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2019 लोकसभा चुनाव से पहले आई ये आफत मोदी-योगी को सबसे ज्यादा सता रही होगी

‘मैं देश की सांसद हूं. इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मैं सांसद रहती हूं या नहीं लेकिन मैं संविधान और आरक्षण में कोई बदलाव सहन नहीं करूंगी.’
सावित्री बाई फुले, बीजेपी सांसद. बहराइच (1 अप्रैल को लखनऊ में आयोजित भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली में)

मैंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने की कोशिश की, लेकिन मुख्यमंत्री ने मुझे बेइज्जत किया. मुख्यमंत्री से दो बार मिला, मदद नहीं मिली और डांट के भगा दिया.’
छोटेलाल खरवार, बीजेपी सांसद रॉबर्ट्सगंज (2 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए पत्र में)

‘पुलिस राज्य में दलितों को निशाना बना रही है. 2 अप्रैल को हुए भारत बंद में हुई हिंसा के बाद राज्य में पुलिस दलितों के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग कर रही है. उनके खिलाफ झूठे मुक़दमे दर्ज किए जा रहे हैं.’
अशोक दोहरे, बीजेपी सांसद, इटावा ( 5 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए पत्र में)

‘2014 में आम चुनाव से पहले मोदी ने दलितों में उम्मीद जगाई थी कि उनकी सरकार गरीबों, वंचितों और दलितों के लिए काम करेगी लेकिन चार साल बाद भी सरकार ने 30 करोड़ दलितों से किया एक भी वादा पूरा नहीं किया है. आरक्षण को भी खत्म करने की कोशिश की जा रही है.’
यशवंत सिंह, बीजेपी सांसद, नगीना ( 6 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए पत्र में)

ये चार अलग-अलग लोगों के बयान हैं. आम तौर पर अगर किसी साधारण आदमी या किसी दूसरी पार्टी के नेता ने ऐसा कुछ कहा होता, तो शायद इन बयानों को सुर्खियां नहीं मिली होतीं. लेकिन ये बयान बीजेपी के सांसदों के हैं और उन सांसदों के जो उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों से ताल्लुक रखने वाले एक ही जाति के हैं. और इन सबके केंद्र में एक ही मुद्दा है और वो है दलितों का उत्पीड़न. लिहाजा सीधे तौर पर निशाने पर हैं प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. पत्र भले ही नरेंद्र मोदी के नाम लिखा गया है, लेकिन हवाला मोदी के साथ ही योगी आदित्यनाथ का भी है. उन योगी आदित्यनाथ का, जिन्हें अंबेडकर महासभा 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के दिन दलित मित्र सम्मान से नवाजने वाली है. या फिर उन योगी आदित्यनाथ का, जिन्होंने दलितों के महानायक डॉ. अंबेडकर के नाम में बदलाव कर उनका नाम डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर कर दिया. या फिर उन योगी आदित्यनाथ का जिनकी पुलिस ने 2 अप्रैल को भारतबंद के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ ही प्रदेश के कई दूसरे हिस्सों में दलितों पर लाठीचार्ज कर दिया. इसके अलावा कुछ सांसदों के निशाने पर प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पांडेय और संगठन मंत्री सुनील बंसल भी हैं.

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अब आते हैं मुद्दे पर. ये सारा गुस्सा. ये सारा बवाल शुरू हुआ 20 मार्च को. जब सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले के दौरान एससी-एसटी ऐक्ट में बदलाव कर दिया. इसके बाद विरोध की शुरुआत हुई और जो आवाज सबसे पहले और सबसे तेज उभरी वो थी बहराइच से बीजेपी की दलित सांसद सावित्री बाई फुले की आवाज. वो 1 अप्रैल को लखनऊ में थीं. कांशीराम स्मृति उपवन में आयोजित संविधान और आरक्षण बचाओ रैली में. भगवा पार्टी की सांसद की इस रैली में हर जगह नीले झंडे नजर आ रहे थे. उन्होंने कहा कि भले ही मेरी सांसदी चली जाए मगर मैं अपने लोगों के मुद्दे जरूर उठाऊंगी. बिना किसी नेता का नाम लिए वो बोलीं –

’67 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी जीने को मजबूर हैं. अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पा रही है. हमारे समाज के आदमी को घोड़े पर बैठने पर मार दिया जा रहा है. बाबा साहेब की मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं. ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है.’

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बीजेपी के खिलाफ बगावती सुर अपनाने वाली ये सांसद बचपन से ही बगावती रही हैं. इनका 6 साल की उम्र में ही विवाह करवा दिया गया था. मगर विदाई नहीं हुई. विदाई का वक्त आया तो इन्होंने इनकार कर दिया. परिवार वालों ने इस विद्रोह को देखते हुए इनकी बहन की शादी उस लड़के से करवा दी. करवानी ही पड़ती. क्योंकि सावित्री बाई के मन में समाजसेवा का भूत सवार था. राजनीति का भूत सवार था. इसकी शुरुआत तब हुई जब वो 8वीं क्लास पास हुई थीं. एक सरकारी योजना के तहत इनके नाम 480 रुपये का वजीफा आया, जिसे स्कूल के प्रिंसिपल डकार गए. इन्होंने इसके खिलाफ बवाल काट दिया. वजीफा तो नहीं मिला, पर स्कूल से नाम जरूर कट गया. यहीं से तय हो गया था कि वो चूल्हे चौके के लिए नहीं, कुछ बड़ा करने के लिए हैं. बहन की शादी के बाद इन्होंने संन्यास ले लिया. और यहीं से 1 जनवरी 1981 को बहराइच के नानपारा के हुसैनपुर मृदांगी गांव में जन्मी सावित्री देवी की जिंदगी बदलनी शुरू हो गई. उनको नया नाम भी मिल गया. वही नाम जिस नाम से सब आज उन्हें जानते हैं. सावित्री बाई फुले. ये नामकरण किया उनके गुरु अक्षयवरनाथ कनौजिया ने. अक्षयवरनाथ कनौजिया उनके पिता के दोस्त थे. कांशीराम के करीबी थे. उन्होंने सावित्रीबाई को गोद ले लिया. राजनीति में भी आगे बढ़वाया. मायावती से मिलवाया. इस मुलाकात की कहानी भी दिलचस्प है.

सावित्रीबाई फूले ने भी बगावती सुर छेड़ रखे हैं.
सावित्रीबाई फुले ने भी बगावती सुर छेड़ रखे हैं.

14 साल की लड़की मंच पर ऐसा बोली कि मायावती भी तारीफ करने से नहीं बचीं

बात 1995 की है. मायावती मुख्यमंत्री थीं. एक कार्यक्रम के लिए बहराइच आई हुईं थीं. इस कार्यक्रम को तब 14 साल की रहीं सावित्रीबाई ने भी संबोधित किया. मौका उनको गुरु ने दिलवाया था. सो सावित्रीबाई ने भी चौका मारा. बड़े ही धाकड़ अंदाज में अंबेडकर और संविधान पर अपनी बात रखी. सभा में बैठे लोगों की जमकर तालियां लूटीं थीं. ये कुछ-कुछ मायावती की शुरुआती कहानी की तरह ही है. एक भाषण की वजह से ही मायावती कांशीराम की नजरों में चढ़ी थीं. सो यहां सावित्रीबाई की मायावती ने जमकर तारीफ की. इसी के बाद उनके परिवार वाले, गांव वाले बोलने लगे कि मायावती सीएम बन सकती हैं तो सावित्रीबाई क्यों नहीं. इसी के बाद सावित्रीबाई बसपा में सक्रिय हो गईं. पढ़ाई भी करती रहीं. बहराइच के महिला डिग्री कॉलेज से ग्रेजुएशन किया.

मगर 1998 में मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया. कारण थे 1996 में हुए जिला पंचायत के चुनाव. इसमें बसपा ने मिहिपुरवा से एक उम्मीदवार खड़ा किया, लेकिन अक्षयवरनाथ कनौजिया ने इसका विरोध करते हुए सावित्री को निर्दल चुनाव लड़ाया. इसमें सावित्री ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल की. हालांकि वो बीएसपी से जुड़ी रहीं. इसी दौरान लखनऊ में बसपा सुप्रीमो कांशीराम की अगुवाई में हुए एक आंदोलन और प्रदर्शन के दौरान सावित्री पर पीएसी ने जमकर लाठियां भांजी और इन्हें एक गोली भी लग गई. मगर लोकल बसपाइयों के मन में जिला पंचायत की हार की टीस थी. विरोध बढ़ा और मायावती ने अक्षयवरनाथ और सावित्रीबाई दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. सावित्रीबाई ने फिर बीजेपी का दामन थाम लिया.

रैली करतीं सावित्रीबाई.
रैली करतीं सावित्रीबाई.

2001 में वो बहराइच से जिला पंचायत का चुनाव लड़ीं और फिर जीत गईं. 2002, 2007 और 2012 में विधानसभा का चुनाव लड़ा. मगर सफलता मिली 2012 में. बहराइच की बलहा सीट से विधायक बन गईं. हालांकि 2005 और 2010 में वो जिला पंचायत सदस्य जरूर बनी रहीं. 2014 में एक बार फिर किस्मत चमकी. बहराइच की आरक्षित सीट से उन्हें बीजेपी ने लोकसभा का टिकट दे दिया. चुनाव हुआ जीतीं और वो भी 1 लाख से भी ज्यादा वोटों से.

सीधे मोदी से मांगा था लोकसभा का टिकट

उनको टिकट मिलने की कहानी भी दिलचस्प है. वो बताती हैं कि उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट सीधा नरेंद्र मोदी से मांगा था. नरेंद्र मोदी से वो पहली बार तब मिली थीं जब वो 2012 गुजरात विधानसभा चुनाव में जूनागढ़, राजकोट और सूरत प्रचार के लिए गई थीं. फिर जब लोकसभा चुनाव का समय आया तो उन्होंने मोदी के सामने लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की, तो मोदी ने उनसे कहा – तुम बहराइच से क्यों, गुजरात आ जाओ, मैं तुम्हें वहां से भी लड़ा सकता हूं. लेकिन फुले कहती हैं कि उन्होंने अपनी जन्मभूमि बहराइच से ही लड़ने का अनुरोध किया. अनुरोध सुना भी गया. फला भी.

पीएम मोदी के साथ सावित्रीबाई.
पीएम मोदी के साथ सावित्रीबाई.

पर अब मामला कुछ खटाई में आ गया है. वो बीजेपी के बैनर के इतर भी लगातार कई कार्यक्रम और सभाएं करने लगी हैं. बीजेपी का नाम तो नहीं लेतीं, मगर मुद्दे बीजेपी के विरोध वाले ही रहते हैं. सावित्रीबाई ने अपना एक सखी संप्रदाय संगठन भी बना रखा है, जिसके जरिए स्थानीय स्तर पर महिलाओं के हित में काम करती हैं. ये भी क्षेत्र में काफी ऐक्टिव रहता है. उनकी पार्टी विरोधी लाइन का ही नतीजा है कि बहराइच के ही बीजेपी कार्यकर्ता उनका पुतला फूंक रहे हैं. स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि बीते हफ्ते में 10 से ज्यादा जगहों पर सावित्रीबाई का पुतला बीजेपी कार्यकर्ता फूंक चुके हैं.

2015 के आसपास सावित्रीबाई पर एनएचएआई के एक ठेकेदार ने आरोप लगाया था कि वो उससे पैसा वसूल रही हैं. हालांकि बाद में मामला सुलझ गया था. मगर सावित्रीबाई का मूड फिलहाल बिगड़ा हुआ है. वो बीजेपी से खुश नहीं नजर आ रही हैं. बीजेपी के खिलाफ ही उनके बोल फूट रहे हैं.

और अब बात छोटेलाल खरवार की

रॉबर्ट्सगंज से पहली बार सांसद बने छोटेलाल ने भी पीएम मोदी को पत्र लिखकर पूरी यूपी सरकार को निशाने पर ले लिया है. छोटेलाल ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि न तो बीजेपी के बड़े नेता उनकी बात सुनते हैं और न ही प्रशासन उनकी बात का वजन लेता है. पहले उनके पत्र में लिखे शिकायती मुद्दों को देखिए-

1 – 2015 में जब प्रदेश में अखिलेश सरकार थी, उस समय नौगढ़ वन क्षेत्र में अवैध कब्जे की शिकायत पीएम समेत कई लोगों से की. लेकिन कार्रवाई की बजाय अधिकारियों ने मेरे घर को ही वन क्षेत्र में डाल दिया. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के आदेश पर दोबारा पैमाईश में सच सामने आया कि मेरा घर वनक्षेत्र में नहीं है.

छोटेलाल खरवार का लेटर.

2 – दूसरा मामला प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद का है. अक्टूबर 2017 में मेरे भाई ( क्षेत्र पंचायत नौगढ़ का प्रमुख ) के खिलाफ समाजवादी पार्टी की तरफ से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. इस पर वोटिंग के दौरान असलहों से लैस अपराधी किस्म के लोगों ने मेरे पर रिवॉल्वर तान दी, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर धमकी दी. उस समय अधिकारी भी मौजूद थे, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की. हमारी पार्टी के लोग भी इसमें शामिल थे.

विरोध की बुलंद आवाज उठाने वाले सांसद छोटे लाल खरवार की कहानी भी बेहद दिलचस्प है.

एक राज्य कई राज्यों से घिरा होता है. ये खूब सुना होगा मगर वो कौन सा जिला है जो सबसे ज्यादा राज्यों से घिरा है? इसका जवाब कम ही लोगों को मालूम होगा. जवाब है सोनभद्र. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार. यूपी का दूसरा सबसे बड़ा जिला सोनभद्र इन चारों राज्यों से घिरा हुआ है. यूपी का एक यही जिला है जहां आज भी कहा जा सकता है कि नक्सलियों की जड़ें जमी हुई हैं. अब नक्सली हैं तो जंगल भी होगा. जंगल है तो मंगल भी होगा. मंगल माने पेड़ों की अवैध कटाई. जंगल की जमीनों पर अवैध कब्जा. अब कब्जा होगा तो कोई नेता भी आएगा और कहेगा ये तो गलत है. तो ये नेता थे छोटेलाल खरवार. रॉबर्ट्सगंज के सांसद (सोनभद्र जिले की लोकसभा को रॉबर्ट्सगंज नाम से ही जाना जाता है). संसद में सवाल उठा दिए. बोले- हमारे क्षेत्र में वन रेंजर द्वारा जमीनों पर कब्जा करवाया जा रहा है. पेड़ों को अवैध तरीके से कटवाया जा रहा है. वगैरह…वगैरह.

छोटेलाल खरवार ने सबसे पहले फोड़ा था चिट्ठी बम.
छोटेलाल खरवार ने सबसे पहले फोड़ा था चिट्ठी बम.

अब यहीं से शुरू होता है इनका पहला आरोप. कहते हैं मैंने सवाल उठाया तो मेरे खिलाफ ही साजिश रच दी गई. मेरे ही घर को वन क्षेत्र में बता दिया गया. जी हां, हुआ तो कुछ ऐसा ही. मगर ये एंगल सांसद जी का है. स्थानीय पत्रकारों ने एक दूसरा एंगल भी बताया है. वो ये कि इनका मकान वनक्षेत्र की आरक्षित जमीन पर बना है. सो डीएफओ इन पर कार्रवाई करने की तैयारी कर रहे थे. इससे बचने के लिए, दबाव बनाने के लिए इन्होंने लोकसभा में सवाल उठा दिया. 2016 में इनकी बेटी की शादी थी तो ये वन भूमि पर सड़क बनवाने लगे. आरोप है कि सांसद निधि के पैसे से बिजली के पोल और ट्रांसफार्मर लगवा दिए. इस पर वन रेंजर ने बिजली विभाग के एक्सईएन के खिलाफ कार्रवाई की. साथ ही सड़क का काम रुकवा दिया. जांच के लिए वन विभाग और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम पहुंची तो इनका मकान वन क्षेत्र में पाया गया. मगर नेता थे, मामला टल गया.

10 मार्च 2018 को फिर एक बार इनकी जमीन की जांच के लिए टीम पहुंची. अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष के निर्देश पर. और इस बार न जाने क्या हुआ. धरती माता का भूगोल ही बदल गया होगा शायद. क्योंकि इस बार जांच में इनकी जमीन वन भूमि में नहीं पाई गई.

संसद में बात रखते छोटेलाल.
संसद में बात रखते छोटेलाल.

प्रधान से सीधा सांसद बन गए

अब थोड़ा सा सांसदजी का इतिहास बता दें. 15 सितंबर 1972 को इनका जन्म चंदौली के नौगढ़ इलाके के मगरही गांव में हुआ. एक गरीब परिवार में. पढ़ाई-लिखाई भी प्राइमरी लेवल तक कर पाए. मगर एक काम पकड़ लिया था. ढोलक बजाने का. गाने-बजाने वाली मंडलियों के साथ जाने लगे. फिर खुद भी गाने लगे. धीरे-धीरे करके क्षेत्र में मशहूर हो गए. भोजपुरी सिंगर के तौर पर. भोजपुरी फिल्मों में भी गाने लगे. राजनीति की बात करें तो 2005 में पहली बार प्रधानी का चुनाव लड़े. अपने ही गांव मगरही से. जीत गए. 2010 में फिर चुनाव हुआ. लड़े और लगातार दूसरी बार प्रधान बन गए. फिर बीजेपी में सक्रिय हो गए. किस्मत का सितारा भी खूब चमका. 2014 का चुनाव आया तो इन्हें प्रधानी से सीधे सांसदी की टिकट मिल गई. रॉबर्ट्सगंज से. मगर रहने वाले तो ये थे चंदौली के. तो यहां भी इनकी किस्मत चमक गई. काहे से नौगढ़ क्षेत्र का कुछ हिस्सा परिसीमन में रॉबर्ट्सगंज में आ गया था. सो यहां भी मामला नहीं अटका. फिर रॉबर्ट्सगंज आरक्षित सीट थी और ये भी आदिवासी समाज से आते थे, जिनकी रॉबर्ट्सगंज में अच्छी खासी तादाद है. सो ये भी प्लस पॉइंट रहा. आखिर में टिकट मिलने के लिए किसी बड़े नेता के आशीर्वाद की जरूरत होती है. सो स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, वो मिल गया तब के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से. सो टिकट हो गई पक्की. 2014 के चुनाव में जीत भी गए.

अब आते हैं इनके दूसरे विवाद पर. नौगढ़ से छोटेलाल के भाई जवाहिर सिंह ब्लॉक प्रमुखी का चुनाव जीते थे. 2017 में यूपी में सरकार बन चुकी थी. इसी बीच इनके भाई के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया. उसमें जवाहिर हार गए. सो छोटेलाल का आरोप है कि उनकी पार्टी के लोगों ने ही उनके भाई को हरवा दिया. साजिश रची. नई ब्लॉक प्रमुख बनीं नीतू सिंह. विवाद तब और बढ़ गया जब नीतू सिंह की एक फोटो चंदौली के सांसद महेंद्रनाथ पांडेय के साथ वायरल हो गई. फिर इस मामले को लेकर ये उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के पास पहुंचे, मगर जैसा कि इनका आरोप है. सुनवाई नहीं हुई. डांटकर भगा दिए गए सो अलग.

2 फरवरी 2018 को छोटेलाल एक बार फिर भड़क गए. सोनभद्र में एक कार्यक्रम में लोगों को साफ-सफाई, शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने को एक ह्यूमन चेन बनाने का कार्यक्रम था. जिला स्वच्छता मिशन मैनेजमेंट कमीशन द्वारा पोस्टर लगवाए गए थे. इसमें पीएम मोदी, सीएम योगी और प्रभारी मंत्री अर्चना पांडेय की तस्वीर थी. मगर स्थानीय सांसद छोटेलाल का नाम और तस्वीर गायब थी. इस पर छोटेलाल भड़क गए. और कई उदाहरण देते हुए कहा कि जिन जिलों में सवर्ण अधिकारी तैनात हैं, वो दलित विरोधी काम कर रहे हैं. मेरा नाम और फोटो न लगाना भी इसी सोच को दर्शाता है.

जब डिप्टी सीएम रॉबर्ट्सगंज पहुंचते हैं तो जिलाध्यक्ष बगल में बैठते हैं मगर सांसद छोटेलाल बगल में खड़े रहते हैं.
जब डिप्टी सीएम रॉबर्ट्सगंज पहुंचते हैं तो जिलाध्यक्ष बगल में बैठते हैं मगर सांसद छोटेलाल बगल में खड़े रहते हैं.

छोटेलाल एक बार और चर्चा में आए थे, जब उन्होंने खुलेआम पुलिसवालों को गालियां बकनी शुरू कर दी थीं. मामला तब का है जब उनके भाई ब्लॉक पंचायती का चुनाव हार गए थे. इसके बाद उन्होंने अपने साथ बदसलूकी का भी आरोप लगाया था. इसका वीडियो वायरल हो गया था.

अभी बीजेपी के बड़े नेता सावित्री बाई फुले और छोटेलाल खरवार को मना पाते, उससे पहले ही इटावा के दलित सांसद अशोक ने भी पीएम मोदी के नाम चिट्ठी लिख दी. दोहरे ने भी मोदी को पत्र लिखकर सीएम योगी और अन्य राज्यों में अपनी ही पार्टी की सरकारों पर एससी-एसटी के लोगों पर अत्याचार करने और झूठे मुकदमे में फंसाने का आरोप लगाया.

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कर्नाटक चुनावों में व्यस्त बीजेपी के बड़े नेता जब तक इनकी आवाज सुनने की कोशिश करते, पश्चिमी यूपी के नगीना से बीजेपी सांसद डॉ. यशवंत सिंह ने भी चिट्ठी लिख मारी. उन्होंने भी पीएम नरेंद्र मोदी से शिकायत की है कि कोर्ट में दलित समाज का कोई प्रतिनिधि नहीं है. इस वजह से ही अदालतें दलितों के खिलाफ फैसले दे रही हैं. उन्होंने दलितों के लिए आरक्षण बिल पास कराने की भी मांग की.

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लेटर में लिखा –

‘जब सांसद चुनकर आया था तब मैंने आपसे मिलकर प्रमोशन में आरक्षण के लिए बिल पास कराने का अनुरोध किया. संगठन के लोग भी यही चाहते हैं, लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी इस देश में करीब 30 करोड़ दलितों के लिए कोई बिल पेश नहीं हुआ.’

और बात अब भविष्य की

सियासी तौर पर देखें तो बीजेपी के लिए भविष्य में फिलहाल का बड़ा चुनाव कर्नाटक विधानसभा का चुनाव है. अगर उसे छोड़ दिया जाए, तो फिर 2019 का लोकसभा चुनाव सिर पर है. ऐसे में यूपी के इन चारों ही सांसदों के बगावती सुर ऐसे समय पर उभरे हैं, जब उनकी पार्टी पहले ही से तमाम झंझटों में घिरी हुई है. एससी-एसटी ऐक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रिव्यू अपील दायर करने में पहले ही देरी हो गई. इसका नतीजा भारत बंद के रूप में दिखा. विपक्ष को बैठे-बिठाए मौका अलल मिल गया. अलापने लगे दलित राग. तिस पर तुर्रा ये हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की एससी-एसटी ऐक्ट पर दायर की हुई रिव्यू पिटिशन भी खारिज कर दी.

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इस सबके बावजूद बीजेपी विपक्ष से लड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसके खुद के दलित सांसदों का वो क्या करे. देश को सबसे ज्यादा 80 सांसद देने वाले राज्य यूपी के सांसद ही बगावत पर उतर आएं तो मुश्किलें बढ़ जाती है. इन 80 में भी 17 सुरक्षित सीटें थीं और सारी ही सीटें बीजेपी के ही खाते में आई थीं. अब इन्हीं 17 में से चार सांसदों ने मोदी और योगी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे डैमेज कंट्रोल और मुश्किल होता दिख रहा है. आखिर अब बीजेपी किस मुंह से कह पाएगी कि वो दलितों के लिए बहुत काम कर रही है, जबकि उसके खुद के चार दलित सांसद अपनी पार्टी पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं. छोटेलाल खरवार तो पहले ही चेता चुके हैं कि अगर दलितों के खिलाफ ऐसे ही होता रहा तो सपा की तरह ही बीजेपी की भी हालत हो जाएगी और बीजेपी पांच सीटों पर सिमट जाएगी.

पीएम मोदी के लिए ये अच्छी खबर नहीं है.
पीएम मोदी के लिए ये अच्छी खबर नहीं है.

यूपी में मार्च में हुए फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव में बीजेपी पहले ही झटका खा चुकी है. झटका देने वाला गठबंधन माने सपा और बसपा का साथ बीजेपी के लिए और बड़ी टेंशन की बात है. इसके बाद दलितों के साथ ही दलित सांसदों का ये आक्रोश बीजेपी को बिल्कुल रास नहीं आएगा. और जब बात यूपी से निकली है तो और भी दूर तलक जाएगी. और इसे जाएगी से ज्यादा पहुंच गई है कहना मुनासिब है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि देश की राजधानी दिल्ली में भी एक सांसद ने अपनी पार्टी के खिलाफ बगावती आवाज उठा दी है. इनका नाम है डॉ. उदित राज, जो उत्तरी पश्चिमी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से बीजेपी के सांसद हैं. उन्होंने ट्वीट कर कहा-

‘दो अप्रैल को हुए आंदोलन में हिस्सा लेने वाले दलितों पर अत्याचार की खबरें मिल रही हैं. ये रुकनी चाहिए. दलितों को देश भर में प्रताड़ित किया जा रहा है, बाड़मेर, जालौर, जयपुर, ग्वालियर, मेरठ, बुलंदशहर, करौली और अन्य स्थानों के लोगों के साथ ऐसा हो रहा है. आरक्षण विरोधियों के साथ पुलिस भी उन लोगों को पीट रही है और फर्जी मामले लाद रही है.’

यूपी के चार सांसद और दिल्ली के एक सांसद कुल पांच सांसदों ने अपनी पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. गठबंधन के लिए सपा-बीएसपी एक साथ आ चुके हैं. राज्यसभा में हर जोड़-तोड़ के बाद बीजेपी ने बीएसपी के दलित प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर को हराकर अपना 9वां प्रत्याशी राज्यसभा में भेज दिया है. 2 अप्रैल को भारतबंद के दौरान हुई हिंसा के बाद पीएम मोदी ने अपने हर भाषण में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का नाम लिया ही है. 14 अप्रैल के आने में एक हफ्ते से भी कम का वक्त है और सबसे बड़ी बात लोकसभा चुनाव में बस एक साल का वक्त है. ऐसे में बीजेपी हर हाल में डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश में जुटी हुई है, लेकिन विरोध करने वाले बीजेपी के सांसदों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है. बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही होगी, जिसे वो जल्द से जल्द ठीक करना चाहेगी.


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‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.