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हो सके तो आज अपनी मां को करवा चौथ का व्रत करने से रोक लो

Pranaya
प्रणय

आज करवा चौथ है. बहुत सारी पत्नियां अपने पति के लिए व्रत रखती हैं. बहुत सारी बिना पानी पिए व्रत रखती हैं. बाद के दिनों में जब कुछ लोगों ने महसूस किया कि पति की लंबी उम्र के लिए सिर्फ पत्नियां ही क्यों कष्ट सहती हैं तो इस परंपरा को ‘मॉडिफाई’ कर लिया गया और बहुत सारे पति भी ‘सॉलिडैरिटी’ के लिए व्रत रखने लगे. फिर भी करवा चौथ से बहुत सारी आपत्तियां पब्लिक स्फेयर में हैं. इस पर ‘दी लल्लनटॉप’ के साथ इंटर्नशिप कर चुके प्रणय पाठक ने हमें कुछ लिख भेजा है.  पढ़िए:


आज फिर फेल हो गया. बल्कि जूते खाने से बाल-बाल बचा हूं. दुनिया में आप कितनी भी औरतों को करवा चौथ का व्रत रखने से रोक दें, लेकिन अपनी मां को नहीं रोक सकते. बल्कि एक सलाह देता हूं. अगर अंधविश्वास पर आपके व्याख्यानों पर वो सर हामी में हिला भी दे, तब भी कोशिश मत करना. हिम्मत कर के अगर आपने उसे एक बार करवा चौथ का व्रत रखने से रोका है और जूता नहीं खाया है, तो वहीं रुक जाना.

दूसरी बार अगर तुमने ये बात मां से कही, तो खामखां बाप की जान के दुश्मन कहलाए जाओगे. जज तक कर लिए जाओगे. पड़ोस में बात पहुंची, तो फिर तो गए. मामा-मौसी आकर समझाएंगे. ‘बेटा, चार किताबें ही सब कुछ नहीं होती हैं. धर्म और भगवान हमारी शांति के लिए हैं.’ थोड़ी ही देर पहले मां सरगी का सामान लाई. पापा के साथ. पापा ने कभी नहीं कहा कि व्रत करना ज़रूरी है. वो जानते हैं ज़्यादा काम करने से मां की हड्डियां कमज़ोर हो गई हैं. नाश्ते को दोपहर में करने से रही-सही भूख बर्दाश्त करने की ताक़त भी ज़्यादा नहीं रही है. ऐसा नहीं है कि पापा मां पर कोई दया कर रहे हैं. वो बस वो ग़लती नहीं कर रहे जो मैं साल-दर-साल करता आ रहा हूं.

मैं वो गलती कर रहा हूं जो पापा करें तो बख़्शे नहीं जायेंगे. हर साल मां और वो हमारे उठने से पहले उठते हैं. और मां सेब और नाशपाती के 2-2 टुकड़े खाती हैं. कुछेक साल दूध भी पिया होगा. वरना मां को दूध पीते देखना विरोधाभास सा लगता है. 10 साल से देखता हूं. सुबह से ही मां एक साधुत्व सा ओढ़ लेती है. रोज़ के अजीबोग़रीब कपड़े छोड़ कर सबसे सादा और वर्दीनुमा सूट पहन लेती हैं. कभी उन्हें मांग में गाढ़ा सिंदूर भरे या चटकीली साड़ियां पहने नहीं देखा. मेहंदी के नाम पर वो एक मोटा सा बिंदा हाथ के बींचोबीच छाप देती हैं और उंगलियों के सिरे रंग देतीं हैं. दोपहर होने पर उनके सिर पर एक पट्टा बंध जाता है और वो 2 घंटे के लिए सो जाती हैं.

कई सालों से अखरता है मोहल्ले की औरतों का इस दिन से इतना डरना. मगर वो डरती तो हैं ही नहीं. एक रात पहले मार्केट में कई जगह मेहंदियां लग रही होती हैं. होने वाले पति तक के लिए मेहंदियां. हर तरफ प्रचंड पाखण्ड. शादी नाम के पहले ही पाखण्ड की सालगिरह. अखरता है पतियों का थक-हार के ऑफिस से घर लौटना और पत्नियों का सारा दिन उनका इंतज़ार करना. एक बार को चांद निकल भी गया, तो भी पतिदेव के बिना खाना तो नसीब नहीं होगा. कुछ ऐसे भी नेकनीयत बेचारे हैं जो पहली सालगिरह पर पत्नी के लिए व्रत रखते हैं. सदियों की गलती को एक झटके में सुधार लेते हैं. कितना मज़ा आता है इस खेल में. ख़ासा रोमैंटिक भी है. लेकिन अगर किसी साल मन नहीं हुआ तो क्या आप रंडुए होने का जोख़िम उठाएंगे?

Photo - Reuters
Photo – Reuters

अखरता है कई दिन पहले से टीवी सीरियल्स में चोरी से कचौड़ियां खाने वाली औरतों का मज़ाक बनाया जाना. हम टीवी देखकर उठते हैं तो मां किचन में पट्टा बांध कर पूड़ियां तल रही होती है. आज के दिन मां से हंसी-मज़ाक नहीं करना है. शाम को चाय बनाने को भी नहीं कहना है. वो इसलिए क्योंकि आज मोहल्ले की औरतें कहानी सुनने आने वाली हैं. थोड़ी देर में कहानी शुरू होगी. सत्यवान और सत्यवती की कहानी. ये कहानी ज़िंदगी और मौत के ऊपर है, और इसलिए सही-गलत से ऊपर है.

दीवाली की कई पूजाओं में ऐसी कई आदर्श कहानियां हैं. होई का व्रत करो नहीं तो बच्चे नहीं रहेंगे. करो तो सीधा 7 औलादें होंगी. नहीं, 7 लड़के होंगे. इस कहानी को सुनकर पता नहीं क्यों बहुत हंसी आया करती थी. कई साल ऐसा हुआ कि पापा ने आंख दिखाई और हम उनके मुंह पर बद्तमीजी से हंसते रहे.

मां के धीरज की परीक्षा लेना सही नहीं होगा. वो आज ज़्यादा हंस नहीं रहीं है. वैसे भी करवा चौथ की कहानी का मज़ाक बनाने से थोड़ा डर सा भी लगता है. आप अपनी मां की बात आते ही सब तर्क सुविधा से भूल जाते हैं. आसपास का ये सामूहिक डर काफी है आपको डराए रखने के लिए. यह साल में आने वाला पितृसत्ता का वो बवंडर है जो आपको आपके कुंए से निकलने से बचा लेता है.

अपने मॉडर्न दोस्तों के भड़कावे में आ कर जो रैडिकल क़दम आप उठाने की सोच रहे थे, ये उसके मुंह पर आपके अंदर छुपी धौंस का चांटा है. अब आप आराम से एक साल और निकाल सकते हैं. शाम होती है. आज चांद नखरे कर-कर के निकलेगा. चार अलग-अलग उम्रों के जोड़े हमारी छत उसे देखने के लिए इस्तेमाल करते हैं. चांद का नैरेटिव बड़ा रूमानी है. हर जोड़-घटा से परे. करवा चौथ मनाओ और चांद का ढक्कन लगाओ. सब जोड़े संतुष्ट हो कर नीचे आते हैं. दोनों के बीच अटूट श्रद्धा और प्यार है. फॉर्मेलिटी के ताले को ये खुलवा आये हैं.


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