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क्या चीज है G7, जिसमें न रूस है, न चीन, जबकि भारत को इस बार बुलाया गया

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24 से 26 अगस्त. ये 2019 के G7 सम्मेलन का कलेंडर है. G7 एक तरह का क्लब है. एकदम पॉश. एलीट. दुनिया के कुछ सबसे ताकतवर, सबसे मुखिया टाइप देश इसके मेंबर हैं. ये लोग साल में एक बार मिलकर बैठते हैं. जो ज़रूरी लगता है, उसपर बात करते हैं. इसको बोलते हैं G7 Summit. इस साल ये हो रहा है फ्रांस में. नरेंद्र मोदी भी इसमें पहुंचे हैं. वैसे तो इस अति-VIP ग्रुप में नहीं है भारत. मगर इस साल हमें खास न्योता भेजा गया आने को. यहां मोदी की मुलाकात डॉनल्ड ट्रंप से होनी है. जो कश्मीर मसले में मध्यस्थता करने को लालायित हैं. भारत मना कर चुका है. फिर भी ट्रंप बार-बार इच्छा जता रहे हैं.

विज्ञान और धर्म, दोनों दो दुनिया के जीव हैं. लेकिन एक बात पर दोनों सेम-टू-सेम सोचते हैं. कि कोई भी चीज यूं ही नहीं होती. G7 के होने का भी कारण है. इस ख़बर में हम कारण भी समझेंगे. और कारण की जड़, यानी G7 को भी.

क्या चीज है G7?
इसका पूरा नाम है- ग्रुप ऑफ सेवन. दुनिया के सात सबसे बड़े इंडस्ट्रियल देशों का संगठन. ये देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान और कनाडा. पहले इसमें रूस भी था. तब था ये ग्रुप ऑफ 8. फिर हुआ ये कि रूस ने क्रीमिया को यूक्रेन से छीनकर खु़द में मिला लिया. इससे बाकी देश नाराज़ हो गए. उन्होंने 2014 में रूस को निकाल बाहर कर दिया. उस साल रूस में ही होना था सालाना सम्मेलन.

हिस्ट्री क्या है इसकी?
साल था 1975. छह देश जुटे. अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिमी जर्मनी, फ्रांस, जापान और इटली. तब कोल्ड वॉर का टाइम था. दुनिया में कैपिटलिस्ट और कम्युनिस्ट की लड़ाई थी. ये छह देश कैपिटलिज़म वाले थे. इन्होंने कहा, हम ग्रुप बनाएंगे. और ग्रुप बनाकर अपने खाते-बही, कारखानों पर बातचीत करेंगे. पॉलिटिक्स और सुरक्षा पर भी बात करना तय हुआ. इनको देखकर फिर अगले साल, यानी 1976 में कनाडा भी साथ आ गया. फिर 1991 में सोवियत गया टूट. आधा-आधा बंटे दो जर्मनी (ईस्ट और वेस्ट) साथ मिलकर दोबारा पूरे हो गए. सोवियत टूटने के सातवें साल, यानी 1998 में रूस आकर इस ग्रुप से जुड़ गया. और इस तरह पहले G6, फिर G7 और फिर G8 होता गया ग्रुप. G8 से G7 होने की कहानी तो हमने ऊपर ही सुना दी.

और कोई है क्या इसमें?
यूरोप एक महादेश है. कुल 44 देश हैं इसमें. इनमें से 28 देशों का अपना एक ग्रुप है- यूरोपियन यूनियन. शॉर्टकट- EU. अब तो ब्रेग्ज़िट हो रहा है. मतलब EU से ब्रिटेन का एग्ज़िट. ये हो जाए, तो EU में 27 देश बचेंगे. ब्रेग्ज़िट का सीन अभी बहुत डंवाडोल है. वो जब फाइनल हो जाएगा, तब देखेंगे. अभी का हिसाब ये है कि उसके सबसे बड़े देश- ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और इटली EU का हिस्सा हैं. ऐसे में आधिकारिक तौर पर मेंबर न होते हुए भी EU हिस्सा है G7 का. 1977 से ही. बाकी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों की तरह यूरोपियन कमीशन के प्रेज़िडेंट भी G7 समिट में पहुंचते हैं.

G7 बराबर क्या?
जनसंख्या के हिसाब में ये सारे देश मिलाकर होते हैं थोड़े से. बमुश्किल दुनिया का 10 फीसद. मगर ग्लोबल GDP जोड़ें, तो इन सबको मिलाकर होता है दुनिया का 40 पर्सेंट.

इंडस्ट्री की बात है, तो चीन क्यों नहीं इसका मेंबर?
सवाल होगा कि चीन दुनिया में दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था है. इतने कल-कारखाने हैं वहां. तो फिर वो क्यों नहीं इस ग्रुप में? चीन वैसे बहुत बड़ी इकॉनमी है. मगर आबादी के हिसाब से उसकी दौलत बांटे, तो वो उतनी विकसित अर्थव्यवस्था नहीं. जबकि G7 अडवांस्ड अर्थव्यवस्था वाले देशों का जमावड़ा है. हालांकि जब रूस को लाया गया था इसमें, तब वो काफी बेहाल था. मगर तब उसे शामिल करना अमेरिका की रणनीति थी. बिल क्लिंटन राष्ट्रपति थे. उन्हें लगा कि पोस्ट-सोवियत दौर में रूस को ट्रैक पर रखने में मदद मिलेगी इससे. रूस को वेस्ट के साथ जोड़ने, इन देशों के हितों के साथ रूस की सिलाई-बुनाई करने में सही रहेगा.

भारत को क्यों बुलाया गया है?
टाइम-टाइम पर G7 में हिस्सा लेने के लिए ‘बाहरी’ देशों को न्योता दिया जाता है. कई सारे संगठनों को भी बुलाया जाता है. भारत बड़ी अर्थव्यवस्था है. आबादी में दूसरे नंबर पर है. इतना बड़ा बाज़ार है यहां. इसके अलावा पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं में भी भारत का सहयोग चाहिए. जियोपॉलिटिक्स भी एक बड़ी वजह होती है किसी देश को न्योता देने की. भारत को इस साल के सम्मेलन में आने का इनविटेशन दिया फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने. मैक्रों वकालत करते हैं आर्थिक समानता की. उनका कहना है कि G7 को इसपर ख़ास ध्यान देना चाहिए. ज्यादा प्रतिनिधित्व होना चाहिए दुनिया का इसमें. भारत के अलावा उन्होंने साउथ अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और चिले को भी बुलाया.

G7 की क्या आलोचना होती है?
सबसे बड़ी आलोचना है भेदभाव की. कहते हैं कि दुनिया के ये बड़े देश ख़ुद को प्रीमियम माल समझते हैं. ख़ुद को अलग लीग में रखते हैं. बाकी दुनिया की कोई हिस्सेदारी ही नहीं इस ग्रुप में. एशिया में से बस जापान है. अफ्रीका पूरे का पूरा नहीं है. लैटिन अमेरिकी मुल्क नहीं हैं. भारत और चीन जैसे ग्लोबल इकॉनमी के बड़े हिस्सेदारों को सस्ती और पिछड़ी अर्थव्यवस्था कहकर मुंह चिढ़ा दिया जाता है. जबकि ये दोनों देश दुनिया को सस्ती चीजें, सस्ती सर्विसेज़ मुहैया कराते हैं. जिसका ख़ूब फ़ायदा उठाता है वेस्ट. इसके सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को प्रॉफिट देता है. आरोप लगते हैं कि ये भी एक तरह का कोलोनियल माइंडसेट है वेस्ट का.

ऐसे तर्क कहते हैं कि इस ग्लोबल इकॉनमी वाली दुनिया में आउट-ऑफ-टच और अव्यावहारिक है G7.ऐसे में G20 का नाम लिया जाता है. वो बड़ा ग्रुप है. ज्यादा संभानवाओं वाला. भारत, अमेरिका, चीन, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की. जानकार कहते हैं कि G20 के होने पर G7 की क्या ज़रूरत? बस एक्सक्लूसिव होने के वास्ते?

अभी क्या मुश्किलें हैं G7 के सामने?
ग्रुप के सदस्यों के बीच एक राय नहीं है. डॉनल्ड ट्रंप खुलकर कह चुके हैं कि रूस को दोबारा साथ लेना चाहिए. बाकी सदस्य राज़ी नहीं. ट्रंप की कई मेंबर देशों से बनती नहीं. जर्मनी और फ्रांस के साथ तो सबसे ज़्यादा असहमतियां हैं. कनाडा के साथ भी हैं. टैक्स और निर्यात-आयात पर यूरोप के हित टकरा रहे हैं ट्रंप से. ऊपर से क्लाइमेट चेंज का भी मसला है. बाकी देश पैरिस क्लाइमेट डील में तय किए लक्ष्य को पूरा करने की कोशिश करना चाहते हैं. जबकि ट्रंप क्लाइमेट चेंज को बड़ी शक़ की निगाहों से देखते हैं.

चीन के साथ चल रहे अमेरिका के ट्रेड वॉर का अलग प्रसंग है. ईरान के साथ चल रहे ट्रंप के टेंशन पर भी मतभेद है. यूरोप ईरान से चीजें ठीक करना चाहता हैं. ट्रंप सब बिगाड़ने पर तुले हैं. उन्होंने न्यूक्लियर समझौता भी तोड़ दिया. ब्रेग्ज़िट को लेकर भी तनाव है. ऊपर से दुनिया के सामने एक और आर्थिक मंदी का ख़तरा मंडरा रहा है.


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