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PubG वाले हैं क्या?

‘पहले मेरा बेटा पढ़ाई में बहुत अच्छा था. मगर कुछ समय से ऑनलाइन गेम की तरफ उसका झुकाव हो गया है. मैं उसे समझाने में असफल हूं.’

एक मां ने प्रधानमंत्री से मार्गदर्शन की चाह में कहा.

प्रधानमंत्री सवाल के बीच में ही हंस पड़े थे. सवाल ख़त्म होने पर कॉमिक पंच मारने के अंदाज़ में बोले, ‘ये पबजी वाला है क्या?’

पूरा हॉल ठहाके लगाने लगा. चिंतित मां भी हंस पड़ी. तालियों से हॉल गूंज उठा. इसके बाद प्रधानमंत्री ने ‘फ्रंटलाइन’ का भी जिक्र किया.

जिन्हें न पता हो, उन्हें बता दूं कि पबजी (PubG) और फ्रंटलाइन गेम हैं. पबजी का मतलब प्लेयर्स अननोन बैटलग्राउंड. ये दोनों ही शूटिंग के गेम हैं. यानी प्लेयर के पास वर्चुअली बंदूकें, टैंक, बम वगैरह होते हैं. वो दुश्मनों का सामना करते हैं. उन्हें उड़ा देते हैं. उनका सामान लूटकर आगे बढ़ जाते हैं.

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. मारियो, पैकमैन, नोकिया के हथौड़ेनुमा फोन में खेला जाने वाला स्नेक, और बेसुरी आवाज में बजने वाले हैंडसेट वीडियो गेम्स से हमारी इतनी यादें जुड़ी हैं. कि इनका नाम सुनते ही आंखो के सामने पूरा बचपन चक्कर लगा लेता है. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

'मारियो' के नाम से प्रचलित गेम 'सुपर मारियो' 1985 में आया था. इसका लेटेस्ट ऑनलाइन मल्टीप्लेयर वर्जन इसी साल आया है.
‘मारियो’ के नाम से प्रचलित गेम ‘सुपर मारियो’ 1985 में आया था. इसका लेटेस्ट ऑनलाइन मल्टीप्लेयर वर्जन इसी साल आया है.

पबजी और बचपन

‘सुभाष (बदला हुआ नाम) को वो दिन आज भी याद है जब उनके बेटे प्रणव के कॉलेज से फोन आया. कि प्रणव ने कुछ ऐसे कागज़ात जमा नहीं किए हैं जो एडमिशन के लिए जरूरी हैं. सुभाष को लगा कि ये लापरवाही का एक आम वाकया होगा. मगर इस छोटे वाकये की पीछे की असलियत जब उन्हें पता चली तो उनके होश फाख्ता हो गए. प्रणव को न कागज़ जमा करने की आखिरी तारीख याद थी, न ही उसने अपने प्रोजेक्ट ख़त्म किए थे और न ही बीते 35 घंटे से कुछ खाया था. क्योंकि वो लगातार डोटा-2 नाम का वीडियो गेम खेल रहा था.’

[द हिंदू में 18 मई 2019 को प्रकाशित अर्चना नाथन के लेख से]

लेख में आगे लिखा हुआ है कि सुभाष और उनके बेटे प्रणव की समस्या यहां ख़त्म नहीं हुई. प्रणव इतना बड़ा एडिक्ट हो चुका था कि उसका वजन घटने लगा था. जब उसका लैपटॉप और मोबाइल उससे छीना गया, उसने घरवालों को आठवें फ्लोर से कूदकर आत्महत्या करने की धमकी दी. गुस्से में एक दरवाजा तोड़ डाला. प्रणव को अंततः दिमाग के अस्पताल ले जाना पड़ा.

बच्चों पर पड़ते इसके प्रभाव को देख देश में कुछ जगह पबजी को बैन भी किया गया. मगर जो चीज़ इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध हो उसे बैन करना मुश्किल है. पबजी का दायरा सेंसर और सरकारों के बाहर था.

मगर बैटल गेम्स ही क्यों?

दीवानगी तो कुछ साल पहले कैंडी क्रश गेम की भी थी. फेसबुक से कनेक्ट होने की वजह से जिसके पास कैंडी क्रश नहीं था, वहां भी अपने अनगिनत लेवेल्स के साथ पहुंचा. मगर कैंडी क्रश या सबवे सर्फर जैसे गेम और बंदूकों वाले गेम्स में एक बुनियादी फर्क है. फर्क है उबलते हुए खून का, अगले को मार गिरा मिलने वाले संतोष का, फर्क है आगे के रास्ते में मिलने वाली अनिश्चितताओं का. मगर सबसे बड़ा फर्क है ताकत और मर्दानगी का, जिसका कैंडी क्रश में कोई काम नहीं है.

कैंडी क्रश एक घरेलू खेल की तरह आया और रह गया. उसे पूरे परिवार ने खेला. खासकर अधेड़ और उम्रदराज औरतों ने, जिन्हें अबतक मालूम नहीं था कि गेमिंग किस चिड़िया का नाम है.

कैंडी क्रश एक घरेलू खेल की तरह आया और रह गया. उसे पूरे परिवार ने खेला. खासकर अधेड़ और उम्रदराज औरतों ने, जिन्हें अबतक मालूम नहीं था कि गेमिंग किस चिड़िया का नाम है.
कैंडी क्रश एक घरेलू खेल की तरह आया और रह गया. उसे पूरे परिवार ने खेला. खासकर अधेड़ और उम्रदराज औरतों ने, जिन्हें अबतक मालूम नहीं था कि गेमिंग किस चिड़िया का नाम है. 

कैंडी क्रश को लोगों ने अपने खाली समय में खेला. जबकि पबजी के लिए समय निकाला गया. टीमें बनीं, अड्डे बने.

गेमिंग के जानकार कहते हैं कि पबजी जैसे बैटल गेम्स की सबसे ख़ास बात ये होती है कि आप इंटरैक्ट कर सकते हैं. यानी आप रियल टाइम दूसरे प्लेयर्स से बात कर सकते हैं.

गेम और मर्दानगी

ये संयोग नहीं कि पबजी अधिकतर लड्कों के बीच खेला गया. हांलांकि इंडिया में लड़कियों तक टेक्नोलॉजी अभी वैसे नहीं पहुंची है, जैसे लड़कों के पास पहुंची है. लड़कों की टेक्नोलॉजी और मोबाइल फोन्स के प्रति सहजता इसमें एक बड़ा फैक्टर हो सकती है.

मगर इससे भी बड़ी बात है खुद के बारे में अपनी कल्पना. ऐसा नहीं है कि पबजी के फाइटर में लड़की का ‘एवटार’ नहीं है. मगर लड़कियों की लड़कियों को लेकर इमेजिनेशन एक योद्धा के तौर पर कम होती है.

हमारी कल्पना में युद्ध और योद्धा सीधे पुरुषों से जुड़ते हैं. इसलिए नन्ही बच्चियों को माता पिता कभी खिलौने वाली बंदूकें खरीदकर नहीं देते. पर लड़कों को देते हैं. क्योंकि लड़कों की कल्पना में हिंसा आम है. और इतनी ही आम बनी रहे, इसका पूरा प्रयास हम करते हैं. ताकि लड़की और लड़के में हम ठीक-ठीक फर्क कर सकें. और उन्हें उनकी भूमिकाओं में बांट सकें.

टॉय गन्स यानी खिलौने वाली बंदूकें 5 साल की उम्र के बच्चों के लिए तक उपलब्ध हैं.
टॉय गन्स यानी खिलौने वाली बंदूकें 5 साल की उम्र के बच्चों के लिए तक उपलब्ध हैं. सोर्स: पिक्साबे 

बैटल गेम्स यूजर को अपनी पहचान खुद चुनने का मौका देते हैं. आप अपने कपड़े, हथियार, लिंग, बाल सब चुन सकते हैं. एक अवतार गढ़ सकते हैं. फिर स्क्रीन पर उसे देख आप ये मानकर चलते हैं कि ये मैं ही हूं. उसके बाद सैकड़ों लोगों को मारकर चिकन डिनर पाने का सुख कैसा होगा, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

जरूरी नहीं कि इस गेम को खेलने वाला व्यक्ति हिंसक वो. वो बेहद नर्म दिल हो सकता है. कवि हो सकता है, शायर हो सकता है. मुमकिन है कि असल जीवन में वो किसी पर हाथ उठाना तो दूर, ऊंची आवाज़ भी न उठाता हो.

तो क्या ये गेम्स बुरे हैं?

‘एक दोपहर मैं अपने डॉरमेट्री रूम में बैठा था. तब तक तड़ातड़ गोलियां चलने की आवाज़ आई. मैं डरा. फिर मैंने खुद को समझाया कि पास के खेतों में कोई शिकार कर रहा होगा. फिर आवाजें बढ़ती गईं. मुझे लगा कोई फिल्म चल रही होगी. डिनर के समय मुझे एक लड़के से पता चला कि वो आवाज़ असल में वीडियो गेम की थी.

स्कूल में मुझे बुली किया गया था. इसलिए उस लड़के से मैं डर गया. बाद में समझ में आया कि वो लड़का तो बिलकुल हिंसक नहीं है. न ही वीडियो गेम खेलने वाले दूसरे लड़के गैंगस्टर हैं, जिनसे मैं दूर रहता था. वो खेल देखने के कुछ समय बाद मैंने जाना कि इस तरह गेम में गोली चलाना और हिंसा उनके लिए टाइम पास है. कोई बड़ी बात नहीं है.

मगर मैंने बहुत देर ये सोचा कि ये किस तरह का एंटरटेनमेंट है? हिंसा को इतनी आसानी से खेल में कैसे तब्दील कर सकते हैं?

मैंने 13 साल युद्ध देखा है, उसके बीच में रहा हूं. मुझे पता है कि जो यहां मनोरंजन है, वो कुछ लोगों का कल्चर रहा है. एक कल्चर जो युद्ध लड़ने वालों को ही नहीं, उसमें फंसे हुए लोगों को भी प्रभावित करता है. युद्ध के बीच होना जीवन भर के लिए हमें बदल देता है.

जो इन खेलों में दिखता है वो मैंने जिया है. गोलियों से बचने के लिए हम बच्चों को जंगलों में छुपना पड़ता था.

वीडियो गेम्स खेलने वाले मेरे मित्र किस्मतवाले हैं कि इन्हें युद्ध के असल माने नहीं पता.’

[पसिफ़िक इरानकुंडा, अमेरिकन स्कॉलर मैगज़ीन के लिए लिखते हुए]

पश्चिमी तंज़ानिया में बुरुंडी रिफ्यूजी.
पश्चिमी तंज़ानिया में बुरुंडी रिफ्यूजी, 2015

लेखक, बुरुंडी नाम के अफ्रीकी देश से हैं. बुरुंडी और रवांडा नाम के दो अफ्रीकी देशों में 90 के दशक से लेकर 2005 तक हुतू और तुत्सी समुदायों में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था. रवांडा में हुतू समुदाय के लोगों के हाथों तुत्सी समुदाय के नरसंहार के जिक्र दुनिया के सबसे बड़े नरसंहारों में किया जाता है.

पसिफ़िक लिखते हैं कि जो इन गेम्स को चाव से खेलते हैं, वो इसलिए खेल लेते हैं क्योंकि उन्होंने कभी असल युद्ध नहीं देखा.

'बाहुबली' फिल्म उन तमाम फिल्मों में से एक है जिसमें युद्ध जीतने को पौरुष और वीरता का पर्याय बताया गया है.
‘बाहुबली’ फिल्म उन तमाम फिल्मों में से एक है जिसमें युद्ध जीतने को पौरुष और वीरता का पर्याय बताया गया है.

इतिहास में युद्धों को दर्ज किया गया. और जिन्होंने कई युद्ध जीते, उनके नाम के आगे ‘महान’ लगाया गया. पूरब के पश्चिम तक युद्धों ने ही वीरता की परिभाषा गढ़ी. इसलिए ये मात्र संयोग नहीं है कि युवाओं को इन नकली युद्धों से एड्रेनलिन रश, या यूं कहें एक ऐसा ‘हाई’ मिलता है जो और किसी तरह के खेल ने मिलना मुश्किल है.

तो क्या खेल हिंसा को बढ़ावा देते हैं?

कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ऐसा नहीं है. अमेरिकी लेखक जेरार्ड जोन्स लिखते हैं कि वीडियो गेम भी एक तरह की फंतासी है. उनके मुताबिक़ बच्चों के लिए जरूरी है कि वे फंतासी और सुपरहीरोज को देखें. इससे उनके अंदर अपने क्रोध, हिंसा और कामुकता को सही दिशा देने में मदद मिलती है. चूंकि उन्हें ऐसी संवेदनाओं को निकालने के लिए एक सेफ्टी वैल्व मिलता है, वो असल जीवन में सभ्य बने रह सकते हैं.

वीडियो गेम्स के लिए भी वही लॉजिक दिया जाता है जो पॉर्न बैन को लेकर दिया जाता है. कि सेक्स को देखकर कोई रेप और युद्ध को देखकर कोई हिंसा करने के लिए मोटिवेट नहीं होता. व्यक्ति क्रिमिनल है या सभ्य नागरिक, ये निर्भर करता है इस बात पर कि व्यक्ति के खुद के अनुभव कैसे हैं.

ज़्यादातर गेम्स अब बच्चों को नहीं, वयस्कों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं. मगर कोई ऐसा फ़िल्टर नहीं है जो इन्हें बच्चों के हाथ में पड़ने से रोक ले. क्योंकि ये इंटरनेट पर उपलब्ध रहते हैं.
ज़्यादातर गेम्स अब बच्चों को नहीं, वयस्कों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं. मगर कोई ऐसा फ़िल्टर नहीं है जो इन्हें बच्चों के हाथ में पड़ने से रोक ले.

मगर ये भी एक सच है कि बच्चों को ये गेम्स बेहद सहजता से उपलब्ध हैं. और इन्हें बनाने वाले तक ये मानते हैं कि ये नाज़ुक उम्र वाले बच्चों के लिए ठीक नहीं हैं. एंटरटेनमेंट सॉफ्टवेर एसोसिएशन का कहना है कि बीते कुछ सालों में वीडियो गेम्स खेलने वालों का एज ग्रुप बदला है. और यही वजह है कि ज़्यादातर गेम्स अब बच्चों को नहीं, वयस्कों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं.

मगर कोई ऐसा फ़िल्टर नहीं है जो इन्हें बच्चों के हाथ में पड़ने से रोक ले. क्योंकि ये इंटरनेट पर उपलब्ध रहते हैं.

फिल्मों में अक्सर वायलेंस को एडल्ट के दायरे में रखा जाता है. फिल्म बहुत खूनखराबे वाली हो तो उसे एडल्ट सर्टिफिकेट दिया जाता है. मगर ठीक उसी समय हमारा पॉपुलर कल्चर, हमारी शब्दावली और भाषा को युद्ध से जुड़े शब्दों से भर रहा है. युद्ध को इतना आम बना रहा है कि उसे छेड़ने वाले फेसबुक पर चार शब्द लिखकर सिपाही बन रहे हैं. और बच्चों को इससे दूर रखने का हमारे पास कोई ज़रूरी नहीं है. खासकर छोटे लड़कों को, जिनको मां-बाप ने ही सिखा दिया है कि किचन सेट, गुड़िया के सेट उनके लिए नहीं है मगर वे बंदूकों से खेल सकते हैं.

युद्ध और भाषा

फरवरी 2019 में पुलवामा में सेना के कॉन्वॉय पर आतंकी हमला हुआ है. जिसके बाद इंडिया ने बालाकोट में एयर स्ट्राइक की है. दो महीने बीते, चुनाव आए. प्रधानमंत्री बड़े से ऑडिटोरियम में एक प्रतिष्ठित पत्रकार को कथित तौर पर इंटरव्यू दे रहे हैं.

उनको लगा था कि मोदी ने पहले सर्जिकल स्ट्राइक किया था (2016) तो इस बार भी करेगा. इसलिए उन्होंने सब वहां पर खड़ा कर दिया. ताम झाम पूरा. इवन अफगानिस्तान के बॉर्डर से लाकर यहां रख दिया. इवन बलोचिस्तान में जो हैं उनको भी यहां लाकर रख दिया. सारे टैंक, रडार लगा दिए.

(हाथ से जहाज बनाकर इशारा करते हुए, मुस्कुराकर) अब हम बजरंगबली की जय करते ऊपर से चले गए.’

'अब हम बजरंगबली की जय करते ऊपर से चले गए.'
‘अब हम बजरंगबली की जय करते ऊपर से चले गए.’

ऑडिटोरियम तालियों से गड़गड़ा उठा है. लोग हंस रहे हैं. शोर कर रहे हैं. सबकी कल्पना में दर्ज हो गया है कि पाकिस्तान को सबक सिखाना बेहद आसान था. जैसे हनुमान से के लिए समुद्र लांघना.

किसी भी देश की डिफेन्स फोर्सेज के लिए युद्ध सबसे आखिरी विकल्प होता है. मगर पबजी वाले देश में सोशल मीडिया पर कभी भी खेल लिया जाता है.

*

आजकल फेसबुक पर पबजी को डाउनलोड करने के विज्ञापन दिख रहे हैं. इसे बुरे अनुवाद का नमूना कहें या युद्ध की सही कल्पना की विफलता कि विज्ञापन का कैप्शन कहता है:आइए, लड़ते हैं.

सोशल मीडिया पर दिखने वाला पबजी लाइट का ऐड.
सोशल मीडिया पर दिखने वाला पबजी लाइट का ऐड. सोर्स: फेसबुक

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