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LGBTQ 6: 'मैं हर जनम में हिजड़ा होना चाहती हूं'

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सिमरन साढ़े 13 साल की थी जब उसने पिता से कहा कि मुझे ‘मर्द’ होना अच्छा नहीं लगता. पिता शाम का पेग ले रहे थे. सोचा कि बच्चा है. यूं ही कह गया होगा. पर उनका बेटा सीरियस था. उसे लगता था वो एक औरत के शरीर में कैद है. जब घरवालों को लगा बेटा सीरियस है, तो कहा सपोर्ट नहीं करेंगे. तो बेटा भाग गया. और उन लोगों के पास पहुंच गया जो उसे अपनाते थे. सिमरन को वो सुंदर लगते थे. वो अच्छे लोग थे. वो हिजड़े थे. सिमरन भी आज एक हिजड़ा है. अलायन्स इंडिया में HIV इन्फेक्टेड लोगों के लिए काम करती हैं. कुछ दिनों पहले उनसे मुलाकात हुई. उन्होंने हमसे शेयर  कीं अपने जीवन की ऐसी कहानियां जिन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो उठते हैं. और ऐसी बातें जिनको सुनकर होठों पे हंसी आ जाती है. क्योंकि लगने लगता है सब कुछ ठीक है. अपने जीवन में. दुनिया में. हम आपसे शेयर कर रहे हैं उनसे हुई बातों के कुछ टुकड़े. 

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“मैं 9 साल की थी, जब होश संभालना शुरू किया. और तब देखा की मेरी चाल ढाल ‘प्रॉपर’ मर्द की तरह नहीं है. मैं अपने पापा या भाई के जैसी नहीं हूं. मैं एक पारसी घर में पैदा हुई. जब शाम को खेलने का वक़्त होता था, मेरा भाई खेलने जाता था. पर मेरा मन नहीं करता था. ये वो वक़्त था जब मैं अपने बारे में सोचा करती थी. जैसे जैसे दिन बीतते गए, मैं अपने आप में डूबती गई.”

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“खुद को पहचानना एक लंबा प्रोसेस था. आज पीछे मुड़ कर देखती हूं तो खुद को खुश पाती हूं. समाज के लिए नहीं, अपने लिए खुश हूं. लेकिन इंसान हूं. इंसान की इच्छाएं जरूरत से ज्यादा होती हैं इसलिए मैं अब भी तमन्नाएं रखती हूं. जिस समाज के लिए मैं काम करती हूं उसे और सक्षम बनाने की जरूरत है. मैं ये करना चाहती हूं और इसी का मुझे लालच है.”

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“एक बच्चे को जब अपने बायोलॉजिकल मां-बाप से सपोर्ट नहीं मिलता है, वो उस बच्चे के लिए सबसे सख्त समय होता है. पर लाइफ आपको सब कुछ सिखा देती है.”

“तब इंटरनेट इतना यूज नहीं करते थे. मुंबई में चर्च गेट स्टेशन पर सेकंड हैंड किताबें मिला करती थीं. 10-20 रूपए में. मैं पॉकेट मनी से पैसे बचा कर इन्हें खरीदती थी. इससे अपने बारे में और पता चलता था. जब कोई ऐसी किताब हाथ में आ जाती जिसमें मेरे जैसे लोगों का थोड़ा सा भी ज़िक्र होता तो मैं पेज फाड़ के रखती थी. इस तरह मेरी खुद की नोटबुक तैयार हो गई थी.”

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“14 साल की उम्र तक चीजें दिखने लगती हैं. पता लगने लगता है कि ये लड़का लड़कों जैसा नहीं है. कि वो लड़कियों की तरह चलता है, वो खेलने नहीं आता है. वो स्कूल में पीटी में इंटरेस्ट नहीं रखता. बस ड्राइंग और पढ़ाई में अच्छा है. ये सब छोटे छोटे ताने गॉसिप बन जाते हैं. और इससे आत्मविश्वास को धक्का लगता है. और वो ऐसी उम्र नहीं होती कि आप उसे इग्नोर कर सकें. यही मेरे साथ हुआ.”

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“मैं नौवीं क्लास में थी. दसवीं वालों का फेयरवेल था. जाने मेरे दिमाग में क्या आया मैं लड़कियों के कपड़े पहन के, वैसे ही तैयार होकर स्कूल गई. स्कूल में इससे हल्ला हो गया था. लोग गॉसिप करने लगे थे. हालांकि किसी ने मुझे फिजिकली अब्यूज नहीं किया. क्योंकि मैं पढ़ाई में अच्छी थी. और सब टपोरी लड़के मुझे मदद लेने आते थे. मैं उनका होमवर्क तक करती थी. लेकिन तानेबाजी शुरू हो गयी थी.”

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“बहन ने कहा, तू हमें समाज में रहने लायक नहीं छोड़ेगी. तू हमारी जिंदगी बर्बाद कर रही है. मेरे दोस्त तुझे देख कर इनसिक्योर होते हैं. वो घर नहीं आना चाहते.”

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“मुझे लगा मैं अपने पापा से कह सकती हूं. तो मैंने कह दिया. कि फुटबॉल या पीटी जैसी मर्दाना चीजें पसंद नहीं हैं. लेकिन उन्हें मेरी नहीं सुनी. उन्होनें सपोर्ट नहीं किया.”

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“मैंने हार नहीं मानी. ये मेरा पॉजिटिव पॉइंट है. नेवर गिव अप. Try, try, try and one day you will succeed.”

“घर से भाग चुकी थी. कोई सहारा नहीं था. बॉम्बे सेंट्रल पर एक हिजड़े से मुलाकात हुई. उसने मेरे सामने सेक्स का प्रस्ताव रखा. मैंने मना कर दिया. पर उसने मुझे खाना-पानी दिया. जिसकी मैंने वैल्यू की. फिर धीरे धीरे वो समझ गयीं कि मैं एक ‘फेमिनिन’ लड़का थी. उन्होंने मेरा साथ दिया. रूप बदलने के लिए वक्त चाहिए था. 4 महीने मैंने केवल बाल बढ़ाने में लगा दिए.”

“भाई बहन ताना कसने लगे थे. घर में या दोस्तों के बीच मेरा होना उन्हें पसंद नहीं आता था. मैं साढ़े तेरा साल की थी जब ‘कम आउट’ करना शुरू किया. मेरी स्क्रैप बुक पकड़ी गयी. वो मेरी किताबों को खंगालने लगी. और पापा के सामने उसने सब कुछ कह दिया. बहुत डाट पड़ी. लेकिन जबी बात छिड़ ही गयी थी तो मैंने भी खुल के बोल दिया कि इस मेल-फीमेल सिस्टम में मैं फिट नहीं हो पा रही हूं. पर ऐसा नहीं था कि मुझे घर से निकाल दिया गया. मैं अपनी मर्जी से छोड़ के गयी. वो मुझे स्वीकार नहीं कर रहे थे. मेरे पास और कोई चारा नहीं था.”

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“भीख मांगने जाती थी तो बहुत बुरा फील होता था. तो मैंने भीख मांगना छोड़ सेक्स वर्क शुरू कर दिया. मैं एक एलीट पारसी परिवार से आई थी. और सेक्स के समय जो लोग मुझे मिलते, सब मजदूर क्लास के होते. तब ख़राब लगता था.”

“बार में काम करती थी तो बाल लंबे करने पड़ते थे. लेकिन कॉलेज मर्दों की तरह जाती थी. क्योंकि पढ़ाई पूरी करना चाहती थी. सर पे कैप लगाती थी. दो-तीन टीशर्ट्स पहनती थी कि ब्रेस्ट न दिखें.”

“NGO में इंटरेस्ट बार के दिनों से आया. तब कॉन्डम प्रचार वाले आते थे. कॉन्डम बांटते थे. मैं बार में सीनियर थी. लड़कियों की लीडर थी. वो सब मेरी बात मानती थीं. मुझे उनकी सेफ्टी की परवाह थी. मैं इस बात का ध्यान रखती थी कि वो टेस्टिंग के लिए जा रही हैं या नहीं.”

“मैं तो जानती भी नहीं थी कि हिजड़ा का मतलब क्या होता है. जिस हिजड़े ने मेरी मदद की, मैंने उन्हें औरत के रूप में देखा. भले ही आवाज मर्दाना थी. उन्होंने मेरी मदद की. तो मैंने तय किया कि मैं भी वैसी ही बनूंगी.”

“घर से भागने के बाद मैंने वापस जाने की कोशिश की. पर पापा ने कहा कि हमारा बेटा हमारे लिए मर चुका है. तब मुझे हिजड़ा समुदाय ने अपनाया. अपनाने के अलावा हिजड़े वो सब कुछ करते थे जो मैं करना चाहती थी. बाल बढ़ाना, लड़कियों के कपड़े पहनना, नेल पॉलिश लगाना.”

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“हिजड़े जोर जोर से ताली बजाते हैं क्योंकि वो चाहते हैं आप उन्हें सुनें. वो अपनी आवाज दुनिया तक पहुंचाना चाहते हैं. क्योंकि वो आपको दिखते तो हैं, पर आप उन्हें नोटिस नहीं करते.”

“ट्रेन में भीख मांगती थी. पुराने दोस्त टकरा जाते थे जो उसी कॉलोनी में रहा करते थे जिसमें मेरा घर था. मैं लड़कियों सा मेकअप लगा के रखती थी. पर पहचान में तो आ जाती थी. इसलिए वो लोग मेरा नाम पुकार कर चेक करते थे. पर मैं जवाब नहीं देती थी. ऐसा मैं अपने लिए करती थी. सोचती थी मेकअप लगाया है तो पहचान नहीं पाएंगे. लेकिन वो पहचान लेते थे.”

“अगर कोई मर्द लड़कियों की तरह चलता है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो हिजड़ा है. या अपना सेक्स बदलवा लेने वाला मर्द भी हिजड़ा नहीं होता. हिजड़ा वो होता है जो अपनी मर्ज़ी से इस घराने में दाखिल होकर हिजड़ों की सभी परंपराएं निभाता है”.

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“लगता था कि क्या बोलूं, किसको बोलूं? होंठ भी अपने, दांत भी अपने. जब घर वालों ने ही साथ नहीं दिया तो गैरों से क्या अपेक्षा रखूं.”

“कोई मुझे 24 घंटे देखता रहे मुझे फर्क नहीं पड़ता. पर मेरे सामने कोई गलत हरकत करे, गंदे इशारे करे, मैं अच्छे से उसकी खबर लेती हूं. मैं किसी से नहीं डरती.”

“मैं पीछे मुड़ के देखती हूं, तो रिग्रेट नहीं करती. मुझे पता है कि मेरी जो पिछली दुनिया थी, मेरे मां-बाप, दोस्त, घर सबसे दूर हो गयी हूं. और ये दूरी मेरी आखिरी सांस तक रहेगी. पर ये दूरी बनी रहे. क्योंकि मैं आज खुश हूं.”

“मेरा बॉयफ्रेंड एक बहुत अच्छा इंसान है. मुझे याद नहीं कि हम कहां मिले थे. लेकिन अब तीन साल होने वाले हैं उसके साथ. हम आज साथ हैं तो सेक्स के लिए नहीं. बल्कि इसलिए क्योंकि हम एक दूसरे को समझना चाहते हैं. एक दूसरे को डिस्कवर कर रहे हैं. मुझे पता है एक दिन उसकी शादी हो जाएगी. पर मैं इसके लिए तैयार हूं. क्योंकि मैं कभी शादी नहीं करने वाली, ये घर-वर संभालना मेरे बस की बात नहीं है.”

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“नेरी नौकरी मेरी पूजा है. मैंने अपने बॉयफ्रेंड से भी कह दिया है कि मेरा काम मेरे लिए ज्यादा जरूरी है.”

“अगर भगवन ने मुझे फिर से जनम दिया तो मैं कहूंगी मुझे इतनी ही कॉम्प्लीकेटेड लाइफ दें. क्योंकि मैंने अपनी लाइफ का हर पल एन्जॉय किया है.”

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“लोगों की धारणा है कि हिजड़े काफी बदतमीज होते हैं, हिंसक होते हैं, ऐसी चीजें करते हैं जो ‘सही’ नहीं हैं. लेकिन लोग ये नहीं सोचते कि हिजड़े ऐसा क्यों करते हैं. इसका कारण आप और आपकी सोच है. हिजड़े तो बस जवाब देते हैं.”

“LGBT समुदाय के लोगों की परिभाषा सिर्फ उनके सेक्स करने से तय नहीं होती है. सेक्शन 377 पर जब कोर्ट का फैसला आना था, लोग कह रहे थे कि ‘गे सेक्स’ पर फैसला आने वाला है. बात सिर्फ ‘गे सेक्स’ की नहीं, सेम-सेक्स ‘रिलेशनशिप’ की है. सेक्स सिर्फ उस रिलेशनशिप का एक हिस्सा है. ये जीने का तरीका है. बात ह्यूमन राइट्स की है.”

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