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'मिस वर्ल्ड' सुनते ही जो मुल्क याद आता है, वहां भयानक खून बह सकता है

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‘मिस वर्ल्ड’ सुनते ही आपको सबसे पहले कौन सा मुल्क याद आता है? वेनेजुएला. लैटिन अमेरिका में बसा एक छोटा सा देश. आपको पनामा पेपर्स याद है? जिसकी वजह से नवाज शरीफ की सरकार गई. उसी पनामा के आसपास बसा है ये. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान. तीनों को जोड़ दीजिएगा. बस उतना बड़ा है वेनेजुएला.

पिछले कई महीनों से यहां बुरा हाल है. लोग बड़े से झोले में पैसा भरकर ले जाएं, तो पॉकेट भर सामान भी नहीं खरीद पाते. पिछले साल खबर आई थी कि पांच लाख रुपये का एक किलो मीट मिल रहा है. 30 लाख से ज्यादा लोगों को देश छोड़ना पड़ गया है. ये सब हुआ है कि वहां के राजनैतिक माहौल के मारे. वेनेजुएला समेत बाकी दुनिया को पता नहीं. कि वहां का राष्ट्रपति है कौन. वजह कि सत्ता है निकोलस मादुरो के हाथ में. मगर विपक्ष के नेता ख्वन ग्वाइदो ने भी खुद को राष्ट्रपति बता दिया है. कुछ देशों ने ग्वाइदो को राष्ट्रपति मान भी लिया है. इस सवाल पर अमेरिका एक तरफ है. और रूस-चीन एक तरफ. ये क्या माज़रा है, यही सब हम आपको बता रहे हैं इस आर्टिकल में.

ये पहचान लीजिए. कि जिस देश की खबर पढ़ रहे हैं, वो है कहां (फोटो: गूगल मैप्स)
ये पहचान लीजिए. कि जिस देश की खबर पढ़ रहे हैं, वो है कहां (फोटो: गूगल मैप्स)

पूरे फ़साद की जड़ कहां है?
साल था 1999. हूगो चावेज़. एक मिलिटरी अफसर. वो वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने. मार्च 2013 में चावेज़ गुज़र गए. फिर उनके विदेश मंत्री निकोलस मादुरो बने प्रेजिडेंट. मादुरो ने सारी ताकत अपने पास जमा कर ली. हर तरह के विरोध को दबाया. एक तरफ ये. दूसरी तरफ देश की फिसड्डी अर्थव्यवस्था और भ्रष्टाचार. मादुरो के खिलाफ माहौल गर्माने लगा. लोग कहने लगे, सारी दुर्दशा मादुरो की वजह से हो रही है.

लोग किस तरफ हैं?
2014 में लोग सड़कों पर उतर आए. मादुरो ने और तानाशाही बढ़ा दी. विपक्षी नेताओं को पकड़कर जेल में डाल दिया. इनमें एक थे लियोपोल्दो लोपेज़. जो पिछले पांच साल से नज़रबंद हैं. इन्हीं लोपेज़ के शिष्य हैं ग्वाइदो. देश की हालत इतनी खराब हो गई कि रोटियों के लाले पड़ गए. विरोध चलता रहा. लोग मादुरो पर चुनाव करवाने का दबाव बनाते रहे.

यूं ही होते-होते किसी तरह 2017 आया. मादुरो के खिलाफ फिर माहौल भड़का. वजह बनी उनका नैशनल असेंबली से उसकी ताकत छीनना. मादुरो ने ऐसा इसलिए किया कि असेंबली विपक्षी नेताओं से मिल गई थी. फिर हुआ खून-खराबा. दर्ज़नों लोग मारे गए. सैकड़ों घायल हुए.

मादुरो के पास आर्मी है. आर्मी के पास हथियार हैं. चीन और रूस ने भी खूब हथियार दिए हैं. तस्वीर में मादुरो मिलिटरी ताकत दिखा रहे हैं (फोटो: रॉयटर्स)
मादुरो के पास आर्मी है. आर्मी के पास हथियार हैं. चीन और रूस ने भी खूब हथियार दिए हैं. तस्वीर में मादुरो मिलिटरी ताकत दिखा रहे हैं (फोटो: रॉयटर्स)

2018 में क्या हुआ?
मादुरो पर राष्ट्रपति चुनाव करवाने का दबाव था. पहले तय हुआ, दिसंबर में चुनाव होंगे. मगर फिर 20 मई को ही हो गए. भरपूर धांधली हुई. ऐसी खबरें भी आईं कि भूख से तड़प रहे लोगों को खाने-पीने की चीजें देकर उनका वोट खरीदा गया. धांधली के बीच कई विपक्षी दलों ने इस चुनाव का बहिष्कार किया. कुछ को खुद मादुरो ने बैन कर दिया. कुछ को जेल में डाल दिया. कुछ देश छोड़कर भाग गए. कुछ पर हमले करवाए गए. जैसे-तैसे करके मादुरो ने खुद को जितवा लिया. इधर रिज़ल्ट आए, उधर फिर से लोग मादुरो के खिलाफ सड़कों पर उतर गए.

कौन साथ है, कौन खिलाफ है?
अमेरिका, कनाडा और यूरोपियन यूनियन तो मादुरो के खिलाफ था ही. वेनेजुएला के पड़ोसी- अर्जेंटीना, ब्राजील, कोलंबिया, कोस्टा रिका, ग्वाटेमाला, होन्डारस, पनामा और पेरू जैसे देशों ने चुनाव नतीजों को खारिज़ कर दिया. वेनेजुएला के 30 लाख से ज्यादा लोग भागकर पड़ोसी देशों में चले गए हैं. उन्हें फिलहाल तो शरण मिली है. मगर ये कब तक चल पाएगा. इसीलिए पड़ोसी देश चाहते हैं कि जल्द से जल्द कोई ठोस राह निकले. वैसे सब खिलाफ नहीं हैं मादुरो के. चीन, रूस, क्यूबा, ईरान, तुर्की और नॉर्थ कोरिया जैसे कुछ देश उनको सपोर्ट कर रहे हैं.

ये हैं वेनेजुएला की विपक्ष के लीडर,
ये हैं वेनेजुएला की विपक्ष के लीडर ख्वन ग्वाइदो. कार्यकारी राष्ट्रपति के इनके दावे को अमेरिका सपोर्ट कर रहा है (फोटो: रॉयटर्स)

अभी ताज़ा-ताज़ा क्या हुआ?
इलेक्शन का रिज़ल्ट तो मई 2018 में ही आ गया थेा. मगर तब मादुरो के पहले कार्यकाल का कुछ महीना बचा था. उन्होंने कहा, पहले वो पूरा कर लूं तब दूसरे कार्यकाल की शपथ लूंगा. 10 जनवरी, 2019. इस दिन मादुरो ने दोबारा राष्ट्रपति की गद्दी संभाली. इससे मादुरो के विरोध ने और जोर पकड़ा. विपक्ष ने ग्वाइदो को लीडर बना दिया. 23 जनवरी को, ख्वन ग्वाइदो ने ऐलान किया. कि आज से मैं हूं वेनेजुएला का कार्यकारी राष्ट्रपति. ग्वाइदो ने ट्विटर पर अपने इंट्रो में भी लिख दिया- मैं वेनेजुएला का राष्ट्रपति. अमेरिका ने भी कह दिया है. कि वो भी ग्वाइदो को वेनेजुएला का राष्ट्रपति मानता है. मादुरो बोल रहे हैं, ये सब अमेरिका की साज़िश है. उनका आरोप पूरी तरह ग़लत भी नहीं. ग्वाइदो को सपोर्ट करने के पीछे अमेरिका का अपना भी इंट्रेस्ट है.

कौन हैं ख्वन ग्वाइदो?
वेनेजुएला में वरगास नाम का प्रांत है. देश के सबसे गरीब हिस्सों में से एक. यहीं के हैं ग्वाइदो. 35 बरस की उम्र है. 1999 में जब हूगो चावेज़ राष्ट्रपति बने, तब ग्वाइदो 15 साल के थे. दिसंबर 1999 में वरगास के अंदर खूब भयंकर बाढ़ आई. करीब 30,000 लोग मारे गए. सरकार ने इस आपदा के बाद काम करने में ढिलाई दिखाई थी. कहते हैं इसी वजह से ग्वाइदो ने राजनीति में आने की सोची. अमेरिका जाकर पढ़े. इंजिनियरिंग की डिग्री ली. 2009 में विपक्ष के नेता लिओपोल्दो लोपेज़ के साथ मिलकर ‘पॉपुलर विल’ नाम की पार्टी बनाई. 2011 में नैशनल असेंबली के लिए चुने गए. मादुरो के खिलाफ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. घायल भी हुए.

ग्वाइदो को अरेस्ट करने की कोशिश की मादुरो ने
जनवरी 2019 में विपक्षी दलों ने ग्वाइदो को नैशनल असेंबली का नेता चुना. इसके बाद सुरक्षाबलों ने उन्हें अरेस्ट कर लिया. कुछ घंटों बाद वो रिहा कर दिए गए. वो गरीब इलाके से आते हैं. ये बात उन्हें लोगों के करीब लाती है. बाकी वेनेजुएला को लेकर उनकी क्या योजनाएं हैं, इसका ब्योरा अभी नहीं मालूम. वैसे भी विपक्ष निष्पक्ष चुनाव चाहता है. ग्वाइदो ने सेना का साथ मांगा है. कहा है कि जो लोकतंत्र को वापस लाने में मदद करेंगे, उन्हें माफ कर दिया जाएगा.

निकोलस मादुरो ने चुनाव करवाने से इनकार कर दिया है. उनका यही रवैया बना रहा, तो वेनेजुएला भुगतेगा (फोटो: रॉयटर्स)
निकोलस मादुरो ने चुनाव करवाने से इनकार कर दिया है. उनका यही रवैया बना रहा, तो वेनेजुएला भुगतेगा (फोटो: रॉयटर्स)

वेनेजुएला के सामने खतरे क्या हैं?
सेना मादुरो के साथ है. अगर उसके जोर से मादुरो यूं ही सबको दबाते रहे, तो उनके खिलाफ सशस्त्र विरोध भड़क सकता है. कई सरकारें और उनकी खुफिया एजेंसियां हैं, जो विरोधियों को हथियार दे सकती हैं. उन्हें ट्रेनिंग दे सकती हैं. अमेरिका तो दर्ज़नों बार ऐसा कर चुका है. अगर हालात नहीं सुधरे, तो हिंसक दखलंदाजी की आशंका बढ़ जाएगी. ऐसा हुआ तो बहुत लोग मारे जाएंगे. पहले ही लोग दाने-दाने को तरस रहे हैं. ऐसा हुआ, तो वो कहां जाएंगे. वेनेजुएला को कुछ चाहिए, तो वो है अच्छी और लायक लीडरशिप. जो इकॉनमी को पटरी पर लाए. लोकतंत्र बहाल करे. स्थिरता लाए. लोगों का भरोसा जीते. उन्हें अनाज दे, रोज़गार दे. बिग पावर्स के हाथों का मोहरा बने बिना, खेमेबाजी किए बिना देश का भला करे.

मादुरो का क्या होगा?
अगर सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ, तो खून बहेगा. इससे कुछ हासिल भी नहीं होगा. मादुरो अभी चीन और रूस के दम पर जमे हुए हैं. वेनेजुएला को वर्ल्ड पावर्स के हाथों की कठपुतली बना दिया है उन्होंने. जबकि उनके आगे समझौते का रास्ता था. वो विरोध को सम्मान देते हुए गद्दी छोड़ सकते थे. निष्पक्ष चुनाव करवा सकते थे. वो अब भी ऐसा कर सकते हैं. इस स्थिति में वो अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहेंगे. विपक्ष अगर इसके लिए तैयार भी हो जाए, तब भी शायद मादुरो उनके आश्वासन पर भरोसा न करें. तब वो शायद देश छोड़कर जाना सही समझेंगे. हो सकता है रूस या तुर्की, दोनों में से कोई उन्हें रख ले. तुर्की की तो अमेरिका से बिगड़ी हुई है. और रूस के पास वजहों की लंबी-चौड़ी लिस्ट है.

रूस, चीन और अमेरिका का खेल 
रूस वेनेजुएला के बहाने अमेरिका को काउंटर करना चाहता है. यूक्रेन में अमेरिका जो कोशिश कर रहा है, वही रूस वेनेजुएला में करना चाहता है. वैसे भी वेनेजुएला चावेज़ के दिनों से उसका दोस्त रहा है. वो नहीं चाहता कि वेनेजुएला में अमेरिका के मनमाफिक सरकार आए. चीन और रूस ने वेनेजुएला को काफी सारा कर्ज़ भी दिया हुआ है. मादुरो गए, तो ये पैसा डूब सकता है. मादुरो के रहने में ही उनका फायदा है. शायद ये भी वजह है कि रूस और चीन ने वेनेजुएला को काफी हथियार दिए हैं. साउथ चाइना सी को लेकर अमेरिका चीन पर प्रेशर बना रहा है. तो इस लिहाज से भी चीन के लिए वेनेजुएला एक किस्म का काउंटर हुआ.

कच्चे तेल का लालच
बाकी सबसे बड़ा खेल कच्चे तेल का है. वेनेजुएला के पास तेल है. तेल में पावर है. पैसा है. तेल के लिए लड़ाइयां लड़ी गई हैं. ये बड़ी वजह है कि वेनेजुएला बड़े खिलाड़ियों के प्रॉक्सी वॉर का मैदान बन गया है. अमेरिका, रूस और चीन सब यहां अपना-अपना हित साध रहे हैं. मादुरो कह रहे हैं कि इराक, लीबिया और सीरिया के जैसे उनके भी तेल पर नज़र है अमेरिका की. उनकी बात को कोई कैसे झूठ कह दे. ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बॉल्टन खुद ही कह चुके हैं. कि वाइट हाउस को वेनेजुएला के तेल में बहुत दिलचस्पी है. उन्होंने फॉक्स बिजनस से कहा-

हम बड़ी-बड़ी अमेरिकी कंपनियों से बात कर रहे हैं. अगर अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के तेल में निवेश करें, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बहुत फायदा होगा. 

बताइए, इसके आगे कहने को क्या बाकी रह जाता है.


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