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'लोग हाथ से छूते हैं, पीछे से पेट सटा देते हैं'

ये आर्टिकल ज्योतिर्मोय तालुकदार ने डेली ओ के लिए लिखा था. लेखक और वेबसाइट की इजाज़त से इसका हिंदी ट्रांसलेशन आपको पढ़वा रहे हैं.


इंडिया एक भीड़ है. और इस भीड़ की एक खासियत है. इस भीड़ का ‘छुअन’ से एक रिश्ता है. यानी छूने के एहसास से.

हम एक दूसरे को छूते हैं, दिन रात. और ये हमारे लिए इतना आम है कि ऐसा करने के पहले हम सोचते भी नहीं. और ये छूना किसी विशेष अंग को छूना नहीं, बल्कि हर जगह छूना है.

कोई भी भारतीय, चाहे औरत हो, पुरुष या कोई और, कभी भी किसी पब्लिक प्लेस से अनछुआ लौटकर नहीं आता.

हालांकि ये वही देश है जहां छुआछूत जैसी प्रथाओं को सिर्फ माना ही नहीं जाता, धर्म का हवाला देकर उनका सख्त पालन किया जाता है. भले ही संवैधानिक रूप से इसे बैन कर दिया गया है.

इसलिए छूना इंडिया में एक उलझी हुई चीज है.

ये ज्यादा दिनों पहले की बात नहीं है. मैं दिल्ली मेट्रो के प्लैटफॉर्म पर अपनी ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था. एक जनाब मेरे पास आए और कुहनी पकड़कर, जो एक आम और अहिंसक क्रिया है, पूछने लगे कि क्या ये ट्रेन मुझे फलां स्टेशन तक ले जाएगी.

मैंने ‘हां’ में जवाब देते हुए अपना हाथ छुड़ा लिया. उस आदमी ने धीरे से अपनी बंधी मुट्ठी खोलते हुए पूछा, ‘हाथ पिघल गया क्या?’

मुझे उसी वक़्त एक विचारोत्तेजक लेख की याद आई, जिसमें लिखा था कि इंडिया में गंदगी बहुत है. लेकिन मेट्रो की साफ़-सफाई देखकर इंडिया के साफ़ होने की उम्मीद बनती है.

लेकिन आप दिल्ली मेट्रो में किसी भी स्टेशन पर चढ़ें या उतरें, चाहे स्टेशन कितना भी खाली हो, ट्रेन कितनी भी देर रुकी रहे, चाहे कितना भी साफ़ या गंदा हो, आपको महसूस होगा इंडिया हमेशा ‘टची-फीली’ रहेगा.

अगर पिछवाड़े को छोड़ भी दें, तो कम से कम आपको अपने कन्धों और पीठ पर हमेशा हाथ और पेट चिपके हुए महसूस होंगे, जो आपको ट्रेन में चढ़ने और उतरने में मदद कर रहे होंगे. साथ में मुंह भी ‘चलो-चलो’ जपता रहेगा. तब भी, जब एंट्री को किसी ने ब्लॉक भी नहीं कर रखा होगा. इसलिए मेट्रो में चढ़ना और उससे उतरना एक बहादुरी का काम बन जाता है. जैसे आपने कोई जंग जीत ली हो.

और भगवान न करे, कभी आप गलती से सचमुच किसी के रस्ते में आ गए, आप अपने आप को दूसरों के बड़े कॉन्फिडेंट शरीरों से धकियाते हुए पाए जाएंगे, बिना कुछ बोले. और हां, रेलवे स्टेशन या बस में चढ़ने की बात तो मैं कर ही नहीं रहा हूं. और ये कहने की तो जरूरत ही नहीं कि औरतों को मर्दों से ज्यादा दूसरों की बिन मांगी छुअन का शिकार होना पड़ता है.

‘बिन-मांगी’ शब्द यहां बड़ा रोचक है. बल्कि ये इस बात का केंद्र है कि इस देश में छूना और छुआ जाना कितना कौतूहल भरा है.

ऐसा इसलिए क्योंकि ये ‘बिन-मांगा’ छुआ जाना जितना आम है, अपनी मर्जी के छुआ जाना इस देश में उतना ही बड़ा अपराध है.

एक लड़का किसी लड़के का, या एक लड़की और लड़का एक दूसरे का हाथ पकड़े हों, इंडिया में कम दिखता है.

और जब दिखता है, यानी किसी मॉल के कोने में या दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में, लोगों की भौंएं तन जाती हैं. और चीप नहीं तो बुरे कमेंट तो सुनने को मिल ही जाते हैं.

बुकोव्स्की जब ये पंक्ति कह रहे थे, जरूर एक भारतीय पुरुष की तरफ से कह रहे होंगे:

‘मैंने तुमसे वैसे प्रेम किया जैसे एक पुरुष एक ऐसी औरत से करता है जिसे वो छूता नहीं, केवल ख़त लिखता रहता है, केवल छोटी-छोटी तस्वीरें रखता जाता है.’

और कमाल की बात तो ये है कि एक शादीशुदा कपल को पब्लिक में प्रेम का इजहार करने से और भी ज्यादा रोका जाता है.

लिव-इन रिलेशनशिप को यहां गुनाह माना जाता है. और केंद्र में राज कर रही पार्टी का स्टूडेंट विंग उसके खिलाफ कैंपेन करता रहता है क्योंकि उनके मुताबिक़ ये देश की संस्कृति के खिलाफ है. जिसका मतलब ये हुआ कि पब्लिक के अलावा प्राइवेट में भी आपसे ये अपेक्षित है कि भले ही आपकी मर्जी हो, आप पाने पार्टनर को न छुएं.

अगर हम अपने हिंदू समाज की बात करें, हमारे समाज का तो ढांचा ही ऐसा है कि ब्राह्मण टॉप पर रहें, और दलित सबसे नीचे. और दोनों के बीच का फर्क नुमाया करने के लिए छुआ-छूत मानी जाए.

छुआ न जाना, या अछूत होना महज एक प्रथा नहीं, बल्कि इस समाज में पहचान के एक मायने हैं.

और अगर अछूत लोग कभी बाग़ी होकर छूने की हिम्मत कर लें, किसी ब्राह्मण को नहीं, बल्कि किसी ऐसे पद को जो किसी ‘अपर कास्ट’ के पद के बराबर हो, उसका जीना मुश्किल कर दिया जाता है.

कुल मिलाकर, भारतीय समाज एक ‘छूत’ समाज है.


दी लल्लनटॉप के लिए ये अनुवाद प्रतीक्षा पीपी ने किया है.

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