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'नमस्ते ट्रंप' की टाइमिंग में ख़ास बात क्या है?

28 जनवरी, 2020.

न्यू यॉर्क टाइम्स की एक ख़बर का पहला पैराग्राफ. लिखा है-

धूप का चश्मा पहने रहस्यमय लोगों ने ताज महल खंगाल दिया है. रैली की जगहों और प्रेजिडेंशल सूइस्ट्स की तलाश जारी है. दोनों देशों के अधिकारी बहुत तेजी से तैयारियों में जुटे हैं. इन तैयारियों में उस व्यापर समझौते पर हो रही आख़िरी चरण की बातचीत भी शामिल है, जिसका लोगों को काफी इंतज़ार है.

ये ख़बर थी अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के भारत दौरे से पहले हो रही तैयारियों की. इन तैयारियों ने पिछले दिनों दोनों देशों में कई हेडलाइन्स बनाईं. 24 फरवरी, यानी आज का दिन उन तैयारियों के श्रीफल का दिन है. बतौर राष्ट्रपति ट्रंप अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर भारत पहुंच चुके हैं. उनका पहला स्टॉप- अहमदाबाद. यहां सबसे पहले वो पहुंचे साबरमती आश्रम. इसके बाद मोटेरा स्टेडियम, जिसका उन्हें उद्घाटन करना है. अहमदाबाद के बाद ट्रंप की मेजबानी करेगा आगरा. यहां ट्रंप और मेलानिया को ताज महल देखना है. आगरा के बाद ट्रंप पहुंचेंगे राजधानी दिल्ली. ये भारत में उनका आख़िरी ठिकाना होगा. यहीं से उनकी वापसी होनी है.

 

ट्रंप से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा अपने 10 बरस के कार्यकाल में दो बार भारत आए- 2010 और 2015 में. उनसे पहले के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश 2006 में और उससे पहले बिल क्लिंटन साल 2000 में भारत आए थे. वो वाजपेयी का कार्यकाल था. बिल के साथ आईं उनकी बेटी चेल्सिया क्लिंटन की राजस्थान में होली खेलती तस्वीरें तब सोशल मीडिया के न होने पर भी काफी शेयर हुई थीं. कुल मिलाकर, अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे पर अलग तरह की उत्सुकता होती है. इस उत्सुकता और यूफोरिया के पीछे और भी कई वजहें हैं. कुछ, सरकार के स्तर पर. कुछ, व्यापार, डिफेंस और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्तर पर. ट्रंप की इस यात्रा से जुड़े अहम पहलू इस ख़बर में हम आपको बता रहे हैं.

इस विजिट की टाइमिंग

ट्रंप के लिए-

‘वन्स अपन अ टाइम इन हॉलिवुड’ के लिए ब्रैड पिट को ‘बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्टर’ का ऑस्कर मिला. अपने भाषण में ब्रैड पिट ने जॉन बोल्टन का ज़िक्र किया, जो कि ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे. ब्रैड पिट की कही ये बात अमेरिका के हालिया हॉट टॉपिक ‘ट्रंप इम्पिचमेंट’ का हिस्सा है. डॉनल्ड ट्रंप पर महाभियोग मामले से बरी हो गए हैं. बरी किया अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन ‘सेनेट’ ने, जहां ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी बहुमत में है. ट्रायल की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं. इसी संदर्भ में ब्रैड पिट ने जॉन बोल्टन का ताना मारा था. जॉन असल में इस इम्पिचमेंट प्रोसेस में अपना बयान देना चाहते थे. उनका कहना था, उनके पास इस मामले से जुड़ी ज़रूरी जानकारियां हैं. मगर सेनेट ने उन्हें बुलाया नहीं. अमेरिकी मीडिया का एक प्रभावी हिस्सा कह रहा है कि ट्रंप ने इम्पिचमेंट प्रक्रिया को लेकर चल रही इन बातों का रुख बदलने के लिए ही भारत यात्रा की अपनी टाइमिंग चुनी है.

मोदी के लिए-

दो बड़ी बातें, जिनकी वजह से पिछले दिनों मोदी सरकार की दुनिया के कई प्रभावी हिस्सों में नेगेटिव छवि बनी. एक, कश्मीर में लॉकडाउन. दूसरा, संशोधित नागरिकता कानून (CAA). देश के कई हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शन, जो कहीं-कहीं हिंसक भी हुए, सुर्खियों में रहे. ऐसे में मोदी सरकार को उम्मीद होगी कि ट्रंप की ये भारत यात्रा उनके लिए एक पुरजोर स्वीकार्यता का काम करेगी. देश और विदेश, सारे मंचों पर.

गुजरात क्यों अहम है?

अमेरिकन कम्यूनिटी सर्वे, 2017 के मुताबिक, भारतीय मूल के लगभग 40 लाख अमेरिकी हैं US में. यानी, कुल आबादी का करीब 1.3 फीसद. इनमें भी तकरीबन 20 फीसद गुजराती मूल के हैं. ये अमेरिका की एक मज़बूत लॉबी है. वहां गुजराती आबादी की बसाहट के मुख्य ठिकाने हैं- न्यू यॉर्क, न्यू जर्सी, शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, लॉस ऐन्जेलेस, वॉशिंगटन और फिलाडेल्फिया. कारोबार, विज्ञान से लेकर पावर कॉरिडोर तक. सोचिए, अमेरिका के करीब 40 फीसद मोटेल्स गुजराती चलाते हैं. मोदी ख़ुद भी गुजरात के हैं. विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदाय के बीच लोकप्रिय माने जाते हैं. 2020 के आख़िर में अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव होना है. डॉनल्ड ट्रंप दूसरा कार्यकाल चाहते हैं. ऐसे में एक तो गुजराती समुदाय, दूसरा समूचे इंडियन-अमेरिकन्स, ट्रंप इन वोटरों को अपनी तरफ रिझाना चाहेंगे. उनकी इस भारत यात्रा के पीछे एक मकसद ये भी बताया जा रहा है.

अमेरिका में ‘हाउडी मोदी’. भारत में ‘नमस्ते ट्रंप’

सितंबर 2019. मोदी गए अमेरिका. वहां यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली के सत्र में शामिल होने. इसी यात्रा के दौरान मोदी पहुंचे हॉस्टन. यहां NRG स्टेडियम. मंच पर नज़र आए मोदी और ट्रंप. हाथ में हाथ डाले. दोनों ने वहां मौजूद करीब 50,000 इंडियन्स-अमेरिकन्स को संबोधित किया. ‘Howdy, Modi’ इसी कार्यक्रम का नाम था.

इस प्रोग्राम के बारे में कहा गया कि 2020 में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के मद्देनज़र US में रह रहे लगभग 40 लाख इंडियन-अमेरिकन्स को ट्रंप के पक्ष में ले जाने की एक कोशिश थी ये. कहा जा रहा है कि इमिग्रेशन पर ट्रंप के सख़्त रवैये के कारण वहां रहने वाले भारतीय रिपब्लिकन पार्टी से छिटके हैं. इसकी बड़ी वजह ये है कि ट्रंप की इमिग्रेशन पॉलिसी ने सिलिकन वैली जैसे व्यावसायिक अड्डों पर बहुत असर डाला है. क्योंकि वहां का कामकाज बड़े स्तर पर H-1B वीज़ा लेकर अमेरिका आने वाले भारतीयों पर निर्भर करता है. 2016 के US प्रेजिडेंशल इलेक्शन में भी इंडियन-अमेरिकन्स का एक बड़ा हिस्सा डेमोक्रैटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलरी क्लिंटन के साथ गया था. ऐसे में ‘नमस्ते लंदन’ के पीछे एक मकसद उन इंडियन-अमेरिकन्स को ट्रंप की ओर मोड़ना भी हो सकता है.

ट्रंप की इस यात्रा से चीन फ्रंट पर क्या उम्मीदें हैं?

चीन से दो स्तरों पर चुनौती मिल रही है. पहला, सामरिक. दूसरा, व्यापार.

पहले सामरिक पक्ष

नवंबर 2019 में दोनों देशों ने पहली बार ज़मीन, समंदर और हवा, तीनों तरह का साझा सैनिक अभ्यास किया. नौ दिनों तक 500 अमेरिकी मरीन्स और नौसैनिक लगभग 1,200 भारतीय सैनिकों, नौसैनिकों और एयर फोर्स के अधिकारियों के साथ अभ्यास करते रहे. 2018 में दोनों देशों ने एक रक्षा समझौता किया था. इसमें अत्याधुनिक हथियारों और दूरसंचार माध्यमों के ट्रांसफर को लेकर भी करार हुआ था. इनके पीछे दोनों की म्यूचुअल चिंता है चीन.

भारत के साथ नजदीकी सामरिक रिश्ते बढ़ाने की अमेरिकी विदेश नीति ट्रंप की शुरू की हुई नहीं है. जॉर्ज बुश और उनके बाद बराक ओबामा के प्रशासन में अमेरिका ऐसा करता दिखा. इसकी वजह, एशिया-प्रशांत इलाके में चीन की बढ़ती ताकत के मद्देनज़र क्षेत्रीय पार्टनर की तलाश. भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के पास हिंद महासागर में अपर हैंड है. मगर चीन ने अपनी आक्रामकता से इसे चुनौती दी है. भारत को घेरने के लिए चीन ने समंदर में अपने कई आउटपोस्ट्स बना लिए. जैसे- दिबूती. श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट. इस स्ट्रैटजी की एक थिअरी है- स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स. माना जाता है कि चीन हिंद महासागर में भारत को घेरने और अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए इस इलाके के अलग-अलग देशों में अपने नौसैनिक और सिविलयन ढांचे बना रहा है. जैसा उसने श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट में किया. म्यांमार के कोको आइलैंड में अपना बेस बनाया. बांग्लादेश के चटगांव में बंदरगाह विकसित किया. चीन के बढ़ते प्रभाव पर काबू पाने की मंशा अमेरिका और भारत को जोड़ती है. ऐसे में ट्रंप की इस इंडिया विज़िट के दौरान दोनों देशों के बीच चीन वाले मोर्चे पर भी कुछ ठोस अंडरस्टैंडिंग बन सकती है.

चीन की चुनौती: ट्रेड फ्रंट पर

पेइचिंग के ‘बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के जवाब में आया ‘ब्लू डॉट नेटवर्क’. BRI की तरह ये भी एक ट्रेड नेटवर्क है, जिसमें कई देश शामिल होंगे. अभी जो जानकारी है, उसके मुताबिक इसके मार्फत सहयोगी देशों की सरकारें, उन देशों के निजी सेक्टर को साथ जोड़ा जाएगा. मकसद होगा, उच्च-स्तरीय और विश्वसनीय इन्फ्रास्ट्रक्चर का ढांचा विकसित करना. ताकि व्यापार में आसानी हो. व्यापार के लिए सस्ता और तेज़ नेटवर्क खड़ा किया जाए.

इस नेटवर्क का फोकस है इंडो-पसिफिक इलाका. इसमें आता है हिंद महासागर और मध्य-पश्चिमी प्रशांत महासागर का इलाका. इस इलाके में आने वाले अहम देश हैं- भारत, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, कनाडा, चीन, इंडोनेशिया, इज़रायल, जापान, सिंगापोर, दक्षिणी कोरिया, श्रीलंका, ब्रिटेन और अमेरिका. नवंबर 2019 में ख़बर आई कि अमेरिका और जापान के बाद ऑस्ट्रेलिया भी इस ‘ब्लू डॉट नेटवर्क’ का हिस्सा बन गया है. चीन की मीडिया इस ‘ब्लू डॉट नेटवर्क’ पर संशय जता चुकी है. चीन को लग रहा है कि इस नेटवर्क के सहारे अमेरिका इंडो-पसिफिक देशों को अपनी तरफ जोड़कर कैंप बना रहा है. उम्मीद है कि ट्रंप की इस यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच भी इस ‘कैंपिंग’ पर कोई बड़ा फैसला लिया जाए.

रक्षा सौदा
चीन के बाद भारत का सबसे ज़्यादा व्यापार होता है अमेरिका से. दोनों देशों के बीच एक ट्रेड डील होने की उम्मीद थी. मगर आख़िर तक भी दोनों पक्ष सहमति नहीं बना पाए. इस बात का मलाल ट्रंप जता चुके हैं. मगर ट्रेड के इस पहलू से इतर एक मैदान हथियार सौदे का भी है. स्टॉकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के मुताबिक, 2013 से 2017 के बीच भारत की अमेरिका से हथियार की खरीद में 557 फीसद का इजाफा हुआ है. नवंबर 2019 में एक और डील हुई दोनों के बीच. करीब एक बिलियन डॉलर के नौसैनिक हथियार. ‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2007 से लेकर अब तक भारत लगभग 1,700 करोड़ रुपये की रक्षा खरीद कर चुका है अमेरिका के साथ.

ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान कुछ अहम आर्म्स डील पर भी मुहर लगने की उम्मीद है. मसलन- नौसेना के लिए 24MH60 रोमियो हेलिकॉप्टर्स. 6 AH64E अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर्स. NASAMS एयर डिफेंस सिस्टम. ख़बरों के मुताबिक, अमेरिका F21 फाइटर्स और गार्डियन्स भी बेचना चाहता है भारत को.

अफगानिस्तान और पाकिस्तान भी हो सकते हैं टॉपिक
लंबी बातचीत के बाद अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता होने जा रहा है. इसके बाद अमेरिका सिलसिलेवार तरीके से अपने सैनिक निकालना शुरू करेगा वहां से. उसकी उम्मीद रहेगी कि अफगानिस्तान में स्थिरता और सुरक्षा, दोनों मोर्चों पर भारत ज़्यादा शरीक हो. भारत की कोशिश होगी कि पाकिस्तान से प्रायोजित होने वाले आतंकवाद पर भी बातचीत हो. ज़्यादा कुछ नहीं तो निंदा तो करवा ही दी जाए अमेरिका से. हालांकि तालिबान के साथ शांति समझौते के मद्देनज़र इस मामले में बहुत उम्मीद नहीं दिखती. वजह ये कि तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव है. अफगानिस्तान छोड़ने के लिए डेस्परेट है अमेरिका. इस नाजुक मौके पर अमेरिका किसी तरह पाकिस्तान को धकेलना नहीं चाहेगा.


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