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'बहन*द जींस, रेप भी नहीं करने देती है'

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आज एक खबर आई है. जिसमें एक औरत को जींस पहनने की वजह से स्लट कहा गया. इस खबर को आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं. इस मौके पर हम आपको कुछ और भी पढ़वाना चाहते हैं, जिसे डेलीओ के लिए कमलेश सिंह ने लिखा था.


घर से बमुश्किल आधा किलोमीटर दूर बने उस बस स्टॉप तक जाने में उसे कभी भी डर नहीं लगा. जहां तक उसे याद है, वो हमेशा उसी रास्ते से गुजरी. उसकी स्कूल बस वहीं आती थी और दोपहर में जब बस उसे स्टॉप पर छोड़ती थी, तब वो उसी रास्ते से घर वापस आती थी. स्टॉप पर मां उसका इंतजार करती थी. जब कभी मां को जरूरत पड़ी या मां शॉपिंग करने गई, तब दोनों उसी रास्ते से साथ जाते थे.

कई बार ऐसा भी हुआ जब उसे अकेले जाना पड़ा. खासकर तब जब बस उसकी कॉलोनी में वक्त से पहले पहुंच जाती थी. स्कूल के बाद कॉलेज शुरू हुआ और फिर नई नौकरी. वो रात को 9-10 बजे से पहले वापस नहीं आ पाती थी. कई बार आधी रात भी हो जाती थी. उसके छोटे से शहर में तो लोग 9 बजे ही बिस्तरों में दुबक जाते हैं. मिडल क्लास वाले मोहल्ले में ऐसे ही होता है. दूरदर्शन पर न्यूज खत्म होने का मतलब होता है कि लाइट बंद कर दो. सोने का वक्त हो गया. कई बार लाइन में फॉल्ट होने की वजह से सड़कों पर लगी लाइटें भी आंखें मूंद लेती थीं. लेकिन इन सबसे कभी कोई फर्क नहीं पड़ा. एक बजती धुन की तरह वो सीधे घर के दरवाजे पर रुकती थी. वो उस सड़क की हर ईंट पहचानती थी. हर ईंट.

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कल की रात भी दूसरी रातों जैसी ही थी. उसने 9 बजे तक काम खत्म कर लिया और साढ़े नौ तक वो कॉलोनी के बस स्टॉप पर थी. वो चंद कदम ही आगे बढ़ी होगी, तभी पीछे से एक बाइक आकर उसके पास रुकी. पिछली सीट पर बैठा बंदा जल्दी से उतरा और उसका हाथ पकड़कर जोर से उसका मुंह दबा दिया. दूसरे लड़के ने बाइक खड़ी की और अपने साथी के साथ उसे पार्क की दीवार के पास उगी झाड़ी के पास खींच ले गया.

लड़की की पीठ दीवार से सटी थी और सामने दोनों लड़के थे. वो हक्काना सा लड़का अपने हाथ से उसका चेहरा दबा रहा था और दूसरा उसकी कमर में फंदा डाल चुका था. वैसे उसकी हाइट 5.2 फुट थी और वो झगड़ सकती थी. मगर उस पल उसे लगा कि वो कुछ नहीं कर सकती. उसके दिमाग में कोई जोर से चिल्लाया… रेप.

उन दोनों लड़कों को उसके ऊपरी हिस्से में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्होंने जींस की बटन खोल दी, जहां उनका निशाना था. वो हार मान चुकी थी. वो इतनी बेबस थी कि उसने अपना सिर एक झटके से दीवार पर दे मारा. एक अनजान शख्स उसका हाथ जकड़े हुए था, जो उससे कहीं ज्यादा ताकतवर था. वो बचने की कोशिश कर रही थी. उसकी एक नस खिंच रही थी. उसकी बचने की कोशिश का कोई फायदा नहीं हो रहा था.

लेकिन वो कमीने अब तक लगे हुए थे. दोनों लड़की के जिस्म को ढंकने वाले एक बेजान कपड़े से जूझ रहे थे. वो टाइट-फिट माइल्ड-टेपर्ड जींस… कमबख्त उतर ही नहीं रही थी. तभी एक मजबूत हाथ पीठ की तरफ से जींस में घुसा. उस हट्टे-कट्टे लड़के ने कोशिश की कि जींस फाड़ दे, लेकिन जींस उस समय शायद दीवार से भी ज्यादा मजबूत थी. ऐसा लगा जैसे इस जींस को कभी कुछ नहीं होगा. तभी दूर कहीं से इंजन की आवाज आने लगी.

हड़बड़ाए हुए दोनों लड़कों ने अपनी पूरी ताकत उसके चेहरे और टांगों पर झोंक दी. लड़की के मुंह से जरा सी भी आवाज नहीं निकल पाई. जीप गुजर गई.

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तभी उनमें से एक लड़के ने दूसरे से कहा कि बाइक सड़क के किनारे लगा दो. बाइक दिखने की वजह से वो लड़की को छोड़कर भाग नहीं सकते थे. कपड़े के साथ हो रही इस लड़ाई में दोनों ने अपनी मां के पिए दूध का खूब इस्तेमाल किया. इतनी ताकत लगाने के बाद भी जींस कमर से जरा सी नीचे खिसक गई थी. बस. इससे उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. उसके अंदर जरा भी ताकत नहीं बची थी कि वो अपना बचाव करे, लेकिन दोनों लड़के एक धक्का और देना चाहते थे. दोनों पंजाबी में फुसफुसाकर बातें कर रहे थे, जो लड़की को जरा भी समझ नहीं आ रही थीं.

इस सबसे वो बड़ा सा लड़का बौखलाहट से भर गया. उसने लड़की के मुंह से अपना हाथ हटाया और एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके चेहरे पर रसीद कर दिया. उस लड़के के ठंडे, मजबूत हाथ और अपने दांतों के बीच उसका होंठ एकदम पिस गया. आखिरकार दोनों हार मानकर चल दिए.

वो वहीं बैठ गई. या शायद उसने अपनी पीठ को दीवार के सहारे फिसलने दिया और खुद को वहीं गिरा दिया. बाइक का इंजन चीखा, लेकिन अभी कुछ बाकी था. पिछली सीट पर बैठा बंदा एक बार फिर बाइक से उतरकर लड़की के पास आया और लड़की की टांग पर लात मारते हुए बोला, ‘बहन*द’. जब वो यामाहा R15 वहां से जाने लगी, तो यही शब्द एक बार फिर उसके कानों में पड़ा, ‘बहन*द जींस‘. दूर खत्म होती रोशनी के पार जाते ही इंजन की आवाज भी खो गई. वो भागकर अपनी मां के पास पहुंच जाना चाहती थी, लेकिन नहीं… वो बैठी रही. वहां बैठे हुए एक-एक पल उसे लंबी जिंदगी सा महसूस हो रहा था. उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.

जैसे ही वो उस नींद से निकली, तेज रफ्तार में एक बाइक उसके पास से गुजर गई. उसका दिल छाती से बाहर निकल आना चाहता था. वो एक झटके से खड़ी हुई और अपना बैग खोजने लगी. बैग मिलते ही उसने उसे छाती से सटा लिया. पहले कुछ कदम उसने बड़ा सकुचाते हुए बढ़ाए. लेकिन घर के नजदीक पहुंचते ही उसने रोज वाले हावभाव ओढ़ लिए. जैसे वो कोई आम दिन बिताकर घर आई हो.

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मम्मी-पापा बरामदे में बैठे थे. उसे देखते ही बोले, ‘आ गए बेटा.’ वो उनसे बिना कुछ कहे अंदर चली गई. कमरे में जाते ही उसने पर्स बेड पर फेंक दिया और चप्पल उतारकर सीधे बाथरूम में चली गई. नल खोला और चेहरे पर पानी मारने लगी. अक्टूबर का महीना था. पानी ठंडा था. उसे महसूस भी नहीं हो रहा था कि वो रो रही है या नहीं. उसे याद ही नहीं आया कि वो कब रोने लगी थी या ये सिर्फ पानी था, जो बहा जा रहा था. वो लगातार चेहरे पर पानी मारती जा रही थी, तभी दरवाजे से आवाज आई:

‘तुम ठीक हो बेटा?’
‘हां मां.’

अनजाने में वो कपड़े पहने ही नहाने लगी थी. ध्यान आते ही उसने टॉप और ब्रा उतारकर जमीन पर ही फेंक दिए. रोज की तरह. घर आकर वो सबसे पहली यही काम करती थी. अभी तक उसने खरोचों, कट और सूजे हुए सिर पर ध्यान नहीं दिया था. उसे दर्द महसूस हो रहा था, लेकिन वो उस पर ध्यान ही नहीं दे रही थी. तभी उसने देखा उसकी जींस की बटन और चेन अब भी खुले हुई हैं. वो जमीन पर बैठकर पैरों की तरफ से जींस निकालने लगी. जींस गीली थी. निकल ही नहीं रही थी. लग रहा था जैसे किसी ने जींस को खाल से चिपका दिया हो. टाइट-फिट माइल्ड-टेपर्ड जींस. ‘फक! डैम! गर्रर्रर्र…’ ये भुनभुनाते हुए वो पूरी ताकत से उस कपड़े को निकालकर दूर फेंक देना चाहती थी. रुक-रुककर उसने कई बार ये कोशिश की. न जाने कितनी देर तक ये चलता रहा.

लेकिन अचानक… अचानक उसके भिंचे हुए दांत मुस्कुराहट में बदल गए और वो बोली, ‘बहन*द जींस!’


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