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मुंबई का नोट गिननेवाला नेता, जिसे शिवसेना ने बेवफा कहा था

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छगन भुजबल बेवफा है. वह लालची है. जब तक शिव सेना से मिलता रहा, लेता रहा. जब कांग्रेस ने रोटी का टुकड़ा दिखाया तो दौड़ा चला आया.
– बंबई के मेयर दिवाकर रावते ने कहा था 1991 में (इंडिया टुडे)

1. छगन भुजबल की 40 साल की राजनीति. मराठों के बीच बड़े ओबीसी नेता.
2. शिवसेना से कांग्रेस और फिर शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी तक पहुंचे.
3. शिवसेना को मुंबई से खींचकर महाराष्ट्र के गांवों तक ले गये.
4. महाराष्ट्र के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक रहे. डिप्टी चीफ मिनिस्टर रहे.
5. मार्च 2016 में मनी लॉन्डरिंग में छगन भुजबल को एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने गिरफ्तार किया. जो लोग तमाम उम्र इनके साथ खड़े रहे, इस बार सबने साथ छोड़ दिया.

सब्जी बेचने से करियर शुरू कर बंबई के मेयर बने

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जिस बंबई में सब्जी बेचा, वहीं के मंत्रालय में नंबर 2 बने

14 अगस्त 1947 को जन्म हुआ था. माली जाति से थे. बंबई के बायकुला के क्राफोर्ड मार्केट में सब्जी बेचते थे. मेकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लिया. इससे पहले नासिक में मां की चाची के पास रहना हुआ था. क्योंकि जब ये दो साल के थे, तभी इनके मां-बाप की मौत हो गई थी. एक जगह छगन ने खुद बोला था कि घर में फंक्शन था. सब्जी कम पड़ रही थी तो इन्होंने पानी मिला दिया. ताकि बेइज्जती ना हो. छगन के बचपन के दिन दुख भरे थे. उस वक्त छगन की बस यही तमन्ना थी कि बायकुला की सब्जी मंडी में दुकान लगाने के लिए जगह मिल जाए. जगह मिल गई. 35 वर्गफीट की.

उसी वक्त 60 के दशक में शिवसेना बनी. बाल ठाकरे का अंदाज छगन को पसंद आया. छगन इसके सिपहसालार बन गये. शिवसेना के लिए बहुत काम किया. बाल ठाकरे की पहुंच बंबई तक सीमित थी. एलीट क्लास की पार्टी माना जाता था इसे. पर छगन इस पार्टी को महाराष्ट्र के गांवों में ले गये. स्कूटर पर बैठकर प्रचार किया था. ओबीसी समुदाय से आते थे. और छगन के प्रयासों के चलते ही शिवसेना को रुरल महाराष्ट्र की सीटें मिलनी शुरू हो गईं. शिवसैनिक रहते हुए छगन हिंदूवादी दिमाग के थे. 1985 में चर्चगेट के फ्लोरा फाउंटेन में गोमूत्र का भी छिड़काव किये थे. क्योंकि वहां दलित रैली हुई थी. भारत में नाथूराम गोडसे की मूर्ति लगवाने की मांग तो अभी कुछ लोग कर रहे हैं. पर 1985 में बंबई के मेयर ने ये मांग की थी. ये मेयर छगन भुजबल ही थे. अपने करियर में छगन ने गोडसे से गांधी और फिर फूले तक का सफर तय किया.

विधानसभा में शिवसेना के पहले विधायक, पर ठाकरे से हुआ झगड़ा

1973 में छगन भुजबल शिवसेना की तरफ से कॉर्पोरेटर बनाये गये. बाल ठाकरे की पार्टी में थे तो बोलने का अंदाज भी वही था. बहुत रसूख बनाया. 1984 तक बंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में शिवसेना विपक्ष में रही. छगन भुजबल इसके नेता रहे. बाद में शिवसेना जीती और छगन बंबई के मेयर बने. दो बार मेयर रहे. मेयर रहते हुए बंबई को हरा-भरा बनाने की बहुत कोशिश की. सुंदर मुंबई, मराठी मुंबई के नाम से कैंपेन भी चलाया. उस शहर में ये इनिशियेटिव लेना ही बड़ी बात थी. बहुत बड़ाई हुई. 1985 और 1990 में दो बार शिवसेना के विधायक बने. मझगांव सीट से. विधानसभा में शिवसेना के एकमात्र विधायक थे.

म्युनिसिपैलिटी का चुनाव लड़ने वाली शिवसेना विधानसभा में अपनी धमक दिखाने लगी. सरकार बनाने-बिगाड़ने लगी. पर जब शिवसेना की सरकार बनने को आई तो छगन भुजबल को दरकिनार कर दिया गया. 1990 में जब सेना और भाजपा ने मिलकर 85 सीटें जीत लीं तो छगन को पूरा भरोसा था कि विपक्ष का नेता इन्हीं को बनाया जायेगा. पर ठाकरे ने मनोहर जोशी को चुन लिया. नाराज छगन ने शरद पवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस जॉइन कर ली. 1991 में. पर कहा कि मंडल कमीशन का विरोध करने के लिए बाल ठाकरे को छोड़ रहे हैं. 1992 में समता परिषद भी बना ली. मंशा थी कि देश के सबसे बड़े ओबीसी लीडर बन जायें. मंशा अधूरी रही. क्योंकि तब तक बाबरी गिर गई. और सब कुछ बदल गया. बाल ठाकरे छगन को लखोबा कहने लगे. लखोबा मराठी नाटकों का एक ठग है. पर छगन कहां चुप रहने वाले थे. ठाकरे के चेले ही तो थे. हिंदू हृदय सम्राट को टी बालू कहना शुरू कर दिया.

बोलना तो बाद तक जारी रहा है. यहां छगन भुजबल प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ा रहे हैं-

 

किस्मत चमकी और फिर ठाकरे से बदला लेने का भी मौका मिला

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शरद पवार के साथ जुड़ते ही किस्मत चमकी

आने वाले साल छगन के लिए जलन से भरे थे. 1995 में सेना की सरकार बनी. मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने. पर इस सरकार पर आरोप बहुत लगे. 1999 के चुनाव में सेना-भाजपा गठबंधन हार गया. उसी साल शरद पवार ने कांग्रेस को तोड़कर अपनी पार्टी बना ली. नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी. छगन भुजबल पवार के साथ निकल लिये. छगन की किस्मत मुस्कुरा उठी. कांग्रेस के साथ गठबंधन कर शरद पवार ने सरकार बना ली. छगन डिप्टी चीफ मिनिस्टर बन गये. होम मिनिस्ट्री भी मिल गई.

अगस्त 2000 में छगन ने बड़ा डेयरिंग काम किया था. बाल ठाकरे पूरी जिंदगी आग लगाते रहे. पर किसी ने उन पर हाथ नहीं डाला था. छगन ने 1993 दंगों के केस में ठाकरे को गिरफ्तार करवा दिया. सामना में एक जहर बुझे लेख को आधार बनाकर. ठाकरे को बेल तो मिल गई पर नजर नीची करनी पड़ गई थी. छगन ने अपमान का बदला लिया था.

और इन्हीं जंगों के बीच पता चला छगन की संपत्ति का

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छगन भुजबल ने यही सोचा कि पता कैसे चला

विधायकी और मेयरी का ही दौर था जब छगन ने प्रॉपर्टी बनानी शुरू की. बंबई और नासिक में दबा के जमीन खरीदी. 1989 में बांद्रा में मुंबई एजुकेशनल ट्रस्ट के नाम से मैनेजमेंट, फार्मेसी, इंजीनियरिंग, IT और इंश्योरेंस की पढ़ाई शुरू की. इसे भुजबल नॉलेज सेंटर भी कहा जाता था. बाद में नासिक में इसी का एक कैंपस खोला. 2006 में. इसको नाम दिया भुजबल नॉलेज सिटी. इन सारे कामों में इनके चार्टर्ड एकाउंटेंट सुनील कर्वे साथ थे. 2013 में इसी सुनील ने छगन भुजबल के खिलाफ मिनिस्टर रहते हुए पैसे की धांधली करने का आरोप लगाया. इन सारे संस्थानों को भी घेरे में ले लिया.

2003 में एक बड़ा कांड हुआ जिसने सबका नशा फाड़ दिया. तेलगी स्कैम. रेवेन्यू स्टांप को लेकर हुआ था. छगन को रिजाइन करना पड़ा. अब्दुल करीम तेलगी पकड़ा गया. पर छगन की किस्मत प्रचंड थी. साफ बच गये. 2004 में शरद पवार फिर जीते. कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बना लिये. अबकी छगन PWD मिनिस्टर बनकर आये. इन्हीं के दौर में दिल्ली में महाराष्ट्र सदन और कलीना में एक लाइब्रेरी में काम लगा. बाद में इन्हीं मामलों में घोटालों का आरोप लगा. सितंबर 2014 तक छगन यही मिनिस्ट्री संभालते रहे.

2013 में भाजपा सांसद किरीट सोमैया ने भुजबल के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. एंटी-करप्शन ब्यूरो उनके पीछे पड़ा. सैकड़ों करोड़ की संपत्ति सामने आई-

1. मुंबई, ठाणे, नासिक और पुणे में छापे पड़े. यहां छगन औऱ इनके रिश्तेदारों के नाम पर करोड़ों की संपत्ति मिली.
2. नासिक में इनके बेटे पंकज ने एक 100 करोड़ रुपये का बंगला रखा था. 46500 वर्गफुट का.
3. भुजबल के कुल 28 ठिकानें पर छापा पड़ा. लोनावाला के एक बंगले में तो हेलीपैड भी था. विदेशी फर्नीचर तो हर जगह फैला हुआ था.
4. नासिक में अंगूर और संतरों की बागान है. चीनी मिल है.
5. इंडोनेशिया और नासिक में ही पावर प्लांट भी हैं.
6. 25 जगह फ्लैट्स और बंगले हैं.
7. 10 कंपनियां हैं.
8. सोमैया दावा करते हैं कि भुजबल के पास ढाई हजार करोड़ की संपत्ति है.

छगन के फंसने में जिन लोगों ने बयान दिये उनमें से कई तो उनके नजदीकी रहे हैं. भाई मगन का बेटा समीर बहुत पहले से साथ में है. वो हिरासत में है और उसने सारे राज खोल भी दिये. सुनील कर्वे ने किया ही. संजीव जैन कंसल्टेंट थे. उन्होंने भी बयान दिया. प्रवीण जैन भुजबल फर्म के कंट्रोलर थे. उन्होंने भी बयान दिये. सुरेश जजोदिया और सुनील नायक इनकी कंपनियों से जुड़े लोग थे. इन्होंने भी नहीं छोड़ा इनको. 26 अगस्त 2013 को आम आदमी पार्टी की अंजलि दमानिया ने सबसे ज्यादा हमला किया छगन भुजबल पर. रोज कुछ ना कुछ लेकर आती रहीं. छगन जेल में रहे. फिर बीमारी के चलते हॉस्पिटल में. सवाल उठते रहे कि जेल वापस क्यों नहीं जा रहे. पर अभी तो वो बाहर ही हैं.

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जेल में रहने के दौरान की तस्वीर

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