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इतनी महंगाई है यहां कि 3 लाख का एक किलो मीट मिल रहा है!

वेनेजुएला में महंगाई बहुत बढ़ गई है और वहां की करंसी बोलिवर बहुत कमजोर हो गई है.

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महंगाई इतनी बढ़ गई थी कि लोग थैलों में पैसा भरकर ले जाते. और, रुमाल में बांधकर सामान लाते.

मुझे ठीक-ठीक याद नहीं किस क्लास की बात है. पहले विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की हालत क्या थी. इसी के जिक्र में ये बात पढ़ी थी. आज आपको वेनेजुएला की खबर बताते हुए दिमाग में ये ही लाइन आई. वहां एक ब्रेड के टुकड़े पर मार-काट मच रही है. लोग देश छोड़कर जा रहे हैं. ताकि कम से कम रोटी जैसी बुनियादी चीजें मयस्सर हो सकें. वेनेजुएला में अभी जितनी महंगाई है, उतनी दुनिया में कहीं नहीं है. पिछले 23 महीनों से हालत लगातार बदतर होती जा रही है. वेनेजुएला की करंसी है बोलिवर. इसका कोई मोल नहीं रहा. ये रद्दी की तरह सड़क पर फेंक दी जा रही है. एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 250,000 बोलिवर के बराबर है. ये अभी का रेट है. हो सकता है कि जब आप ये खबर पढ़ रहे हों, तब तक वैल्यू और गिर जाए. क्योंकि 12 हफ्ते पहले तक ये रेट करीब साढ़े पांच हजार बोलिवर ही था. लोग सच में बोरियों के अंदर नोट भरकर लाते हैं और चुटकी में सामान खरीदकर ले जाते हैं.

पेड़ के पत्तों पर नोट चिपके हैं. हमारे और आपके लिए नोट की क्या वैल्यू है? उससे हम जरूरी चीजें खरीदते हैं. अगर नोट इस काबिल ही न रहें कि कुछ खरीद पाएं, तो उनका ये ही हश्र होता है.
पेड़ के पत्तों पर नोट चिपके हैं. हमारे और आपके लिए नोट की क्या वैल्यू है? उससे हम जरूरी चीजें खरीदते हैं. अगर नोट इस काबिल ही न रहें कि कुछ खरीद पाएं, तो उनका ये ही हश्र होता है.

कभी लैटिन अमेरिका का सबसे अमीर देश था
वेनेजुएला. लैटिन अमेरिका का एक छोटा सा देश. आपने समाजवाद का नाम सुना है? ऐसा समाज जहां कोई भूखा न सोए. जहां सबको बराबर मौके मिलें. एक वक्त था. वेनेजुएला ऐसे ही मुल्क के तौर पर जाना जाता था. लैटिन अमेरिका का सबसे अमीर देश था. और अब? भीषण महंगाई. कर्ज. भुखमरी. इतनी भुखमरी कि लोग कचरे से चुनकर खाने को मजबूर हैं. नोटों की कीमत धड़ाम हो गई है. रुपये किसलिए होते हैं? ताकि उनसे जरूरतें पूरी की जा सकें. मगर वेनेजुएला में करंसी इतनी डूब गई है कि लोग उसे फेंक रहे हैं. उनसे कुछ खरीदा नहीं जा सकता है. जैसे हमारी करंसी रुपया है, वैसे ही वहां की करंसी बोलिवर है. एक किलो मीट की कीमत तीन लाख बोलिवर हो गई है. एक कप कॉफी की कीमत करीब 50,000 बोलिवर है.

वेनेजुएला का आर्थिक संकट नया नहीं है. पिछले कई सालों से वहां की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है. जबतक शावेज जिंदा थे, राजनैतिक स्थिरता थी. इस वजह से चीजें नियंत्रण में थीं. निकोलस मादुरो के आते ही राजनैतिक और आर्थिक संकट मिल गए और देश की स्थितियां बदतर हो गईं.
वेनेजुएला का आर्थिक संकट नया नहीं है. पिछले कई सालों से वहां अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है. जब शावेज जिंदा थे, राजनैतिक स्थिरता थी. इस वजह से चीजें नियंत्रण में थीं. निकोलस मादुरो के आते ही राजनैतिक-आर्थिक संकट मिल गए और स्थितियां बदतर हो गईं.

15 साल पहले किसी के पास 10 लाख थे, तो…
पिछले एक साल में यहां करीब 4,068 फीसद महंगाई बढ़ी है. जनवरी के महीने में महंगाई दर 84.2 पर्सेंट था. इसको अगर सालाना के हिसाब से जोड़ें, तो डेढ़ लाख फीसद से ज्यादा होगा. हर 35 दिन में चीजों के दाम दोगुने हो रहे हैं. इंटरनैशनल मॉनेटरी फंड (IMF)का कहना है कि 2018 में वेनेजुएला के अंदर महंगाई बढ़कर करीब 13,000 फीसद तक पहुंच जाएगी. करीब 15 साल पहले अगर किसी के पास 10 लाख वेनेजुएलन बोलिवर थे, तो अब उनकी कीमत घटकर छह से सात डॉलर तक रह गई है.

खाने-पीने की चीजों का इतना अकाल है कि भुखमरी की हालत है. जेब में पैसे हैं, मगर पैसों की कोई वैल्यू नहीं. दुकानें खाली पड़ी हैं. जहां सामान है, वहां लूट हो रही है. इस तस्वीर में देखिए. दुकान का डिस्प्ले तोड़कर सामान निकालते आदमी का हाथ दिख रहा है.
खाने-पीने की चीजों का इतना अकाल है कि भुखमरी की हालत है. जेब में पैसे हैं, मगर पैसों की कोई वैल्यू नहीं. दुकानें खाली पड़ी हैं. जहां सामान है, वहां लूट हो रही है. इस तस्वीर में देखिए. दुकान का डिस्प्ले तोड़कर सामान निकालते आदमी का हाथ दिख रहा है.

तेल का बहुत बड़ा भंडार है वेनेजुएला के पास
दुनियाभर की गाड़ियां अब भी तेल से ही चलती हैं. कारें पेट्रोल और डीजल ही पीती हैं. और वेनेजुएला के पास बहुत बड़ा तेल भंडार है. बस तेल ही नहीं, बल्कि सोने और हीरे की खानें भी हैं. ऐसे में तो वेनेजुएला को इतना गरीब कतई नहीं होना चाहिए था. ऐसा क्या हो गया यहां कि चीजें इतनी बदहाल हो गई हैं. इसका जवाब वहां के इतिहास में छुपा है.

कहानी: ह्यूगो शावेज
ह्यूगो शावेज. वेनेजुएला के करिश्माई नेता. दिसंबर 1998 में पहली बार राष्ट्रपति बने. तमाम वादे किए, मगर दो वादे सबसे ऊपर थे. कहा, भ्रष्टाचार और गरीबी दोनों खत्म कर दूंगा. शावेज के जीतने की वजह ही यही थी. उन्होंने वादा किया था कि राजनैतिक पार्टियों के अंदर पैठे भ्रष्टाचार को खत्म करेंगे. वेनेजुएला को इसकी सख्त जरूरत थी. शावेज को जिताने वाले लोग समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग थे. गरीब, बेसहारा. जिनके पास खोने को कुछ खास नहीं था.

पूर्व राष्ट्रपति हूगो चावेज की तस्वीर के साथ प्रदर्शन करते लोग
पूर्व राष्ट्रपति शावेज की तस्वीर के साथ प्रदर्शन करते लोग

कच्चे तेल का सहारा था
वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को तेल का सहारा था. दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ती जा रही थीं. जब शावेज सत्ता में आए, तब एक बैरल कच्चे तेल की कीमत करीब 6,446 रुपये थी. चावेज का सीधा सा फंडा था. तेल बेचने से जो पैसा आता, उसको वो लोगों की बेहतरी में खर्च करते. खाना, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा जैसी जरूरी चीजों में निवेश किया जाता. चावेज जो कर पाए, उसके पीछे लोगों का समर्थन एक बड़ी वजह थी.

अपने हिसाब से सिस्टम बना लिया
सत्ता में आने के बाद शावेज ने वेनेजुएला के सिस्टम में बहुत बदलाव किए. एक नई नैशनल असेंबली बनाई. इसके मुखिया वो खुद थे. फिर अपनी ताकत के सहारे उन्होंने संविधान में मनमुताबिक बदलाव किए. पहले सिस्टम था कि अगर आप राष्ट्रपति हैं और दोबारा चुनाव लड़ना चाहते हैं, तो आपको कम से कम दस साल रुकना होगा. वहां पांच साल के लिए सरकार चुनी जाती थी. शावेज के वक्त में इसे छह साल कर दिया गया. दोबारा चुनाव लड़ने से जुड़ी जो शर्त थी, वो भी खत्म कर दी गई. ये सब इसलिए कि शावेज जब तक चाहें, सत्ता में बने रह सकें.

वेनेजुएला की पूरी अर्थव्यवस्था कच्चे तेल के निर्यात से आने वाले पैसे पर निर्भर हो गई. इस पैसे का खर्च भी सोच-समझकर नहीं किया गया.
वेनेजुएला की पूरी अर्थव्यवस्था कच्चे तेल के निर्यात से आने वाले पैसे पर निर्भर हो गई. इस पैसे का खर्च भी सोच-समझकर नहीं किया गया.

कर्ज के नीचे दबता जा रहा था वेनेजुएला
इस नैशनल असेंबली ने सुप्रीम कोर्ट में भी बदलाव किए. वहां भी अपने मुताबिक लोगों को बैठा दिया. कारखानों और उद्योगों का सरकारीकरण किया. निजी सेक्टर के खिलाफ जंग छेड़ दी. सरकारी तंत्र बढ़ाया. खूब खर्च किया. तेल की बिक्री से पैसा आ ही रहा था. जहां कमी पड़ी, कर्ज ले लिया गया. वेनेजुएला को पता ही नहीं चला कि वो कर्ज के ढेर के नीचे दबता जा रहा है.

सस्ती कीमतों पर दोस्तों को बेचा तेल
शावेज ने एक और काम किया. कई लैटिन अमेरिकी देशों को सस्ती कीमत पर तेल बेचा. क्यूबा से उनकी अच्छी दोस्ती थी. क्यूबा की बागडोर तब फिदेल कास्त्रो के हाथ में थी. शावेज ने क्यूबा के डॉक्टरों को अपने यहां काम करने बुलाया. बदले में खूब सस्ती कीमतों पर क्यूबा को तेल मुहैया कराया.

मादुरो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग. इस पोस्टर में जो लिखा है, उसका मतलब होगा- अब और तानाशाही नहीं चलेगी.
मादुरो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग. इस पोस्टर में जो लिखा है, उसका मतलब कुछ इस तरह होगा- अब और तानाशाही नहीं चलेगी.

वेनेजुएला की पूरी अर्थव्यवस्था= कच्चा तेल
इसके अलावा एक और बात हुई. वेनेजुएला की पूरी अर्थव्यवस्था तेल पर सिमटती गई. निर्यात के कारण होने वाली आमदनी का 95 फीसद हिस्सा तेल के एक्सपोर्ट से आता है. अंधाधुंध सरकारीकरण की वजह से उद्योग-धंधों के पांव बिल्कुल उखड़ गए थे. शावेज अपने इस मॉडल को ’21वीं सदी का समाजवाद’ कहते थे. ये वो दौर था जब तेल की वजह से वेनेजुएला अच्छा-खासा पैसा कमा रहा था. मगर जमकर खर्च भी कर रहा था. देश बस निर्यात से आए पैसों पर नहीं चलता. देश के अंदर भी अर्थव्यवस्था के लिए कई चीजें करनी होती हैं. सरकार का खर्च भी उसकी आमदनी के अनुपात में होता है. ऐसा नहीं होता, तो वेनेजुएला की तरह हाल होता है. देश के सिर पर कर्ज का पहाड़ खड़ा हो जाता है. ऐसे दिन और ऐसी रात में आया मार्च 2013. शावेज नहीं रहे. उनकी मौत हो गई. उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुना निकोलस मादुरो को.

मादुरो हैंडपिक्ड थे. उन्हें खुद चावेज ने अपना उत्तराधिकारी चुना था.
मादुरो हैंडपिक्ड थे. उन्हें खुद चावेज ने अपना उत्तराधिकारी चुना था.

बस ड्राइवर थे, राष्ट्रपति बन गए
राजनीति में आने से पहले मादुरो बस चलाते थे. ड्राइवर थे. वहां से यूनियन लीडर बने. मजदूर संगठन से राजनीति में पहुंचने में देर नहीं लगी. ऊपर उठे. शावेज की नजर में आए. मादुरो जो थे, वो शावेज को बहुत मानते थे. शावेज को भी उनके ऊपर बड़ा यकीन था. तभी तो उनको पहले नैशनल असेंबली का सदस्य बनाया. फिर सेक्रटरी ऑफ स्टेट. फिर उपराष्ट्रपति. और आखिर में अपना उत्तराधिकारी. मादुरो को न केवल सत्ता मिली. बल्कि कर्ज का पहाड़ भी मिला.

मादुरो ने चावेज बनने की बहुत कोशिश की, बन नहीं पाए
मादुरो ने शावेज की तरह सत्ता चलाने की पूरी कोशिश की. मगर उनके साथ परेशानी ये थी कि वो शावेज की तरह करिश्माई नेता नहीं थे. न ही राजनीति में ही उतने मंजे हुए थे. तेल की कीमतें भी ढलान पर थीं. कीमत कम होकर प्रति बैरल ढाई हजार रुपये तक पहुंच गई थी. तेल की कीमतें कम होने का मतलब था वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था का पूरी तरह चरमरा जाना. ऐसे में गरीबी बहुत बढ़ गई. प्राइवेट सेक्टर को इतना कमतर कर दिया गया था कि उसके पास इकॉनमी को देने के लिए कुछ नहीं बचा था. तो मादुरो ने करंसी की कीमत गिरा दी. सोचा कि इससे व्यापार बढ़ेगा. मगर ऐसा हुआ नहीं. बल्कि महंगाई बेतहाशा बढ़ने लगी. अनाज मिलना मुश्किल हो गया.

विपक्षी पार्टियों के समर्थन से निकाली गई एक सरकार विरोधी रैली की तस्वीर
विपक्षी पार्टियों के समर्थन से निकाली गई एक सरकार विरोधी रैली की तस्वीर

विपक्षी पार्टियों को नैशनल असेंबली में बहुमत मिल गया
बात रही मादुरो की ताकत की, तो सेना और सुरक्षाबलों पर उनका पूरा नियंत्रण था. सुप्रीम कोर्ट जेब में थी. मादुरो अपनी सरकार और सुप्रीम कोर्ट, दोनों के सहारे तानाशाही कर रहे थे. मगर जनता का समर्थन वो खोते जा रहे थे. चीजें उनके हाथ से निकलती जा रही थीं. फिर आया दिसंबर 2015. जनता ने यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी (शावेज और मादुरो की पार्टी) के खिलाफ वोट दिया. नैशनल असेंबली में विपक्षी पार्टियों दमदार हो गईं. सरकार ने पलटवार करते हुए कई मुख्य विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया. विपक्ष ने आरोप लगाया कि मादुरो तानाशाही कर रहे हैं. वो मादुरो का इस्तीफा मांगने लगे. मादुरो ने उल्टा इल्जाम लगाया कि विपक्ष विदेशी ताकतों के साथ मिलकर देश को अस्थिर करने की साजिश रच रहा है. एकबार फिर वेनेजुएला ने अपनी बर्बादी का ठीकरा अमेरिका पर फोड़ा. मगर एक बात का जवाब नहीं था मादुरो के पास. कि ऐसा क्या है कि वेनेजुएला में हिंसा इतनी बढ़ गई है. सीरिया और इराक जैसे देशों में तो लोग जंग और आतंकवाद के कारण मर रहे हैं. मगर वेनेजुएला में लोकतंत्र के बावजूद वैसी ही अराजकता की स्थिति क्यों है?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हालात और बदतर हो गए
फिर आया जनवरी 2016. सुप्रीम कोर्ट ने एक विवादित फैसला सुनाया. चार विधायिकों का चुनाव खारिज कर दिया. इन चार में तीन विपक्ष के नेता थे. कोर्ट ने कहा कि मतदान में अनियमितताएं हुई हैं. विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के बहाने उनके बहुमत को खत्म करना चाहती है. फिर विपक्ष ने अदालत के फैसले को अंगूठा दिखाते हुए अपने जीते हुए नेताओं का शपथ ग्रहण भी करवा लिया. जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने नैशनल असेंबली को कोर्ट की अवमानना का दोषी ठहरा दिया. और कहा कि नैशनल असेंबली के लिए फैसले अवैध होंगे.

ये एक बच्चे की कॉ़पी का पन्ना है. उस दिन उसे खाने में कई चीजें मिलीं. बच्चा बहुत खुश था. उसने चीजों के नाम गिना दिए. ये भी लिखा कि उसे खाने में पिज्जा सबसे ज्यादा पसंद है. जब लोग ब्रेड को तरस रहे हों, तो ढेर सारा खाना मिलना बच्चे
ये एक बच्चे की कॉ़पी का पन्ना है. उस दिन उसे खाने में कई चीजें मिलीं. बच्चा बहुत खुश था. उसने चीजों के नाम गिना दिए. ये भी लिखा कि उसे पिज्जा सबसे ज्यादा पसंद है. जब लोग ब्रेड को तरस रहे हों, तो ढेर सारा खाना पाकर बच्चे को कितनी खुशी हुई होगी.

कोर्ट को तो सरकार ने अपनी जेब में रखा हुआ था
विपक्ष का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट तो सरकार की जेब में है. उसके फैसले कैसे माने जाएं? बात ठीक भी थी. न्यायपालिका की आजादी तो कब की खत्म हो चुकी थी. फिर विपक्ष ने मांग की कि मादुरो पर जनमत सर्वेक्षण कराया जाए. ये भी नहीं हुआ. फिर चुनाव भी टाल दिए गए. फिर एक और टकराव हुआ. नैशनल असेंबली (यानी विपक्ष) ने सरकारी तेल कंपनी PDVSA को प्राइवेट कंपनियों के साथ मिलकर काम करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया. फिर क्या हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने सारी ताकतें अपने हाथ में ले ली.

एक ब्रेड के टुकड़े पर मार-काट शुरू हो गई
अगले दिन से ही वेनेजुएला की सड़कों पर जमकर दंगा होना शुरू हो गया. राजधानी कारकस की हालत सबसे खराब थी. लोग सुप्रीम कोर्ट द्वारा नैशनल असेंबली के खिलाफ सुनाए गए फैसले का विरोध कर रहे थे. विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए कोर्ट ने अपना फैसला वापस ले लिया. मगर विरोध बंद नहीं हुए. अगले तीन महीने तक दंगा-फसाद रोजाना की बात हो गई. प्रदर्शन करने वाले पत्थर फेंकते. पुलिस और सेना उनके ऊपर आंसू गैस छोड़ती. फिर ये विरोध और फैल गया. महंगाई और गरीबी तक पहुंच गया. हालत इतनी खराब हो गई कि दुकानों के अंदर ब्रेड तक मिलना बंद हो गया. न खाने को कुछ मिल रहा था. न दवाएं मिल रही थीं. जबर्दस्त भुखमरी की हालत आ गई. एक ब्रेड का टुकड़ा लक्जरी बन गया. इसके लिए मार-काट शुरू हो गई. लोग जब खरीद नहीं पा रहे थे, तो दुकानों पर हमला करके खाने-पीने की चीजें लूटने लगे.

ये एक सुपरमार्केट की तस्वीर है. रैक खाली पड़े हैं.
ये एक सुपरमार्केट की तस्वीर है. रैक खाली पड़े हैं. जीवन जीने की बुनियादी चीजें लक्ज़री हो गई हैं.

वेनेजुएला की दिक्कतें: एक लिस्ट

सरकार: निकोलस मादुरो ने रत्तीभर भी समझदारी दिखाई होती, तो स्थितियां इतनी न बिगड़तीं. ये कैसा लोकतंत्र है जहां सारी ताकत एक आदमी के हाथ में है. कोई एक संस्था ऐसी नहीं, जो स्वतंत्र हो. सत्ता अगर विरोध को दबाने के लिए हिंसा का इस्तेमाल करे और बाकी सारी दिक्कतों से ज्यादा अपनी सरकार बचाने में संसाधन खर्च करे, तो उसे चले ही जाना चाहिए. ऐसी सरकार से देश का कोई भला नहीं हो सकता. इतना ही नहीं, सरकार ने वर्ग संघर्ष को भी बढ़ावा दिया. अपनी आलोचना करने वालों को देशद्रोही ठहराया. 2004 से 2014 के बीच लाखों हत्याएं हुईं. कुछ सरकार के हाथों. कुछ वर्ग संघर्ष में. कुछ दंगों में. कुछ लड़ाई-झगड़ों में.

महंगाई: 2014 से ही महंगाई लगातार ऊपर चढ़ रही है. करंसी की वैल्यू एकदम खत्म हो गई है. जैसा भाव रद्दी कागज का होता है, वैसा ही करंसी का भी है. सरकार ने पहले क्या किया कि खूब नोट छपवाए. 2017 की शुरुआत से ही करंसी की प्रिटिंग 14 गुना बढ़ा दी गई. इससे हालत और खराब हो गई. पैसे की वेल्यू धरातल में घुस गई.

ये एक सुपरमार्केट के बाहर लगी लाइन है. लोग सामान खरीदने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. कई किलोमीटर लंबी लाइनें लग रही हैं. मांग ज्यादा है. उसके मुकाबले सप्लाई बहुत कम है.
ये एक सुपरमार्केट के बाहर लगी लाइन है. लोग सामान खरीदने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. कई किलोमीटर लंबी लाइनें लग रही हैं. मांग ज्यादा है. उसके मुकाबले सप्लाई बहुत कम है.

खाने की कमी: यहां सरकार कीमतें तय करती है. फिर भी कालाबाजारी खूब होती है. काला बाजार के कारण चीजों की कीमतों पर काफी असर पड़ता है. करीब एक महीने के अंदर चीजों की कीमत दोगुनी होती जा रही है. सप्लाई है नहीं. न लोग इस हालत में हैं कि चीजें खरीद पाएं. बुनियादी चीजों के ऊपर भी संकट है. खेती पहले ही बंद हो गई थी. हर चीज विदेशों से मंगवाया जाता था. न दूध उत्पादन में आत्मनिर्भरता है, न मीट वगैरह में.

तेल उत्पादन: वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था तकरीबन पूरी तरह से तेल पर निर्भर है. देश में इतना दंगा-फसाद छिड़ा है. इसकी वजह से तेल का प्रॉडक्शन भी बहुत गिर गया है. वेनेजुएला तेल नहीं बेचेगा, तो पैसा कहां से लाएगा? खाएगा क्या?

स्वास्थ्य सेवाएं: वेनेजुएला का सिस्टम ऐसा है कि अस्पताल और डॉक्टर ज्यादातर सरकारी हैं. सरकार की जेब खाली होगी, तो इन सुविधाओं की सुध कौन लेगा. इसीलिए लोगों को दवाएं तक नहीं मिल रही हैं. मरीज के दोस्त-रिश्तेदार दवाओं की तलाश में एड़ियां घिसते हैं और वहां मरीज अस्पताल में मर जाता है.

सुरक्षाबलों से भिड़ते प्रदर्शनकारी. मादुरो सरकार के पास लोगों की दिक्कतों के लिए ये ही जवाब है- हिंसा.
सुरक्षाबलों से भिड़ते प्रदर्शनकारी. मादुरो सरकार के पास लोगों की दिक्कतों के लिए ये ही जवाब है- हिंसा, दमन.

दंगा-फसाद, अपराध: वेनेजुएला में फिलहाल कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची है. वेनेजुएलन वॉइलेंस ऑर्ब्जवेटरी के मुताबिक, 2016 में यहां करीब 28 हजार लोग मारे गए. कुछ दंगों में. कुछ उपद्रव में. कुछ पुलिस और सेना के साथ भिड़कर.

हजारों की तादाद में लोग वेनेजुएला छोड़कर जाने की कोशिश कर रहे हैं. मुसीबत ये है कि जहां वेनेजुएला की सीमा खत्म होती है, वहां से किसी और मुल्क की हद शुरू हो जाती है. कोई भी मुल्क शरणार्थियों को क्यों आने दे? कोलंबिया और ब्राजील, दोनों ने वेनेजुएला से सटी सीमा पर सेना तैनात कर दी है. ताकि वहां से भागकर आ रहे लोगों को घुसने से रोका जा सके. कोलंबिया पहले ही करीब पांच लाख शरणार्थियों को अपने यहां ले चुका है. कोलंबिया भी बहुत अमीर नहीं. बहुत ज्यादा लोगों को तो वो भी जगह नहीं दे सकता है. वैसे कुछ हजार लोगों का बॉर्डर पार कर जाना वेनेजुएला को सांस नहीं दिला पाएगा. जो बॉर्डर पार कर जाएंगे, रिफ्यूजी बन जाएंगे. जो पीछे छूट जाएंगे, वो जी नहीं पाएंगे. हार तो दोनों तरफ ही है.


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