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इस साल का सबसे बेवकूफाना फैसला 'भारत बंद' है

लेफ्ट पार्टियों ने भारत बंद का ऐलान किया है. 28 नवंबर को. कांग्रेस ने भारत बंद का सपोर्ट नहीं किया है पर इसे जन आक्रोश दिवस के रूप में मनाने को कहा है. ये सब हो रहा है नोटबंदी के खिलाफ. विपक्ष कह रहा है कि केंद्र सरकार का फैसला जनता के हित में नहीं है. इस फैसले के बाद जनता को बहुत दिक्कतें उठानी पड़ी हैं. छोटे-मोटे व्यापारी, मजदूर, रेहड़ी वाले इन सबकी बुरी हालत हो गई है. नेताओं की बातें सुनकर ये दर्द और बढ़ जाता है. एक तरफ सरकार रोज नये नियम बदल रही है. दूसरी तरफ विपक्ष रोज नये तरीके ला रहा है जनता का ही गला घोंटने के लिए.

पर क्या भारत बंद से ये स्थिति बदल जाएगी? क्या सरकार तेजी से नोट छापने लगेगी? क्या रोड पर लाइनें कम हो जाएंगी? क्या सरकार अपना फैसला वापस ले लेगी?

भारत बंद एक तरीका है पार्टियों के लिये. विरोध जताने का. स्वतंत्रता आंदोलन के समय इस तरह से विरोध किया जाता था. क्योंकि उस वक्त सब कुछ अंग्रेजों का था. ऐसे भी देश लुट रहा था. तो लोग पर्सनल घाटा होने के बावजूद विरोध करते थे. क्योंकि गुलामी बर्दाश्त नहीं होती थी. पर बाद में इस चीज को हर तरह के विरोध का तरीका बना लिया गया.

अब देश हमारा है. सरकार हमारी चुनी हुई है. सरकार के फैसले से लोग हमारे परेशान हो रहे हैं. तो हमारी क्या जिम्मेदारी है? सरकार को घेरें. संसद में. सारी राजनीतिक पार्टियों के पास ये तो अधिकार है ही. संसद में सवाल पूछें. बिना शोर-शराबा किये. जनता को हमेशा लगता है कि अगर सही सवाल पूछे जाएं तो सरकार के लोग हमेशा घबराएंगे जवाब देने में. कन्नी नहीं काट सकते. पर शोर करने से सरकार को भी निकलने का रास्ता मिल जाता है. सही सवाल के तो अनेक उदाहरण हैं. इसके लिये अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये का उदाहरण लेने की जरूरत नहीं है. जिस वक्त राहुल गांधी दो महीने की छुट्टियां बिता के वापस आये थे, तब दो सांसदों ने ऐसे सवाल पूछे जिन पर कोई जवाब नहीं सूझ रहा था. स्पीकर ने उनको राज्य का विषय बता के कन्नी काट ली.

एक ने पूछा- टीचर इतनी मेहनत कर रहे हैं, उनको पैसा क्यों नहीं मिल रहा है? वेतन क्यों रोका हुआ है? इस सीधे से सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था. देखेंगे के अलावा.

दूसरे ने पूछा- मैं भाजपा से हूं. सांसद हूं. मेरे क्षेत्र में किसानों की स्थिति खराब है. मैं क्या कर सकता हूं उनके लिये? इस बात का भी जवाब नहीं था.

इससे पहले 2015 में एक राज्यसभा में सांसद ने कहा कि वर्धा जिले के 109 किसानों ने सुसाइड क्लियरेंस के लिये आवेदन किया है. इस बात पर सरकार के पास कोई जवाब नहीं था.आर्मी में अफसरों की घटती संख्या पर सवाल पूछे गये. ये सवाल जरूरी हैं. और तार्किक हैं. इनका जवाब सरकार को देना ही पड़ता है. ना दें तो मोरली कमजोर होती है सरकार. अगर रोज सही सवाल ही करें तो जनता को भी तो पता चलेगा कि क्या चल रहा है.

अब भारत बंद करने से सवाल तो नहीं उठेंगे सरकार के सामने. पर ये जरूर होगा-

1. छोटे व्यापारियों की दुकानें और बिजनेस बंद हो जायेंगे. कोढ़ में खाज. जो मिल रहा है वो भी चला जायेगा.
2.लोगों को और ज्यादा निराशा होगी. हर पार्टी से. लोग सबसे त्रस्त हो जायेंगे.
3.सरकार अपनी गलतियां नहीं मानेगी. हमेशा यही कहेगी कि आप ज्यादा डैमेज कर रहे हैं इकॉनमी को.
4.सही सवाल लोगों तक नहीं पहुंचेंगे. लोगों को समझ ही नहीं आयेगा कि क्या हो रहा है इस देश में.
5.ऐसे मामलों में छुटभैये नेता निकल आते हैं. जिनको किसी चीज के बारे में पता नहीं होता है. पर उनके अंदर निष्ठा होती है. एक बंद के पक्ष में होता है. दूसरा विपक्ष में. बंद को ये सीरियसली लेते हैं. दुकानें बंद कराने लगते हैं. मार-पीट करते हैं. माहौल को कुछ और ही बना देते हैं.
6.ये मामले जाति और धर्म से जुड़े फसाद को बढ़ाने में सहायता करते हैं. पुरानी दुश्मनी निकाल ली जाती है. नई दुश्मनी मोल ली जाती है. क्योंकि किसी को समझ ही नहीं रहती असल मुद्दे की.

भारत बंद ये दिखा रहा है कि विपक्ष को किसी से कोई मतलब नहीं है. ना ही उसे सच्चाई दिख रही है. उन्हें लोगों की समस्याओं से कोई विशेष ताल्लुक नहीं है. उन्हें लगता है कि शोर-शराबा करने से जनता के बीच उनका वोट परसेंटेज बढ़ेगा. जो काम आजकल लोग संसद में करते हैं. सरकार ने अगर फैसला लिया है तो इसके नफे-नुकसान तो हैं ही. पर इस पर बात करने की जरूरत है. कुछ लोग फैसला ही वापस लेने की बात कर रहे हैं. वो तो और बेवकूफाना है.

संसद से सड़क तक का जुमला उछालने के चक्कर में मूल बात से ही भटक जा रहे हैं. अगर वाकई में जनता की दिक्कतों से सरोकार है तो सारी राजनीतिक पार्टियों को अपने ब्लैक मनी को डिक्लेयर कर देना चाहिए. पर ये तो बहुत दूर की बात कह दी गई है. प्रजातंत्र में इसका तो जिक्र ही नहीं होना चाहिये. क्योंकि सब कुछ रेटॉरिक पर चलता है. इमेज बिल्डिंग और मिथ मेकिंग.

सच तो ये है कि अगर फैसले का विरोध करना था तो सारे विपक्षी नेताओं को खुद लाइन में लगकर रोज नोट बदलवाने थे. दो हजार ही बदलवाते. रोज पैसे निकालने के लिये लाइन में लगते. लोग भी देखते कि ये लोग भी दिक्कत उठा रहे हैं. ये लोग भी जनता की दिक्कतों को समझते. तो लोगों को तो समझ ही नहीं आ रहा कि सरकार और विपक्ष एक-दूसरे की आलोचना कर रहे हैं या फिर साथ हैं. क्योंकि दोनों में से कोई लाइन में नहीं लग रहा. इनको कोई दिक्कत नहीं हो रही. और दोनों ही जनता की दिक्कतों को बढ़ा रहे हैं.

अगर इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं बहुत सारे सांसद अपने-अपने क्षेत्रों में ही नये एंटरप्रेन्योर्स को बढ़ा रहे हैं? जो नये विचार लेकर आते कैशलेस पेमेंट के लिये. लोगों की चिंतायें सुलझाते. पर सुनने में तो यही आ रहा है कि विपक्ष अपना ही जुगाड़ भिड़ा रहा है हर जगह.

भारत बंद से किसी को कोई फायदा नहीं हो रहा. ये पुरातन जमाने की वो कोशिश है, जो अब निष्प्रभावी है. जैसा कि लोग कह रहे हैं कि ब्लैक मनी से लड़ने के लिये नोटबंदी पुरातन हथियार है वैसे ही सरकारी फैसलों का विरोध करने के लिये भारत बंद करना जंग लगा हथियार है.

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