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बस ये एक शब्द बोल दोगे और टॉप के सूफी सिंगर-राइटर हो जाओगे

‘रांझण दे यार बुलेया
सुन ले पुकार बुलेया
तू ही तो यार बुलेया
मुर्शिद मेरा… मुर्शिद मेरा…

तेरा मुकाम कमले
सरहद के पार बुलेया
परवरदिगार बुलेया
हाफिज तेरा… मुर्शिद मेरा…’


रणबीर कपूर इन दिनों ये बोल गुनगुना रहे हैं ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में. किसी बुलेया से बात कर रहे हैं. उसे अपना यार बताकर उससे कुछ अरज कर रहे हैं. पर ये बुलेया है कौन? ये कौन है जो अक्सर गाने के बोलों में हमारा यार बन जाता है. आखिर कौन है ये जिससे हर कोई हमनवां होना चाहता है. कोई उसका कलाम पढ़ता है तो कोई उससे उसकी पहचान पूछता है. कोई उसके बहाने सूफी हो जाना चाहता है.

और इतने सारे सवालों के बीच बुलेया कहता है, ‘बुल्ला की जाणां मैं कौन…’.

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जिस बुलेया से आप वाबस्ता होना चाहते हैं, वो कहता है, मैं खुद नहीं जानता कौन हूं. उसे नहीं पता कि ‘होना’ क्या होता है. जब हम बुलेया को ढूंढने निकलते हैं तो वो हमें मुर्शिद खोजने की राह में खड़ा मिलता है. हजरत मोहम्मद का वो वशंज ख़ुदा को पाने निकला था. इस सफर में एक दौर वो भी आया जब बुल्ला खुद अपने मुर्शिद के रंग में रंग गया और कहने लगा, ‘रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई…’.


बुलेया पहले अब्दुल्ला शाह था. 1680 में पैदा हुआ. तब भारत और पाकिस्तान नहीं थे. बहावलपुर था (अब पाकिस्तान में). वहीं पैदा हुआ था. फिर अपने पिता के साथ मलकावल (मुल्तान) चला गया. बाद में प्यार से नाम मिला बुल्ले शाह. इस्लामी और सूफी किताबों से कई मुलाकातों के बाद बुलेया को रब पाने की चाहत हुई. इसके लिए एक मुर्शिद की जरूरत थी. मुर्शिद यानी जो उसका रहबर हो, गुरू हो, सांई हो. जब बुलेया बाग में आम गिराने की कलाकारी दिखा रहा था, तब शाह इनायत पास में खड़े थे. दोष देने लगे तो बुलेया बोला, ‘मैंने तो कुछ किया ही नहीं.’ दोनों पहचान गए एक-दूसरे को. बुल्ला इनायत के कदमों में लोट गया और बोला, ‘ख़ुदा से मिला दो.’

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इनायत बोले, ‘बुलेया, रब दा की पौणा, एधरों पुटणा ते ओधर लाउणा‘ यानी बुल्ले, रब को पाना मतलब एक पौधे को यहां से उखाड़कर वहां लगा देना है. बस. बुल्ला अपने सफर पर निकल गया और इतनी दूर चला गया, जहां उसकी कोई जात, कोई पहचान नहीं रह गई. ‘टोटल सियाप्पा’ में अली जफर बुलेया से गुजारिश करते हैं, ‘चल बुल्लेया चल ओथे चलिए, जित्थे सारे एन्ने, ना कोई साड्‌डी जात पछाने’. बेशक, बुलेया की कोई जात नहीं है, लेकिन न जाने कितने चेहरे बुलेया में अपनी पहचान ढूंढ लेते हैं.

लेकिन बुलेया का ये सफर इतना आसान नहीं था. इनायत शाह जाति से अराइन थे. सैय्यद जाति के बुल्ले शाह से छोटी जाति के. ये दिल्लगी देखकर हर कोई बिफर पड़ा. बुलेया की भाभी आईं और कहने लगीं:

बुल्ले नूं समझावन आंइयां पैणां ते परजाइयां
‘मन्न ले बुल्लेया साड्डा केहणा, छड्ड दे पल्ला राइयां
आल नबी, औलाद अली, नूं तू क्यूं लीकां लाइयां?

मतलब: बुल्ले की बहनें और भाभियां समझाने आईं, ‘बुल्ले हमारा कहना मान ले और अराइन को छोड़ दे. नबी के परिवार और अली के वशंजों पर कलंक मत लगा.’

लेकिन पता है उस बेख़ौफ, बेक़ैद बुलेया ने क्या जवाब दिया:

‘जेहड़ा सानू सैय्यद सद्दे, दोज़ख़ मिले सजाइयां
जो कोई सान्नूं राईं आक्खे, बहिश्तें पींगां पाइयां
राईं-सांई सभनीं थाईं रब दियां बे-परवाइयां
सोहनियां परे हटाइयां ते कूझियां ले गल्ल लाइयां
जे तू लोड़ें बाग-बहारां चाकर हो जा राइयां
बुल्ले शाह दी जात की पुछणी? शुकर हो रजाइयां

मतलब: मुझे सैय्यद बुलाने वाला नरक जाएगा और अराइन कहने वाले को स्वर्ग में झूले मिलेंगे. अराइन और सैय्यद पैदा होते रहते हैं, रब को जाति की परवाह नहीं है. वो खूबसूरतों को दूर हटाकर बदसूरतों को गले लगाता है. अगर तुझे स्वर्ग चाहिए तो अराइनों का नौकर बन जा. बुल्ले की जाति क्या पूछता है, इस दुनिया के लिए रब का शुक्र मना.

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इसी बेख़ौफ और बेक़ैद बुलेया से जब इरशाद कामिल मुलाकात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे बुलेया बगल में बैठा अपना यार है. ‘अ वेडनेसडे’ के लिए लिखा गया था ये गाना जिसे तोशी ने गाया था. ‘ओ बुल्ले शाह ओ यार मेरे…

ख़ुदा से इश्क के पंथ सूफी को, सूफी बनाने में ढेर सारे लोगों ने कांधा लगाया, लेकिन बुलेया ने दिल लगाया. यही कारण है कि आज बुलेया का सहारा लेकर सूफी हो जाना बड़ा आसान है. बुलेया ने अपने मुर्शिद को अपना महबूब बना लिया और लिख दिया, ‘मेरा पिया घर आया ओ लाल नी…‘. 1993 में वाशिंगटन के मीनी हॉल में बैठे नुसरत फतेह अली ख़ान साहब जब बुलेया का ये कलाम गा रहे थे तो हर कोई अपने पिया को अपने दिल में महसूस करने लगा.

वैसे बुलेया और उनके मुर्शिद शाह इनायत की कहानी भी बड़ी हसीन है. इश्क का सफर था. यकीनन मुश्किल रहा. एक बार बुलेया ने ख्वाहिश जताई कि वो हजरत रसूल का दीदार करने हज जाना चाहता है. इनायत अली ने उसे उसके सपने में ही रसूल से मिला दिया. ख्वाब में बुल्ला पहचान ही नहीं पाया कि दोनों में से हजरत कौन था और मुर्शिद कौन. लेकिन एक दिन कहानी पलट गई.

बुलेया के अंदर अभी तक बुलेया बाकी था और प्रेम की राह में ये सबसे बड़ा रोड़ा था. मुर्शिद खफा हो गए इस बात से. उन्होंने बुल्ले को ठुकरा दिया. ये इम्तिहान था बुल्ले का. मुर्शिद से दूर बुलेया तड़पती हीर सा हो गया. घुंघरु बांध लिए. नाचना सीख लिया. गाना सीख लिया. ऐसी काफियां लिखने लगा जो सीधे ख़ुदा तक पहुंचाती हैं. गाता रहा. तब तक गाता रहा, जब तक मुर्शिद पिघल नहीं गए. आखिरकार मुर्शिद लौटे और बुल्ले से पूछा, ‘तू बुल्ला है?’ बुल्ला बोला, ‘नहीं मुरशद, मैं भुल्ला (भूला) हूं.’ मुर्शिद रो पड़े और बुल्ले को रब मिल गए. वो गाने लगा, ‘आवो नी सइयों रल देवो नी वधाई, मैं वर पाया रांझा माही‘.

बुलेया का महबूब सिर्फ रब नहीं, राम भी है. वो तो बस नजर का फर्क है. ये फर्क हमने 1995 में खत्म होते देखा, जब ‘याराना’ में बेसबब हुस्न वाली माधुरी नाचते हुए गाती हैं, ‘मेरा पिया घर आया ओ राम जी… मेरा पिया घर आया’. माया गोविंद ने लिखा था ये गाना जो बुल्ले के कलाम पर ही था.

पाकिस्तान से शुरू हुआ बुल्ले शाह का सफर पंजाब और वहां से अमेरिका तक पहुंचा. गुलजार बताते हैं कि सूफियों का कलाम गाते-गाते आबिदा परवीन खुद सूफी हो गई हैं. उनकी आवाज अब इबादत की आवाज लगती है. वही आबिदा जब बुल्ले शाह को गाती हैं तो सारे हिसाब आंखें मूंदकर बैठ जाते हैं. ‘जे रब मिलदा नहातेयां धोतेयां…

वैसे गुलजार का जिक्र हो और महफिल गुलाबी न हो, ऐसा मुमकिन नहीं. कबीर को हमसे मिलाने वाले गुलजार ने बुल्ले शाह को भी हमसे मिलाया. मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ में गुलजार ने लिखा था, ‘रांझा रांझा करदी नी मैं आपै रांझा होई.‘ ये बुल्ले शाह का ही कलाम था.

जब बुल्ले शाह के लिए उनका मुर्शिद उनका साजन, यार, सांई, आरिफ, रांझा, महबूब, शौह, हादी, आरियां… सब हो गया था, तब बुल्ले शाह ने ये लिखा था:

‘रांझा रांझा’ करदी हुण मैं आपे रांझा होई
सद्दो मैनूं धीरो रांझा हीर न आक्खो कोई.

रांझा मैं विच, मैं रांझे विच गौर खिआल न कोई
मैं नाही ओह आप है अपणी आप करे दिलजोई.

जो कुझ साडे अन्दर वस्से जात असाडी सोई
जिसदे नाल मैं न्योंह लगाया ओही जैसी होई.

चिट्टी चादर लाह सुट कुड़िए, पहन फकीरां दी लोई
चिट्टी चादर दाग लगेसी, लोई दाग न कोई.

मतलब: रांझा रांझा करते-करते मैं खुद ही रांझा हो गई हूं. अब मुझे हीर नहीं, रांझा ही कहो. अब रांझा मुझमें है और मैं रांझे में हूं, अब मैं कुछ भी नहीं हूं और सब रांझा ही है. जो हमारे अंदर है वही हमारी जाति है. मैंने जिससे प्रेम किया, उसके जैसा ही हो गई. सफेद चादर छोड़कर फकीरों की लोई पहन लो, क्योंकि सफेद चादर में दाग लग जाएगा, लेकिन लोई में कोई दाग नहीं लगेगा.

वजूद के जादूगर बुल्ले शाह दूसरों को भी जादूगरी दिखाने का मौका देते हैं. गुलजार ने ये मौका नहीं छोड़ा. ‘जब तक है जान’ में जब वो ‘हीर हीर न आक्खो ड़ियो’ लिख रहे थे तो उनकी हीर रांझा नहीं, बल्कि साहिबां हो गई. वो रांझा नहीं, साहिबां कहलाना चाहती है.

कई बार तो बुल्ले शाह के लिखे काफियों की भी जरूरत नहीं पड़ती. बस उनका नाम भर जोड़ देने से माहौल सूफियाना हो जाता है. यही हुआ ‘इनकार’ के गाने ‘मौला तू मालिक है’ में. स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा ने इसकी शुरुआत बुल्ले शाह के चंद लफ्जों से की, ‘अब हम गुम हुए गुम हुए…’

कोक स्टूडियो के गाने ‘मदारी’ में भी ऐसा ही था. विशाल ददलानी के साथ सोनू कक्कड़ गाती हैं, ‘हाजी लोक मक्के नूं जांदे, ते असां दे जाणां तख्त हजारे. आन फकीर ले खा खा जावें, राजी होवो बुल्ला.‘ सब बुल्ले दी मर्जी है.

1757 से 1759 के बीच न जाने किस दिन बुल्ले शाह चले गए. प्रेम करना सिखाकर. वो न जाने कितनों को सूफी बना गए. पर हमारी पहुंच से इतनी दूर होने के बावजूद उनसे मिलने में हमें कभी ज़हमत नहीं हुई. अभी कुछ दिनों पहले ही ‘सुल्तान’ में इरशाद कामिल ने उन्हें न्यौता दिया था. पेपॉन गा रहे थे, ‘मैं भी नाचूं मनाऊं सोहणे यार को, चलूं मैं तेरी राह बुलेया. मैं भी नाचूं रिझाऊं यार को, करूं न परवाह बुलेया.

और अब सबसे खास चीज. बुलेया हमेशा कहता है कि उसकी कोई पहचान नहीं है पर इस सवाल पर वो एक संजीदा जवाब भी देता है. बुल्ला बताता है न उसका कोई नाम है, न कोई देश है. न कोई मजहब, न कोई जाति. कोई किताब, कोई भाषा उसकी पहचान नहीं है. बुल्ले शाह का ये काफिया रब्बी शेरगिल ने गाने की तर्ज पर गाया है. पांच साल के स्ट्रगल के बाद बन पाया ये गाना हर उस शख्स के लिए तोहफा है जो बुल्ले शाह के रंग में रंगना चाहता है.


आज बुल्ले शाह फैशन बन चुके हैं. उनका नाम, उनके कलाम, उनकी काफियां छू भर लेने से लोगों को सूफी होने का गुमान हो जाता है. आज बुल्ले शाह हमें खुश्क नाज़नीन चेहरों और गिटारों के बीच भी मिल जाते हैं. शॉर्टकट से हो गए हैं वो. कभी अकेले में बैठकर बुल्ले शाह को गुनगुनाएंगे तो महसूस होगा जैसे दिल में कुछ जुड़ा सा जा रहा है.

बुल्ले शाह ने पाकिस्तान के कसूर में आखिरी सांस ली थी. वहां आज भी हर साल लोग जमा होते हैं. दिनभर सूफी गाते हैं. झूमते हैं. दीवाने हो जाते हैं. बुल्ले के रंग में डूब जाते हैं.

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