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गंभीर साहित्य पढ़ने वालों, क्या लुगदी साहित्य लिखने में मेहनत नहीं लगती?

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लगभग डेढ़ साल पहले ‘पाखी’ पत्रिका का एक अंक आया था जो लोकप्रिय साहित्य को समर्पित था. लोकप्रिय साहित्य यानी वो किताबें जो लुगदी कागज पर छपती हैं और रेलवे स्टेशनों पर बिकती हैं. जिनको भारत का आम इंसान खरीदता है और गरमी की दुपहरों में निपटा देता है. जिन दुपहरों को भारी फिलॉसफी बोझिल बना देती है. पाखी के उसी अंक में लोकप्रिय साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर सुरेंद्र मोहन पाठक का साक्षात्कार छपा था. ये इतना बढ़िया बन पड़ा था कि उसके प्रकाशित होने के बाद साहित्यिक हलकों में हलचल मच गई थी.

उस इंटरव्यू की गुणवत्ता इतनी आला दर्जे की थी कि लोकप्रिय साहित्य को हेय दृष्टि से देखनेवाले तमाम साहित्यिक स्तंभ भी चुप रहने पर मजबूर से हो गए लगते थे. उस अंक में प्रकाशित तमाम लेख पढ़कर मुझ जैसे एक आम पाठक के मन में गंभीर उठापठक चल पड़ी थी. जहां एक तरफ लोकप्रिय साहित्य की प्रासंगिकता पर हो रही चर्चा पसंद आ रही थी वहीं दूसरी तरफ गंभीर साहित्य के आधारस्तंभों द्वारा इसका तिरस्कार देख कर मन आक्रोश से भर जाता था. ‘पाखी’ में प्रकाशित तमाम गुणीजनों के साक्षात्कार पढ़ने के बाद मेरे मन में कुछ सवालात उठे थे, कुछ शिकायतें थी जिन्हें इस लेख के माध्यम से कागज़ पर उतारा था मैंने. पता नहीं ये सवालात तब उन नज़रों के आगे से गुजरें थे भी या नहीं जिनसे इनका सरोकार है. लेकिन इससे इनकी प्रासंगिकता कम नहीं हो जाती. 18 फ़रवरी को वेद प्रकाश शर्मा का देहांत हो गया. 19 फ़रवरी को सुरेंद्र मोहन पाठक 77 साल के हो गए. थोड़े से संशोधन के साथ उस अंक के निचोड़ को तसल्ली से पढ़ा जाए. 


मेरा दावा है कि मेरे पुस्तकप्रेमी मित्रों में शायद ही ऐसा कोई विरला शख्स होगा जिसने उम्र के किसी हिस्से में लोकप्रिय साहित्य ना पढ़ा हो. ज़्यादातर लोग गुलशन नंदा, राजहंस, ओमप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक आदि लेखकों को पढ़ते-पढ़ते ही किताबों की दुनिया से इश्क़ कर बैठते थे. मैं हिंदी बेल्ट की बात कर रहा हूं. सहज उपलब्ध ये किताबें गंभीर साहित्य की तरफ आकर्षित करने में ज़बरदस्त ढंग से सहायक हुआ करती थीं. मुझे अच्छी तरह याद है कि कॉमिक्स या चंदामामा जैसी किताबों से हटकर जो पहली विस्तृत कलेवर की किताब मैंने पढ़ी थी वो ओमप्रकाश शर्मा की ‘खून की दस बूंदें’ थी. पॉकेट बुक्स से हुआ ये परिचय आगे किताबों में और रुचि जगाता गया. अफ़सोस की बात ये है कि हमारे गंभीर साहित्यकारों की जमात ने इन लेखकों के इस रोल को ना तो कभी माना और ना ही कभी उन्हें इस लायक समझा कि कहीं उनका ज़िक्र ही कर दिया जाए. कोठागोई के लेखक प्रभात रंजन ठीक ही कहते हैं कि “हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वालों ने लोकप्रिय साहित्य की सुदीर्घ परंपरा को सिरे से गायब कर दिया.” लोकप्रिय साहित्य के साथ बरसों से चला आ रहा ये अन्याय यकीनन क्षोभ पैदा करता है.

विदेशों में लोकप्रिय साहित्य के साथ ये भेदभाव दिखाई नहीं पड़ता. क्राइम फिक्शन लिखनेवाले सिडनी शेल्डन, जॉन ग्रिशम, अगाथा क्रिस्टी, गार्डनर, स्टीफन किंग, जेफ्री आर्चर जैसे लेखक वहां न सिर्फ व्यावसायिक रूप से सफल हैं बल्कि उन्हें सम्मान भी खूब हासिल है. विदेशों में ही क्यों, हमारे यहां भी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस विधा के अमीश त्रिपाठी, अश्विन सांघी जैसे अंग्रेजी के लेखकों को पूरे मान-सम्मान से बुलाया जाता है. मराठी साहित्य कितना समृद्ध है! वहां भी सुहास शिरवळकर, रत्नाकर मतकरी जैसे लेखक पाठकों से और लेखक बिरादरी से भरपूर प्रेम हासिल करते हैं. छुआछूत तो सिर्फ हमारी हिंदी में है. हमारे यहां लोकप्रिय साहित्य और इसके लेखकों को लगभग अछूत मान लिया गया है. उनका ज़िक्र कहीं नहीं. लोकप्रिय साहित्य को पढ़ना जैसे निचले दर्जे की हरकत हो. जबकि हकीकत में हमारे स्वनामधन्य साहित्यकार भी इस विधा को खूब पढ़ते आये हैं. बस ज़िक्र से बचते रहे हैं. यदा-कदा किसी ने साहस दिखा कर ज़िक्र कर भी दिया तो वो कुछ ऐसा होता है जैसे कोई कुलीन युवक क्षणिक लहर में वेश्या के कोठे का दौरा कर के लौटा हो और फिर उसे कबूल कर के अपने वजूद पर लगे कथित कलंक का पश्चाताप कर रहा हो.

हमारे लोकतंत्र की तरह ही हमारे साहित्य में भी ‘मासेज’ को सीरियसली ना लेने की प्रथा है. जिस विधा को लाखों करोड़ों लोगों द्वारा पढ़ा जाता है, पसंद किया जाता है उसे सिरे से नकार देना ना सिर्फ नाइंसाफी है बल्कि बेशर्मी भी है. लता मंगेशकर ने एक बार कहा था कि शास्त्रीय संगीत की अहमियत भी सुगम संगीत की वजह से है. बिलकुल ठीक कहा था उन्होंने. बकौल प्रभात रंजन जी, “जिस भाषा का कोई लोकप्रिय साहित्य नहीं होता, उस भाषा का कोई उल्लेखनीय साहित्य भी नहीं होता.” मैं सहमत हूं उनके इस कथन से.

लोकप्रिय साहित्य यकीनन जिज्ञासु पाठक और गंभीर साहित्य के बीच में पुल का काम करता है. लेकिन जब पाखी के उसी अंक में छपे अपने लेख में मदन सोनी इस पुल को खाई बता देते हैं तो मन वितृष्णा से भर उठता है. मदन सोनी अपने लेख में लिखते हैं कि, “अधिकांश लोग, ज्यादातर समय चेतना और संवेदना के सतही स्तरों पर रहते हैं इसलिए इस तरह का (लोकप्रिय) साहित्य उनके बीच आसानी से जगह बना लेता है.”

मैं समझने में असमर्थ हूं कि एक पाठक को एक पुस्तक पढ़ने के लिए संवेदना के किस स्तर पर विराजमान होना आवश्यक होता है? और जिन (अधिकांश) लोगों की ‘चेतना और संवेदना’ का स्तर सतही होता है, उन्हें इस स्तर को बढ़ाने के लिए क्रैश कोर्स किस संस्थान से करना चाहिए?

सोनी साहब आगे लिखते हैं, “साहित्य अपने आप में दुरूह नहीं होता, लेकिन उस तक पहुंचने के लिए, उसको पढ़ने-समझने के लिए, उसके साथ तादात्म्य होने के लिए, एक ख़ास तरह की शिक्षा-दीक्षा, संस्कार, यहां तक कि शायद एक ख़ास तरह की प्रतिभा भी आवश्यक होती है.”

मेरा सवाल ये है मदन सोनी साहब से कि जिनके पास ऐसी प्रतिभा नहीं होती वो लोग क्या करें? किताबें पढ़ना छोड़ दें? गंभीर साहित्य के इस पूर्वाग्रह से भरे, अहमकाना रवैये ने जितना नुकसान साहित्य का किया है, उतना तो इंटरनेट युग भी नहीं कर पाया होगा. यानी कि साहित्य – जिसका काम मनुष्य के रोजमर्रा के संघर्ष को परिभाषित करना एवं उस संघर्ष में बने रहने के लिए आवश्यक जिजीविषा को मनुष्य में इंजेक्ट करना है – को पढ़ने के लिए भी अब एक ख़ास तरह की प्रतिभा होनी जरुरी है? अगला स्टेप क्या होगा महोदय? क्या ये कि पीएचडी के बिना मुक्तिबोध को पढ़ना अपराध होगा? हिंदी से स्नातक का बंदा ही आचार्य चतुरसेन को पढ़ने लायक समझा जायेगा? क्या हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को पढ़ने के लिए संस्कृत का ज्ञाता होना आवश्यक होगा? और कितने खांचे बनाये जाएंगे साहेबान? पहले ही हिंदी साहित्य में क्या कम सर्कस है? आपका ये दुराग्रह साहित्य को बचे-खुचे पाठकों से भी वंचित करा देगा.

एक बार फिर प्रभात रंजन को कोट करना चाहूंगा. उन्होंने एक बेहद अहम बात कही थी कि, “जनवादी कहलाने वाले लेखक अपने साहित्य में मजदूरों-किसानों की बात तो करते हैं, शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं, लेकिन कभी भी उन तक पहुंचने की कोशिश नहीं करते हैं.”

सही बात है. और लोकप्रिय साहित्य जब उन लोगों तक पहुंच बनाने में कामयाब हो जाता है, तो समवेत स्वर में उसे कोसने लगते हैं. हमारे साहित्य की आम जनमानस तक पहुंच ना बना पाने की एक बड़ी वजह किताबों की कीमतें भी हैं. कुछ नामचीन प्रकाशन समूह अपनी किताबों की प्राइसिंग कुछ इस तरह से करते हैं कि आम आदमी उसे खरीदने की सोचे ही नहीं. तो क्या इस इल्जाम में सच्चाई है कि गंभीर साहित्य महज लाइब्रेरियों की शोभा बढ़ाने के लिए और अपने हम-जमात लेखकों से तारीफें बटोरने के लिए लिखा जाता है? जब आप खुद ही पाठकों तक पहुंचने के ख़्वाहिशमंद नहीं है, तो पाठकों की कमी का रोना रोने का आपको कोई नैतिक अधिकार नहीं. जमीनी – तल्ख़ – हकीकत तो ये है कि अगर राजकमल/राधाकृष्ण जैसे कुछ प्रकाशन समूह अपने रीज़नेबल प्राइसिंग वाले पेपरबैक संस्करण निकालना बंद कर दें, तो ज़्यादातर हिंदी साहित्य अनपढ़ा ही रह जाए. इधर ‘हिंद युग्म’, ‘दखल प्रकाशन’ जैसे प्रकाशकों ने कीमतों के मामले में अच्छा नज़रिया दिखाया है जो कि संतोष का विषय है. लेकिन बाकी जगह हाल बुरा है. कोई मुझे ये बताये कि पाठक चार सौ रुपये देकर ऐसी किताब क्यों खरीदेगा जिसके बारे में उसे ये गारंटी भी ना हो कि उसे ये पसंद आएगी ही. इसके उलट लोकप्रिय साहित्य सस्ता और सहज उपलब्ध होता है. यहां सस्ते को चीप से कंफ्यूज ना किया जाए तो बेहतर.

‘पाखी’ के उसी अंक में प्रकाशित एक और लेख में लेखक निलय उपाध्याय जी ने इस विधा की धज्जियां उड़ाकर रख दी थी. बकौल उनके, “लोकप्रिय साहित्य की बहस जितनी बढ़ेगी, उतना ही साहित्य को प्रदूषित करेगी.” जैसे किसी मंदिर के गर्भ गृह में किसी सूअर का प्रवेश होने पर जो आसार बन जाते हैं और तथाकथित शुचिता टूटने लगती है. अपनी तथाकथित पवित्रता पर दाग ना लग जाए इस डर से उन्हें इस बहस में शरीक होना भी अच्छा नहीं लगा. उन्होंने तो पाखी को भी जमकर कोसा है कि कैसे उनकी हिम्मत हुई इस निकृष्ट दर्जे के विषय को अपने अंक में जगह देने की? बड़े ही रोष में उन्होंने लिखा है कि, “पाखी को गर्म कहानियां, सच्ची कहानियों की पत्रिका बना दीजिये.”

इतना तो दंभ है हमारे गंभीर साहित्य के पुरोधाओं में. अपने कुएं से तो खैर ये क्या निकलेंगे, इन्हें तो किसी और का अस्तित्व कबूलते भी फांसी लगती है. अपनी बिरादरी के अलावा किसी और को लेखक मानने को ये लोग कतई राजी नहीं. और ये हाल तब है जब खुद की पहचान का संकट मुंह बाये इनके सामने खड़ा है. मुझे आजतक ऐसी एक भी साहित्यिक गोष्ठी या सेमिनार याद नहीं जहां साहित्य के स्वनामधन्य मसीहाओं ने किसी लुगदी के लेखक को आमंत्रित किया हो. जबकि पाठकों की संख्या के मामले में इनमें से कई लोग लोकप्रिय साहित्य के लेखकों के आगे कहीं नहीं ठहरते. हालांकि मैं मानता हूं कि लोकप्रियता एकमेव पैमाना नहीं होता गुणवत्ता का, लेकिन ये भी एक अहम पहलू तो है ही. कुछ ज्यादा ही मशहूर नामों को छोड़ दिया जाए तो हिंदी साहित्य के कितने ही लेखक ऐसे हैं जो आपके पास से गुजर जाए तो भी आपको पता न चले. जिनके लिए लिखा जाता है उन्हीं से दूरी हिंदी साहित्य को ले डूबेगी एक दिन. पर अभी भी हमारा अहंकार जस का तस है. हद है. बल्कि लानत है.

प्रमोद सिंह ‘पाखी’ में लिखे अपने लेख में कहते हैं, “हिंदी के लेखक को उसके अपने बच्चे तक नहीं पहचानते, वह भागा-भागा विश्व पुस्तक मेले के हिंदी पंडाल में आता है जहां उसे डेढ़ सौ नमस्ते बोलकर पहचानने वाले मिल जाएं और उससे कहें कि आप कमाल का लिखते हैं, सर, जिसकी आश्वस्ति में वह वापस अपने अंधेरों में लौट सके.”

पहचान के संकट का सटीक वर्णन किया है प्रमोद जी ने. मुझे लगता है और शायद ठीक ही लगता है कि नाम और शोहरत की ये भयंकर कमी ही लोकप्रिय साहित्य के प्रति विद्वेष का कारण बनती होगी. वरना ऐसी भी क्या नफरत कि उसका जिक्र करने से भी बचा जाए! क्या ऐसा उपन्यास लिखने में मेहनत नहीं लगती? क्या उसे लिखनेवाला लेखक अपने पेशे के प्रति ईमानदार नहीं होता? क्या वो उस ‘प्रसव-पीड़ा’ से नहीं गुज़रता जिसका गाहे बगाहे ज़िक्र करते रहना साहित्यिक हलकों में फैशन माना जाता है?

सुरेंद्र मोहन पाठक कहते हैं कि “बिना कमिटमेंट के तो मोची जूता नहीं गांठ सकता.” यहां तो लेखन जैसा जिम्मेदारी का काम है. वो भी ऐसा लेखन जो पाठकों को बांधे रख सके. कुछ इस तरह कि अगली बार पाठक महज लेखक का नाम देख कर ही किताब खरीद ले. क्या ये सब बिना मेहनत के संभव है? अगर नहीं तो फिर ये सौतेला व्यवहार क्यों? मैं ये नहीं कह रहा कि लोकप्रिय साहित्य को ही सर्वोत्तम मान लिया जाए लेकिन उसके अस्तित्व से ही इंकार करने का आग्रह (दुराग्रह) क्यों?

पिछले तीन सालों में दो बार जो किताब साल की नंबर वन किताब बनी वो सुरेंद्र मोहन पाठक की थी. तब क्या हिंदी का गौरव नहीं बढ़ा? कब तक जारी रहेगा ये दूजाभाव? हम जैसे पाठक जो दोनों ही विधाओं को पसंद करते हैं उन पर ये अघोषित दबाव क्यों है कि लोकप्रिय साहित्य को फॉलो करना छोड़ दें? मेरे जैसा बंदा – जिसके पूरे खानदान में कोई साहित्यिक अभिरुचि का व्यक्ति नहीं – आज इतने गंभीर विषय पर कलम चलाने का हौसला कर रहा है, तो इसमें लोकप्रिय साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है. सुरेंद्र मोहन पाठक को पढ़-पढ़ कर हमने सीखा है कि शब्दों का उचित संयोजन कैसे किया जाता है. उनके सुनील, विमल जैसे किरदारों से सीखा है कि मानवता हर हाल में सर्वोपरि है. हमारी जिंदगियों पर इतना प्रभाव डालने वाली उन किताबों को महज़ इसलिए कमतर मानें कि मुख्य धारा का साहित्य उन्हें पहचानने से इंकार करता है? आख़िर साहित्य कहलाने जाने वाले लेखन से भी तो यही अपेक्षा होती है न! किताबों के अद्वितीय संसार से हमारा परिचय करानेवाली, मानवीय भावनाओं के हर एक पहलू से हमें वाकिफ कराने वाली इन किताबों को महज़ इसलिए फेंक दे क्योंकि वो लुगदी कागज़ पर छपी हैं और प्लेन में, मेट्रो में पढ़ने लायक नहीं मानी जाती?

आज सुरेंद्र मोहन पाठक की किताबों का अनुवाद इंग्लिश में हो रहा है. हार्पर कॉलिंस जैसा बड़ा प्रकाशन समूह तीन साल से लगातार उन्हें छाप रहा है. तब जाकर कहीं उनकी पूछ हो रही है. उन्हें फेस्टिवल्स में बुलाया जा रहा है. यहां एक बात बड़ी दिलचस्प है. तमाम बड़े-बड़े लिटरेचर फेस्टिवल्स जो कि अंग्रेजी के दीवाने हैं जब हिंदी लेखन के प्रतिनिधि के तौर पर किसी को चुनते हैं, तो वो कोई घोषित साहित्यकार नहीं बल्कि लुगदी साहित्य का लेखक होता है. यानी वाइट पेपर पर छपने के, अंग्रेज़ियत से एंडोर्स होने के बाद ही किसी को लेखक को लेखक कंसीडर करने की प्रथा है हमारे यहां. इस सूरतेहाल पर रोना आता है.

इसी अंक में छपा सत्यानंद निरुपम का लेख वाकई उम्दा था. उन्होंने बेहद संतुलित तरीके से स्पष्ट किया था कि लोकप्रिय साहित्य को हेय दृष्टि से देखने के पीछे क्या क्या कारण हो सकते हैं. साथ ही बड़ी ही फराखदिली से माना था कि लोकप्रिय साहित्य के लेखकों जैसे लेखकों की हिंदी को अभी सख्त जरुरत है. ऐसी बात कहनेवाली शख्सियत जब राजकमल जैसे आला दर्जे के प्रकाशन समूह से जुड़ी हो तो उसकी बात में वज़न होता है.

खैर, आवेश में मैं शायद कुछ ज्यादा ही लिख गया हूं. किसी का दिल दुखाने की या किसी को कमतर आंकने की कतई कोई मंशा नहीं है. हिंदी का एक जागरूक पाठक होने के नाते अपनी पीड़ा को जुबान देना ही मैंने योग्य समझा. मैं लेखक नहीं इसलिए मेरा कोई निजी स्वार्थ होने का मतलब नहीं. एक पाठक की ये व्यथा अगर साहित्य जगत के मसीहा समझ पाएं तो एहसान होगा हिंदी पर.

अपनी बात का अंत कृष्ण कल्पित जी के इस सारगर्भित स्टेटमेंट से करना चाहूँगा,

“लोकप्रिय साहित्य लिखा नहीं जाता, साहित्य लिखा जाकर लोकप्रिय होता है.”

काश कोई समझे! काश!


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