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मौत के 19 दिन बाद किस तरह हुआ गैंगस्टर आनंदपाल का अंतिम संस्कार

पिछले 19 दिन से आनंदपाल के अंतिम संस्कार पर सस्पेंस खत्म हो गया है.  भारी पुलिस बंदोबस्त और परिजनों की मर्जी के खिलाफ आनंदपाल सिंह का अंतिम संस्कार कर दिया गया. शाम करीब 6.15 मिनट पर पुलिस ने आनंदपाल का शव उनके घर से जब्त कर लिया गया. शव को 108 एम्बुलेंस से श्मशान ले जाया गया.  इसके बाद पुलिस ने लाउड स्पीकर से एलान किया कि अगर कोई आदमी दाहसंस्कार में शामिल होना चाहे तो शमशान में आ सकते हैं.

करीब आधा घंटा इंतजार करने के बाद पुलिस ने आनंदपाल का अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू कर दी. नगरपालिका के कर्मचारियों से कह कर उनकी लाश को चिता पर रखा गया. इसके बाद पुलिस आनंदपाल के बेटे ऋषि को लेने उसके घर गई. घरवालों ने इस चीज का विरोध किया. ऋषि श्मशान घाट  में अपने पिता को मुखाग्नि  देने नहीं गए. दूसरी बार में पुलिस ने ऋषि को जबरदस्ती श्मशान ले जाकर पिता का अंतिम संस्कार करवाया. इस मौके गांव के पांच को लोगों को बतौर गवाह वहां मौजूद रहने दिया गया.

इससे पहले पुलिस ने आनंदपाल के परिजनों को चार बजे तक का समय दिया था. अगर उनके परिजन चार बजे तक अंतिम संस्कार नहीं करते हैं तो पुलिस उनका अंतिम संस्कार करेगी. इसके बाद करीब साढ़े चार बजे मेडिकल टीम लाश का मुआयना करने गांव में घुसी. लाश के मुआयने के बाद पुलिस ने शव को घर से गोपनीय तरीके से बाहर निकाला और उसका अंतिम संस्कार की कार्रवाही शुरू कर दी गई.

कल सांवराद में राजपूत समाज की तरफ से हुई श्रद्धांजलि सभा के बाद सरकार बैकफुट पर थी. रात में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने कैबिनेट की आपात मीटिंग बुलाई थी. इस बीच मानवाधिकार आयोग ने भी आनंदपाल का अंतिम संस्कार ना करने पर आपत्ति जताई थी. तो कल आखिर सांवराद में ऐसा क्या हुआ कि सरकार को कड़े कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा.

anandpal

नागौर की लाडनूं तहसील का छोटा सा गांव सांवाराद कल दिन भर ऑनलाइन मीडिया और टीवी की सुर्खियों में बना रहा. राजस्थान में गैंगस्टर आनंदपाल के एनकाउंटर का मामला राजनीतिक तूल ले चुका है. आनंदपाल के परिजन और राजपूत समाज के लोग इस एनकाउंटर को फर्जी बता कर सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. पिछले 18 दिन से आनंदपाल की लाश अपने अंतिम संस्कार का इंतजार कर रही है.

इस सिलसिले में 12 तारीख को सांवराद में राजपूत समाज की तरफ से श्रद्धांजलि सभा रखी गई थी. इस सभा के बाद हुए बवाल में हरियाणा के रोहतक में रहने वाले लालचंद की मौत हो गई. वहीं 16 जवान घालय हो गए. 13 तारीख के अखबार में दो खबरों को प्रमुखता से छापा गया. पहले खबर इस बवाल को लेकर थी. वहीं दूसरी खबर राज्य मानवाधिकार आयोग के हवाले से छपी थी. आयोग ने 24 घंटे के भीतर सरकार से शव का निस्तारण करवाने की बात कही है. अखबार के पन्नों पर छपी इन सपाट लाइनों के बीच कई चीजें ऐसी थीं जो दर्ज नहीं हो पाई थी. हम आपको संवाराद में बवाल का आंखों देखा हाल सुनाने जा रहे हैं.

श्रद्धांजलि सभा का समय 12 बजे का रखा गया था. संवाराद में लोग एक रात पहले से जुटने लगे थे. लाडनूं और डीडवाना से सांवाराद पहुंचने के कुल छह रास्ते हैं. सब पर पुलिस की नाकेबंदी थी. निकलने वाली हर गाड़ी का नंबर नोट किया जा रहा था. सीआईडी की रिपोर्ट में दिन के 12 बजे करीब 1000 गाड़ियों के संवाराद पहुंचने की बात दर्ज थी. पुलिस के निचले स्तर के अधिकारियों ने इस सिलसिले में अपने ही विभाग को धोखे में रखा. ऊपर के स्तर तक पहुंचते-पहुंचते यह संख्या 1000 से घटकर जादुई रूप से 135 पर पहुंच गई.

भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी. करीब दो बजे आनंदपाल की बेटी योगिता मंच पर चढ़ी. उन्होंने घोषणा की कि सरकार से प्रतिनिधि मंडल की बात चल रही है. सरकार ने हमारी मांगों पर विचार करने के लिए 2 घंटे का समय मांगा है. अगर बातचीत सफल रहती है तो हम आज ही शव का अंतिम संस्कार कर देंगे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो ‘दादी सा’ आकर बताएंगी कि आगे क्या करना है.

इस बीच मंच से भाषण चलते रहे. आनंदपाल को न्याय दिलाने की कसमें खाई जा रही थी. इस बीच लोग समय बीतने का इंतेजार करते रहे. चार बचे महिपाल सिंह मकराना ने मंच से लोगों को बताया कि सरकार से वार्ता अभी चल रही ही रही है. एक घंटे के भीतर दोनों पक्ष किसी ना किसी नतीजे पर पहुंच जाएंगे.

श्रद्धांजलि सभा
श्रद्धांजलि सभा

लोग फिर से इंतजार करने पर लग गए. असमान पर बादल छाए हुए थे और मंच पर कसमों और प्रतिज्ञाओं का मौसम लौट आया था. इंतजार करते-करते छह बज गई. दूर से आए हुए लोग ‘कुछ नहीं होने वाला है’ का भाव लिए हुए घर लौटने लगे.

इस बीच भीड़ में से किसी ने पटरियां उखाड़ने की बात कही. ये लोग पटरियां उखाड़ने के लिए सांवराद के छोटे से रेलवे स्टेशन पहुंच पाते इससे पहले हम आपको सांवराद का नक्शा समझा देते हैं. डीडवाना से जब आप लाडनूं की तरफ मुड़ते हैं तो करीब 15 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद सांवरद पहुंचते हैं. यह गांव का पश्चिमी छोर है. यहां से आनंदपाल का घर करीब डेढ़ किलोमीटर है. यहां पर पुलिस का एक अस्थाई कंट्रोल रूम बनाया गया है. पूर्वी छोर पर है जोधपुर दिल्ली रेलवे लाइन, जिस पर संवाराद का रेलवे स्टेशन बना हुआ है.

जब भीड़ में पटरी उखाड़ने की ललकार उठी तो लोगों का एक जत्था रेलवे स्टेशन पहुंच गया. गांव के इस कोने पर मोनिका सेन नाम की ट्रेनी आईपीएस अधिकारी को तैनात किया गया था. नई-नवेली आईपीएस बनी मोनिका के लिए यह इस किस्म का पहला प्रदर्शन था. भीड़ को स्टेशन की तरफ बढ़ते देख उन्होंने दो ट्रकों में मौजूद क्विक रेस्पोंस टीम के जवानों को भीड़ पर नियंत्रण करने के आदेश दिए . बढ़ती भीड़ को देख कर जवानों ने पटरी की बजाए खुद की सुरक्षा को ज्यादा तवज्जो दी. वो ट्रक में सवार हुए और कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ गए. इस बीच मोनिका अपने गार्ड के साथ भीड़ में घिर गई. यहां उनके साथ बदसलूकी हुई. उनके गार्ड को बुरी तरह से पीटा गया. उनकी पिस्टल छीन ली गई.

श्रद्धांजलि सभा
श्रद्धांजलि सभा

इधर गांव के पश्चिमी छोर पर भी युद्ध जैसे हालात ही बने हुए थे. पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू कर दिया. उधर से लाठी का जवाब पत्थर से दिया जाने लगा. नागौर एसपी परीश देशमुख बलवाइयों से निपटने के अपनी गाड़ी से उतरे. भीड़ से आवाज आई कि इसे पीटो. लोग पत्थर बरसाते हुए उनकी गाड़ी की तरफ बढ़ने लगे. जान बचाने के लिए उन्हें वहां से भागना पड़ा. इस बीच उनका गार्ड भी बलवाइयों से घिर गया. उनको बुरी तरह से पीटा गया. उनकी एके 47 छीन ली गई. इधर एक और डीवाई एसपी के गार्ड भी साथ भी यही घटना पेश आई. उनकि पिस्तौल भी छीन ली गई.

पूर्वी छोर पर अब हालात और बिगड़ने लगे. पटरियां उखाड़ी जा चुकी थी. स्टेशन पर रेलवे पुलिस की एक छोटी सी चौकी थी. यहां मौजूद जवान ना तो हथियारबंद थे और ना ही उनका इस घटना से कोई सीधा ताल्लुक था. भीड़ ने खाकी वर्दी देख कर उन्हें घेर लिया. रेलवे पुलिसवालों ने हाथ जोड़ कर समझाइश की लेकिन भीड़ हमलावर थी. पुलिसवालों की एक ना सुनी गई. उन्हें बुरी तरह पीटा गया. इधर ट्रेनी आईपीएस मोनिका सेन लापता हो चुकी थीं. संवाराद के आसपास तीन किलोमीटर के दायरे में मोबाइल नेटवर्क जाम कर दिया गया था. मोनिका से कोई भी संपर्क नहीं हो पा रहा था. अफवाह यह आने लगी कि बलवाइयों ने मोनिका को अगवा कर लिया है.

पुलिस का कड़ा बंदोबस्त बहुत मुलायम था 

पश्चिमी छोर पर पुलिस को समझ में आ गया था कि अब निर्णायक कदम उठाने का वक़्त आ गया है. बस एक दिक्कत थी कि उनके पास पर्याप्त मात्रा में जवान नहीं थे. श्रद्धांजलि सभा के एक दिन पहले पुलिस अधिकारियों को जो ब्रीफिंग मिली थी उसके हिसाब से करीब 20 से 25 हजार लोगों के आने अंदाजा लगाया गया था. यही वो तिलस्म था जिसके चलते गाड़ियों की संख्या 1000 से घट कर 135 पर सिमट गई थी. एक लाख की भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस के पास महज ढाई हजार जवान थे. सरकार की तरफ से प्रदेश भर के राजपूत अफसर बुलाए गए थे. लेकिन सरकार की यह तरकीब भी कोई ख़ास कारगर साबित नहीं होती दिख रही थी. कुल 6 एएसपी,8 डीएसपी और 27 एसएचओ तैनात किए गए थे. खैर लाठी चार्ज से बात ना बनते देख फायरिंग के आदेश दिए गए.

पूरे दिन यह हालत बने हुए थे कि बलवाइयों ने पुलिस को कंट्रोल रूम से 10 मीटर आगे नहीं बढ़ने दिया था. करीब 7.15 शाम पुलिस लाठीचार्ज करते हुए गांव के अंदर घुसी. पूर्वी छोर तक तीन किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब 45 मिनट और लग गए. आठ बजे के आसपास पुलिस रेलवे स्टेशन पहुंची. यहां एक आदमी फटे हुए पेट के साथ उनका इंतजार कर रहा था.

श्रद्धांजलि सभा
श्रद्धांजलि सभा

इस आदमी का नाम लालचंद था. रोहतक हरियाणा के रहने वाले लालचंद को जब घटना स्थल से उठाया गया तो उनका पेट दाएं से बाएं फटा हुआ था. उनकी आंते बाहर निकल कर चुकी थीं, लेकिन उनमें जान बाकी थी. उन्हें जल्द ही पास के अस्पताल ले जाया गया. बड़ी मशक्कत के बाद डॉक्टर ने उनका पेट सिला और जयपुर के लिए रवाना कर दिया. बमुश्किल 25 किलोमीटर चलने के बाद उन्होंने अपना दम तोड़ दिया.

सुबह होने तक एके 47 पास के ही खेत से बरामद कर लिया गया. कुल 16 पुलिसकर्मी घायल थे. 3 प्रदर्शनकारियों को गोली लगी थी. सांवराद में कर्फ्यू लग चुका था. गांव में औरतों के अलावा कोई नहीं बचा था. रात 8.30 बजे तक मोनिका सुरक्षित कंट्रोल रूम लौट चुकी थीं. उन्होंने पास ही के एक घर में शरण ली थी. कुल तीन सर्विस पिस्टल और तीन वायरलेस गायब थे. पुलिस के एक हजार जवान गांव में मौजूद थे ताकि एक लाश के मानवाधिकार की रक्षा की जा सके.


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