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'उस रात लड़के 10-11 के झुंड में लड़कियों की ओर बढ़ रहे थे'

जब बेंगलुरु में मास-मोलेस्टेशन हुआ, पारुल वहां मौजूद थीं. पारुल उसी भीड़ में थीं, जिसमें लड़कियों को दबोचा, नोचा, छुआ गया. पारुल उन्हीं लड़कियों में से थीं, जिनका नए साल का जश्न उनके जीवन की सबसे बुरी यादों में से एक में बदल गया. पारुल से Bindi Bottoms वेबसाइट से बात की. 


 

‘मैं उस पूरी रात अपने दोस्तों के साथ वहां थी. हम उन लड़कियों में से थे, जिन्हें भीड़ ने दबोचा था. तकलीफ ये थी कि हमारा वहां से बाहर निकल आना हमारे डर का अंत नहीं था. हम अपने साथ वो ट्रॉमा घर लेकर आए थे. मेरी एक सहेली सो नहीं पाई क्योंकि उसे सारी रात लगता रहा कि वो घर पर भी सुरक्षित नहीं है. एक और सहेली नींद में चौंक-चौंक कर उठ रही थी ये सोचकर कि उसने ऐसा क्या किया, जो उसके साथ ऐसा हुआ. जब हम अगले दिन मिले, एक सहेली ने अकेले घर जाने से मना कर दिया. हम सभी दोस्त उसे घर तक छोड़ने गए.

हमारे साथ 3 लड़के भी थे. लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ा. हमें तंग करने वाले बड़े झुंड में आए थे. हमने पलटकर कोई हरकत नहीं की क्योंकि हम उस परिस्थिति को और खराब किए बगैर बस बचकर भागना चाहते थे. एक लड़का, जो मेरी सहेली को परेशान कर रहा था, 10-11 लड़कों के साथ आया था.

सच कहूं, मैंने नहीं पढ़ा कि हमारे नेता क्या कह रहे हैं. क्योंकि मुझे मालूम है कि वो क्या कह रहे होंगे. उनसे वही अपेक्षित है कि लड़कियां छोटे कपड़े पहनकर निकलेंगी, पश्चिमी संस्कृति को अपनाएंगी तो ऐसा होगा ही. मैं उनसे वही कहूंगी, जो मुझसे पहले से लोग कहते आए हैं. मेरे कपड़ों से फर्क नहीं पड़ना चाहिए. बल्कि कपड़ों से कोई फर्क पड़ता ही नहीं है. मुझे सलवार-कमीज़ में भी मोलेस्ट किया गया है, वो भी तब, जब सलवार-कमीज़ मेरी स्कूल यूनिफॉर्म थी.

मैं देख रही हूं कि फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर लोग आ-जा रहे हैं. मैंने देखा है कि जो हुआ, लोगों ने उस पर अपना गुस्सा जाहिर किया है. लेकिन मैं बताऊं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं समझती हूं कि आपके विचार सच्चे हैं. लेकिन जब तक हम अपने बिस्तरों और कुर्सियों पर बैठकर केवल फेसबुक पोस्ट लिखते रहेंगे, तब तक कुछ नहीं होगा.

हमें कुछ कदम उठाने की जरूरत है. केवल हमारे मंत्री और प्रशासन को नहीं. अगली बार आपके सामने हो, तो खड़े मत रहिए. कुछ करिए. मेरी एक सहेली ने बताया कि वो अपनी कैब तक सुरक्षित सिर्फ इसलिए पहुंच पाई क्योंकि कुछ लोग उसके साथ थे. शहर में 25 लड़कों का एक ग्रुप है, जो हर नए साल की पार्टी में बाहर जाते हैं, जश्न मनाने नहीं, सिर्फ ये देखने कि लड़कियां सेफ हैं या नहीं. ऐसे ही चार लड़के मेरी सहेली के पास आए. और वो सुरक्षित अपनी कैब तक पहुंच सकी. अगली बार इतना करें कि सड़कों पर रात को निकलें. उनकी मदद करें जिन्हें आपकी ज़रूरत है. कुछ भी करें, लेकिन बस चुपचाप खड़े होकर तमाशा न देखें.

जैसा इस साल हुआ, वैसा मेरे साथ पहले भी हो चुका है. पहले मैं उदास हो जाती थी पर अब आदत सी हो गई है. मुझे नहीं पता कि ज्यादा बुरा क्या होता है. ये कि पहली बार इस तरह से हैरेस होकर ट्रॉमा झेलना या फिर इतनी बार झेल लेना कि आदत सी पड़ जाए. अब मुझे डर नहीं लगता. मैं गुस्से से पागल हो जाती हूं जब लड़कों को पकड़ नहीं पाती क्योंकि वो बाइक या कार से छेड़कर निकल जाते हैं.

सच कहूं, इतना सब झेलने के बाद जब लगता है कि आगे चलकर क्या बच्चे पैदा करूं, तो डाउट होता है. अगर मेरी बेटी हुई, मैं उसे सिखाऊंगी कि अपनी सेफ्टी का ध्यान कैसे रखते हैं. मैं उसको किसी सेल्फ डिफेन्स या मार्शल आर्ट्स की क्लास में भेजूंगी, ताकि अगर कोई उसे हैरेस करे तो वो उसे वहीं पर जवाब दे सके.


ये बिंदी बॉटम्स की फेसबुक पोस्ट का हिंदी अनुवाद है. 



 

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