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अगर सेक्स चैट किया तो क्या गलत किया?

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सन 1991 की बात है. सावन अपने चरम पर बरस रहा था. हमेशा की तरह सुहाना और भीगा हुआ था. जर जमीन और जोरू सब इस मौसम के सुहानेपन का मौज ले रहे थे. इन सब के बीच बिहार के जमुई जिले में एक लौंडा अवतरित हुआ. और इस लौंडे के साथ पूरे हिंदुस्तान में और भी हज़ारों लौंडे-लौंडियों ने अवतार लिया. आकाशवाणी हुई और लोगों को अवतरण की खबर मिली. हमने अवतार के बाद पहली बार अपनी आंख खोली. आंख खुली तो एक औरत जो हमेशा मुझे अपने सीने से लगाए रहती उसके दर्शन हुए. जिसे मैं माँ कहता हूँ.

हम और बड़े हुए. स्कूल गये. कभी ये ख्याल आया ही नहीं कि आखिर मेरा अवतार हुआ कैसे? और उद्देश्य क्या है मेरे अवतार का? अब हम नौवीं क्लास में पहुंच चुके थे. हाई स्कूल का बड़का सा हॉल पूरा तरबरा के भरा हुआ. एक तरफ लौंडे. और दूसरी तरफ लौंडियां. सब अपनी जवानी की ओर कूदते हुए. ये वो दौर था, जब मुझे विज्ञान विषय से कुढ़न शुरू हो गई थी.

स्साला जब देखो हर बात के पीछे एक वजह देने लगा. नौवीं में इस विज्ञान ने मेरे अवतार को भी झूठा साबित कर दिया. विज्ञान की क्लास में गुरु जी आये. बायोलॉजी की क्लास थी. मास्साब का नाम था रामसागर सिंह. कतई जवान आदमी थे. वैसे उम्र तो इतनी थी की हमरे पिता जी के दौर से ही पढ़ा रहे थे. कुछ कहे से न शर्माते. और पूछने की भी पूरी आज़ादी थी हम लोगन को.

क्लास पहुंची, प्रजनन अध्याय पर. मल्लब बच्चे पैदा करने वाले चैप्टर पर. मुझे अब अपने अलग-अलग अंगों की जानकरी होने लगी. कल तक खेत बहियार किनारे बैठे. रपट दौड़-धूप, ले गर्दनिया देने वाले लौंडों को अब बतियाने के लिए नई बात मिल गयी. प्रजनन. शुरू में शर्माते, मुंडा जमीन में गोंत के बात करते. फिर धीरे-धीरे सब खुल गए. पहली क्लास जब हुई. मास्साब आए. पूछा, ‘केतना लोग को कुछ पता है, एकरा बारे में.’ हम थे साले निपट हरामी शुरू से. हाथ उठा दिए. ‘हां हमको पता है. बताओ.’

‘मास्साब, गैय्न्न को देखे हैं?’
‘कैसे?’
‘सर, गैय्न्न को लेई जाते हैं. पाल खिलाबे. पाल मने, सांड से संभोग के लिए. बाकायदा, घर से गाय को खोल के सांड के पास ले जाते हैं.’
गुरु जी भी पूरे क्लास को ऐसे ही बता दिए. बोले, बस ऐसे ही पैदा होता है, बच्चा. आदमी में भी ऐसे ही होता है.

लौंडे जो घर से बाहर दिन भर लफंदरी करते वो समझ गये. लेकिन, इसी क्लास में बैठी थी लड़कियां. उन्होनें ना कोई सवाल पूछा, न जवाब. क्या उनको जानना जरूरी नहीं था? क्या उनको समझना जरूरी नहीं था? या फिर, सिर्फ कोर्स पास हो जाना ही काफी था?

आगे की क्लास में मास्टर साहब ने अंगों की जानकारी दी. लौंडों को क्लास में बैठे बैठे खिखियाने का मौका मिल गया. बाहर निकले तो बतियाये, स्साला सिर्फ मूतने के लिए नहीं है. कुछ और भी यूज है इसका. हमारा भ्रम टूटा. हमें अपने अवतार का कारण भी मिल गया था. लेकिन, एक सवाल हमेशा रहा. प्रोसेस तो समझ गये. आगे और क्या. क्या सब कुछ इतना ही आसन है?

दसवीं में पहुंच गया था, जब पहली बार रंग-बिरंगी-नंगीं-पुंगी तस्वीर देखी. एक दोस्त ले आया था कहीं से उठा के. पहली बार देखे तो एकदम से अकचका गये. ई का उठा के ले आया है? बेंच के नीचे घुसिया-घुसिया के देखे. लगा, अभी बहुत कुछ जानना बाकी है. लेकिन, पूछें तो पूछें किससे. क्या मां से पूछूं या बहन से?

फिर, कॉलेज पहुंचा. लड़कियों से पहली बार दोस्ती हुई. इसके बावजूद कि मेरे घर में हमेशा बड़ा ही खुला माहौल रहा. लेकिन था तो आखिर निपट गाँव. लड़कियों से बतियाए नहीं कि बस. तुम्हरा कुछ हो न हो. लौंडिया की छीछालेदर हो ही जानी है. कॉलेज में बहुत सी बातें होतीं, कई बार बातें-बहसें सेक्स की बातों तक पहुंची. उन बातों ने मुझे ‘बुरा’ नहीं बनाया. न उन लड़कियों को.

और ऐसा लगता रहा कि हमारी उम्र हो चुकी है. अब कम से कम जानें तो सब कुछ. साला, 20 बरस तक टीवी में स्टेफ्री का ऐड देख-देख थक गए. समझ नहीं पाए. आखिर है क्या बला ये. क्या है ये, जो खरीदते ही लड़कियां खुल कर नाचने लगेंगी. लौंडों को तो जरूरत ही नहीं है. अईसे ही खुदवाते रहते हैं. पता तब लगा जब कॉलेज पहुंचा. किसी दोस्त से बात करने के दौरान. एक बार मां से भी शायद पूछा था मैंने. टी.वी. देखते हुए. आखिर है क्या ये? मां ने टाल दिया था. लेकिन, एहसान इन दोस्तों का जिन्होंने बताया.

लगभग हर रोज रात में किसी न किसी दोस्त से बात हो ही जाती है. और सब से खुल कर बातें होती है. हर मुद्दे पर. चाहे वो सेक्स हो या वो अपने पीरियड्स से जूझ रही हों. उन्हें लौंडों के कमेंट कैसे लगते हैं? कौन से कमेंट अच्छे लगते हैं? कौन से बुरे? लेकिन, ये सब कुछ मुझे पता कैसे चला? क्योंकि, बात करता हूं उनसे. और ऐसा नहीं है कि मैंने अपने बचपने में कोई कमेंट न किया हो. किया है. और खूब किया है. लेकिन अब जान गया हूं, तो चाहता हूं कि सब जानें.

कल रात ऐसे ही एक दोस्त से बात हो रही थी. आई.आई.टी से एम.टेक कर रही है. कल बहुत दिनों बाद काफी लम्बी बात चली. बातों ही बातों में उसने बताया. ‘यार, ये आई.आई.टी-वाई.आई.टी कुछ नहीं. हर जगह लोग साले अईसे ही होते हैं. यहां क्लास के ही एक दोस्त से बात चीत होती थी. तो ऐसे ही कई बार हमने सेक्स को लेकर बातें की. क्या होता है, कैसे होता है? लड़कियों का क्या मानना है. सेक्स के दौरान सबसे बेहतरीन वक़्त क्या होता है. और इस लड़के ने सबके पास ये बात फैला दी कि ये लड़की मुझसे सेक्स चैट करती रहती है.’ इसके बॉयफ्रेंड तक को यह बात पता चल गयी. और उस गधे ने ब्रेक अप भी कर लिया. बाद में कहता है, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं तुम्हें माफ़ करता हूं.

यहीं से बात मेरे दिमाग पर चढ़ गयी. इतना गुस्सा आया कि बस. लगा फोड़-फाड़ दूं किसी को. सेक्स के बारे में बात की. इसमें गलत क्या किया? ठीक है. लेकिन, सेक्स के बारे में बात सेक्स चैट कब से हो गई. और अगर सेक्स चैट किया भी तो गलत क्या किया? कोई कौन होता है, ये तय करने वाला. जवान हैं. तो दिन में एक-दो बार नहीं. 20 बार सेक्स की फीलिंग आती है. और इसका जिक्र अगर कोई करता है तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है. जांघ पर हाथ ठोंक के कहता हूं, सेक्स की बातें करो. और खुल कर करो. और तब तक करो, जब तक सारे सवालों के जवाब न मिल जाएं. लौंडे आपस में दिनभर काना-फूसी करते हैं. सामने से गुज़रती हर एक लड़की को अइसे ताड़ते हैं जैसे वहीं खोल कर रख देंगे. लेकिन लड़कियां इन गधों से इनकी फीलिंग्स एक्सप्रेस करने का मौका दे देती है तो वो ‘रंडी’ हो जाती है.

अगर किसी को सवाल आ रहा हो. जा के ज्ञान अपनी बहन को दे सकता है क्या? तो हां. मैं अपनी बहनों को भी खुल कर कहता हूं. अगर, उनेक दिमाग में कहीं से भी ऐसा ख्याल आता है. तो खुल कर करें. उनको फ्रीडम देने वाले हम कौन होते हैं. मैं उन्हें परमिशन देने वाला कौन होता हूं. और अपनी सभी महिला मित्रों से भी ऐसा ही कहता हूं. मत भूलो नौवीं में भी तुम चुप रह गयी थी. और आज फिर वही कोशिश की जाएगी. लेकिन, अब चुप मत रहना. हमसे कुछ जानना हो. जैसा हमने तुमसे सीखा है. तो खुल कर पूछो. मेरे लिए तब भी तुम वैसी ही रहोगी.

मैं तो हर उस लड़की का एहसानमंद हूं जिसने मुझ जैसे न जाने कितने ही लौंडों को ये बताया. कि सेक्स का मतलब सिर्फ लड़के का स्खलित होना नहीं होता. बल्कि एक दूसरे की परमीशन से, एक दूसरे के साथ सबसे खुशनुमा लम्हें बिताना होता है. वरना, कितनी कोशिश कर लो. ज़िन्दगी भर कुढ़ के मर जाओगे और इस खुशनुमे एहसास को छू भी नहीं पाओगे.

काश, हर एक लड़की, हर एक लड़के को ये बता पाती. शायद हर एक लौंडा सेक्स का असली मतलब जान सकता. वो रेपिस्ट ये जान सकते. वो उल्लू भी जान सकते. जिन्हें औरत सिर्फ और सिर्फ एक बच्चे पैदा करने की मशीन लगती है. लेकिन, अफसोस हमारा समाज ऐसी लड़कियों को सेकेंड के 60वें हिस्से से भी कम समय में ‘रंडी’ करार दे देता है.

बुरा मानने वाले अवश्य बुरा मानें. आगे और भी मौके दूंगा बुरा मानने के.


 

ये आर्टिकल द लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहे शिवेंदु शेखर ने लिखा है. 

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