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बच्चों को सेक्स, पीरियड्स के बारे में नहीं बताएंगे, तो वो लड़कियों को चरित्रहीन ही समझेंगे

#. दिल्ली से ईद की शॉपिंग करके घर जा रहे लड़के को ट्रेन के कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिए जान से मार दिया, क्योंकि उन्हें शक था कि वो अपने साथ बीफ ले जा रहा है.

#. देश में 1 जुलाई से लागू होने वाले GST बिल के क्या नफा-नुकसान हैं, इसके बारे में देश के 90% लोगों को जानकारी नहीं है. GST के समर्थन या विरोध के पीछे पीएम मोदी हैं. उनके समर्थक इसे सही बता रहे हैं, जबकि विरोधी गलत बता रहे हैं. लेकिन, इनमें से शायद ही किसी को बिल के बारे में कोई ढंग की जानकारी हो. लोग बस इतना जानते हैं कि इससे पूरे देश में टैक्स रेट एक सा हो जाएगा.

लेकिन, हमारे समाज को इन चीज़ों से कोई फर्क नहीं पड़ता, न ही इन मुद्दों पर मैंने अपने आस-पास कभी कोई चर्चा होते सुनी. क्योंकि हमारे समाज को अपने ढकोसलों पर बात करने से फुर्सत नहीं है. हम एक-दूसरे के बारे में बात करने को लेकर इतने जज्बाती हैं कि उसके लिए अपनी जरूरत की कोई भी बहस कुर्बान करने को तैयार हैं, भले वो कितनी भी जरूरी हो.

मोहल्ले की लड़की का लव-मैरिज करना किसी भी बड़े मुद्दे को ताक पर रखवाने की क्षमता रखता है. और उनका ये करना सही भी है, क्योंकि खुद की मानसिकता से न लड़ पाने वाले लोग देश की समस्याओं से क्या लड़ेंगे! इन्हीं वजहों से हमारा समाज दुनिया के सबसे पिछड़े समाजों में गिना जाता है. और ये गिनने वाले कोई और नहीं, इसी समाज के भुक्तभोगी हैं, जो अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए हैं.

भारत आई एक पर्यटक को घूरते लोग
भारत आई एक पर्यटक को घूरते लोग

अगर आप इन लोगों को जानना चाहते हैं, तो कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं. बस बालकनी में खड़े होकर मोहल्ले की आंटियों का ग्रुप देख लीजिए. नजदीक जाने पर आपको मोहल्ले की एक-दो लेटेस्ट न्यूज़ भी मिल जाएंगी. घर में भी देखिए, जहां आपके मम्मी-पापा बगल वाले श्रीवास्तव अंकल की लड़की के बारे में बात करते मिल जाएंगे, जो कल रात पार्टी में छोटे कपड़े पहनकर आई थी और बगल वाले लड़के से बात कर रही थी. पर एक बात का ख्याल रहे, वो आपके जाते ही चुप हो जाएंगे और मम्मी को चाय बनाने का ऑर्डर पास हो जाएगा.

वही मम्मी-पापा कभी आपके सामने सेक्स एजुकेशन और पीरियड्स के बारे में बात नहीं करेंगे, जो हर किसी को जानना जरूरी है. पर इन्हें हमसे छिपाकर रखा जाता है. अब टाइम आ गया है कि इस दोगले किस्म की हमारी सोसायटी में बदलाव आए. इस कड़ी में जिन चीज़ों से हमारी सोसायटी को ‘यूज़ टू’ होना चाहिए, यहां मेंशन कर रहा हूं:-

#1. इंटरकास्ट मैरिज

ये हमारी सोसायटी की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है और इसका तो मुझे फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस है. मेरे बड़े पापा की बेटी काफी पढ़ी-लिखी हैं. जर्मनी में रहती हैं. उन्होंने अपने ऑफिस के ही एक इंडियन लड़के से शादी कर ली, जो उनकी कास्ट का नहीं है. सालभर पुरानी इस बात का मुझे, परिवार के ही एक मेंबर को, कुछ दिनों पहले पता चला.

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अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि लोग अपने ही बनाए समाज से कितना डरते हैं. उन्होंने ये बात सबसे इसलिए छिपाकर रखी, क्योंकि उन्हें ‘बदनामी’ का डर है. ‘कोई सुनेगा, तो क्या कहेगा?’ पर उन्होंने ये नहीं सोचा कि उनकी बेटी खुश है या नहीं. जब समाज को इसका पता चला, तो उन्होंने सबके सामने अपनी लड़की को डिसओन कर दिया, ताकि समाज उन्हें पूजे.

अरे इससे समाज को क्या फर्क पड़ गया? दूर तो आप हुए न अपने बच्चे से. समाज तो इस पर दो दिन बात करने के बाद दूसरा खिलौना ढूंढ लेगा, पर मुझे ये समझ नहीं आता कि इंटर-कास्ट मैरिज में गलत क्या है! कोई भी इंसान उसी के साथ रहना पसंद करेगा, जिसके साथ वो खुश रहता है. हम कॉलेज/स्कूल में अपने दोस्त भी तो इसी तरह चुनते हैं न. वहां तो हम किसी से उसकी जाति या धर्म पूछकर दोस्ती नहीं करते. तो लाइफटाइम के लिए ऐसे दोस्त चुनने में क्या प्रॉब्लम है.

मेरी मम्मी आधे टाइम इसी टेंशन में रहती है कि कहीं उनके बच्चे दूसरी कास्ट में शादी न कर लें. लेकिन मुझे लगता है कि अब हमारी सोसाइटी को इससे सामंजस्य बिठाने की कोशिश करनी चाहिए. यही हमारे हित में है.

#2. दहेज़ प्रथा

ये तो मतलब सामाजिक कुरीतियों की पराकाष्ठा है. लोग अपनी लड़की देते हैं और उसके साथ अच्छी-खासी रकम और ढेर सारे गिफ्ट्स भी. अरे हां, इन्हें तो अब गिफ्ट कहा जाता है, क्योंकि दहेज़ कहने-सुनने में ओछा लगता है. बढ़िया दहेज़ वाली शादी के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. नजदीक का ही एक किस्सा बताता हूं. अच्छे ओहदे पर काम कर रहे एक सरकारी कर्मचारी हैं. घरवाले पूरे प्लान में थे कि किसी बढ़िया खानदान में शादी करेंगे.

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आप भी कोई कच्चे खिलाड़ी तो हैं नहीं, जो अच्छे खानदान का मतलब समझाना पड़े. लेकिन यहां स्टोरी में ट्विस्ट है. लड़का पहले से किसी लड़की के साथ रिलेशनशिप में था, जो उसकी कास्ट की नहीं थी. अब घरवाले नाराज. परेशान यहां-वहां टहल रहे थे कि बताओ, अब ये इंटरकास्ट शादी करेंगे. थोड़ी देर बाद लड़की के पापा का फ़ोन आया और मामला सॉर्टेड. जो घरवाले अब तक नाक फुलाए घूम रहे थे, वही बैंक अकाउंट नंबर टेक्स्ट कर रहे थे.

यहां तो शादी हुई. धूम-धाम से हुई. लेकिन उनका क्या जो फ़ोन तो करते हैं, लेकिन विनती करने के लिए. रकम कम करवाने के लिए. ये दहेज़ ही है, जो समाज में कई और बुराइयों को जन्म देता है. इसी प्रथा की देन है कि लोग मनमाना दहेज़ न मिलने पर लड़कियों को मारते-पीटते हैं. जान से भी मार देते हैं. यही दहेज जब लेना हो, तो बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन देने की बारी आते ही सबकी घिग्घी बंध जाती है. तो फिक्र करनी है, तो बैंक बैलेंस की नहीं, बल्कि सोशल बैलेंस की फिक्र करिए. तभी कुछ अच्छा होगा.

#3. जेंडर इश्यूज

इस तरक्की-पसंद दुनिया में हमारा समाज लड़के-लड़कियों में अंतर करता है. लोगों को लड़कियों के छोटे कपड़े पहनने, शराब पीने, बॉयफ्रेंड बनाने और शादी से पहले सेक्स करने से दिक्कत है. सोसायटी को तो लड़कियों की हर दूसरी बात से दिक्कत है. हमारे समाज में महिलाओं को को लिमिटेड छूट है. उन्हें सिर्फ वही करने की इजाज़त है, जो इस पुरुषवादी समाज को सही लगता है. अगर कोई लड़की इस बंधन से खुद को आजाद करके एक खुली ज़िंदगी जीना चाहे, तो उसे बहुत सी कुर्बानियां देनी पड़ती है.

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

हम हमेशा लड़कियों को लड़कों से कम आंकते हैं, जबकि दुनियाभर में सूरत बदल रही है. पर हमें ये दिखता ही नहीं. हम उस देश में रहते हैं, जहां प्रधानमंत्री को ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाएं लानी पड़ती हैं, क्योंकि आम आदमी के दिमाग पर पत्थर पड़ चुका है. हम उस देश में रहते हैं, जिसके लिए फेसबुक को प्रोफाइल पिक्चर गार्ड जैसे एक्सक्लूसिव फीचर लांच करने पड़ते हैं, ताकि लोग लड़कियों की तस्वीरों का गलत इस्तेमाल न कर सकें.

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लड़कियों की इज्जत को उनके कपड़ों और लिंग से जोड़ा जाता है, जबकि लड़कों के साथ कभी ऐसा नही किया जाता. कभी-कभी तो बड़ी कोफ़्त होती इससे. बातें हम चाहे जितनी बना लें, पर हम खुद भी उन्हीं पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं. और इसमें हमारी कोई गलती नहीं है, क्योंकि हम वही कर रहे हैं, जो हमने सीखा है. और उन्ही चीज़ों को बदलने के लिए ये लिखा जा रहा है. हमें अपनी सोच का दायरा बढ़ाने की जरूरत है और इसकी शुरुआत खुद से करनी होगी. तभी कुछ बदलेगा,, वरना हम जो हैं, वो तो हैं ही.

#4. बच्चों की पैशन संबंधी समस्या

पेरेंट्स बच्चे के पैदा होते ही तय कर लेते हैं कि उसे बड़े होकर क्या बनाना है और वो तब तक उसे बनाने की कोशिश करते हैं, जब तक बच्चा खुद कोई आइडिया लेकर न आ जाए. बच्चे की इस पैशन वाले भूत से उनका दीर्घ-सूत्री कार्यक्रम स्थगित सा हो जाता है. हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा कुछ अच्छा कर जाए, लेकिन उनके हिसाब से ‘अच्छा’ सिर्फ पढ़ना है और बाकी चीज़ें बकवास.

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सांकेतिक तस्वीर

पढ़ाई के अलावा किसी फील्ड में उन्हें कोई स्कोप नज़र नहीं आता. ये वो वक्त है, जब बच्चे एक्टर से लेकर सोशल मीडिया एक्सपर्ट और न जाने क्या-क्या बनने की चाहत रखते हैं, जबकि पेरेंट्स उन्हें सिर्फ सरकारी नौकरी करते देखना चाहते हैं. तो पेरेंट्स से विनती करें, उन्हें कन्विंस करें. उस फील्ड का स्कोप समझाएं. और पेरेंट्स, प्लीज आप भी अपने बच्चों की बात एक बार जरूर सुनें. अपने बच्चों को कम से कम एक मौका जरूर दें, ताकि वो आपको कुछ करके दिखा पाएं.

#5. टैबू पर बात

मुझे याद नहीं कि मेरे घर में आज तक किसी भी बड़े ने सेक्स, पीरियड या प्रेग्नेंसी जैसी चीज़ें कभी बोली हों. असल में ऐसा कभी हुआ ही नहीं. हमारे घर में भी एक सेंसर बोर्ड है और उसने इन शब्दों को ‘कस वर्ड्स’ की लिस्ट में डाल रखा है. हमारा आधा बचपन इसी क्यूरॉसिटी में बीत जाता है कि बच्चे कैसे पैदा होते हैं. क्लास 10 की बायोलॉजी में जब इसका चैप्टर आता भी है, तो टीतर कह देते हैं, ‘ये सब तो आपको पता ही होगा.’

जिन बातों को छिपाया जाता है, उन पर हमारी खास नज़र होती है. मुझे पीरियड्स से जुड़ी आधी चीज़ें तब पता चलीं, जब मेरी उम्र 20 की हुई. घर में एक ऐसा टाइम आता है, जब सब खुशनुमा हो जाता है. सब खुश रहते हैं, एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं. इस पर बहुत रिसर्च के बाद दीदी से पता चला कि आंटी प्रेग्नेंट हैं. अरे तो हमें भी तो इस खुशखबरी का पता होना चाहिए. हम कौन सा आंटी के पेट पर लात मार देंगे. हद है यार!

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इसी चक्कर में कई बार बच्चों का उत्पीड़न हो जाता है. उन्हें तो कभी बताया ही नहीं गया कि ऐसा कुछ एक्जिस्ट भी करता हैं. अगर हम इस पर खुलके बात करें, तो वो सबके लिए बेहतर है. वरना तो हम उन लड़कियों को चरित्रहीन ही समझेंगे, जो अपनी पीरियड्स के बारे में खुलकर बात करती हैं. जब मुझे पता चला कि ये बहुत कॉमन चीज़ें है, तो मैं दो मिनट के लिए सन्नाटे में चला गया. लगा कि मेरा पूरा बचपन तो धोखे में ही निकल गया.

ये चीज़ें उतनी ही जरूरी हैं, जितनी कोर्स की पढाई. तो प्लीज अपने बाल-बच्चों से इन चीज़ों के बारे में जरूर बात करें, उनका कन्फ्यूजन दूर करें. उन्हें किसी और से ये चीज़ें पूछने के लिए मजबूर न करें. खुद बताएं और जितनी जल्दी हो सके, समझा दें. ताकि उन्हें भविष्य में कोई समस्या हो, तो वो खुद आकर आपसे बात करें. आप से दूर न भागें. खुद में ही न उलझ जाएं.

समय की जरूरत है बदलाव और वो जरूर आना चाहिए. उसके लिए जो करना पड़े, किया जाए. हमें जो कहना था, कह दिया. बाकी कहा-सुना माफ़ हो.


ये आर्टिकल दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहेश्वेतांक शेखर ने लिखा है.


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