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क्या मेलामाइन नाम के ज़हर को दूध में मिलाने की खुली छूट खुद सरकार ने दी है?

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मिलावटी दूध से संबंधित ढेर सारे वीडियो, पोस्ट, टेक्स्ट, फ़ोटोज़ सोशल मीडिया में तैर रहे हैं. ढेरों वीडियोज़ यू ट्यूब में उपलब्ध है. पूरे वीडियो को देखने के बाद और उसकी पड़ताल करने के बाद हमें जो पता चला वो चौंकाने वाला है. ये सारे वीडियो देखने के बाद एक नाम बार-बार सामने आता रहा.  मेलामाइन.


सबसे पहले पूरी पड़ताल का सार आपको बता देते हैं –

Melamine - 2

मेलामाइन से संबधित जितनी भी जानकारियां सोशल मीडिया पर उपलब्ध है उस सब को सिरे से खारिज करना अनुचित होगा. लेकिन पूरा कंटेंट अक्षरशः सत्य है ये कहना भी असत्य होगा. यूं इसमें कुछ चीज़ें सत्य हैं, कुछ असत्य और कुछ चीज़ों को बढ़ा-चढ़ा के पेश किया गया है. साथ ही कुछ चीज़ों को अंडरप्ले भी किया गया है. लेकिन इन सबसे जो निष्कर्ष निकलता है वो इतना भ्रामक है कि हमारी ये स्टोरी पूरी पढ़ने के बाद अपना माथा पीट लेंगे. यूं ये स्टोरी न केवल नकली दूध बल्कि नकली खबरों के लिए भी एक टेस्ट है.


पड़ताल 1.0

आइए पहले खूब वायरल हो रही वीडियो की पड़ताल करें. पॉइंट बाय पॉइंट. –

# वीडियो के शुरुआत में बताया जाता है कि – 1830 में जर्मनी के एक वैज्ञानिक ने एक अनोखे पदार्थ की खोज की, जिसका नाम मेलामाइन रखा गया. जब इसे फोर्मेल्डीहाइड के साथ मिलाया गया तो ये एक मोल्डेबल मटेरियल में बदल गया जो वर्च्युअली अनब्रेकेबल था. इस पदार्थ का कई उद्योगों में उपयोग किया गया. जैसे प्लास्टिक उद्योग, खाना खाने के बर्तन फ्लोर की चमकदार टाइल्स.

– सही! मेलामाइन के इस पूरे इतिहास में कहीं कोई झूठ नहीं है.

# आगे वीडियो कहता है कि – धीरे-धीरे वैज्ञानिकों को पता चल गया कि मेलामाइन में 67% नाइट्रोजन होती है. इसलिए इसका उपयोग पहले पशु चारे में और उसके बाद दूध की मिलावट करने में होने लगा. क्यूं होने लगा? क्यूंकि दूध में मेलामाइन की मिलावट करने पर ‘क्वालिटी कंट्रोल टेस्ट’ में इसका पता नहीं लग पाता था.

– ये पूरा पोर्शन भी पूरी तरह सत्य है. दरअसल किसी पदार्थ में मिलावट है या नहीं इसका पता लगाने के लिए उसके प्रोटीन कंटेंट को ‘कैलडाल मेथड’ से जांचा जाता है. इस मेथड या टेस्ट में, अगर मिलावट नहीं होती है तो प्रोटीन कंटेंट सामान्य आएगा और अगर टेस्ट किए जा रहे पदार्थ में किसी तरह की मिलावट है तो प्रोटीन कंटेंट सामान्य से कहीं कम आएगा. लेकिन कैलडाल मेथड में सीधे-सीधे प्रोटीन की मात्रा नहीं पता लगाई जाती, बल्कि इस मेथड में किसी पदार्थ में उपलब्ध प्रोटीन उसमें उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा से पता लगता है. मतलब कान को उल्टा पकड़ा जाता. खैर, सो फार सो गुड. लेकिन दिक्कत ये है कि नाइट्रोजन दो तरह के होते हैं – प्रोटीन नाइट्रोजन और नॉन प्रोटीन नाइट्रोजन.

मेलामाइन की फिनिशिंग वाले दरवाज़े
मेलामाइन की फिनिशिंग वाले दरवाज़े

मतलब ये कि अगर किसी पदार्थ में नॉन प्रोटीन नाइट्रोजन की मिलावट की जाए तो वो ‘कैलडाल मेथड’ तो पास कर जाएगा (अधिक नाइट्रोजन के चलते) लेकिन उसमें प्रोटीन की मात्रा कम होगी. या यूं कहें कि पदार्थ मिलावटी होने के बावज़ूद ‘कैलडाल मेथड’ या ‘कैलडाल टेस्ट’ पास कर जाएगा. अब नॉन प्रोटीन नाइट्रोजन के उदाहरणों की बात की जाए तो यूरिया, अमोनिया और 67% नाइट्रोजन के साथ मेलामाइन इसके उदाहरण हैं. इसलिए ही तो आप आए दिन दूध में यूरिया की मिलावट के बारे में सुनते रहते होंगे. लेकिन चूंकि बात यहां पर मेलामाइन की हो रही है तो आइए इस वीडियो के आगे के कंटेंट की बात की जाए.

# तो वीडियो के आगे वाले भाग में ये बताया गया है कि – मेलामाइन को पहले पशुचारे और फिर दूध में मिलाया जाने लगा. मेलामाइन मिला खाना खा-खाकर कितनी गाएं मरी होंगी इसका डाटा पूरी दुनिया में किसी के पास नहीं. लेकिन मेलामाइन मिला पशुचारा अमेरिका में खूब पकड़ा गया और बाद में 2010 में इसपर बैन भी लगा.

ऑलमोस्ट सही. हमने इसके लिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटे और पाया कि ये बात भी कमोबेश सही है. दरअसल कुछ अमेरिकी और चाइनीज़ कंपनियों के पालतू पशुओं के खाने में मेलामाइन पाए जाने की पुष्टि तो हुई लेकिन ये भी कहा कि इसके नुकसान का आकलन करना असंभव है. 2007 में ‘प्रोडक्ट रिकॉल’ हुआ. लेकिन ये अमेरिका नहीं कनाडा से शुरू हुआ. और कैनेडियन फूड कंपनी ‘मेनू फूड’ ने अपने प्रोडक्ट बाज़ार से वापस मंगवाने शुरू कर दिए. उस पशु चारे को वापस लिया गया जिसमें चाइना का ग्लूटीन था.

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

कुछ जानवरों पर इस चारे को टेस्ट करने पर पता चला कि ये जानवरों को बीमार कर रहा था और कुछ जानवरों की मृत्यु का कारण भी बना. बाद में अमेरिका और साउथ अफ्रीका से भी जानवरों के किडनी फेलियर और मृत्यु की खबरें आने लगीं. और इन सब का संबंध चाइना के मेलामाइन वाले ग्लूटीन से पाया गया. मार्च 2007 तक सैंकड़ों पालतू जानवरों की मृत्यु की खबरें आ चुकी थीं. कई अपुष्ट खबरों ने तो ये संख्या हज़ारों में बताई थीं.

# अब वीडियो में आगे बढ़ते हैं जो बताती है कि – बाद में दुष्टबुद्धि को ये आईडिया आया कि मेलामाइन को दूध में भी तो मिलाया जा सकता है. तो क्यूं न इसे ड्राई मिल्क फ़ॉर्मूला में मिलाया जाए. लैब में जब इस पाउडर को टेस्ट किया गया तो लैब चकमा खा गई. सबसे पहले इसे मिलावटखोरों के सरदार चीन ने बनाया. लेकिन जब वहां तीन लाख से अधिक बच्चे इस दूध को पीकर बीमार पड़े तो 2008 में चीन सरकार ने इस मिलावटखोरी को पकड़ लिया. इतिहास में इस घटना को 2008 चाइनीज़ मिल्क स्कैंडल के नाम से जाना जाता है. आप लोग गूगल करके पढ़ सकते हैं. (वीडियो में ‘दुष्टबुद्धि’ शब्द को एक उपमा की तरह यूज़ किया गया है, उन लोगों या संस्थाओं के लिए जो मेलामाइन का दुरूपयोग करते हैं.)

– इस वाले पार्ट में भी एक-एक बात सच है संख्याएं और वर्ष जैसे आंकड़े भी. और हां, छः बच्चे मारे गए थे और किडनी की परेशानी से जूझ रहे हज़ारों बच्चे हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे.

टाइगर्स फिल्म का एक दृश्य, जिसमें बेबी फ़ॉर्मूला के चलते पाकिस्तान में हो रही मौतों को दिखाया गया है.
टाइगर्स फिल्म का एक दृश्य, जिसमें बेबी फ़ॉर्मूला के चलते पाकिस्तान में हो रही मौतों को दिखाया गया है.

# वीडियो के अगले भाग के अनुसार  – दुष्ट बुद्धि को पता चल चुका था कि चाइना और अमेरिका जैसे बड़े देशों में उसकी दाल गलने वाली नहीं है. तब उसने भारत का रुख किया. भारत में आज तक कितने दुधमुहें बच्चों ने ये फेक प्रोटीनयुक्त दूध पिया किसी को नहीं पता. किसी के पास कोई भी डाटा नहीं है. दुष्ट बुद्धि ने सोचा कि इन्फेंट फ़ॉर्मूले के बदले इसे दूध में ही क्यूं न मिलाया जाए. तो उसने दूध लिया और उसमें पानी और मेलामाइन मिला दिया. यूं पानी मिलाने पर दूध में जो प्रोटीन की मात्रा कम हुई थी वो मेलामाइन मिलाने से फिर से सामान्य हो गई. लेकिन इससे फैट भी कम हो जाता. और फैट बढ़ाने के लिए दूध में सूअर, गाय वगैरह की चर्बी मिलाई जाने लगी. एफएसएसएआई ने 2016 में एक कानून बनाकर भारत में बिकने वाले दूध में मेलामाइन को लीगल कर दिया. अब इन्फेंट फ़ॉर्मूला बनाने वाली कोई भी कंपनी अपने मिल्क पाउडर में 1 मिलीग्राम मेलामाइन मिला सकती है. लिक्विड मिल्क में ये लिमिट .15 मिलीग्राम/लीटर की है. बाकी सभी खाद्य पदार्थ में ये 2.5 मिलीग्राम/किलो के हिसाब से मेलामाइन नाम का ज़हर मिलाने की खुली परमिशन है. आखिर क्या मजबूरी थी. एफएसएसएआई ने दूध में इस ज़हर को मिलाने की परमिशन क्यूं दी? ये तो एफएसएसएआई ही जाने.

अब ये वाली सारी बातें पूरी तरह फेक है. एफएसएसआई ने एक प्रेस नोट ज़ारी किया था. 27 नवंबर, 2018 को. उसके अनुसार मेलामाइन किसी भी खाद्य पदार्थ में दो तरीके से उपस्थित हो सकता है. एक तो जानबूझकर दूध के प्रोटीन कंटेंट को बढ़ाने के लिए जिसे मिलावट कह सकते हैं और जिसकी बात हमने ऊपर की है और दूसरा गलती से जिसे प्रदूषक कह सकते हैं. ग़लती से मतलब ‘इंसिडेंटल प्रेजेंस’.

मेलामाइन
मेलामाइन

इस इंसिडेंटल प्रेजेंस को यूं समझिए कि मेलामाइन का उपयोग प्लास्टिक में बहुतायत से होता है अब अगर प्लास्टिक की थैली में दूध बेचा जाएगा तो उसमें भी हो जाएगा. ऐसे ही ये उन पौधों में हो सकता है जो गाय-भैंस खाती हैं, और यूं गाय भैसों के दूध में भी सीमित रूप से इसकी उपस्थिति कोई बड़ी बात नहीं है. ये मात्र एक-दो उदाहरण हैं लेकिन ऐसे कई कारकों के चलते दूध में मेलामाइन की इंसिडेंटल प्रेजेंस संभव है. तो इसी ‘इंसिडेंटल प्रेजेंस’ की भी एक सुरक्षित मात्रा तय करने के लिए करने के लिए एफएसएसएआई ने 6 जनवरी, 2016 को एक गजिटेड नोटिफिकेशन जारी किया था जिसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं. और इस नोटिफिकेशन से साफ़ है कि दूध में मेलामाइन को लीगल नहीं किया गया बल्कि एक लिमिट तक सीमित कर दिया. यानी जो चीज़ वायरल वीडियो में दूध बनाने वाली कंपनियों के लिए एक ‘अवसर’ की तरह प्रचारित की जा रही है वो दरअसल उनके लिए एक ‘प्रतिबंध’ सरीखा है. वायरल हो रहे वीडियो को देखकर लगता है कि 2016 से पहले मेलामाइन बैन था उसके बाद लीगल हुआ. लेकिन हुआ ये कि 2016 से पहले दूध में मेलामाइन की अधिकतम मात्रा निर्धारित नहीं थी, उसके बाद हुई.

# वीडियो आगे कहता है कि – वैज्ञानिक प्रयोगों में भी सिद्ध हो चुका है कि मेलामाइन एक बहुत खतरनाक किस्म का ज़हर है. इसकी माइक्रोग्राम मात्रा भी किडनी की कोशिकाओं को डेमेज कर नष्ट कर देती है. इससे किडनी फेल हो जाती है और तमाम तरह की अन्य बीमारियां लग जाती हैं. मेलामाइन के कण गुर्दों में जमा हो जाते हैं और सफेद सफेद टाइल्स के जैसी पथरी बनाते हैं. इसके संपर्क में आने वाली कोशिकाएं आरओएस नामक केमिकल बनाती हैं जो खतरनाक कैंसर पैदा करती हैं. इसके ऊपर वर्ष 2015 से लेकर अब तक सैकड़ो रिसर्च पेपर आ चुके हैं. डॉक्टर, वैज्ञानिक लोग चाहें तो गूगल पर सर्च कर पढ़ सकते हैं. दोस्तों आपके हमारे दुधमुहें बच्चों के ऊपर क्या असर पड़ रहा होगा, आप सोच सकते हैं. जब दूसरे देशों में ये बैन हो सकता है तो हमारे देश में क्यूं नहीं? दोस्तों अगर हमको अपने बच्चों और खुद को इस ज़हर से बचाना है, तो हमें इस ज़हर के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी. और इसे हमारे देश में, जितने भी खाए या पिए जाने वाले पदार्थ हैं उनमें, इसके इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए आवाज़ उठाई जानी चाहिए. तो दोस्तों एक बार फिर साथ हो जाइए इस मिशन में और हरेक व्यक्ति तक इस वीडियो को पहुंचाए ताकि वो मेलामाइन से सफेद जाल से बाहर निकल सके.

ये वीडियो का लास्ट पार्ट है. इसके काउन्टर में हमारे पास वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की जो रिपोर्ट है उसके अनुसार –

एफएसएसएआई का लोगो
एफएसएसएआई का लोगो

मेलामाइन इंसानों के संपर्क में कम ही आता है. मेलामाइन शरीर में पचता नहीं है और मूत्र के द्वारा तेज़ी से शरीर से बाहर निकल जाता है. मेलामाइन की विषाक्तता को लेकर कोई मानव डेटा नहीं मिला लेकिन पशुओं पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि इसकी विषाक्तता कम ही है. पशु आहार वाले अध्ययन में मेलामाइन की उच्च खुराक मूत्राशय पर प्रभाव डालती है और सूजन का कारण बनती है. मूत्राशय में स्टोन और क्रिस्टल का कारण बनती है. पशु आहार के अध्ययन से ये भी पता चला है कि लंबी अवधि और उच्च खुराक के बाद ही गुर्दे की विषाक्तता की आशंका बनती है. और जहां तक आरओएस और उससे होने वाले खतरनाक केमिकल की बात है तो सर्वप्रथम तो कम मात्रा में आरओएस शरीर के कोगनिटिव (संज्ञानात्मक) कार्यों में शामिल होती है लेकिन इसकी बहुत ज़्यादा मात्रा के कुछ हानिकारक प्रभाव भी हो सकते हैं, ये सब चूहों पर किए गए एक टेस्ट से पता चला है. लेकिन बहुत ज़्यादा रिसर्च करने के बावज़ूद इसका संबंध कहीं भी कैंसर से नहीं पाया गया.

ये थी वीडियो की पूरी पड़ताल.

अब एक और महत्वपूर्ण बात. जिस कैलडाल मेथड की बात वीडियो में की गई है वो दरअसल दूध की शुद्धता जानने का एक मात्र मेथड नहीं है. हमने दिल्ली के एक एफएसएसआई कर्मचारी से बात की, साथ ही हमने एक फूड इंस्पेक्टर से भी बात की. कुछ और विशेषज्ञों से बात करने पर हमें पता चला कि दूध में मेलामाइन की पुष्टि के लिए एलसी/एमएस टेस्ट किया जाता है और इससे मेलामाइन की मात्रा का सही-सही पता चल जाता है. इन विधियों के बारे में और ये कैसे काम करती हैं उस बारे में लिखने पर ये स्टोरी एक शोध-पत्र ज़्यादा लगने लगेगी.


पड़ताल 2.0

इस वीडियो के साथ और अलग से भी एक फोटो भी वायरल हो रही है. लेकिन टैग इसमें भी मेलामाइन ही है. आइए इसकी भी बात कर ली जाए.

मेलामाइन नाम से वायरल हो रही इस फोटो में मेलामाइन का कहीं ज़िक्र नहीं है.
मेलामाइन नाम से वायरल हो रही इस फोटो में मेलामाइन का कहीं ज़िक्र नहीं है.

इस फोटो में कहा गया है कि –

डब्लूएचओ की एडवाईज़री के अनुसार 8 सालों में (2025 तक) 87% भारतियों को कैंसर हो जाएगा. भारत में बिकने वाले दूधों में मिलावट है. इस दूध को पीने से कैंसर का खतरा है. भारत में बिकने वाले 68.7% दूध में मिलावट है.

अब इस वाली खबर/पोस्ट के दो पार्ट हैं. आइए दोनों की बारी-बारी से पड़ताल करते हैं –

# 1 – भारत में बिकने वाले 68.7% दूध में मिलावट है!

# जहां तक इस वाले पॉइंट की बात है इसकी सच्चाई एफएसएसएआई के 2011 के सर्वे से पता चल जाती है. जिसके अनुसार कुल 68.4 सेंपल एफएसएसए के मानकों में खरे नहीं उतरे थे.

# साथ ही भारत सरकार के साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने भी लोकसभा ने ये स्वीकार किया था –

# कई अख़बारों में एनिमल वेलफेयर बोर्ड इंडिया के सदस्य मोहन सिंह अहलूवालिया के हवाले से देश में 68.7 दूध को दूषित बताया गया था. इनमें इकोनॉमिक्स टाइम्स, क्विंट, द वीक  जैसे प्रतिष्ठित अख़बार/पोर्टल भी थे.  

# इस सन्दर्भ में हमें एक और बात पता चली. वो ये कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को मोबाइल लैब बनाए जाने, नकली दूध के मामलों में फैसला जल्दी करते हुए जुर्माना लगाने के आदेश दिए थे.

# ये सब तो थी इस वाले पॉइंट के समर्थन में बात. लेकिन, एफएसएसएआई द्वारा 27 नवंबर, 2018 को जारी किए गए प्रेस नोट के अनुसार उसने 2018 में एक सर्वे किया. इसे वो अब तक का सबसे समुचित सर्वे बताती है. 6400 से ज़्यादा कच्चे और प्रोसेस्ड दूध के सेंपल लिए गए. इनको 12 मिलावटों और 4 दूषणों के लिए टेस्ट किया गया. इसमें से केवल दस प्रतिशत से भी कम सेंपल दूषित पाए गए.

तो निष्कर्ष ये कि एक दूसरे को कंट्राडिक्ट करती इन सब खबरों और सर्वेज़ के बीच में ये मान लेना ही समझदारी होगी कि मिलावट कमोबेश दूध और देश की सच्चाई है. और दूसरा निष्कर्ष ये कि दूध की मिलावट एक खतरा तो बन रही है लेकिन इसके लिए मेलामाइन या ‘केवल’ मेलामाइन दोषी नहीं.

 

# 2 – WHO के अनुसार 2025 तक 87% भारतियों को कैंसर हो जाएगा!

# एफएसएसएआई द्वारा 27 नवंबर, 2018 को जारी किए गए प्रेस नोट के अनुसार उसने यह पता लगाया था कि डब्लूएचओ द्वारा ऐसी कोई सलाह जारी नहीं की गई थी. एक जगह खबर छपी और सब अखबारों ने उसके हवाले से खबर छाप दी.

# एफएसएसएआई के दावे को सच साबित करती हमें कई अख़बारों और पोर्टल्स में ये खबर मिली तो सही लेकिन सबका मूल सोर्स एक ही था – पीटीआई. यानी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया.

# साथ ही बहुत खोजने पर भी हमने डब्लूएचओ की ऐसी किसी एडवाइज़री का कोई सीधा पता नहीं मिला. सीधा पता मतलब डब्लूएचओ की वेबसाइट वगैरह में ऐसी कोई एडवाइज़री नहीं मिली.

# अंततः हमने डब्लूएचओ को कॉल और ई-मेल दोनों माध्यमों से संपर्क किया और उनकी कम्युनिकेशन टीम ने दोनों ही माध्यमों से बताया कि उन्होंने (खबर लिखे जाने तक) ऐसी कोई भी एडवाइज़री ज़ारी नहीं की है.

तो निष्कर्ष ये कि इसका दूसरा वाला भाग यानी ‘WHO के अनुसार 2025 तक 87% भारतियों को कैंसर हो जाएगा!’ पूरी तरह असत्य है.

तस्वीर में एक अधिकारी द्वारा शंघाई में 14 नवंबर, 2008 को जब्त किए गए अयोग्य दूध पाउडर को नष्ट किया जा रहा है.
तस्वीर में एक अधिकारी द्वारा शंघाई में 14 नवंबर, 2008 को जब्त किए गए अयोग्य दूध पाउडर को नष्ट किया जा रहा है.

तो दोस्तों, निष्कर्ष ये निकलता है कि जिस तरह केल्डाल टेस्ट के माध्यम से दूध ने प्रोटीन की मात्रा का पता लगना मुश्किल है उसी तरह किसी फेक खबर में सत्यता की मात्रा का पता लगना असंभव नहीं भी तो मुश्किल तो है ही.


वीडियो देखिए –

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