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123 साल पहले हुआ गाय के नाम पहला दंगा, पहली बार मुसलमान कांग्रेस से भागे थे

यकीन नहीं होता न कि गाय के नाम पर दंगे 100 साल से ज्यादा बूढ़े हो गए हैं. बहुत गाय- गाय हो गया है. मामला ऐसा है कि ‘चुप रहे तो चुक रहे.’ सोशल मीडिया से मीडिया तक यूपी और योगी छाए हुए हैं. अवैध बूचड़खाने बंद होने की बात चल रही है. पता चला कि 100 साल में पहली बार लखनऊ की एक टुंडे कबाबी की दुकान बंद हो गई. आधे घंटे में कल्चर घुटनों पर आ गया. टू मच पॉलिटिक्स है. और ये नई नहीं है.

चंंद दिनों पहले रोज अखबारों में भी निकल रहा था कि गाय ले जाने वालों को गोबर खिलाया. कहीं दलितों के कपड़े उतार कर संटियों से मारने के वीडियो आ रहे थे. क्योंकि उन्होंने मुर्दा गायों की चमड़ी निकाली थी. राजस्थान से खबर आई कि दो सौ गाएं भूख और बरसात में भीगने से मर गईं. पहले पंजाब से खबर आई थी कि वहां गाय ले जाने का रेट फिक्स है. दो सौ रुपए दो और गाय ले जाओ. गौरक्षकों का ये रेट है. फिर चाहे उन गायों को पालो, बेचो या काटो. कोई रोकने नहीं आएगा. मंथली और 6 महीने के पास भी जारी किए जाते हैं. हालत यहां तक आ गई कि खुद प्रधानमंत्री को इस पर चुप्पी तोड़नी पड़ी और 80 परसेंट गौरक्षकों को फर्जी, धंधेबाज बता दिया.

सोचो हालात कैसे हो चले हैं. लेकिन ये सब अचानक नहीं हुआ है. इसके बीज बहुत पुराने हैं. भारत में गाय को लेकर पहला हिंदू मुस्लिम दंगा 123 साल पहले हुआ था. तब यहां न हिंदू की चलती थी न मुसलमान की. अंग्रेजों का राज था. और सबसे पहले गोरक्षा का मुद्दा हिंदुओं ने नहीं, सिखों ने उठाया था. गाय के साथ कब लोगों की भावनाएं जुड़ीं, कब वो एक पॉलिटिकल टूल के रूप में विकसित हुई. और कब उसे बिना उसकी इच्छा के दंगों का कारण बना दिया गया. ये सब परत दर परत पढ़ते चलो.

गाय कब से पूज्यनीय हुई

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पुराने समय में यहां सभ्यता जानवरों और पेड़ पौधों पर निर्भर थी. उन्हीं से खाना और उन्हीं को खाना. फिर खेती बाड़ी का जुगाड़ लगा. तब से गाय पालना शुरू हो गया था. लेकिन उस वक्त तक इसकी पूजा का काम शुरू नहीं हुआ था. जब मध्यकाल में बकरीद वगैरह त्योहारों पर मुसलमानों ने गाय की कुर्बानी देनी शुरू की तो अति कर दी. क्योंकि गाय बाकी हर जानवर से सस्ती पड़ती थी. ऊंट, भैंस, बकरी माने सबसे. दूसरी चीज ऐसा करके वो हिंदुओं के वर्चस्व को नकारना चाहते थे. इधर धार्मिक ग्रंथों में गाय का महिमा मंडन शुरू हुआ और गाय से भावनात्मक बंधन बंध गया. फिर अंग्रेजों का राज आ गया. तब भी गाय सीधे टकराव की वजह नहीं बनी.

राजनीति में गाय के नाम का इस्तेमाल

1870 के दशक में सीधी लाइन खिंचनी शुरू हो गई. हिंदू अंग्रेज शासन से गोकशी पर रोक वाला कानून बनाने की मांग करने लगे. अंग्रेज एक बार झेल चुके थे सन सत्तावन में. देख चुके थे गाय और सुअर का हिंदू मुसलमान पर क्या प्रभाव है. इसलिए वो कुछ भी करने की जल्दी में नहीं थे. जो हिंदू मुस्लिम अब तक अपनी लोकल लड़ाइयां अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते थे, अब एकदूसरे के खिलाफ हो गए. तो 70 के दशक में गोरक्षा वाली भावनाएं फैलनी शुरू हुईं. गौरक्षा समितियों की स्थापना होने लगी. पंजाब, अवध, रुहेलखंड, बंगाल, बंबई, मद्रास, सिंध, राजपूताने से लेकर पूरे भारत में.

पहला गोरक्षा आंदोलन सिखों ने शुरू किया

अब सुनो मेन बात. सन 1871 में सिखों का कूका पंथ था. समाज में सुधार लाने में अपने तरीके से जुटा हुआ था. ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ लाने के लिए उन्होंने गाय को मोहरा बनाया. मुसलमानों को गाय किसी भी कीमत पर मारने नहीं देनी है, इसकी जिद बढ़ती गई. और वो मार काट तक आ गए. अंग्रेजों की नजर में इतना सब कुछ कर गुजरना माफी लायक काम तो था नहीं. तो इनके आंदोलन को अंग्रेजों ने धूल में मिला दिया.

लेकिन इससे आर्य समाज को क्लू मिल गया था. कि इस रास्ते से हिंदुओं को एकजुट किया जा सकता है. दयानंद सरस्वती ने आर्यधर्म, आर्यभाषा और आर्यावर्त को पूरी मानव सभ्यता का गुरू बताया और प्रचार प्रसार शुरू किया. ये आंदोलन इसाइयत और इस्लाम के खिलाफ था, लेकिन नरम तरीके का. माने मार काट से बहुत दूर रहने को कहा था दयानंद ने. मकसद था जो धर्म बदलकर मुसलमान या क्रिश्चियन हो गए हैं उनको वापस अपने धर्म में लाया जाए. गोरक्षा आंदोलन का इसमें बड़ा रोल था. लेकिन मारकाट से दूर रहने के कारण तब तक ये इज्जतदार प्रोटेस्ट था.

गाय के नाम पर मार काट की शुरुआत

सन 1883 में दयानंद दुनिया से चले गए. उसके बाद गोरक्षा आंदोलन की छीछालेदर शुरू हो गई. बातचीत से मामला निपटाने का फैशन चला गया. उसकी जगह ले ली तलवारों, लाठी डंडों और बंदूकों ने. और इसमें अगुवा बनी अगड़ी जाति वाले. जमींदार तो थे ही, इन आंदोलनों की लीडरशिप करके अपनी धमक और तेज करते गए. बाकी जातियों ने उनका साथ दिया क्योंकि नेम धरम की बात थी.

फिर आया कयामत का साल

Image: Reuters
Image: Reuters

बात बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ गई कि माहौल एकदम गरम हो गया. साल 1893. आजमगढ़ के अंदर लगता था मऊ. वहीं से दंगे की चिंगारी भड़की. शुरू यहां हुए. फिर बिहार और यूपी के अलावा कई स्टेट्स में तमाम दंगे हुए. 6 महीने में 31 दंगे. मामूली बात नहीं है साहब. जो तब शुरू हुआ, उसकी गर्मी अभी तक सालती है.

नतीजा, पॉलिटिकल उलट पलट

तब ले देकर देश कांग्रेस के बैनर तले आगे बढ़ रहा था. हिंदू हों चाहे मुस्लिम. कांग्रेस गौरक्षा में सीधे इनवॉल्व नहीं थी. लेकिन इसको चोरी चुप्पे अपनी सरपरस्ती में रखा. सन 1891 में कांग्रेस का नागपुर में अधिवेशन हुआ. उसी कांग्रेस के पंडाल में गोरक्षा सभा ने अपना प्रोग्राम किया. कांग्रेस के तमाम बड़े नेता और देखने वाले उसमें जुटे थे. 1893 में इलाहाबाद कांग्रेस के जलसे में उस जमाने के मशहूर गौरक्षा वाले नेता श्रीमन स्वामी आए थे. उसके बाद ये दंगे हुए और मुसलमान कांग्रेस के अंडर में चलने वाले आजादी के आंदोलन से खुद को अलग करने लगे.

सन 66 का सबसे बड़ा बवाल

सालों से आग सुलग ही रही थी गोहत्या के खिलाफ. 1966 में हिंदू ऑर्गनाइजेशन आर पार के मूड में आ गए. संविधान में गोकशी को पूरी तरह बंद कराने का कानून बनाने की डिमांड पूरे जोर से रखी गई. शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ ने इसके लिए अनशन कर रखा था. साथ में स्वामी करपात्री, महात्मा रामचंद्र वीर भी थे. रामचंद्र वीर तो 166 दिन लंबा अनशन कर ले गए थे.

हुआ ये था कि गोकशी के खिलाफ कानून बनाने की डिमांड लेकर 7 नवंबर सन 1966 को संसद घेर ली गई. प्रचंड आंदोलन हुआ. तब की पीएम इंदिरा गांधी ने गोकशी पर बैन लगाने की मांग खारिज कर दी. हिंदू बाबाओं की लीडरशिप में जुट गई 10 हजार वकीलों की भीड़. भीड़ संसद का घेराव करने चली. लेकिन उनको रोक दिया गया. फिर इस भीड़ ने दिल्ली शहर में खूब उत्पात मचाया. भगदड़ मच गई. 48 घंटे के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया. हर गली, कूचा बंद हो गया. भीड़ ने तब के कांग्रेस अध्यक्ष कामराज के घर पर हमला बोल दिया. घर को लगा दी आग. भीड़ को कंट्रोल करने के लिए फायरिंग हुई. तमाम लाशें गिर गईं. लड़ाई गाय के नाम की थी, गाय की नहीं. मरे इंसान.


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