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त्रिपुरा में लाल सलाम को राम राम

चुनाव की गणना के दौरान शुरुआती रुझान कई बार धोखेबाज साबित होते हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव का सबसे पहला रुझान बंगाल से आया था. सीपीएम बंगाल की हुगली सीट पर आगे चल रही थी. यह सीट 1957 से कम्युनिस्ट पार्टी के पास रही थी. शाम होते-होते सीपीएम बंगाल हार गई. 2004 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 27 सीटों की गिरावट के साथ वो महज 16 सीट पर सिमट गई. यह वामपंथ के हाशिए पर जाने की शुरुआत थी. त्रिपुरा चुनाव के नतीजों ने इस सर्किल को पूरा कर दिया.

आजादी के बाद भारत का वामपंथी आंदोलन पूरे भारत से सिकुड़ता हुआ तीन राज्यों तक सिमटकर रह गया था. बंगाल, त्रिपुरा और केरल. पिछले एक दशक में वामपंथ इसमें से दो गढ़ गवां चुका है. 2009 के लोकसभा चुनाव में हार से साफ़ हो गया था कि 2011 में सीपीएम अपने सबसे मजबूत किले बंगाल से बेदखल होने जा रही है. 2011 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम बंगाल और केरल दोनों जगह बुरी तरह से खेत रही. केरल की हार से कम्युनिस्ट ज्यादा परेशान नहीं थे. यहां की जनता की तासीर पंजाब और हिमाचल जैसी है. ये लोग हर पांच साल में सत्ता बदल देते हैं. बंगाल 34 साल बाद वामपंथ की पकड़ से फिसल गया था.

त्रिपुरा: 19४७ के बंटवारे में यहां पूर्वी बंगाल के हजारों हिन्दू परिवार आकर बस गए थे
त्रिपुरा: 1947 के बंटवारे में यहां पूर्वी बंगाल के हजारों हिन्दू परिवार आकर बस गए थे

ऐसे दौर में त्रिपुरा पर भी संकट के बदल मंडरा रहे थे. उस दौर में कांग्रेस के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस ने भी त्रिपुरा में पूरा जोर लगा रखा था. फरवरी 2013 में विधानसभा चुनाव में माणिक सरकार अपना गढ़ बचा ले गए. 48.11 फीसदी वोट के साथ सीपीएम ने 2013 के चुनाव में कुल 49 सीटें हसिल की थीं. यह अबतक का सबसे बड़ा बहुमत था. देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री का करिश्मा सिर चढ़कर बोल रहा था.

अब तक हर लहर से खुद को बचा ले जाने वाले माणिक सरकार आखिरकार 2018 के चुनाव में कैसे पिछड़ गए और कैसे पिछले विधानसभा चुनाव में महज डेढ़ फीसदी वोट पाने वाली बीजेपी सत्ता में आ गई?

आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी

त्रिपुरा का उत्तरी हिस्सा बांग्लादेश से सटा हुआ है. बंटवारे के वक़्त पूर्वी बंगाल के हिंदू विस्थापित बड़ी तादाद में त्रिपुरा में आकर बस गए थे. इसने त्रिपुरा की डेमोग्राफी को बदल कर रख दिया. त्रिपुरा के आदिवासी रातों-रात अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक बनकर रह गए.

दोनों के बीच पैदा हुई तनाव की स्थिति में विस्फोटक मोड़ आया जून 1980 में. अलगाववाद अपने चरम पर था. 6 से 8 जून के बीच अगरतला से महज तीस किलोमीटर दूर मांडवी और आस-पास के गांव के 350 से 400 बंगाली हिंदुओ का क़त्ल कर दिया गया. इस नरसंहार को अंजाम देने वाला संगठन TUJS (Tripura Upajati Juba Samiti) था. यही TUJS आगे चलकर INPT (Indigenous Nationalist Party of Twipra) बना, जो इस चुनाव में BJP के साथ गठबंधन में है.

अलग राज्य की मांग को लेकर प्रदर्शन करते INPT के कार्यकर्ता
अलग राज्य की मांग को लेकर प्रदर्शन करते INPT के कार्यकर्ता

त्रिपुरा में कम्युनिस्ट आंदोलन आजादी से पहले से था. उस समय कम्युनिस्ट कार्यकर्ता जन शिख्खा समिति के नाम पर आदिवासियों को शिक्षित कर रहे थे. इन जन शिख्खा समिति स्कूलों ने आदिवासी इलाकों में कम्युनिस्ट पार्टी को पहला संगठन खड़ा करने में मदद की. सीपीएम के खाते से त्रिपुरा के पहले मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती ने बतौर कार्यकर्ता अपना सारा काम आदिवासी इलाकों में किया था. नृपेन आदिवासियों के बीच काफी लोकप्रिय चेहरा हुआ करते थे. माणिक सरकार ने भी नृपेन की परंपरा को आगे बढ़ाया.

त्रिपुरा की साठ में बीस सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. यहां सीपीएम की मजबूत पकड़ के बारे में यह कहा जाता था कि त्रिपुरा में सीपीएम के लिए सीटों की गिनती 21 से शुरू होती है यानी 20 सीटों पर उसकी जीत पहले ही मान ली जाती थी. पिछले चुनाव में उसे उन 20 में 19 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. आदिवासी इलाकों में मजबूत पकड़ के चलते सीपीएम ने ना सिर्फ अलगाववादी सशस्त्र संगठनों को हाशिए पर लगाया बल्कि अपने शासनकाल में आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी की बहस को भी खड़ा नहीं होने दिया.

त्रिपुरा के भूतपूर्व राजघराने के प्रति आदिवासियों में आज भी एक सॉफ्ट कॉर्नर है. सीपीएम राजघराने के महिमामंडन के खिलाफ रहा है क्योंकि यह एक तरह से सामंतशाही का महिमामंडन है. बीजेपी ने आदिवासियों के सॉफ्ट कॉर्नर को भुनाना शुरू किया. 8 जनवरी, 2018 के रोज बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह चुनाव प्रचार के लिए त्रिपुरा पहुंचे हुए थे. अपने भाषण के दौरान उन्होंने कहा कि अगरतला हवाईअड्डे का नाम भूतपूर्व राजा बीर विक्रम किशोर के नाम पर क्यों नहीं रखा जा सकता? इसके बाद त्रिपुरा में बीजेपी के प्रभारी सुनील देबधर कई मौकों यह कहते हुए पाए गए कि त्रिपुरा बीजेपी ने हाईकमान के पास बीर विक्रम सिंह को भारत रत्न देने का प्रस्ताव भेज दिया है.

भूतपूर्व राजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य बहादुर
भूतपूर्व राजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य बहादुर

भूतपूर्व राजा बीर विक्रम किशोर की तस्वीर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीन दयाल के साथ बीजेपी के हर जलसे में नजर आने लगी. अगरतला हवाई अड्डे का नाम बीर बिक्रम किशोर के नाम पर करने की बात बीजेपी के विजन डॉक्यूमेंट में भी दर्ज हो गई. इसके अलावा उनके पिता बीरेंद्र किशोर माणिक्य बहादुर के नाम पर एक कल्चरल अकेडमी खोलने की बात भी विजन डाक्यूमेंट्स में कही गई.

त्रिपुरा में बीजेपी ने बड़े सधे अंदाज में आदिवासी पहचान के मुद्दे को उठाना शुरू किया. इसके लिए उसने INPT के साथ गठबंधन किया. यह पार्टी TJUS का ही लोकतान्त्रिक रूप है. 2000 के साल में TJUS और IPFT (Indigenous People’s Front of Tripura) के मिलने से INPT का निर्माण हुआ था. पिछले डेढ़ दशक से यह पार्टी खुद को त्रिपुरा के आदिवासियों का झंडाबरदार बताती आई है. 2013 के विधानसभा में इसे  7 फीसदी वोट तो मिले लेकिन सीटों की संख्या सिफर रही थी. ऐसे में INPT गठबंधन में बीजेपी की जूनियर पार्टी बनने के लिए तैयार हो गई. इस गठबंधन के तहत बीजेपी के हिस्से आई 51 सीट और बची हुई 9 सीट गई INPT के खाते में.

तोड़-फोड़ और गठजोड़

INPT से गठबंधन के साथ बीजेपी ने अपनी रणनीति के तहत दूसरी बड़ी पार्टियों में बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ की. 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में 10 विधायक थे. 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की जीत के बाद इसमें से 6 विधायकों ने तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी. लेकिन ये लोग वहां सालभर भी ना रह पाए. राष्ट्रपति चुनाव के वक़्त इन लोगों ने तृणमूल से बगावत करके रामनाथ कोविंद को वोट डाला. इसके बाद ममता ने इन्हें पार्टी से निकल दिया.

राम माधव की उपस्थिति में कांग्रेस से पाला बदलकर बीजेपी में आते रतन लाल नाथ
राम माधव की उपस्थिति में कांग्रेस से पाला बदलकर बीजेपी में आते रतन लाल नाथ

8 अगस्त, 2017. 10 विधायकों वाले विपक्ष में से आधे से ज्यादा बीजेपी के पाले में थे. इस तरह 2013 के विधानसभा चुनाव में शून्य पर सिमटी बीजेपी 2017 में सदन की मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई. एक बार शुरू हुई तोड़-फोड़ यहीं नहीं रुकी. इसके कुछ ही दिन बाद सूबे में तृणमूल के 500 कार्यकर्ताओं ने एकसाथ बीजेपी का दामन थाम लिया. यह भगदड़ यहीं नहीं रुकी. 22 दिसंबर, 2017 के रोज कांग्रेस के एक और विधायक रतन लाल नाथ भी बीजेपी के पाले में आ गए. देखते ही देखते कांग्रेस के जीतकर आए 10 में 8 विधायक बीजेपी का झंडा ढो रहे थे.

चलो पलटाई

‘चलो पलटाई’ यही वो नारा था जो त्रिपुरा में बीजेपी के लिए सत्ता की चाबी साबित हुआ. चलो पलटाई माने चलो बदलाव करें. अगर 1988 से 1993 के बीच के पांच साल छोड़ दें तो त्रिपुरा में 1977 से वामपंथी सरकार है. माणिक सरकार भले ही देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री हों लेकिन उनकी साधारण छवि इससे ज्यादा समय तक सत्ता विरोधी लहर को दबा पाने में कामयाब नहीं हो पाती. मजबूत विपक्ष और सत्ता विरोधी लहर दो ऐसे समीकरण थे, जिनके एकसाथ नत्थी होने के बाद उनका चित्त होना तय था.

कोई चुनाव छोटा चुनाव नहीं

2014 से पहले बीजेपी उत्तर-पूर्व, बंगाल, तमिलनाडु और उड़ीसा जैसे राज्यों में रस्मी तौर पर चुनाव लड़ा करती थी. 2014 के बाद से यह स्थिति बदल गई है. अब बीजेपी संगठन हर चुनाव में बेहतर तैयारी और जीतने के इरादों के साथ जा रहा है. उत्तर-पूर्व वैसे भी संघ के एजेंडे में प्राथमिकता में रहा है. बीजेपी 2014 के लोकसभा चुनाव के समय से उत्तर-पूर्व में अपनी ताकत झोंके हुए है.

त्रिपुरा में प्रचार करते योगी आदित्यनाथ
त्रिपुरा में प्रचार करते योगी आदित्यनाथ

बीजेपी की रणनीति की ख़ास बात यह है कि वो चुनाव के दौरान हर छोटी से छोटी चीज पर ध्यान देती है. त्रिपुरा की एक-तिहाई आबादी नाथ संप्रदाय को मानने वाली है. आज तक इस तथ्य की तरफ कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया गया. इस बार के चुनाव में नाथ संप्रदाय के प्रमुख योगी आदित्यनाथ त्रिपुरा में बीजेपी के लिए प्रचार करते नजर आए. इस किस्म की बारीक बुनी रणनीति का अक्सर विरोधियों के पास कोई जवाब नहीं होता.

आगे क्या

बीजेपी के लिए यह चुनाव बड़ा सबक है. उसे यह अनुभव आगे काम देने वाला है. ख़ास तौर पर बंगाल में जहां तृणमूल कांग्रेस का शासन है. हाल ही में हुए उप-चुनाव में बीजेपी वहां दूसरे नंबर पर रही है. यह बीजेपी के लिए शुभ संकेत है. इसके अलावा लोकसभा चुनाव के साथ ही उड़ीसा में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. बीजू जनता दल के नवीन पटनायक का यह चौथा कार्यकाल है.

ढह गए गढ़ को फिर से खड़ा करना माणिक सरकार के सबसे बड़ी चुनौती है
ढह गए गढ़ को फिर से खड़ा करना माणिक सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है

वाम मोर्चे के लिए यह समय अपनी राजनीति को फिर से मथने का है. अब उनके पास सिर्फ केरल बचा हुआ है. अगर केरल अपनी तासीर पर कायम रहता है, तो 2021 में उन्हें इस राज्य की सत्ता से भी हाथ धोना पड़ेगा. त्रिपुरा के साथ एक अच्छी बात यह है कि चुनावी हार के बाद वहां सीपीएम नेतृत्वविहीन नहीं हो जाएगी. माणिक सरकार करिश्माई नेता हैं. एक चुनावी हार से उनका जादू पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता है. त्रिपुरा में सीपीएम की पूरी चिंता दशरथ देव के करिश्मे को दोहराने की होनी चाहिए. 1988 में सत्ता से बेदखल होने के महज पांच साल बाद उनके नेतृत्व में सीपीएम ने त्रिपुरा में सत्ता में धमाकेदार वापसी की थी.


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