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निर्भया की मां का सम्मान करने के लिए बुलाया, मगर उनके साथ की भद्दी हरकत

PP KA COLUMN

8 मार्च को जब आप फेसबुक पर औरतों के गुणगान में लगे हुए थे, 16 दिसंबर गैंगरेप की शिकार लड़की, जिसे आमतौर पर ‘निर्भया’ कहा गया, की माताजी आशा देवी को सम्मानित किया जा रहा था. सम्मान देना हमारा पुराना तरीका रहा है अपनी कमियों को ढंकने का. एक दिन औरतों को सम्मान दो, और वो भूल जाएंगी कि सालभर उनके साथ क्या-क्या किया गया. बेशक निर्भया की मां अबतक अपनी बेटी के इतने बुरे तरीके से दुनिया छोड़ देने से लगातार संघर्ष कर रही हैं. बेशक ये संघर्ष बहुत बड़ा काम है.

मगर माफ़ कीजिए, सम्मान का काम नहीं है. ये हमारी विफलता है कि उनकी बेटी को वो दिन देखना पड़ा, उसे दुनिया छोड़नी पड़ी.

मगर मसला सिर्फ इतना ही होता तो क्या बात थी! असल बात तो तब हुई जब इसी सम्मान समारोह में मौजूद पूर्व सांसद और पूर्व पुलिस कमिश्नर एचटी संगलियाना ने आशा देवी के ‘सम्मान’ में ये शब्द कहे: ‘मैं निर्भया की मां को देखता हूं. उनका फिजीक (शरीर की बनावट) देखता हूं. मैं सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूं कि निर्भया कितनी खूबसूरत रही होगी.’

बात शरीर की बनावट और औरतों की कथित खूबसूरती की हो रही है तो आपको याद दिला दूं कि 16 दिसंबर 2012 को क्या हुआ था. मेडिकल की एक स्टूडेंट का साउथ दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप हुआ था. वो अपने एक मित्र के साथ थी. उसकी वजाइना में लोहे की रॉड घुसेड़ी गई थी, जिसकी वजह से उसकी आंतें फट गई थीं. 13 दिन बात उसकी मौत हो गई थी.

वो लड़की आजतक हमारे ज़हन में किसी भी औरत के साथ होने वाली हैवानियत की एक बेनाम, बेचेहरा उपमा बनी हुई है. मगर अफसर साहब ने उसे नाम तो क्या, शरीर भी दे दिया.

आशा देवी को सम्मान देने के लिए बुलाया गया था. एक बात बताएं, औरत का सम्मान उसके काम से होता है या उसके शरीर से?

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16 दिसंबर गैंगरेप विक्टिम की मां आशा देवी और पिता बीएन सिंह.

मैं बताती हूं क्या हुआ होगा. अफसर साहब को लगा होगा कि आशा देवी की तारीफ करें. और तारीफ में वो उन्हें खूबसूरत कहना चाह रहे होंगे. उनकी नीयत में कोई बुराई नहीं होगी. क्योंकि औरत की तारीफ और करें भी किस तरह से? औरत है, तो शक्ल की तारीफ सुनकर खुश ही होगी. क्योंकि किसी औरत की तारीफ और करें ही कैसे. औरत की तारीफ के तो दो ही पैमाने हैं. एक वो खूबसूरत हो, दूसरा खाना अच्छा बनाती हो. खाना तो अफसर साहब ने उनके हाथ का खाया नहीं. तो फिजीक की तारीफ ही कर दी.

संगलियाना को हीरो का दर्जा प्राप्त है. इन्हें टॉप कॉप कहा जाता है.
संगलियाना को हीरो का दर्जा प्राप्त है. इन्हें टॉप कॉप कहा जाता है.

अफसर साहब ने यहां एक स्त्री-विरोधी ही नहीं, बेवकूफ़ी की पराकाष्ठा की नुमाइश करने वाला बयान दिया है. हालांकि एक पढ़े-लिखे आदमी के मुंह से स्त्री-विरोधी बात सुनना अपने आप में ही उनकी बेवकूफी की पराकाष्ठा है. मगर इससे ये भी साबित होता है कि न तो अफसर साहब ने अच्छे अखबार पढ़े, न अच्छे से टीवी देखा. क्योंकि वो निर्भया की मौत ही थी, जिसके बाद हम इस बात को लेकर खुले कि कितने बेशर्म तरीके से हम औरतों को महज एक शरीर, महज उपभोग की वस्तु मानते आए हैं.

इससे इतर ये भी बता दूं कि संगलियाना देश के सबसे  बड़े और प्रचलित अफसरों में से एक है. सिर्फ अफसर कहा जाना इनकी शान में गुस्ताखी मानी जाए क्योंकि इनको हीरो का दर्जा प्राप्त है. इनपर कम से कम 3 फ़िल्में बन चुकी हैं.

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मीडिया से बात करते हुए आशा देवी ने कहा कि इतने दिनों में कुछ भी नहीं बदला.

अफसर साहब के कमेंट के बाद कुछ लोगों ने तो क्रोध में प्रोग्राम ही छोड़ दिया. और उनमें से एक, महिला एक्टिविस्ट अनीता चेरिया ने अपनी स्पीच का इंतजार किया. अवॉर्ड लेते हुए अनीता ने कहा,

‘जब टॉप सरकारी पुलिस अफसर किसी औरत के लिए स्टेज पर कुछ अच्छा बोलने आएं, और ये कहें कि उस महिला का शरीर कितना अच्छा है, हमें ये पता पड़ता है कि एक समाज के तौर पर हा अब भी बहुत पीछे हैं.’

मीडिया से बात करते हुए आशा देवी ने कहा कि इतने दिनों में कुछ भी नहीं बदला.

इस पूरे प्रकरण के बाद संगलिया के जवाब ने आशा देवी के कथन पर मुहर भी लगा दी.

संगलियाना का ये कहना, कि उनका मकसद तो अच्छा था, ये बेवकूफाना नहीं. मुझे यकीन है कि उनका इस बात पर पूरा भरोसा होगा. ये एक स्थापित सत्य, या यूं कहें, एक पैटर्न बन चुका है. स्त्री-विरोधी टिप्पणी तो छोड़िए, पुरुष औरतों का यौन शोषण कर भी यही कहते हैं कि ऐसा उनका मकसद नहीं था. कभी हाथ पकड़, कभी कोई भद्दी बात कहकर, कभी पब्लिक में उन्हें ‘टंच माल’ बुलाकर, कभी लाइव स्टेज पर ‘तुम्हें बजा दूंगा’ कहकर, तो कभी महज वेश्या पुकारकर. इनमें से किसी भी पुरुष का मकसद नहीं होता. क्योंकि उन्हें पता ही नहीं होता कि शोषण की केटेगरी में क्या आता है.

कुल मिलाकर, ये जिम्मेदारी औरतों के कंधों पर आ जाती है की वो यौन शोषण तो सहें ही, साथ में ये भी समझें कि पुरुष का मकसद बुरा नहीं था. और चूंकि पुरुषवाद के बड़े पंडित कह गए हैं कि अपनी सुरक्षा अपने हाथ होती है, लड़कियां बाहर भी न निकलें. क्यों?


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