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अजीत जोगी पॉलिटिक्स में एंटर हुए तो 'आदिवासी' थे, मगर अब नहीं रहे!

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कबीर दास ने काफी पहले लिख दिया था- जाति न पूछो साधु की. यहां आप ‘साधु’ को ‘जोगी’ पढ़ लीजिए. माने अजीत जोगी. उनकी जाति का मैटर काफी गरम चल रहा है इन दिनों. वो छत्तीसगढ़ के पहले सीएम रहे. राजनीति में आने से पहले IAS अफसर रहे. जानकार कहते हैं कि उनकी दूर की नज़र काफी तेज़ है. अब का मालूम नहीं. पहले जरूर थी. कैसे? ये समझने के लिए आपको दो किस्से सुनने होंगे.

#एक

तब अजीत जोगी कलेक्टर हुआ करते थे. रायपुर में पोस्टिंग थी उनकी. उन दिनों राजीव गांधी पायलट हुआ करते थे. एयर इंडिया की प्लेन उड़ाते थे. कलेक्टर साहब के सख्त निर्देश थे, कि जब भी राजीव की फ्लाइट रायपुर आए उन्हें बताया जाए. तो राजीव की फ्लाइट रायपुर पहुंचती और जोगी घर से चाय-नाश्ता लेकर उनसे मिलने पहुंच जाते. इस तरह जोगी राजीव गांधी की नज़र में आए. उनके करीब आए.

कुछ साल बाद. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. वह अपनी टीम एक्सपैंड कर रहे थे. उन्हें एक युवा, तेज-तर्रार, आदिवासी चेहरे की जरूरत थी. ऐसा नेता जो छत्तीसगढ़ को समझता हो और जिससे लोग जुड़ाव महसूस करें. जोगी तब इंदौर में कलेक्टरी कर रहे थे.  वो आदिवासी भी थे, छत्तीसगढ़ी भी और मुखर भी. राजीव को उनका नाम सुझाया गया. राजीव उन्हें जानते थे. उन्होंने तुरंत हामी भर दी.

इस तरह जोगी की कांग्रेस या यूं कहें कि राजनीति में एंट्री हुई. एक आदिवासी नेता के तौर पर. साल था 1985. कांग्रेस की टिकट पर वह राज्यसभा सांसद बनाए गए. 1986 में.

#दो
अजीत जोगी 1986 से 1998 तक राज्यसभा सांसद रहे. किस्सा मशहूर है कि सांसद रहने के दौरान, हर रविवार वह उसी चर्च में प्रार्थना करने जाते थे जिसमें सोनिया गांधी जाती थीं. इस तरह जोगी सोनिया गांधी के करीब आए. देखते ही देखते वह उन नेताओं में शामिल हो गए जिन्हें गांधी परिवार का खास माना जाता था. गांधी परिवार से अच्छे संबंधों का इनाम भी उन्हें मिला.  वो भी बताते हैं, पहले ये जान लीजिये कि ये खबर किस बारे में है.

खबर ये है कि छत्तीसगढ़ की एक हाई पॉवर कमिटी ने अजीत जोगी को आदिवासी मानने से इनकार कर दिया है. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जोगी खुद को आदिवासी साबित नहीं कर पाए हैं. उनकी जाति पर विवाद उतने ही लंबे वक्त से चल रहा है जितना लंबा उनका राजनीतिक करियर है. कई मौकों पर उनके आदिवासी होने पर सवाल उठाए गए हैं. ये खबर जोगी की जाति के उसी विवाद पर है.

आदिवासी होने की वजह से कांग्रेस आलाकमान ने अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ का सीएम बनाया था.
आदिवासी होने की वजह से कांग्रेस आलाकमान ने अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ का सीएम बनाया था.

#जाति के खिलाफ 1986 में पहली याचिका

जोगी राजनीति में आए. और इसी के साथ शुरू हुआ उनकी जाति से जुड़ा विवाद. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जोगी के राज्यसभा सांसद बनने के बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में एक याचिका दाखिल हुई. मनोहर दलाल नाम के शख्स ने यह याचिका लगाई थी. कथित तौर पर किसी कांग्रेस नेता के कहने पर. ये याचिका एक साल के अंदर ही खारिज कर दी गई.

याचिका खारिज हुई. जोगी की पहचान दिग्गज आदिवासी नेता के रूप में बनी रही. साल बदले. आया मिलेनियम वाला साल यानी साल 2000. मध्य प्रदेश दो हिस्सों में बंट गया. 1 नवंबर को छत्तीसगढ़ को एक अलग राज्य की पहचान मिली. छत्तीसगढ़ के हिस्से आई विधानसभा सीटों में कांग्रेस का बहुमत था. लिहाज़ा कांग्रेस सरकार बननी तय थी.

#अब आई इनाम की बारी

तब सीएम बनने की रेस में श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, राजेंद्र शुक्ल और मोतीलाल वोरा थे. काफी माथापच्ची और जोड़-घटाने के बाद भी वोरा और विद्याचरण शुक्ल के बीच फैसला नहीं हो पाया. तब सोनिया गांधी कांग्रेस प्रेसिडेंट थीं. जब मुख्यमंत्री पर फैसला अटका हुआ था तब कांग्रेस आलाकमान ने मामला सुलझाने के लिए नया पत्ता फेंका. कहा- छत्तीसगढ़ का पहला मुख्यमंत्री आदिवासी होगा. आलाकमान की नज़र में अजीत जोगी पहले से थे ही. वो छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बन गए.

क़िस्सा मशहूर है कि राज्यसभा सांसद रहने के दौरान जोगी हर रविवार को उसी चर्चा में जाते थे जिसमें सोनिया गांधी जाती थीं.
क़िस्सा मशहूर है कि राज्यसभा सांसद रहने के दौरान जोगी हर रविवार को उसी चर्चा में जाते थे जिसमें सोनिया गांधी जाती थीं.

सीएम बने तो उनका विधानसभा सदस्य बनना भी जरूरी था. 2001 में उपचुनाव लड़ा. मरवाही विधानसभा सीट से. अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी उम्मीदवार के लिए आरक्षित सीट है. चुनाव जीत गए लेकिन उनकी जाति पर विवाद एक बार फिर शुरू हो गया. 2001 में संत कुमार नेताम ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में जोगी के आदिवासी होने को चुनौती दी. आयोग ने जोगी को नोटिस भेजा. जोगी ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी व्यक्ति की जाति की जांच करने का अधिकार अनुसूचित जनजाति आयोग के पास नहीं है.

#हाईकोर्ट ने दो बार केस की सुनवाई से इनकार किया

एक साल बाद यानी 11 जुलाई, 2002 को एक और याचिका लगाई गई. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में. बनवारी लाल अग्रवाल ने ये याचिका लगाई थी. वो छत्तीसगढ़ विधानसभा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं. उस वक्त हाईकोर्ट ने बिना कोई कारण बताए मामले की सुनवाई से इनकार कर दिया था. इस बीच जोगी के जाति प्रमाण पत्र की सीबीआई जांच कराने की मांग भी उठी. 2012 में जस्टिस सुनील कुमार सिन्हा ने सुनवाई से इनकार कर दिया. हवाला दिया कि वह पहले जोगी के वकील रह चुके हैं. ऐसे में इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकते हैं. हालांकि, 2013 में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जोगी की जाति से जुड़े सभी दस्तावेज कोर्ट में जमा किए जाएं. कोर्ट ने 1967 के बाद के सभी रिकॉर्ड्स भी मंगवाए.

इस बीच संत राम नेताम (वही जिन्होंने जनजाति आयोग में शिकायत की थी) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई. 13 अक्टूबर, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया कि मामले की जांच उच्च-स्तरीय कमिटी से करवाई जाए. सीनियर IAS अधिकारी रीना बाबा साहेब कंगाले की अध्यक्षता में कमिटी बनी. इस कमिटी ने जून, 2017 में अपनी रिपोर्ट सौंपी.

रिपोर्ट में कहा गया कि जोगी के आदिवासी होने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले. इस कमिटी ने जोगी को आदिवासी मानने से इनकार कर दिया. बिलासपुर जिला प्रशासन ने अजीत जोगी के जाति प्रमाणपत्र रद्द कर दिए. अजीत जोगी के बेटे अमित ने आरोप लगाया कि 7 सदस्यीय कमिटी के चार पदों पर रीना बाबासाहेब कंगाले ही थीं. कहा कि कमिटी निष्पक्ष नहीं थी. जोगी ने इस रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती दी.

21 फरवरी, 2018 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नई कमिटी बनाने के निर्देश दिए. डीडी सिंह के नेतृत्व में नई कमिटी बनाई गई. इस कमिटी ने 21 अगस्त को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. इस रिपोर्ट में भी यही लिखा है कि जोगी खुद को आदिवासी साबित करने में असफल हुए हैं.

#खुद को कंवर आदिवासी बताते हैं जोगी

अजीत जोगी और उनका परिवार शुरुआत से ही दावा करता आया है कि वो आदिवासी हैं. कंवर जनजाति के हैं. कंवर जनजाति छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में पाई जाती है. छत्तीसगढ़ में इस जनजाति के लोग मुख्यरूप से रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर, कोरबा, जशपुर और सरगुजा जिलों में रहते है. मान्यता है कि ये जनजाति कौरवों की वंशज है. कंवर शब्द कौरव का अपभ्रंश माना जाता है. छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग कानून के तहत इस जनजाति के लोगों के पास वो सभी अधिकार हैं जो आदिवासियों को मिलते हैं.

#क्या अजीत जोगी दलित हैं?

अजीत जोगी ने कई मौकों पर ये कहा है कि वो बेहद गरीब परिवार से आते हैं. बचपन में स्कूल पहनकर जाने के लिए उनके पास जूते तक नहीं होते थे. ऐसे में उनके माता-पिता धर्म बदलकर ईसाई हो गए. जिसके बाद जोगी को पढ़ाई के लिए मिशन से मदद मिली. बीबीसी में 2016 में अजीत जोगी पर एक लंबा लेख छपा था. इसमें विनोद वर्मा ने लिखा कि जोगी पर आरोप है कि वो आदिवासी नहीं अनुसूचित जाति के हैं. उन्होंने तिकड़म भिड़ाकर आदिवासी होने का सर्टिफिकेट हासिल किया.

साल 2004 में महासमुंद लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान अजीत जोगी हादसे का शिकार हो गए थे. तब से वह व्हीलचेयर पर हैं.
साल 2004 में महासमुंद लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान अजीत जोगी हादसे का शिकार हो गए थे. तब से वह व्हीलचेयर पर हैं.

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 और इसमें 1956 और 1990 में हुए संशोधनों के मुताबिक, यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति यदि ईसाई धर्म अपनाता है तो उसे और उसकी आने वाली पीढ़ियों को अनुसूचित जाति को मिलने वाले लाभ नहीं मिलेंगे. वहीं अगर कोई हिंदू SC सिख या बौद्ध धर्म अपनाता है तो  उसे SC को मिलने वाले लाभ मिलते रहेंगे. यानी अगर जोगी आदिवासी हैं तब तो ईसाई धर्म में जाने के बाद भी आदिवासियों को मिलने वाले अधिकार उन्हें मिलते रहेंगे. लेकिन अगर वो SC हैं तो ऐसा नहीं होगा.

#रिपोर्ट आने के बाद अजीत जोगी ने क्या कहा?

जोगी ने कहा कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी उन्हें आदिवासी मानते हैं लेकिन भूपेश बघेल उन्हें आदिवासी नहीं मानते. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट की कॉपी मिलते ही वो हाईकोर्ट में इसे चुनौती देंगे. फिलहाल जोगी के बेटे अमित जोगी की जाति पर कोई सवाल नहीं उठे हैं, न ही उस पर जांच शुरू हुई है. यानी वह अभी भी कंवर आदिवासी हैं. इसे लेकर भी अमित जोगी ने भूपेश सरकार पर निशाना साधा कि उनके राज में सब उल्टा होता है. हालांकि, अगर कमिटी की रिपोर्ट को कोर्ट मान लेती है कि सीनियर जोगी आदिवासी नहीं हैं. तो जूनियर जोगी तक लपटें आने में देर नहीं लगेगी. ख़ैर.

#अब आगे क्या?

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल बताते हैं कि जोगी IPS और बाद में लंबे वक्त तक IAS रहे लेकिन न पढ़ाई के लिए और न ही सर्विसेज में जाने के लिए उन्होंने जाति का इस्तेमाल किया. उनका कहना है कि जोगी ने जनरल कैटेगिरी से परीक्षाएं दीं और पास किया. पुतुल आगे कहते हैं-

1. अगर कोर्ट इस रिपोर्ट को सही मान लेती है तो एक तो जोगी की विधायकी चली जाएगी. क्योंकि वह मरवाही सीट से विधायक हैं और यह आदिवासी आरक्षित सीट है.

अपने भाषणों में छत्तीसगढ़ी का भरपूर इस्तेमाल करते हैं अजीत जोगी (इंडिया टुडे आर्काइव)
अपने भाषणों में छत्तीसगढ़ी का भरपूर इस्तेमाल करते हैं अजीत जोगी (इंडिया टुडे आर्काइव)

2. उनके खिलाफ धोखाधड़ी के मामले दर्ज हो सकते हैं. आदिवासी होने के जितने लाभ उन्होंने अब तक लिये हैं उन सबकी जांच होगी और उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है. छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग कानून, 2013 के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई होगी.

3. उनकी पहचान एक आदिवासी नेता की है. राजनीतिक मंचों पर उन्होंने अपने आदिवासी और छत्तीसगढ़िया होने को जमकर भुनाया है. ये पहचान ही खारिज हो गई तो वो प्रदेश की राजनीति से गायब हो जाएंगे. लोगों में ये संदेश तो जाएगा ही कि उन्होंने धोखेबाजी की और जाति के नकली दस्तावेज बनवा लिए.

अजीत जोगी की जाति का मामला उतना ही पुराना है जितना उनका राजनीतिक सफर. साल दर साल ये मामला खिंचता चला आ रहा है. कई मौकों पर उन्हें राहत भी मिली. इस बार भी वह रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहे हैं, अब देखना ये है कि कोर्ट में उनकी दलील सुनी जाती है या रिपोर्ट पर मुहर लग जाती है.


वीडियो- कलेक्टर से सूबे के पहले आदिवासी CM तक अजीत जोगी की कहानी

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