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क्या आपको भी चहास लगती है?

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abhishek singhचाय पर यह आर्टिकल हमें भेजा है ‘दी लल्लनटॉप’ के रीडर अभिषेक सिंह ने. साहित्य और राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं और चायप्रेमी भी हैं. अदरक वाली पीते हैं. पत्ती ठोंक के, चीनी रोक के. आपके पास भी कायदे का कंटेंट हो तो हमें lallantopmail@gmail.com पर भेज सकते हैं. हमें ठीक लगा तो छापेंगे.


सर्दी ज्यादा थी. चीन के महान राजा शैन नांग गर्म पानी पी रहे थे, उसी वक्त उनके कटोरे में कुछ पत्तियां उड़कर गिर गईं. राजा ने देखा कि पत्तियों से पानी का रंग बदलकर भूरा हो रहा है और उससे कमाल की खुशबू आ रही है.

शैन नांग से रहा नहीं गया. उन्होंने उसे पीना शुरू किया और मंत्रमुग्ध हो गए. 2737 ईसापूर्व में राजा शैन नांग ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वो दुनिया को क्या बताने जा रहे हैं. जो पत्तियां गिरी उन्होंने इस मुल्क के सबसे बड़े हुक्मरान का मुस्तकबिल लिखा. जी हां, यहां चाय की बात हो रही है.

वही चाय जिस पर चर्चा करके एक शख्स प्रधानमंत्री बन गया. वही चाय जिसको मेजबानी में परोस कर मेहमान नवाजी की इबारतें लिखी जाती हैं. हिंदुस्तान में चाय को लाने वाले अंग्रेज थे. 1820 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने चीनी बीज और चाय की खेती की चीनी तकनीक का इस्तेमाल करना शुरू किया और बड़े पैमाने पर उनके लिये ऐसा कर पाने वाले काश्तकार खोजे जाने लगे क्योंकि पूरी दुनिया (खासकर कोरिया, ताइवान और जापान) में चाय की मांग बढ़ रही थी.

जोरहाट, असम की तस्वीर. Photo: Reuters
जोरहाट, असम की तस्वीर. Photo: Reuters

चाय जो चीन में पहले दवाई के रूप में इस्तेमाल होती थी वो दैनिक उपभोग में शामिल हो गई. जब मांग बढ़ी तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे असम में उगाने का फैसला किया और काश्तकारों को बड़े पैमाने पर जमीन देने का ऐलान किया. तब मनीराम बरुआ ने मुल्क का पहला भारतीय चाय बागान लगाया. मनीराम का जीवन भी कम रोचक नहीं था. उनके पुरखे कन्नौज से जाकर असम में बस गए थे. वो असम की एक रियासत में तहसीलदार थे और बाद में भोरबंदर (उस राज्य के प्रधानमंत्री) भी बनाए गए. लेकिन जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजाओं के पर कतरने शुरू किए तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

सर्दियों की करारी चाय! Photo: Reuters
सर्दियों की करारी चाय! Photo: Reuters

1839 में मनीराम असम चाय कंपनी के दीवान बनाए गए और उस वक्त उनकी तनख्वाह 200 रुपये महीना थी. लेकिन कंपनी से कुछ बातों पर मतभेद के चलते उन्होंने 1840 में अपनी नौकरी छोड़ दी. उन्होंने जोरहाट में पहला चाय बागान लगाया जो बाद में टोकलोई एक्सपेरिमेंटल स्टेशन नाम से रिसर्च सेंटर बना. 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों ने मनीराम ‘दीवान’ को फांसी दे दी. आज भारत पूरी दुनिया में चीन के बाद सबसे बड़ा चाय उत्पादक है जिसका 70 फीसदी वो खुद उपभोग करता है.

चाय अपने यहां सिर्फ राजनीतिक टेबल पर ही नहीं रह गई, वो हिंदी सिनेमा में हमेशा मौजूद रही. 1983 में आई राजेश खन्ना की फिल्म ‘सौतन’ अगर आपको याद हो तो लता और किशोर का वह गाना भी जरूर याद होगा.

शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है.

इस गाने के लिए किशोर (गायक), उषा खन्ना (संगीतकार) और सावन कुमार (गीतकार) तीनों को फिल्म फेयर में नॉमिनेशन मिला था. उषा खन्ना को यह नॉमिनेशन 40 साल की संगीत साधना के बाद हासिल हुआ था.

चाय ने कभी किसी को निराश नहीं किया. साल 2000 में आई हिंदी फिल्म ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ में ‘एक गरम चाय की प्याली हो’ बरसों तक दूरदर्शन के ‘चित्रहार’ का हिस्सा रहा और अनु मलिक को पहली बार गायक बनाने वाला गाना भी यही है.

एमिली डिकंसन चाय के पैकेट पर कविता लिख दिया करती थीं. उन्हें याद करते हुए नार्वे के कवि ऊलाव हाउगे ने एक कविता में लिखा था कि एक अच्छी कविता से चाय की ख़ुशबू आनी चाहिए.

दिल्ली में आईटीओ पर चाय की दुकान लगाने वाले लक्ष्मण राव अब तक 12 किताबें लिख चुके हैं और उन सब किताबों की कहानियां उनके इर्द-गिर्द चाय के शौकीनों की जिंदगी से निकली हुई हैं.

फिल्म का नाम ‘दम मारो दम’ था, लेकिन जयदीप साहनी ने यही लिखा कि ‘न आए हो, न आओगे. न फोन पे बुलाओगे. न शाम की करारी चाय, लबों से यूं पिलाओगे.’

हाय ये करारी चाय! सलमान खान जैसा नायक भी नायिका को अक्सा बीच घुमाने का प्रलोभन देता है, तो इसमें ये भी नत्थी होता है कि ‘चाचा की चाय पिला दूं, आ चलती क्या!’ न जाने कितने चाय वालों से हमने चाचा का नाता जोड़ा है.

दिल्ली की तस्वीर. Photo: Reuters
दिल्ली की तस्वीर. Photo: Reuters

नौजवान लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की किताब ‘मसाला चाय’ में हिंदी लेखन के सहारे ‘हिंग्लिश’ ठेली गयी तो पढ़ते वक्त ये ख्याल आया कि ये बदलाव भी चाय के बहाने ही हो सकता था. कनाडा में “The tea party” के नाम से एक बहुत मशहूर बैंड भी है जिसका गाना “Heaven Coming Down” कनाडा में सबसे ज्यादा रेडियो पर सुना जाने वाला गाना रह चुका है. किसी कॉलेज की बेहतरीन प्रेम कहानियां कैंटीन में चाय पर ही शुरु होती हैं. लेकिन साहित्य में जितना शराब पर लिखा गया, उसका हजारवां हिस्सा भी चाय पर खर्च नहीं हुआ. तो हमने ही कोशिश की..

‘चाय पीने दे बेगम बिना ब्रश किए
या वो वक्त बता दे जब चहास ना हो’

शांतिदीप ने चाय पर ये कविता भी लिखी है. जिसे पढ़ने के बाद ही ये सब लिखने का ख्याल आया.

जितना आसान था सवाल मेरा,
उससे भी आसान उनका जवाब आया,
जिंदगी क्या है??
चाय की प्याली हाथ में लेकर
मासूमियत से उनने चुस्की ली और फरमाए–
चाय जिंदगी है.
अटपटा लगा उनका जवाब
पूछ बैठा, कैसे भला
जिंदगी कड़वाहट है, चाय पत्ती की तरह
जिंदगी मीठी है शक्कर जैसी
जिंदगी हौले से जिओगे तो जी जाओगे
जल्दी-जल्दी में जल जाओगे
कहकर दुबारा लेने लगे चाय की चुस्की
एक दम आसान-सी जिंदगी की तरह
मुझे कर दिया था अपनी बातों से कायल उनने
लगने लगी थी मुझे भी
चाय की इच्छा..
चहास!

रवींद्र स्वप्निल प्रजापति की कविता ‘चाय’

तुम चुप थीं और मैं भी चुप था
हमारे बीच चाय का कप था
धूप का सुनहरा रंग लिए
उसकी सुनहरी किनार पर
तुम्हारी आँखें चमक रही थीं

बहुत देर तक चाय
ज़िन्दगी की उपेक्षा में ठंडी होती रही
फिर तुमने उंगली से चाय पर जमी परत हटा दी
मैंने कप को उठा कर ओंठों से लगा लिया

विमलेश त्रिपाठी की कविता ‘आग सभ्यता चाय और स्त्रियां’

सदियों पहले आग के बारे में
जब कुछ भी नहीं जानते थे लोग
तब चाय के बारे में भी
उनकी जानकारी नहीं थी

स्त्रियाँ नहीं जानती थीं
चाय की पत्तियाँ चुनना
और आँसुओं के खामोश घूँट
बूँद-बूँद पीना भी
ठीक से नहीं मालूम था उन्हें

फिर कुछ दिन गुजरे
और आग की खोज की किसी मनुष्य ने
और ऐसे ही सभ्यता के किसी चौराहे पर
बहुत कुछ को पीने के साथ
उसे चाय पीने की तलब लगी

तब तक आग से
स्त्रियों का घनिष्ठ रिश्ता बन गया था
और सीख लिया था स्त्रियों ने
अपने नरम हाथों से पत्तियाँ चुनना
तब तक सीख लिया था
स्त्रियों ने
किवाड़ों की ओट में
चाय की सुरकी के साथ
बूँद-बूँद नमकीन
ओर गरम आँसू चुपचाप पीते जाना

राधावल्लभ त्रिपाठी की कविता ‘चाय पीते हुए’

कसैला मधुर स्वाद
हर चुस्की में नया होता हुआ
हाथ में लिए कप में झलकती लगती है
चाय के बगीचों की हरियाली
दूर-दूर तक घाटियों में फैली
आसाम, सिक्किम या दार्जिलिंग में
पीठ पर बाँस की टोकरी टाँगे
तेज़ी से हाथ चलाती
चाय की पत्ती चुनने वाली किसी स्त्री का
अपार श्रम
जो उसने निरन्तर एक-एक पत्ती चुनते हुए किया
चाय में उसकी भी तो गन्ध घुली है
मीठी और कसैली

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The Story of Tea: A Cultural History

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