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बंगाल का कसाई, जिसने एक रात में 7 हजार लोगों का कत्ल कर दिया

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आज ‘इतिहास के एक कसाई’ की बरसी है.

1971 में पूर्वी पाकिस्तान में ‘बंगाल का कसाई’ घुस आया. ये पाकिस्तानी आर्मी का अफसर था, जिसके बारे में पाकिस्तान के ही जनरल नियाजी ने लिखा था कि लड़ाई की आड़ में ‘टिक्का’ ने जो किया वो एक वर्दीधारी कभी नहीं कर सकता था. टिक्का! जनरल टिक्का!

बंगाल की उस रात को इसने खून और बर्बरता से रंग दिया. नियाजी ने चंगेज खान और हलाकू जैसे खूनियों से टिक्का की तुलना की थी.

जनरल टिक्का का खुला फरमान था: ‘लोगों से मतलब नहीं, हर कीमत पर ये जमीन चाहिए.’

1971 में ही एबीसी के रिपोर्टर हॉवर्ड टकनर ने टिक्का खान के काम पर ये रिपोर्टिंग की थी:

ब्रिटिश इंडियन आर्मी में काम कर चुका टिक्का खान कब कसाई बन गया, पता नहीं चला

टिक्का खान पाकिस्तानी सेना का 4-स्टार जनरल था. पाकिस्तान का पहला चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ. रावलपिंडी के पास पैदा हुआ टिक्का इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून में पढ़ा था. फिर वो सीधा मध्य प्रदेश के आर्मी कैडेट कॉलेज में पहुंच गया. 1935 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भरती हो गया. 1940 में वो कमीशंड ऑफिसर बन गया. दूसरे विश्व युद्ध में लड़ा भी. वो भी जर्मनी के तेज-तर्रार जनरल रोमेल के खिलाफ. बर्मा की लड़ाई में टिक्का घायल हो गया था. उसके बाद उसकी पोस्टिंग मथुरा और कल्याण जैसी जगहों पर हो गई. टिक्का का ब्रिटिश अफसर मजाक भी बनाते थे. क्योंकि उनके हिसाब से उसने हाई क्लास एजुकेशन नहीं ली थी.

विभाजन के बाद वो पाकिस्तान चला गया. वहां वो मेजर बन गया. और तेजी से प्रमोशन मिला उसको. क्योंकि 1965 की भारत-पाक लड़ाई में पंजाब के चाविंडा में लड़ा था वो. वो लड़ाई दुनिया की सबसे खतरनाक टैंक लड़ाइयों में से एक थी. उसी दौरान वो रण ऑफ कच्छ में भी लड़ा था.

1971 की लड़ाई में सरताज सिंह के साथ इंदिरा गांधी बॉर्डर पर
1971 की लड़ाई में सरताज सिंह के साथ इंदिरा गांधी बॉर्डर पर

फिर 1969 में याह्या खान पाकिस्तान के प्रेसिडेंट बन गए. उधर पूर्वी पाकिस्तान में अलगाववाद की बू आने लगी. पाकिस्तान में टिक्का की इमेज काम करा लेने वाले की थी. उसे पूर्वी पाकिस्तान भेज दिया गया.

टिक्का खान ने मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग के खिलाफ डायरेक्ट मिलिट्री एक्शन शुरू कर दिया. इसको ऑपरेशन सर्चलाइट का नाम दिया गया. पूर्वी पाकिस्तान में खून की नदियां बहा दी गईं. यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर, सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों, छात्रों सबको मारा गया. हजारों लोग मार दिए गए. ढाका में तो एक रात में 7 हजार लोग मार दिए गए. ढाका बहुत बड़ी जगह नहीं है. सोचिए कि दिल्ली में ही एक रात में 7 हजार लोगों का कत्ल हो जाए तो कैसा महसूस होगा?

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पूर्वी बंगाल की हत्याओं की तस्वीरें

टिक्का खान ने अपने बचाव में बस यही कहा था: ‘केवल 30 हजार बंगाली ही तो मरे हैं इस ऑपरेशन में.’

रॉबर्ट पेन ने बांग्लादेश की इस कहानी पर Massacre किताब लिखी है. इसके मुताबिक, ‘फरवरी 1971 में पाकिस्तान के प्रेसिडेंट याह्या खान ने कहा था: ‘तीस लाख बंगालियों को मार दो, बाकी को हम अपने हाथ से खिलाएंगे’. बांग्लादेश में 1971 के 9 महीनों में तकरीबन दो लाख औरतों और लड़कियों का रेप हुआ था.’

मिलिट्री स्टाइल में इस स्ट्रैटजी को सर्च एंड डिस्ट्रॉय कहा जाता है. अपने विरोधियों को खोजो, उनके एरिया में घुस जाओ, मार दो और वापस आ जाओ. माफी की गुंजाइश नहीं. जब लड़ाई खत्म हुई तो टिक्का खान का नाम पाकिस्तान में भी बदनाम हो चुका था. सिविलियन को मारने का ऐसा उदाहरण इतिहास में बहुत कम मिलता है. तैमूर लंग और चंगेज खान का नाम भी इसी वजह से बदनाम है. टाइम मैगजीन ने टिक्का खान को बंगाल का कसाई कहा था.

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रॉबर्ट पेन की किताब और टाइम मैगजीन का कवर

ब्रिटेन के संडे टाइम्स के पाकिस्तानी रिपोर्टर एंथनी मैस्करनहास ने 13 जून 1971 को एक आर्टिकल लिखा जिसने पूर्वी पाकिस्तान के इस खौफनाक पहलू को दुनिया के सामने रख दिया. इस आर्टिकल की शुरूआत कुछ यूं हुई है:

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एंथनी का आर्टिकल

‘अब्दुल बारी की किस्मत दगा दे गई है. पूर्वी बंगाल के हजारों लोगों की तरह उसने भी एक गलती की है. एक जानलेवा गलती. वो पाकिस्तानी सेना की नजरों के सामने आ गया है. 24 साल का ये लड़का पाकिस्तानी सेना से घिरा हुआ है. वो कांप रहा है, क्योंकि अब उसे गोली मारी जाएगी.

पर एंथनी को देख के पाकिस्तानी अफसर रुक जाता है. फिर बताने लगता है: हम सिर्फ हिंदू मर्दों को मार रहे हैं. हम सैनिक हैं. विद्रोहियों की तरह औरतों और बच्चों को नहीं मारते.’

टिक्का खान के आने के बाद एंथनी कहते हैं:

’15 अप्रैल को मैं ढाका में घूम रहा हूं. चार छात्रों के सिर इकबाल हॉस्टल में सड़ रहे हैं. हॉस्टल के पीछे की दीवारें गोलियों से छिदी हुई हैं. 9वीं डिवीजन के अफसर अजमत को मेजर बशीर चिढ़ाते हैं क्योंकि उसने एक भी कत्ल नहीं किया है.’

पर पाकिस्तानी सेना के लिए टिक्का खान एक रत्न था. उसका प्रमोशन हुआ. पाकिस्तान का पहला चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बन गया.

1974 में टिक्का खान को बलूचिस्तान के ऑपरेशन के लिए भेजा गया. यहां पर उसे बलूचिस्तान का कसाई कहा गया. इसकी लीडरशिप में 80 हजार की सेना बलूचिस्तान में घुस गई. मर्री और बुगती ट्राइब के लोगों को कुचलने के लिए. 8 हजार लोग मार दिए गए. इसमें भी विद्रोहियों और सिविलियन में कोई फर्क नहीं किया गया. उसके बाद बलूचिस्तान मानसिक रूप से पाकिस्तान के हाथ से निकल चुका है. इतनी तबाही के बाद सिर्फ बंदूक के दम पर वो पाकिस्तान के साथ जुड़ा हुआ है.

अब ढाका के शंकरी बाजार रोड का नाम टिक्का खान रोड कर दिया गया है.


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