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इंडिया में 'वॉर एंड पीस' पर बवाल मचा है, जानिए लियो टॉल्स्टॉय की किताब में क्या है

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बट हाऊ डू यू डू? आई सी आई हैव फ्राइटेंड यू- सिट डाउन ऐंड टेल मी ऑल द न्यूज़.

(मगर आप कैसे हैं? ओहो, मैं समझ गई कि मैंने आपको डरा दिया है- बैठ जाइए और मुझे सारी ख़बरें बताइए)

91 शब्दों के एक लंबे पैराग्राफ की आख़िरी लाइन. मेरी पढ़ी सारी किताबों में सबसे बोर, सबसे उबाऊ शुरुआत. 1,225 पन्नों की मोटी किताब. ऊपर से इतनी क्लिष्ट. ‘वॉर ऐंड पीस’ पहली नज़र सच में डराती है. मगर 19वीं सदी में लिखी इस किताब का अभी क्यों ज़िक्र कर रहे हैं हम? यूं कि 28 अगस्त को ख़बर आई. बताया गया कि बॉम्बे हाई कोर्ट में भीमा कोरेगांव के आरोपियों में से एक- वरनॉन गोनसॉल्वेज़ की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए लियो टॉल्स्टॉय की ‘War and Peace’ पर सवाल उठाया. ख़बरों के मुताबिक, जस्टिस सारंग कोतवाल ने गोनसाल्वेज़ से पूछा-

आप अपने घर पर ‘वॉर ऐंड पीस’ जैसी आपत्तिजनक किताबें क्यों रखते हैं? आपको इसे अदालत में एक्सप्लेन करना होगा. 

अब ये ख़बर आई है कि जिस ‘वॉर ऐंड पीस’ की बात हो रही है, वो टॉल्स्टॉय वाली नहीं है. ये ‘वॉर ऐंड पीस इन जंगलमहल: पीपल, स्टेट ऐंड माओइस्ट्स’ है. जिसे लिखा है बिस्वजीत रॉय ने. वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक ट्वीट करके ये बताया. इस ट्वीट में लिखा है कि सुनवाई कर रहे जज ने कहा है कि जिस तरह से चीजें रिपोर्ट हुई हैं, वो बतौर संस्थान हाई कोर्ट के लिए काफी चिंताजनक हैं.

हालांकि जो ख़बरें आई थीं पहले, उनके मुताबिक जज ने सवाल किया था. कि ‘वॉर ऐंड पीस’ तो किसी और देश के युद्ध की किताब है. तो उसे क्यों अपने पास रखा गोनसाल्वेज़ ने. ये बयान तो टॉल्स्टॉय वाली ‘वॉर ऐंड पीस’ के साथ ही मेल खाता है. ख़ैर, इस सबमें टॉल्स्टॉय वाले ‘वॉर ऐंड पीस’ पर ग़लतफ़हमी तो हुई ही लोगों को. सो इस बहाने हम ये वाली किताब डिस्कस कर लेते हैं.

वॉर ऐंड पीस: क्या है?
मैं इंटरनेट पर थी. TIME मैगज़ीन की एक लिस्ट मिली. जनवरी 2007 की. दुनिया के इतिहास की 10 सबसे महान किताबें. इसमें पहले और तीसरे नंबर पर जो किताब थी, उसे एक ही आदमी ने लिखा था- लियो टॉल्सटॉय. पहले पर- अन्ना करेनिना. और नंबर तीन- वॉर ऐंड पीस. दुनिया के सबसे क्लासिक, सबसे महान साहित्य का प्राउड मेंबर. ‘वॉर ऐंड पीस’ एपिक है. महाकाव्य है.

ये भी पढ़ें: हाई कोर्ट ने जिस किताब पर सवाल उठाया, लोगों ने PM मोदी के हाथ में उसी किताब का वीडियो वायरल कर दिया!

कौन थे टॉल्सटॉय?
मॉस्को से तकरीबन 200 किलोमीटर दूर एक लंबा-चौड़ा एस्टेट है. यासनाया पोलिआना. टॉल्स्टॉय का घर. 1828 की पैदाइश. मां-बाप बचपन में गुज़र गए. रिश्तेदारों ने पाला. पढ़ाई में बहुत मामूली. यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी नहीं की. मगर लिखना आता था. फिर आर्मी जॉइन कर ली. क्रीमिया की जंग में हिस्सा लिया. इसमें एक तरफ था रूसी साम्राज्य. दूसरी तरफ, ऑटोमन एंपायर, फ्रांस, ब्रिटेन और सरडिनिया. रूस ये जंग हार गया. रूस के करीब 50 हज़ार सैनिक मारे गए. कुछ जंग में दुश्मन के हाथों. कुछ बीमारी से. कुछ भूख से. क्रीमिया की जंग ख़त्म हुई, टॉल्स्टॉय ने सेना छोड़ दी. फुल टाइम लिखने लगे. उन्होंने जो देखा, उसका उनके लिखे पर असर है. उसमें दर्शन था. इंसानी मन था, उसके कन्फ्लिक्ट थे. हिस्ट्री थी. सोसायटी थी. पॉलिटिक्स थी. मनोविज्ञान था. अपने आसपास की सोसायटी थी. टॉल्स्टॉय अपने लाइफटाइम में महान कह दिए गए.

वॉर ऐंड पीस: बैकग्राउंडर
1862 की बात है. टॉल्स्टॉय की कहानी- द कॉसैक्स पहली बार प्रिंट मीडियम में छपी. एक मैगज़ीन होती थी- द कन्टमपरेरी. उसने इसका रिव्यू छापा. लिखा, टॉल्स्टॉय कहीं बहुत पुराने जमाने में अटके पड़े हैं. आउट-ऑफ-डेट हैं. उनमें उम्मीद नहीं दिखती. टॉल्स्टॉय ख़ुद के लिए दी गई इस राय से कतई वास्ता नहीं रखते थे. अगले साल, उन्होंने ‘वॉर ऐंड पीस’ लिखना शुरू किया. कई ड्राफ्ट लिखे. पहले ये छोटे-छोटे हिस्सों में छपी. 1869 में जाकर ‘वॉर ऐंड पीस’ का पहला कंप्लीट संस्करण छपा. जब ये छपकर आया, तो लोगों के लिए तय करना मुश्किल था. इसे इतिहास कहें. या इसे उपन्यास कहें. फिर समय के साथ लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ये अकेला न तो उपन्यास है. न बस इतिहास. ये एक चम्मच दूध पाउडर और इतनी ही चीनी डालकर तैयार की गई चाय है.

क्या थीम है?
24 जून, 1812. नेपोलियन बोनापार्ट की सेना ने रूस पर हमला किया. ज़ार अलेक्जांदेर की सेना ने नेपोलियन की चुनी जगह पर लड़ाई नहीं लड़ी. रूस के अंदरूनी हिस्सों में घुस गई. नेपोलियन की सेना को लड़ने के लिए अंदर घुसना पड़ा. मगर इसके लिए उनकी तैयारी नहीं थी. रसद और बारूद तक की कमी हो गई उनके पास. ऊपर से रूस की भयंकर सर्दी. छह महीने चला ये इनवेज़न. नेपोलियन की सेना के तीन लाख से ऊपर लोग मारे गए. रशियन आर्मी के दो लाख से ज्यादा लोग गए. बैटल ऑफ बोरोदिनो की एक दिन की लड़ाई में 70 हज़ार से ज्यादा मौतें हुईं. नेपोलियन की हार हुई.

टॉल्स्टॉय ने इसी दौर के रूस की कहानी लिखी है वॉर ऐंड पीस में. कई सारे किरदार हैं, जो कई रंग बदलते हैं. उनके आदर्श हैं, लेकिन परमानेंट नहीं. वो बदलते रहते हैं. कहानी की शुरुआत 1805 में होती है. टॉल्स्टॉय ने अपने किरदारों की फ़ौज के सहारे कहानी सुनाई है. पियरे बेज़ुख़ोव. ऐंड्रयू बोलकोन्सकी. नताशा. निकोलस. और भी कई सारे. गिनती में करीब 550-600. ये लोग अपने आस-पास की दुनिया, उसमें होने वाली सोशल और पॉलिटिकल घटनाओं, युद्धों के बीच अपना जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं. अपने पांव खड़े रखने में जुटे हैं. कोई भी न तो पूरी तरह बुरा है, न पूरी तरह अच्छा. शेड्स हैं उनमें कई तरह के. कहानी किसी बॉलरूम से जंग के मैदान, ज़िंदगी और मौत, नरसंहार सबके बीच घूमती रहती है. टॉल्स्टॉय लिखते हैं-

इंसान जी रहा है. बह रहा है. उसमें हर तरह की संभावना है. एक पल वो मूर्ख था, अब चालाक है. वो शैतान था, अब उसमें अच्छाई है. यही मनुष्य की महानता है.

टॉल्स्टॉय की फैन फॉलोइंग
बहुत सारे नाम हैं. दुनियाभर में. इनमें गांधी भी हैं. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में टॉल्स्टॉय के नाम पर एक कोऑपरेटिव कॉलोनी बनाई थी- टॉल्स्टॉय फार्म. ये उनके सत्याग्रह आश्रम का ही एक शुरुआती रूप था. चिट्ठियों में बातें भी हुईं उनके बीच. अप्रैल 1910 में टॉल्स्टॉय को भेजी एक चिट्ठी में गांधी ने ख़ुद को उनका समर्पित शिष्य कहा था. दोनों में कई बातें कॉमन थीं. मसलन- अहिंसा. ऐंटी मिलिटरिज़म. सविनय अवज्ञा. गांधी कहते थे, उन्हें टॉल्स्टॉय से प्रेरणा मिली है. टॉल्स्टॉय के लिखे ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है. बेहतर बनाया है. रूस के क्रांतिकारी लुनाचारस्की ने कभी गांधी को ‘हिंदू टॉल्स्टॉय’ कहा था. नेल्सन मंडेला कहते थे, वॉर ऐंड पीस उनकी फेवरिट है.

‘वॉर ऐंड पीस’ को लेकर एक कॉमन अंडस्टैंडिंग है दुनिया में. कि ये दुनिया में लिखी गई सबसे महाने किताबों में आती है. रूस को पसंद न करने वाले अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में टॉल्स्टॉय की ग्रेटनेस पर सहमति है. नाम में भले वॉर हो इसके, लेकिन ये किसी को युद्ध नहीं सिखाती. न ही इसमें युद्ध को रोमांटिसाइज़ किया गया है. बल्कि ये युद्ध की क्रूरता, इसकी भयावहता दिखाती है. इसपर सीरीज़ भी है बीबीसी की. आप चाहें, तो शॉर्टकट में वो देखकर कहानी समझ सकते हैं.


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