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जानिए भूकंप के बारे में सब कुछ

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दिल्ली-एनसीआर में भूकंप के झटके महसूस हुए हैं. वैज्ञानिक आए दिन भूकंप के खतरों के बारे में बताते ही रहते हैं. तो आइए आपको भूकंप के बारे में तसल्ली से बताते हैं. सबकुछ.


धरती पर भूकंप आता क्यों है?

हम सभी कुछ ना कुछ गड़बड़ करते रहते हैं. कभी-कभी धरती भी गड़बड़ कर देती है, बल्कि रोज कर देती है. पूरे ग्लोब पर रोज-रोज कहीं ना कहीं कुछ खटपट होता रहता है. छोटे-छोटे वाले तो कुछ नहीं कर पाते. पर जब कहीं कुछ बड़ा हो जाता है, तो पता चलता है कि भूकंप आ गया है.

अगर धरती को छेद के देखें तो ये तीन लेयर में होती है. सबसे ऊपरी लेयर को क्रस्ट कहते हैं. ये क्रस्ट पूरी धरती को घेरे रहता है. मतलब हमारे पांव के नीचे की जमीन और नदी-समंदर के नीचे की भी जमीन. ये बहुत ही मोटी परत होती है. जो हम देख पाते हैं, इससे बहुत गहरी.

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धरती के लेयर्स

तो हमारी जमीन के नीचे बहुत सारी प्लेट्स होती हैं. आड़ी-तिरछी. इधर-उधर. एकदम फंसी हुई. एक हिली तो दूसरी भी हिलेगी. एक खिंची तो कई और खिंच जाएंगी. और जब ये ज्यादा हो जाता है, तो ऊपर की जमीन खड़खड़ा जाती है. भूकंप आ जाता है. करोड़ों बरसों पहले जब कई प्लेट्स ऐसे ही टकराई थीं, तब इसी टक्कर से कई सारे पहाड़ बने थे. मतलब हल्के में नहीं लेना है इस टक्कर को. हिमालय भी ऐसे ही बना था. कहीं-कहीं भूकंप के अलावा ज्वालामुखी भी फट जाते हैं. इसमें क्या होता है कि धरती के अन्दर का लावा बाहर आ जाता है. गरम-गरम.

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इंडिया और यूरेशिया के प्लेट्स

तो पूरी धरती पर कई फॉल्ट जोन हैं. मतलब कई जगह प्लेट्स एक-दूसरे से मिलती हैं. अब जहां मेल-जोल होगा, खटपट होगी ही. तो भूकंप ऐसे ही फॉल्ट जोन में आता है.

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पूरी दुनिया के प्लेट्स और फाल्ट लाइन्स

प्लेट्स के हिलने के भी कई तरीके हैं

1.Strike-Slip

इसमें प्लेट्स अगल-बगल में खिसक जाती हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया का सैन एंड्रियाज फॉल्ट.


 

2.Dip-Slip

जब प्लेट्स ऊपर-नीचे हिलती हैं, तो भी भूकंप आता है. उत्तरी अमेरिका और प्रशांत महासागर वाली प्लेट में ऐसा होता है.


 

3.Oblique

यहां मामला टेढ़ा है. ऊपर-नीचे और अगल-बगल दोनों तरफ प्लेट खिसकती है. सैन फ्रांसिस्को में ऐसा होता है.

इंसान भी इसमें पीछे नहीं है. लगे हाथ ऐसे काम कर देता है कि भूकंप आ जाता है. जैसे एटम बम और हाइड्रोजन बम का टेस्ट. नॉर्थ कोरिया के तानाशाह ने जब एटम बम फोड़ा था, तब जमीन हिलने से ही पता चला था. इसके अलावा किसी-किसी प्रोजेक्ट में इंसान इतना गहरा गड्ढा खोद देता है कि धरती उसे संभाल नहीं पाती. हल्के भूकंप आ ही जाते हैं.

समुद्र के नीचे भूकंप आ जाए, तो पानी की धार बदल जाती है और सुनामी आ जाती है. भूकंप प्रकृति का एक नियम है. जैसे हर चीज टूट-फूट के फिर कुछ नई चीज बन जाती है, वैसे ही धरती के अन्दर भूकंप प्लेटों को फिर से व्यवस्थित कर देता है.

अब कैसे नापते हैं? इंची-टेप से? नहीं यार. ऐसे होता तो सब लोग साइंटिस्ट बन जाते.

पुराना ज़माना

1.

इंडिया में वराह मिहिर की लिखी बृहत् संहिता और बल्लाल सेना की अद्भुत सागर में भूकंप का जिक्र है. इसको ज्यादा पढ़ा नहीं गया.


2.

चीन में 2000 साल पहले भूकंप नापने के लिए एक जुगाड़ था. खुले मैदान में एक कांसे का 6 फीट डायमीटर का जार रख दिया जाता था. डायमीटर के चारों ओर खुले मुंह के 8 ड्रैगन लगा दिए जाते थे. नीचे 8 मेंढक लगा दिये जाते थे. सब कांसे के ही. ड्रैगन के मुंह में एक बॉल रख दी जाती थी. जब भूकंप आता तो बॉल उसके मुंह से छिटक कर मेंढक के मुंह में चली जाती. जिस दिशा में जाती, उसे भूकंप की दिशा मान लिया जाता था.

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चीन का जुगाड़: Houfeng Didong

नया ज़माना

जब भी भूकंप की न्यूज़ आती है, कुछ ऐसे ही आती है: जापान में 7.5 रिक्टर की तीव्रता का भूकंप आया. डिटेल 10 बजे. इसका मतलब क्या है?

भूकंप में दो चीजें देखी जाती हैं: मैग्नीट्यूड और इंटेंसिटी. मतलब कितना आया और कितनी जोर से. ये नापा जाता है रिक्टर स्केल से.

जब प्लेट्स टकराती हैं, तो एनर्जी निकलती है. ये तरंग के रूप में निकलती है. तो इसके लिए एक यंत्र बैठाया जाता है. सीज्मोमीटर. वैसे एरिया में जिससे 100-200 किलोमीटर दूर भूकंप आते हैं. तो भूकंप की तरंग आ के सीज्मोमीटर से टकराती है. ये इसको बढ़ा-चढ़ा के नापता है. फिर दूरी और इस तरंग के आधार पर एक फ़ॉर्मूले के तहत रिक्टर स्केल पर नंबर बताया जाता है. और भी एक-दो तरीके हैं, पर रिक्टर वाला ज्यादा चलन में है.

रिक्टर स्केल पर 3 तक के तो पता भी नहीं चलते. पर 4 से गड़बड़ शुरू हो जाती है. 6 वाले गंभीर खतरा पैदा करते हैं.

tremor.nmt.edu
tremor.nmt.edu

धरती के नीचे जहां भूकंप शुरू होता है, उसको फोकस कहते हैं. इसके ठीक ऊपर की दिशा में जमीन पर जो पॉइंट होता है, उसको एपीसेंटर कहते हैं. सीज्मोमीटर इसी पॉइंट से भूकंप की तीव्रता नापता है.

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भूकंप का एपीसेंटर और फोकस

दी लल्लनटॉप के लिए ये लेख ऋषभ ने लिखा था.


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