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21,500 करोड़ रुपए में भारत सेना के लिए अमेरिका से क्या साजो-सामान खरीद रहा है?

36 घंटे की अपनी भारत यात्रा के शुरुआती घंटों में ही डॉनल्ड ट्रंप ने एक बड़ा ऐलान किया. कहा, अमेरिका और भारत 3 अरब डॉलर (भारतीय मुद्रा में करीब 21,568 करोड़ रुपये) के रक्षा सौदों पर दस्तखत करेंगे. ‘सरदार पटेल स्टेडियम’ में करीब एक लाख की भीड़ के आगे ट्रंप ने कहा-

हम दुनिया में अब तक बनाए गए सबसे बेहतरीन हथियार बनाते हैं. एयरप्लेन. मिसाइल. रॉकेट्स. जहाज. ये सब हम सबसे बेहतरीन बनाते है और अब हम भारत के साथ कारोबार कर रहे हैं. इनमें अति-विकसित एयर डिफेंस सिस्टम और आर्म्ड-अनआर्म्ड हवाई उपकरण (बहुत मुमकिन है ड्रोन्स की बात हो रही है) भी शामिल हैं.

इस आर्म्स डील की खास बातें क्या हैं, दोनों देशों के बीच डिफेंस फील्ड का अतीत क्या है, इस आर्टिकल में हम आपको यही सब बता रहे हैं.

कोल्ड वॉर पीरियड
ये गुटबाजी का दौर था. कम्यूनिस्ट सोवियत और पूंजीवादी अमेरिका के बीच. भारत ने सैद्धांतिक तौर पर किसी भी गुट से अलग, यानी गुटनिरपेक्ष रहने का फैसला किया. मगर इन सिद्धांतों से परे भारत के सामने एक तनावग्रस्त सीमा की चुनौती थी. पाकिस्तान और चीन, दोनों की तरफ से. ऐसे में हमें ज़रूरत थी हथियारों की. इसकी खरीद के लिए भारत करीब-करीब पूरी तरह से सोवियत पर निर्भर था. सोवियत के मुकाबले अमेरिका ने चुना पाकिस्तान को.

1971 की लड़ाई में पाकिस्तान का साथ देते हुए अमेरिका ने अपनी सातवीं फ्लीट का एक हिस्सा भेज दिया था भारत के मुकाबले. टास्क फोर्स 74 को बंगाल की खाड़ी में भेज दिया गया था. इस फोर्स के सेंटर में थे एयरक्राफ्ट करियर USS एंटरप्राइज. इसके साथ नौ जहाज भी थे, जिनमें न्यूक्लियर अटैक सबमरीन भी शामिल था. हालांकि ये भी माना जाता है कि शायद ये फोर्स हमला करने के इरादे से नहीं भेजा गया था. इसका मकसद था सोवियत पर दबाव बनाना, ताकि वो भारत को युद्ध ख़त्म करने के लिए तैयार करे. कहते हैं कि सोवियत के एक नौसेना टास्क फोर्स ने इस अमेरिकी टास्क फोर्स 74 का पीछा भी किया था. सोवियत के फोर्स में एक क्रूज़र, एक डेस्ट्रॉयर और दो अटैक सबमरीन्स शामिल थे.

क्लिंटन से आगे…
मगर ये सब अतीत है. सोवियत के विघटन के साथ कोल्ड वॉर ख़त्म हुआ. फरवरी 1978 में हुए जिमी कार्टर के भारत दौरे के ठीक 22 बरस, दो महीने बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत दौरे पर आए. साल था 2000. भारत अब न्यूक्लियर स्टेट था. परमाणु परीक्षण के एवज में लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत-अमेरिका के रिश्ते सुधर रहे थे. क्लिंटन ने 1999 के कारगिल युद्ध में भी भारत का साथ दिया था. ये पहली बार था जब पाकिस्तान के मुकाबले अमेरिका ने भारत की सुनी थी.

बुश, न्यूक्लियर डील और ओबामा की दो भारत यात्राएं
जॉर्ज बुश इस रिश्ते को और आगे ले गए. उनके कार्यकाल का हाई पॉइंट था सितंबर 2008 में भारत के साथ की हुई न्यूक्लियर डील. उनके बाद आए ओबामा. जो आठ साल के अपने कार्यकाल में दो बार भारत की आधिकारिक यात्रा पर पहुंचे. पहली बार, 2010 में. राष्ट्रपति बनने के एक साल बाद. उन्होंने 26/11 के हमले में भारत के साथ एकजुटता जताई. ओबामा ने UN सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के भारत के दावे का समर्थन किया. साथ ही, 5 बिलियन डॉलर कीमत के अमेरिकी सैन्य उपकरण भारत को बेचने का भी ऐलान किया. इनमें 10 बोइंग C-17 मिलिटरी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और 100 जनरल इलेक्ट्रिक F-414 फाइटर एयरक्राफ्ट शामिल थे. दूसरी बार ओबामा आए 2015 में. बिल क्लिंटन से लेकर ओबामा के कार्यकाल तक अमेरिका में भारत के लिए माहौल बदला. भारत पर भरोसा बढ़ा. भारत को अत्याधुनिक हथियार बेचने और भारत से तकनीक साझा करने को लेकर भी अमेरिका में स्वीकृति बढ़ी.

हथियार सौदों में इजाफा
न्यूक्लियर डील के बाद से भारत की अमेरिका से होने वाली हथियार खरीद लगातार बढ़ती गई है. स्टॉकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के मुताबिक, 2013 से 2017 के बीच भारत की अमेरिका से हथियार की खरीद में 557 फीसद का इजाफा हुआ है. ‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 से लेकर अब तक भारत लगभग 1,700 करोड़ रुपये की रक्षा खरीद कर चुका है अमेरिका के साथ. 2008 में अमेरिका से हमारी डिफेंस हार्डवेयर की खरीद जहां शून्य पर थी, वो 2019 में 18 बिलियन डॉलर पर पहुंच गई. महज 11 सालों में. सितंबर 2018 में भारत और अमेरिका के बीच हुए एक सुरक्षा समझौता के बाद हाई-टेक अमेरिकी हथियार भारत को बेचे जाने की राह खुली. इसमें तय हुआ कि अमेरिका भारत के साथ संवेदनशील टेक्नॉलजी भी साझा करेगा. इसी का नतीजा है कि अब ड्रोन्स की खरीद को लेकर भारत-अमेरिका में बातचीत हो रही है.

मौजूदा आर्म्स डील के खास पॉइंट्स-

 

1. 24 MH-60 रोमियो सीहॉक हेलिकॉप्टर्स- ये भारतीय नौसेना के लिए खरीदा गया है. खरीद हुई है Lockheed Martin Corporation से. ये एक अमेरिकी एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनी है. 24 MH-60 R ऐंटी-सबमरीन वॉरफेयर हेलिकॉप्टर्स हैं. भारतीय नौसेना को इनसे सबसे बड़ी मदद मिलेगी हिंद महासागर में. जहां चीन लगातार ख़ुद को स्थापित कर रहा है. कई बार भारतीय समुद्रीय सीमा में भी उनकी घुसपैठ होती है.

2. छह AH-64E अपाचे हेलिकॉप्टर्स- ये ऐंटी-टैंक हेलिकॉप्टर्स हैं, जिन्हें बनाता है बोइंग. भारत पहले ही वायु सेना के लिए 22 अपाचे हेलिकॉप्टर्स खरीद चुका है. इनमें से कुछ फ्लीट में शामिल भी किए जा चुके हैं. अब ये जो डील होनी है, ये एक तरह से फॉलो-ऑन डील है. फॉलो-ऑन डील में ऑरिजनल डील की तरह लंबा-चौड़ा समय नहीं लगता. इस डील के मार्फत इंडियन आर्मी के लिए छह हेलिकॉप्टर्स खरीदे जाने हैं.

और किन अहम रक्षा सौदों पर बात चल रही है-

1. आर्म्ड-अनआर्म्ड एरियल व्हिकल्स- इसका ज़िक्र ट्रंप ने 24 फरवरी को ‘सरदार पटेल स्टेडियम’ में दिए गए अपने भाषण में किया था. ये शायद उसी तरह के ड्रोन्स हैं, जिनका इस्तेमाल अमेरिका अफगानिस्तान में करता आया है. भारत बहुत समय से ये खरीदना चाहता था. इसके पीछे सबसे बड़ी ज़रूरत सीमा की निगरानी करना है. चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल से लगी एक लंबी सीमा है भारत की. कई जगहों पर ये सीमा दुरुह है. इसकी निगरानी करना, घुसपैठ पर नज़र रखना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में ये ड्रोन्स भारत के लिए काफी मददगार होंगे.

2. इंटिग्रेटेड एयर डिफेंस वीपन सिस्टम (IADWS)-  अमेरिका इसके लिए मंजूरी भी दे चुका है. ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस को बताया था कि वो भारत को IADWS बेचना चाहता है. नोटिफिकेशन के मुताबिक, भारत ने पांच AN/MPQ-64Fl सेंटिनल रेडार सिस्टम्स, 118 AMRAAM AIM-120C-7/C-8 मिसाइल्स, तीन AMRAAM गाइंडेंस सेक्शन्स, चार AMRAAM कंट्रोल सेक्शन्स और 134 स्टिंगर FIM-92L मिसाइल्स खरीदने का आग्रह किया था. ये वही IADWS है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका वॉशिंगटन DC की सुरक्षा के लिए करता है. और ये जो AMRAAM मिसाइल है, इसका इस्तेमाल बालाकोट हमले के अगले दिन पाकिस्तान ने किया था. उसने F 16 से AMRAAM चलाई थी.

जाते-जाते

एक वक़्त हम हथियारों की खरीद के लिए पूरी तरह रूस पर निर्भर थे. फिर इजरायल से भी हथियार खरीदने लगे. फिर अमेरिका से आर्म्स डील बढ़ता गया. फ्रांस जैसे पार्टनर्स भी आए, जिनसे हमने रफेल खरीदा. मगर इस सबके बावजूद भारत ने रूस से हथियार खरीदना बंद नहीं किया. तब भी नहीं, जब अमेरिका रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए. इन सेक्शन्स में ख़तरा ये था कि रूस के साथ डील करने वाले देशों पर भी प्रतिबंध लग सकता था. मगर इसके बावजूद बीते दिनों में भारत और रूस के बीच तकरीबन 10 बिलियर डॉलर की आर्म्स डील हुई. इनमें 5.4 बिलियन डॉलर की डील भी शामिल थी, जिसके तहत S400 एयर डिफेंस मिसाइलें खरीदी जानी हैं. इनकी डिलिवरी 2020 के बाद शुरू होनी है.

ख़बर आई कि अमेरिका ये डील ख़त्म करने को लेकर भारत पर दबाव बना रहा है. मगर भारत नहीं माना. मगर दोनों देशों को भुगतान में बड़ी दिक्कत आ रही थी. ये जोखिम भी था कि अगर रूस के साथ बिजनस करो, तो अमेरिका आप पर भी प्रतिबंध लाद देगा. ऐसे में 2019 में ख़बर आई कि भारत और रूस, दोनों भुगतान के लिए नए तरीके को लेकर सहमत हो गए हैं. रूस की मुद्रा है रुबल. भारत की रुपया. तो तय हुआ कि इन्हीं दोनों में भुगतान होगा. मतलब भारत रूस से थोड़ा छिटका तो है. मगर हम रूस को छोड़ नहीं रहे हैं. अमेरिका से अपनी बढ़ती नजदीकियों और कारोबार के बावजूद.


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