्द्रशेखर की घूमती गेंदों ने ओवल में भारत का झंडा गाड़ दिया. फिर 72-73 में जब एमसीसी टीम भारत आई, तो भारत ने सीरीज़ जीत 2-1 से दोहरा दी. इसीलिए जब अपराजेय कप्तान अजीत वाडेकर के नेतृत्व में 1974 की गर्मियों में भारत इंग्लैंड के दौरे पर पहुंचा, तो इतिहास में पहली बार खड़ूस अंग्रेज़ प्रेस भी उसे सीरीज़ में जीत का दावेदार मान रही थी.

सच था. एक नया इतिहास लिखा जाना था इस दौरे पर.

कहने को गर्मियां थीं, लेकिन अप्रैल में जब भारतीय टीम इंग्लैड की सरजमीं पर उतरी तो कभी भारत पर शासन करनेवाला ये मुल्क हाड़ कंपाती ठंड में कुकड़ रहा था. जब टेस्ट सीरीज़  के पहले 12 में से 10 प्रैक्टिस मैच ड्रा हो गए तो इसे ठंड का असर ही माना गया था. मेहमान टीम ने आखिर के दो मैच जीते, लेकिन एसेक्स और सर्रे के खिलाफ़ चार स्पिनर वाले बॉलिंग अटैक वाली टीम में सीम बॉलर आबिद अली का सबसे सफ़ल गेंदबाज़ बनकर उभरना खतरे की घंटी थी.

जब पहला टेस्ट ओल्ड ट्रैफर्ड में 113 रन से हारे, तो इसे इंग्लैंड टीम की जीत कम और प्रतिपक्षी मौसम की मार ज़्यादा माना गया. इसीलिए जब लॉर्ड्स के दूसरे टेस्ट में धूप खिली तो इसे उपमहाद्वीप से आई टीम की अच्छी किस्मत माना गया. इंग्लैंड की टीम की सारी चर्चा धाकड़ बल्लेबाज़ ज्यॉफ़ बॉयकॉट को टीम से निकाले जाने से जुड़ी थी, ओपनिंग पर जिनके बदले इंग्लैंड ने युवा डेविड लॉयड को चुना था.

खिली धूप में टॉस इंग्लैंड ने जीता और पहले दिन 334 रन जोड़ दिए. विकेट सिर्फ़ एक ही गिरा था. दूसरे दिन इंग्लैंड की पारी 629 पर खत्म हुई, हालांकि स्थिति इससे भी खराब हो सकती थी. इंग्लैंड का स्कोर एक समय 4 विकेट पर 571 था. और जब भारत के लिए गावस्कर और इंजीनियर ने पारी की शुरुआत की, तो तीसरे दिन लंच तक स्कोर बिना विकेट खोए 131 था. लग रहा था कि लॉर्ड्स की पिच अचानक ग्रीनपार्क कानपुर के पाटा विकेट में बदल गई है, जिसका जन्म ही मेहनती गेंदबाजों की अकाल हत्या के लिए हुआ है. इंग्लैंड के पंटर मैच के ड्रा होनेपर 6-4 का दांव लगा रहे थे.

शायद ये ‘ड्रा’ का ख्याल भारतीय टीम को सूट नहीं हुआ. आखिर वो चैम्पियन टीम थे. और सीरीज़ में पीछे भी. उनके लिए लार्ड्स हारना सीरीज़ जीत हाथ से गंवाना था. गावस्कर के आउट होते ही अचानक बल्लेबाज़ आक्रामक हो गए और नतीजे में विकेट गंवाने लगे. मैच के बाद दी क्रिकेटर में जॉन वुडकॉक ने लिखा, “मुझे भी बल्लेबाज़ी में एडवेंचर पसन्द है, लेकिन उसमें कुछ तो समझदारी दिखनी चाहिए”. कुछ आकर्षक क्रिकेट खेलकर भारत की पहली पारी शनिवार की डूबती शाम 302 पर खत्म हुई, और फॉलोआन खेलते हुए 2 पर नॉटअाउट गावस्कर और इंजीनियर पॉवेलियन लौटे.

उम्मीद थी कि चौथा दिन भी पहले तीन की तरह बल्लेबाज़ों की बादशाहत वाला होगा. लेकिन इस बीच रविवार का दिन रेस्ट डे था. वीकेंड पर इंग्लैंड के बेमुरव्वत मौसम ने अपना रुख बदला और सोमवार की सुबह आसमान पर घने काले बादल थे और हवा में ऊमस भरी थी. इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज़ों ज्यॉफ़ अर्नोल्ड और क्रिस ओल्ड की बांछें खिल गईं. जैसा अर्नोल्ड ने बाद में कहा, “हुआ क्या कि बारिश की वजह से कवर्स के नीचे पिच में ऊमस भर गई और एक दिन के गैप ने उसे थोड़ा हरा भी कर दिया. ठीक उतना, जितना मेरी गेंदबाज़ी को सफ़ल होने के लिए ज़रूरी था.”

समर अॉफ 42, ऐतिहासिक स्कोरकार्ड, photo via twitter
समर अॉफ 42, ऐतिहासिक स्कोरकार्ड, photo via twitter

इन्हीं घिरी फिज़ाओं में पहली पारी में 86 का टॉप स्कोर बनाने वाले फारुख इंजीनियर क्रीज़ पर थे. इंजीनियर ऐसे बल्लेबाज़ थे जिनके लिए इंग्लैंड उनका दूसरा घर था और वो उस अपरिचित मौसम को दूसरे खिलाड़ियों से बेहतर समझते थे. सामने थे ज़्यॉफ़ अर्नोल्ड. दिन के दूसरे ओवर में किसी चालाक रणनीतिकार की तरह अर्नोल्ड ने पहले एक गेंद आउटस्विंगर फेंकी. दूसरी गेंद इनस्विंगर थी. बिसात बिछ चुकी थी. अर्नोल्ड की तीसरी गेंद सीधी अपनी लाइन पकड़ कर इंजीनियर के पैड से टकराई और वे पगबाधा हो गए. अगले ही ओवर में भारत 5 पर 2 था, जब ओल्ड ने कप्तान वाडेकर के गिल्ले बिखेर दिए. जब कलाइयों के धनी गुंडप्पा विश्वनाथ विकेटकीपर एलन नॉट को कैच देकर आउट हुए, स्कोर था 12 पर 3. ब्रजेश पटेल पूरे दौरे पर अच्छा खेले, लेकिन टेस्ट एरिना में उनकी कमज़ोरी खुलकर सामने आ जाती थी. उनके आउट होते ही 14 पर 4 के साथ भारत संकट में था.

इस बीच सुनील गावस्कर दूसरे छोर पर शांत खड़े थे. 13 टेस्ट में 60 के करीब अौसत वाला 25 साल का यह युवा बल्लेबाज़ चिंतित भारतीय खेमे को भरोसा दे रहा था कि अभी खेल खत्म नहीं हुआ है. लेकिन 25 के स्कोर पर जब अर्नोल्ड की इनस्विंगर ने उन्हें क्रीज़ में घेरकर आउट किया, समझो भारतीय टीम की बरात निकल गई.

प्लेइंग एंड पर इन गिरते विकेटों के तूफ़ान के मध्य दूसरी ओर एकनाथ सोलकर टिके थे. ये सोलकर वही थे जिन्हें इंग्लैंड की पारी में शुरुआती 6 ओवर फिंकवाने के बाद अजीत वाडेकर ने पूरी पारी के लिए जेब में डाल लिया. सोलकर जमे थे, इस बीच क्रिस ओल्ड का एक बाउंसर उनके सर पर आकर लगा. ये हैलमेट जैसी सुरक्षाओं से पहले का दौर था और तेज़ गेंदबाज़ों का सामना यहां बल्लेबाज़ सिर्फ़ जिगरे से करते थे. जब ओल्ड ने दूसरी गेंद फिर बाउंसर फेंकी, सोलकर तैयार थे. गेंद को घूमकर हुक में फंसाया और छक्का ठोक दिया. उन अंधेरे 77 मिनट में यह अकेली रौशनी की चौंध थी शायद.

कुल 17 ओवर चली पारी में 42 रन बनाकर पूरी टीम वापस घर लौट आई थी. पूरी नहीं, क्योंकि अंगूठे की चोट की वजह से चंद्रशेखर बल्लेबाज़ी के लिए नहीं आए थे. वैसे इसका ज़्यादा दुख क्रिस ओल्ड को था, जिनका हैट्रिक लेने का सुनहरा मौका चंद्रशेखर ने बल्लेबाज़ी के लिए ना आकर छीन लिया. ओल्ड के आंकड़े 21 पर पांच थे, आर्नोल्ड के 19 पर 4. मज़ेदार बात यह कि शुरुआत में ही भारत की कमर तोड़नेवाले आर्नोल्ड तो इस टेस्ट की टीम में भी नहीं थे. उन्हें बॉब विलिस की पीठ में खिंचाव आने की वजह से ऐन मैच की पिछली शाम टीम के साथ जोड़ा गया था. यह लॉर्ड्स में किसी भी टीम का और टेस्ट में भारतीय टीम का सबसे कम स्कोर था.

भारत के लिए यह झटका बहुत बड़ा था. खासकर इसलिए कि यह 71 के गोल्डन समर के बाद में आया था. कप्तान वाडेकर टीम से इतने गुस्सा थे कि उधर पॉवेलियन पर इंग्लैंड की टीम शैंपेन की बोतलें खोल रही थी और इधर मैच के फौरन बाद नर्सरी एंड पर उन्होंने पूरी टीम से कठोर नैट सेशन करवाया. गावस्कर शायद ज़्यादा संयत थे, या निराशा में दार्शनिक हो रहे थे जब उन्होंने कहा, “अर्नोल्ड और ओल्ड ने पांच अच्छी गेंदे फेंकी बस, जिनके सामने हमारे पांच टॉप बल्लेबाज़ आउट हो गए.”

टीम की बेइज्जती का आलम ये था कि मैच के बाद इंग्लैंड के दर्शकों ने अपने पैसे वापस मांगे. भारत का इंग्लैंड में दो साल पहले जमाया हुआ सिक्का 17 ओवर और 77 मिनट में नष्ट हो गया. इस खोए हुए सम्मान को वापस पाने के लिए अब देश को 9 साल और इंतज़ार करना था. उस घुंघराले बालों वाले गेंदबाज़ का इंतज़ार जिसका नाम था कपिल देव निखंज और जिसे भारतीय क्रिकेट की किस्मत हमेशा के लिए बदल देनी थी.


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