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क्या तालिबान के साथ शांति समझौता करके अमेरिका ने अपनी हार मान ली है?

ईसा पूर्व 330 का साल. तुर्की, सीरिया, लेबनन, इज़रायल, मिस्र, इराक और ईरान. ये सब जीत चुका अलेक्जैंडर द ग्रेट अपनी सेना के साथ अफगानिस्तान की ओर बढ़ा. सिकंदर (हमारे यहां अलेक्जैंडर का लोकप्रिय नाम) की सेना फारस की ओर से अफगानिस्तान में घुसी. सिकंदर का अगला निशाना था हिंदु कुश पार हिंदुस्तान. मगर वो पार करने में सिकंदर को तीन बरस लग गए. वजह, अफगानिस्तान बहुत मुश्किल साबित हुआ सिकंदर के लिए. उसका मुकाबला वहां के कबीलों से था. जिनके मुकाबले सिकंदर की सेना हर पैमाने पर ज़्यादा मज़बूत थी. मगर एक चीज जो उन कबीलों के मुफ़ीद थी, वो थी-

लोकलनेस.

जिसके बारे में कभी मार्को पोले ने लिखा था-

यहां बहुत संकरे दर्रे हैं. कुदरती किले हैं. इनकी वजह से यहां के लोग हमलावरों से डरते नहीं. इनकी रहाइश की जगहें पहाड़ की चोटियों पर बनी हैं. ऐसी जगहों पर बसी हैं, जहां उन्हें कुदरती डिफेंस हासिल है.

बेहद खूनखराबे के बावजूद सिकंदर उन्हें अपने अधीन नहीं कर पाया. कुछ लोग कहते हैं, हिंदुस्तान न जीत पाने के पीछे एक वजह ये भी थी कि अफगानिस्तान ने उसे और उसकी सेना को ख़ूब थका दिया था.

सिकंदर अकेला नहीं था. अफगानिस्तान हमेशा से थकाता आया है. इसने हमलावरों को हमेशा ख़ुद में उलझाए रखा है. जो जीता भी, वो जीतकर निश्चिंत नहीं हो पाया. कुछ ने जीता और फिर गंवा बैठे. ये बात सिकंदर के वक़्त जितनी सही थी, उतनी ही अब भी जंचती है.

11 सितंबर, 2001. अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ. हमले के नौ रोज़ बाद अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ऐलान किया- वॉर अगेंस्ट टेरर. बुश ने कहा-

अल-कायदा की लीडरशिप का अफगानिस्तान में बहुत प्रभाव है. वहां के ज़्यादातर हिस्सों पर नियंत्रण बनाने के लिए ये तालिबान की सत्ता का समर्थन करता है. आतंकवाद के विरुद्ध हमारे जंग की शुरुआत अल-क़ायदा से शुरू होती है, मगर ये उस पर ख़त्म नहीं होगी. ये तब तक ख़त्म नहीं होगी, जब तक कि हर एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी समूह को खोज, रोक और हरा नहीं लिया जाता.

यही लक्ष्य दिखाकर 7 अक्टूबर, 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. इस हमले का नाम था- ऑपरेशन इन्ड्यूरिंग फ्रीडम. ये युद्ध अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे महंगा काउंटरटेररिज़म युद्ध साबित हुआ. जॉर्ज बुश ने इसे शुरू तो किया, मगर इसे पूरा करने की जगह इराक पर शिफ्ट हो गए. ओबामा बहुत चाहकर भी अपने दो कार्यकालों में इसे ख़त्म नहीं कर सके. अब ट्रंप कार्यकाल के आख़िरी साल ये जंग ख़त्म होती दिख रही है. 29 दिसंबर को अमेरिका और तालिबान के बीच ‘शांति समझौता’ हुआ. इस समझौते के मायने क्या हैं? इससे क्या उम्मीदें जगी हैं? अफगानिस्तान में आगे की राह क्या होगी? इस आर्टिकल में इन्हीं सवालों का जवाब देने की कोशिश की है हमने.

कब से हो रही थी बातचीत?
क़तर की राजधानी है दोहा. यहीं पर अमेरिका और तालिबान की बातचीत शुरू हुई. साल 2018 में. कुल नौ राउंड हुए बातचीत के. कई बार पटरी से उतरी. फिर शुरू हुई.

2019 में क्यों फेल रही थी वार्ता?
अगस्त 2019 में ख़बरें आईं. बताया गया कि अमेरिका और तालिबान डील पर सहमत होने ही वाले हैं. मगर सितंबर 2019 में एक ट्रेजडी हो गई. अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक कार धमाका हुआ. इसमें अमेरिका के एक सर्विसमैन की मौत हो गई. इससे नाराज़ ट्रंप ने वार्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दिया.

समझौते से पहले क्या शर्त रखी गई?
अमेरिका ने शर्त रखी. अगर तालिबान समझौता चाहता है, तो उसे हिंसा कम करने के प्रति गंभीरता दिखानी होगी. एक हफ़्ते का टाइमफ्रेम तय हुआ. ये हफ़्ता शुरू हुआ 21 फरवरी को. इस दौरान-

अमेरिका ऐंड फ्रेंड्स समेत अफगान फोर्सेज़ को अपनी कार्रवाइयां रोकनी थी.
तालिबान को किसी भी तरह की हिंसा में शामिल नहीं होना था.

ये हफ़्ता बीता. दोनों पक्षों ने अपने टारगेट पूरे गए. और इसका नतीजा था 29 फरवरी को दोहा में हुआ शांति समझौता.

इस ‘पीस अग्रीमेंट’ में क्या तय हुआ है?
1. अमेरिका और इसके सहयोगियों के विरुद्ध किसी शख्स या संगठन द्वारा अफगानिस्तान की ज़मीन के इस्तेमाल पर रोक
2. 14 महीने के भीतर समय सभी अमेरिकी (NATO समेत) फौजों के अफगानिस्तान से बाहर निकलने पर सहमति
3. अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत
4. स्थायी सीज़फायर.

विदेशी फोर्सेज़ के बाहर निकलने की शर्त में मियाद भी तय है. शुरुआती 135 दिनों में US अपनी सेना घटाकर 8,600 पर ले आएगा. अभी ये तादाद करीब 13 हज़ार है. इसी अनुपात में NATO फोर्सेज़ की भी मौजूदगी में कमी लाई जाएगी. आगे के साढ़े नौ महीने में अमेरिका और उसके सहयोगी देश अपनी बाकी की सेना भी अफगानिस्तान से वापस बुला लेंगे.

किस शर्त पर पेच फंस गया है?
तालिबान के करीब 15,000 लड़ाके हैं अफगान सरकार की कैद में. US-तालिबान डील के मुताबिक, इनमें से 5,000 को 10 मार्च तक रिहा किया जाएगा. इसी तारीख़ से अफगान सरकार और तालिबान के बीच इंट्रा-अफगानिस्तान बातचीत शुरू होनी है. मतलब, ये वार्ता शुरू होने की शर्त है. समझौते में लिखा है- द यूनाइटेड स्टेट्स कमिट्स टू कंप्लिटिंग दिस गोल. मतलब अमेरिका ने कमिटमेंट दी है. मगर 1 मार्च को अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी का इनकार आया. उन्होंने कहा-

तालिबानी कैदियों की रिहाई को लेकर हमारा कोई कमिटमेंट नहीं है. ऐसा करने का आग्रह किया गया था. हम तालिबान के साथ होने वाली वार्ता में इस संभावना पर बात कर सकते हैं. मगर वार्ता शुरू करने के लिए ये शर्त नहीं रखी जा सकती. तालिबानी कैदियों को कब रिहा किया जाएगा, ये हम तय करेंगे. अमेरिका नहीं.

इस शर्त पर डेमोक्रैटिक पार्टी भी सवाल उठा रही है. वो कह रहे हैं कि सेक्रटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पिओ ने उन्हें गुमराह किया. इन आरोपों के मुताबिक, उन्हें बताया गया था कि कैदियों को रिहा करने वाली बात अमेरिका-तालिबान डील का हिस्सा नहीं होगी.

क्या अफ़गानिस्तान से पूरी तरह निकल जाएगा अमेरिका?
डॉनल्ड ट्रंप ने दिल्ली की अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था-

वहां हमारे इंटेलिजेंस (खुफिया विभाग) की हमेशा मौजूदगी रहेगी. वी विल हैव अदर थिंग्स देअर.

मतलब, समझौता हो जाने के बाद भी अफगानिस्तान में अमेरिकी की ज़ीरो उपस्थिति की संभावना नहीं लगती. इसके पीछे का सबक अफगानिस्तान में की गई अमेरिका की पुरानी ग़लतियां हैं. अफगानिस्तान में सोवियत की लड़ाई ख़त्म हो जाने के अमेरिका वहां से निकल आया. उस दौर में वाइट हाउस की कोई अफगान पॉलिसी भी नहीं थी. जनवरी 1989 में काबुल स्थित अमेरिकी दूतावास के बंद हो जाने के बाद अफगानिस्तान में CIA का कोई स्टेशन भी नहीं था. जिसकी मदद से तालिबान या फिर उसके ताकतवर होने से जुड़ी इंटेलिजेंस जमा की जा सके. कुछ एजेंट्स ज़रूर थे उसके अफगानिस्तान में, मगर उनका ब्रीफ अलग था. ऐसे में अमेरिका को भनक भी नहीं लगी कि तालिबान कैसे ख़ुद को अहमद शाह मसूद के मुकाबले खड़ा कर रहा है. अमेरिका ये ग़लती नहीं दोहराना चाहता.

भारत का क्या स्टैंड है?
भारत ने आधिकारिक तौर पर तालिबान को मान्यता ही नहीं दी कभी. न ही उसने कभी तालिबान को वैध राजनैतिक पक्ष माना. तालिबान के ऊपर पाकिस्तान का प्रभाव है. उसे वार्ता के लिए राज़ी करना, वार्ती की मेज पर लाने के लिए पाकिस्तान के प्रभाव की ज़रूरत थी. इसी प्रभाव का इस्तेमाल कर पाकिस्तान ने अमेरिका की अफगान पॉलिसी में अपनी ज़रूरत बनाए रखी. इस ज़रूरत की वजह से आतंकवाद को सपोर्ट करने जैसे आधार पर पाकिस्तान के ऊपर जितनी सख़्ती दिखाई जानी चाहिए, उतनी नहीं दिखाता अमेरिका. ये बात भारत के हित में नहीं जाती. ऐसे में ऐसे समझौते तालिबान को मान्यता देते हैं. उसे राजनैतिक और अंतरराष्ट्रीय वैधता देते हैं. ये बात पाकिस्तान के भी हाथ मज़बूत करती है. ये स्थिति भारत के लिए घरेलू, क्षेत्रीय और अफगानिस्तान-स्पेसिफिक, तीनों तरह से नुकसान की बात है. ऐसे में भारत का मानना है कि अफगानिस्तान को लेकर किसी भी तरह का हल अफगान सरकार के नेतृत्व में ही निकाला जाना चाहिए. इसीलिए भारत की अफगान नीति के मुख्य पॉइंट्स हैं-

– अफगान सरकार के नेतृत्व में
– अफगान सरकार के द्वारा
-अफगान सरकार के नियंत्रण में

दो साल पहले जब अमेरिका और तालिबान के बीच वार्ता शुरू हुई, तो अफगान सरकार की इसमें कोई प्राथमिक भूमिका नहीं था. वार्ता के दोनों प्रमुख पक्षों में वो नहीं था. उसकी भूमिका इस समझौते के बाद शुरू होनी थी. तब, जब आगे के भविष्य को लेकर उसकी तालिबान से वार्ता होती. ये स्थिति तालिबान को अफगान सरकार की बराबरी में रखती है. ऐसे में अपनी आपत्तियों के आधार पर भारत ने ख़ुद को इससे अलग रखा. मगर अब इस पीस डील के साथ तालिबान बड़ा प्लेयर बन गया है. भारत अगर अफगानिस्तान में अपने हितों की परवाह करता है, तो उसे बदली स्थितियों के साथ इन्गेज होना पड़ेगा.

ट्रंप के लिए इस समझौते की अहमियत?
तालिबान के साथ बातचीत पर अमेरिका में आम सहमति नहीं थी. ट्रंप की अपनी टीम भी इसपर बंटी हुई थी. यहां तक कि ट्रंप के NSA जॉन बॉल्टन ने भी इसी असहमति पर इस्तीफ़ा दे दिया. एक बड़े धड़े का मानना था कि तालिबान के साथ टेबल पर बैठना, अमेरिकी उसूलों के खिलाफ है.

ऊपर से वार्ता के पहले चरण से अफगान सरकार को अलग रखने पर भी गंभीर सवाल उठे. मगर ट्रंप इस वार्ता को सफल बनाना चाहते थे. नवंबर 2020 में चुनाव हैं. ये शांति समझौता कर लेना ट्रंप को बूस्ट दे सकता है. वो कह सकते हैं कि उन्होंने 19 सालों से चली आ रही ये जंग ख़त्म की. अमेरिकी सैनिकों को वापस ले आए. लेकिन अगर ट्रंप हार जाते हैं, तो क्या होगा? डेमोक्रैटिक पार्टी की सरकार का क्या स्टैंड रहेगा? इसका कोई ठोस जवाब नहीं दिया जा सकता अभी. क्योंकि अभी ऑफिशल कैंडिडेट का नॉमिनेशन नहीं हुआ है. बर्नी सैंडर्स और जोसफ बाइडन जैसे मुख्य उम्मीदवारों की राय अलग-अलग है.

क्या ये समझौता अमेरिका की हार है?
अफगानिस्तान का एक विशेषण है- द ग्रेवयार्ड ऑफ सुपरपावर्स. ब्रिटेन भी यहां लड़ने घुसा था. 1919 में उसे अपना दावा छोड़ना पड़ा. ये शायद ब्रिटिश साम्राज्य के सिकुड़ने के शुरुआती लक्षणों में से था. सोवियत ने इसे जीतने की कोशिश की. मगर उसे भी यहां से निकलना पड़ा. सोवियत को इस गेम में हराने के बाद अमेरिका को लगा, उसके लिए यहां कुछ नहीं बचा. वो अफगानिस्तान में अराजकता पीछे छोड़कर चलता बना. इस दौर में अफगानिस्तान के अंदर ढेर सारे मिलिशिया थे. जो एक-दूसरे से लड़ते थे. इसी अराजकता और हिंसा के बीच 1994 में सामने आया तालिबान. 1996 में सूडान से भगाए गए ओसामा बिन लादेन ने यहां एंट्री की. 2011 में ओसामा मारा गया. मगर अमेरिका की लड़ाई ख़त्म नहीं हुई. वो तालिबान से लड़ रहा था. अब उसी तालिबान से उसने आमने-सामने बैठकर डील की है. तालिबान की हमेशा से मांग थी कि डीलिंग उसके और अमेरिका के बीच हो. वो अफगान सरकार की शुरुआती भूमिका नहीं चाहता था. अमेरिका ने ऐसा ही किया. एक बार फिर वो अफगानिस्तान को अधर में छोड़कर निकल रहा है.

अफगान सरकार की आपत्तियां?
सवाल अफगानिस्तान का है. अफगान सरकार के भविष्य का है. और, अमेरिका-तालिबान की बातचीत से उसी को अलग रखा गया. अशरफ गनी शुरुआत से ही इस डील को लेकर सशंकित और नाराज़ रहे हैं. म्यूनिख सिक्यॉरिटी कॉन्फ्रेंस में भी उन्होंने कहा था. कि उन्हें इस डील के दूसरे चरण, यानी अफगान सरकार और तालिबान की वार्ता पर बहुत भरोसा नहीं है. यही वजह है कि दोहा के प्रोग्राम में भी अशरफ गनी नहीं पहुंचे. अमेरिका और NATO अभी आश्वासन दे रहे हैं. कि जब तक तालिबान और अफगान सरकार के बीच समझौता नहीं होता, वो नहीं जाएंगे. मगर अफगान सरकार फिर भी सशंकित है. ट्रंप वैसे भी बहुत अप्रत्याशित लीडर हैं. ये डर भी है कि एक दिन वो अचानक पूरी तरह निकल जाने का फैसला कर सकते हैं. अफगान सरकार आर्थिक और सैन्य, हर तरह से अमेरिका पर निर्भर है. अगर अमेरिका चला गया. और तालिबान-अफगान सरकार के बीच कोई आम राय नहीं बन पाई. तो शायद तालिबान का काबुल पर भी कब्जा हो जाए. शायद वो पूरे अफगानिस्तान में सत्ता बना ले अपनी.

चिंताएं क्या हैं?
1. सितंबर 2019 में अफगानिस्तान के अंदर राष्ट्रपति चुनाव हुए. ख़ूब हिंसा हुई. वोटिंग के पांच महीने बाद जाकर नतीजा आया. चुनाव की निष्पक्षता को लेकर गंभीर शंका है. ऐसे में अशरफ़ ग़नी की सरकार को वैसी वैधता नहीं मिलती, जैसी जनता के हाथों चुनी हुई किसी लोकतांत्रिक सरकार को मिलती है. ये स्थिति अशरफ ग़नी की स्थिति कमज़ोर करती है. तालिबान के साथ सीधी डील करके अमेरिका ने पहले ही अफगान सरकार को कमज़ोर किया है.

2. क्या तालिबान अपनी कमिटमेंट निभाएगा? क्या शांति बहाल रहेगी? या अमेरिका का निकलना एक बार फिर तालिबान के हाथ मज़बूत करेगा?

3. अफगान सरकार पूरी तरह से अमेरिका और उसके सहयोगियों की आर्थिक और सैन्य सहायता पर निर्भर है. अमेरिका और NATO फोर्सेज़ के निकल जाने के बाद भी क्या ये मदद जारी रहेगी? अगर नहीं, तो अफगान सरकार कैसे सर्वाइव करेगी?

4. अफगानिस्तान में ISIS की भी मौजूदगी है. तालिबान और ISIS के बीच काफी होड़ है. क्या नई परिस्थितियों में ISIS जैसे आतंकी नेटवर्क और हावी हो जाएंगे?

5. अफगानिस्तान का राजनैतिक भविष्य क्या होगा? अभी लगभग आधा अफगानिस्तान तालिबान के कब्ज़े में है. क्या अफगानिस्तान को तालिबान और अफगान सरकार के बीच बांट दिया जाएगा? क्या तालिबान के कब्ज़े वाले हिस्से उसके कब्ज़े में बने रहेंगे? क्या अफगान सरकार और तालिबान के बीच वार्ता में कोई बीच की राह निकल सकती है? क्या कोई बीच की राह है भी?

6. प्रो-तालिबान पॉलिसी वाले पाकिस्तान की क्या भूमिका होगी अफगानिस्तान में? क्या पाकिस्तान और उसकी ज़मीन से चल रहे आतंकी संगठन अफगानिस्तान में शांति बहाल होने देंगे?

7. क्या तालिबान को मेनस्ट्रीम करना, अफगानिस्तान के लोगों के लिए नई मुश्किलें पैदा नहीं करेगा?

8. क्या लड़ाई से तंग होकर अमेरिका हड़बड़ी में निकल रहा है? क्या इस चक्कर में वो अफगानिस्तान के भविष्य को दांव पर लगा रहा है?

9. समझौते की अहम शर्त है तालिबान का अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों से रिश्ता तोड़ना? मगर इसकी गारंटी कौन तय करेगा?

10. क्या तालिबान के हिंसक और क्रूर तौर-तरीके, उसका कट्टरपंथ आंखें मूंदने लायक हैं? क्या उसने मानवाधिकार बहाल करने को लेकर कोई गारंटी दी है? क्या वो अपने अमानवीय तौर-तरीकों को बदलेगा?

करीब 41-42 साल से अफगानिस्तान में तकरीबन लगातार ही संघर्ष बना हुआ है. पहले, सोवियत और अमेरिका की होड़ के दौरान. फिर 1989 के बाद का दौर. फिर 2001 में अमेरिका का हमला. अरबों रुपये का फंड मिलने के बाद भी वो बदहाल है. बुनियादी ढांचा तक मुकम्मल नहीं. ऊपर से भ्रष्टाचार. मगर ऐसे ज़रूरी मसले भी अफगानिस्तान में सेंकेडरी पड़ जाते हैं. उसे सबसे पहले तो शांति चाहिए. मगर क्या ये हो सकेगा? या नवंबर 2020 में होने वाले अमेरिकी चुनावों के मद्देनज़र बस किसी प्रॉप की तरह डील की गई है? क्योंकि फिलहाल तो इस डील में स्थायी समाधान नहीं दिख रहा.


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