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लखपत के लोग उम्मीद भरी नज़रों से उत्तर दिशा की ओर देखते हैं, क्या सिन्धु नदी वापस आएगी?

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सावजराज सिंह
सावजराज सिंह

भारत का सुदूर पश्चिमी सिरा, लखपत. गुजरात के सबसे अंतिम सिरे पर बसे गांव से आते हैं सावजराज सिंह. उजले कच्छ के रण से आने वाले उजली आत्मा के इंसान. इंसानों को पढ़ते हैं. समय की कहानी सुनाते हैं. इमारतों पर लिखी इबारतों का दस्तावेजीकरण अपनी स्मृति की किताब में करते हैं. पांच भाषाएँ जानते हैं, लेकिन चुप्पी की जुबां सबसे बेहतर पढ़ते हैं.

आज वे हमें अपने साथ अपनी स्मृतियों के नगर ले चले हैं.  समय की कसौटी पर खड़ा और लड़ा एक निर्भय कस्बा लखपत. पढ़ें सावजराज सिंह का लिखा अपने शहर का सफरनामा.


एक शहर जो आज खंडहर है. माता सिंधु का सबसे लाडला पुत्र जो काल की गर्त में सो गया. मेरा गांव, मेरा घर, मेरी रियायत, मेरा लखपत. इसके किले की दीवारों के हर पत्थर में मैं छिपा हूं. मेरी देह में मेरा लखपत महक रहा है. हम दोनों में बहती है माता सिंधु. हम दोनों में ठहरा है परा पूर्वज पिता अरब सागर.

सात किलोमीटर लंबी दीवारों में फैला किला आज भी ललकारता है अपने प्रतिद्वंद्वियों को और मजबूती से जमाता है अपने पैर मिट्टी में. वो प्रतिबद्ध है दुश्मनों से, तूफानों से, भूकंपों से सुरक्षित बचाये रखने को अपनी अस्मिता और संस्कृति. वो ढाल बने डटा खड़ा है सदियों से अपनी प्रजा की सुरक्षा के लिए. वो घायल है, लहुलुहान है पर अपनी जमीन से एक इंच भी नहीं हिला कभी.

दूर दूर तक उत्तर में फैली सिरक्रीक. जहां 1819 के भूकंप से पहले सिंधु बहती थी. इस क्रीक के गर्भ में छिपा है सोना, गैस और खनिज तेल के रूप में और इसी गर्भ में कभी दफन हो गया था इस लखपति नगर और प्रदेश का ऐश्वर्य.

नगर के बीचों बीच खड़ी है कुछ पुरानी इमारतें. शहर के सुवर्णमय अतीत की साक्ष्य. नगर के हर खंडहर के पास बचा है एक शोकगीत. खंडहर हुए इस नगर में अब भी प्रेत डरते हैं इनसानों से. पर खंडहर हुए इस नगर को जीतने का ख्वाब अब कोई सिकंदर या अलाउद्दीन खिलजी नहीं रखता. मैं प्रेत बना अपने पुराने नगर में भटकता हूं. अपने पूर्वजों की कब्रें सहलाता हूं.

शहरों के धुएं से दूर, गंवई अस्मिता से भरपूर और अपनी फकीरी, मस्ती में चूर पश्चिम में सुदूर अरब सागर के तट और सिंधु के सूखे पट पर एक छोटी सी संस्कृति जी रहा छोटा सा मेरा लखपत. जहां के खेतों में धान से ज्यादा घास उगता है और घरों में आदमियों से ज्यादा पशु रहते हैं. जहां लोग घरों से ज्यादा मैदानों में रहते हैं अपनी गायों, भैंसों, ऊंटों और भेड़ बकरियों के झुंडों के साथ. और जहां इंसान की जाहोजलाली नहीं, जरूरतें महत्व रखती हैं.

अक्टूबर 2014 में अरब सागर से आने वाला तूफान “नीलोफर” लखपत से टकराने वाला था. राज्य सरकार डरी हुई थी. पूरा स्थानीय तंत्र और सरकार सावधान हो गए थे हर मुश्किल का सामना करने को. और लखपत के लोग मुस्कुरा रहे थे. वो अपने परा पूर्वज पिता अरब सागर की ओर देख हंसकर अपनी मूछें खुरदते. बुड्ढा मियां गुलभेग भी अपनी भैंसों को चराते देख रहा था दूर तक फैले अरब सागर को. कुछ देर देखने के बाद वो मुस्कुरा उठा और फिर जोर जोर से हंसने लगा. मानो कि वो अरब सागर का मजाक उड़ा रहा हो, उसका अट्टाहास दूर तक गूंज रहा था.

पास खड़े जिला कलेक्टर ने बुड्ढे मियां गुलभेग को पूछा, “हंस क्यों रहे हो चाचा? डर नहीं लगता आने वाली आफत से?”

बुड्ढा मियां गुलभेग कुछ देर देखता रहा अपनी भैंसों को, जो तीन साल के सूखे के बावजूद अभी जिंदा थीं. धीरे से बुड्ढे ने अपना अंगवस्त्र उतारा और अपने नंगे पेट को अरब सागर को दिखाते हुए बोला, “आओ तूफान आओ, मेरा पेट इतना भूखा है कि तुम्हें पूरे का पूरा निगल जायेगा.” और बुड्ढा सागर की ओर अपना पेट दिखाते अट्टाहास करने लगा. वो ललकार रहा था अरब सागर को.

कहते हैं 1999 में आये तूफान में मियां गुलभेग की सारी भैंस मर गई थीं. पचास भैंसों के मरने के बाद तब भी वो अरब सागर की ओर देखते हुए अट्टाहास कर रहा था.

इस लखपत प्रदेश में कुछ समय के अंतराल के बाद आने वाले निरंतर तूफान, सूखा, भूकंप और युद्ध के बावजूद यहां के लोग अट्टाहास करते हैं. अट्टाहास करते हैं तब भी जब कब्रों में सो रहे होते हैं, अट्टाहास करते हैं तब भी जब मैदानों में दौड़ रहे होते हैं, अट्टाहास करते हैं तब भी जब अपने पशु चरा रहे होते हैं, अट्टाहास करते हैं तब भी जब युद्ध मैदान में शत्रु से भिड़ रहे होते हैं, और अट्टाहास करते हुए एक दिन चिर नींद में सो जाते हैं अपनी युद्ध भूमि झारा में अपने पूर्वजों के पास.

ये प्रदेश और इसके लोग जब हरे होते हैं तो इतने हरे होते हैं की जैसे कोई स्त्री संभोग के बाद चरमसुख की तृप्ति के बाद हरी होती है, और ये जब सूखने लगते हैं तो इतने क्रूर होते हैं कि मैदानों के हर पेड़ की नसों का खून तक चूसकर उन्हें फेंक देते हैं. जितना ऐश्वर्य इस लखपत नगर में था उतना ही ऐश्वर्य इन खुले मैदानों के लोगों में था. आज अपनी जर्जर हालत और आफतों के बावजूद इनके पास बचा है तो सिर्फ अट्टाहास. वो अट्टाहास करते हैं अपने शत्रुओं पर, वो अट्टाहास करते हैं अपनी मुश्किलों पर, वो अट्टाहास करते हैं अपने अतीत पर, वो अट्टाहास करते हैं परा पूर्वज पिता अरब सागर पर. और वो रोते हैं! वो रोते हैं तो बस छूट गई माता सिंधु के लिए.

वो आज भी उत्तर दिशा में देखते हैं इस आशा में कि कभी किसी रोज लौट आयेगी माता सिंधु.


 

सावजराज के स्मृतियों के शहर लखपत की चंद तस्वीरें देखने के लिए नीचे तस्वीर पर बने आइकॉन पर क्लिक करें.

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