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बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

‘मैं कविता. मैं आपको अपना पूरा नाम नहीं बता सकती. क्योंकि आप मुझे मेरे नाम के लिए नहीं देख रहे. आप मुझे मेरे जिस्म के लिए देख रहे हैं. मेरे जिस्म की गर्मी के लिए देख रहे हैं. मुझे लोग कविता भाभी के नाम से जानते हैं. खाते-पीते घर की, भरी हुई माल कविता भाभी.’

और इस तरह बिना किसी लल्लो-चप्पो के आपके जीवन में एंट्री लेती है कविता भाभी. कविता भाभी फ़ोन सेक्स करती है. और फ़ोन पर अपने क्लाइंट्स को कहानियां सुनाती है अपने असल जीवन की. कविता बताती है कि उसका पति गे है. उसे संतुष्ट नहीं रख सकता. सास बेहद बीमार. परिवार पर ससुर का लिया क़र्ज़ है. इसलिए फोन सेक्स से वो पैसे कमाती है, खूब पैसे.

‘कविता भाभी’ कोई ऐसी किताब नहीं जो छुपकर बेची जा रही हो, कोई ऐसी साइट नहीं जिसे इनकॉगनिटो मोड पर या प्रॉक्सी साइट पर देखा जा रहा हो. इसमें कोई ऐसा सीन नहीं है, जिसे ‘न्यूडिटी’ कहा जाए. ये पॉर्न नहीं है. पारिवारिक भी नहीं है. ये दुनिया है OTT इरॉटिका की. जिसके ऐप आप अपने फोन में रखने पर शर्मिंदा नहीं होते. मगर इसे देखते अकेले ही हैं.

पहले ही सीन में कविता भाभी अपना परिचय देती हैं और ये साफ़ करती हैं वो यहां किसलिए हैं.
पहले ही सीन में कविता भाभी अपना परिचय देती हैं और ये साफ़ करती हैं वो यहां किसलिए हैं.

डर्टी टॉक, क्लीन सेक्स

दो कपल एक गेस्ट हाउस में जाते हैं. गेस्ट हाउस का अटेंडेंट अधेड़ है. पूल से निकलती लड़कियों को देखता है. क्लीवेज, पेट, कमर, जांघें. एक-एक अंग पर ज़ूम किया जाता है. पीछे सैक्सोफोन जैसा कुछ बजता है. उस समय ये सीरीज देख रहे सभी लोग, अपनी अपनी स्क्रीन के पीछे वही अधेड़ अटेंडेंट हैं, जो उस दूध सी सफ़ेद लड़की को पूल से निकलते देख रहा है.

‘कूकू’ स्ट्रीमिंग ऐप पर उपलब्ध ‘कपल्स गेस्ट हाउस’ का सीन है ये. सीन में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे ‘न्यूडिटी’ की केटेगरी में रखा जाए. क्या हमने बॉलीवुड में शीर्ष पर बैठी एक्ट्रेस के क्लीवेज, कमर, पेट, जांघें नहीं देखे?

होटल के मैनेजर ने कुछ कमरों में छिपे हुए कैमरे लगा दिए हैं. एक के बाद एक कपल्स आते हैं और उनके वीडियो निकलते जाते हैं. इसमें कम्पलीट स्टोरीलाइन है. एक कपल का वीडियो पॉर्न साइट पर लग जाता है. पुलिस तफ़्तीश करती है और अपराधी पकड़ा जाता है. कागज़ पर ये कहानी एक अपराध की है. लेकिन जबतक क्लाइमैक्स में अपराधी पकड़ा जाता, तबतक आप कभी अटेंडेंट तो कभी वीडियो रिकॉर्ड कर रहे मैनेजर की नज़र से 3 से 4 बार सेक्स सीन देख चुके होते हैं.

'कपल्स गेस्ट हाउस' से एक सीन.
‘कपल्स गेस्ट हाउस’ से एक सीन.

ऐसी ही कंप्लीट स्टोरीलाइन, अच्छे बजट और दो से दस एपिसोड्स में बनीं कई सीरीज तमाम स्ट्रीमिंग ऐप्स पर उपलब्ध हैं. जिन्हें हम नेटफ्लिक्स, प्राइम या ज़ी-फाइव जैसी ऐप्स के मुकाबले कई गुना कम पैसों में देख सकते हैं.

मधुर कहानियां

किसी भी समाज में सॉफ्ट पॉर्न का होना कोई नयी चीज़ नहीं है. नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के स्टॉल पर तमाम किताबों और तमाम ऐसी ही मैगजीनों में एक ‘मधुर कथाएं’ होती है. इसके एक अंक से कुछ कहानियों के शीर्षक देखें:

1. गोरे जिस्म का जूनून
2. अलमारी में बंद बहू की वासना
3. सेक्स के लिए बीवी को शराब की लत
4. कामुक मर्द की कातिल सोच
5. सहेली की ब्रेसरी में सेक्स का राज़
6. मादक देह का ‘खजाना’ चूमने की ख्वाहिश

हर एक अंक में 10 से 15 कहानियां होती हैं. सभी सच्ची घटनाओं पर आधारित. अक्सर हम अखबारों में पत्नियों के प्रेमी संग भागने की ख़बरें पढ़ते हैं. एक पुरुष कैसे अफेयर चलाता रहा. कैसे लव ट्रायंगल के चलते किसी ने किसी की हत्या कर दी. अखबारों के ‘सिटी’ पन्ने के सबसे गैर-महत्वपूर्ण कॉलम में छप रही इन ख़बरों में कुछ भी मधुर नहीं होता. निर्मम हत्याएं, जालसाजी, झूठ. मगर इन कहानियों के नाट्य रूपांतरण बेहद ‘मधुर’ होते हैं.

3 Madhur Kathayein
‘मधुर कथाएं’ और ‘मनोहर कहानियां’ से मिलते जुलते प्लॉट्स पर बनी कहानियां OTT पर उपलब्ध हैं.

कहानियों के टीज़र मिलने के बाद ‘शेष पेज 32 पर’ आएगा और जब आप 32 पर पहुंचेंगे तो पाएंगे कि पेपर की क्वालिटी काफी बदल चुकी है. छपाई खराब है. और सच्ची घटना में शामिल लोगों की असल तस्वीरें भी हैं. मगर कहानी का टीजर आपको चिकने कागज़ पर मिलेगा, जिसमें नाट्य रूपंतारण के मकसद से लगाई गई एक तस्वीर होगी. कविता भाभी के शब्दों में ये औरतें ‘भरी’ हुई होंगी. क्लीवेज या मांसल जांघों को चूमता एक पुरुष होगा.

‘सहचरी’, ‘ब्रेसरी’, ‘नितंब’, ‘शीत्कार’, ‘अंतर्देह’, और ‘संसर्ग’ जैसे शब्दों से होते हुए ये कहानियां अक्सर ‘प्राण पखेरू उड़ने’ पर ख़त्म होती हैं.

मगर OTT पर दिखने वाली मधुर कहानियां नया रूप लेती हैं. इसमें मॉडर्न पॉर्न फिल्मों में इस्तेमाल किए जाने वाले प्रॉप हैं. लॉन्जरे, मेकप, हील वाले जूते, कमरे की सेटिंग अपर क्लास घर जैसी है. ये वो कहानी नहीं है जो घटित हुई है और लिखने वाले ने कल्पना का तड़का लगाया है. बल्कि ये कस्टम मेड कहानियां हैं. ‘क्या हुआ’ पर नहीं, ‘क्या हो सकता है’ पर आधारित हैं.

मगर एक सवाल बना रहता है. कि जब इंटरनेट पर तमाम फ्री हार्डकोर पॉर्न उपलब्ध है. तो लोग सॉफ्ट पॉर्न का सब्सक्रिप्शन क्यों लेते हैं? यूट्यूब पर उसे खोजकर क्यों देखते हैं?

व्याकरण

आपके सामने फ्री बुफ़े में मिल रहा ट्रफल केक हो. या 5 रुपये में बिक रही जलेबी. तो आप क्या खाएंगे? मुमकिन है अलग-अलग वक़्त पर दोनों ही चीजें खा लें. क्योंकि एक फ्री है. और दूसरी आपकी खरीदने के क्षमता के अंदर है. OTT प्लैटफॉर्म्स जैसे कूकू, एमएक्स प्लेयर, ऑल्ट बालाजी के कुछ शो या उल्लू टीवी हमारे लिए यही जलेबियां लेकर आते हैं. ये जलेबियां ताज़ा हैं और साफ़-सुथरी दुकान से हैं.

वीडियो के रूप में सॉफ्ट पॉर्न या इरॉटिका का होना तबसे ही शुरू हो गया था जबसे डाटा पैक इंडिया में आए. लगभग 10-12 साल पहले, डायल अप कनेक्शन मिलने लगे और इसी वक़्त इंडिया में यूट्यूब की एंट्री हुई. साल 2008 में यूट्यूब इंडिया में लॉन्च हुआ. और उस वक़्त न वहां पायरेसी को लेकर कड़े नियम थे, न कॉन्टेंट को. नतीजा ये, कि आने वाले 6-7 साल तक धड़ल्ले से सॉफ्ट पॉर्न चलता रहा. कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स कड़े होने के बाद भी यूट्यूब पर सॉफ्ट पॉर्न की खपत बनी रही, क्लीन व्याकरण के चलते. इनमें कभी फुल न्यूडिटी यानी जननांग या महिला के निपल नहीं दिखते. मगर पूरे वीडियो द्विअर्थी संवाद, ड्रीम सीक्वेंस और चेहरे के सेक्शुअल एक्सप्रेशन से भरा होता है.

सिर्फ 'देवर-भाभी' जैसे कीवर्ड डालने पर यूट्यूब एक नयी दुनिया में पहुंच जाता है.
सिर्फ ‘देवर-भाभी’ जैसे कीवर्ड डालने पर यूट्यूब एक नयी दुनिया में पहुंच जाता है.

लल्लनटॉप की साल 2016 की रीसर्च के मुताबिक़:

देसी जलवा’ के एक वीडियो को 2.80 करोड़ से ज्यादा व्यूज मिल चुके थे. ‘मैटिनी मस्ती’ के एक वीडियो ‘इंडियन भाभी चीटेड डॉक्टर’ पर 1.99 करोड़ व्यू थे. ‘मनोरमा की कहानियां’ के ‘आफ्टर सैटिसफाइंग’ वीडियो को 1.37 करोड़ लोगों ने देख रखा था. ये आंकड़े उस वक़्त किसी चर्चित यूट्यूब चैनल के वायरल हो चुके वीडियो से कहीं ज्यादा थे. शाहरुख़-सलमान की फिल्मों के ट्रेलर व्यूज से भी कहीं ज्यादा.

बीते एक साल में ही अपलोड हुए कई वीडियो जिनके टाइटल में ‘पड़ोसन’, ‘टीचर’, ‘कॉम्प्रोमाइज’, ‘देहाती’, ‘देसी’, ‘कामवाली’ जैसे शब्द मिल जाएंगे, करोड़ों में देखे गए हैं. ये सभी वीडियो हिंदी, भोजपुरी या रीजनल भाषाओं में होते हैं. इनका बजट छोटा है, ये वीडियो देखकर मालूम पड़ जाता है.

इन वीडियोज के नीचे कमेंट्स में आप अक्सर लोगों को सेक्स वर्क या सेक्स चैट से जुड़े फ़ोन नंबर शेयर करता हुआ पाएंगे. कमेंट करने वाले असल हैंडल हों, इसके चांस कम होते हैं. इसके लिए नकली नाम और फर्जी यूज़र्स का इस्तेमाल होता है.

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2016 तक यूट्यूब पर 500 से भी ज्यादा सॉफ्ट कोर चैनल चल रहे थे.
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2016 तक यूट्यूब पर 500 से भी ज्यादा सॉफ्ट कोर चैनल चल रहे थे.

मगर OTT पर दिखने वाले वीडियो ऐसे नहीं हैं. ये हेवी बजट वीडियो हैं, जिनमें लाखों रुपये लगे हैं. इनमें काम करने वाले भले ही मंझे हुए एक्टर न हों, लेकिन वैसे असहज और भावहीन नहीं दिखते, जैसे यूट्यूब की छोटी बजट की छोटी फिल्मों के एक्टर लगते हैं. किसी भी मेनस्ट्रीम फिल्म की तरह इनके प्रड्यूसर, डायरेक्टर, कास्टिंग डायरेक्टर, राइटर, डायलॉग राइटर और कॉस्ट्यूम डायरेक्टर सधे और मंझे हुए लोग हैं.

कूकू टीवी पर ‘शीमेल’, ‘सुनो ससुरजी’ जैसे शो बना चुके राइटर-डायरेक्टर आज़ाद भारती बताते हैं:

‘जो फ़िल्में पहले आ रही थीं. छोटे सिनेमा हॉल्स में लगती थीं, उनके मुकाबले प्रोडक्शन वैल्यू अच्छा है. हर प्रोजेक्ट का कॉस्ट अलग होता है. मगर औसत प्रोडक्शन कॉस्ट 2 से 10 लाख मान लीजिए. जैसे टीवी सीरियल शूट होते हैं, उसी तरह शूट होते हैं. इसमें कुछ ऐसा नहीं है, जो अलाऊ न हो. जो एक्टर्स हैं, उन्हें फिल्म में लेने का सेम प्रोसेस है. जैसा किसी भी फिल्म या सीरीज के लिए होता है. एजेंसी के थ्रू कास्टिंग होती है. फिर फिल्म मिलती है.’

व्याकरण के तौर पर OTT में दिखने वाला इरॉटिक कॉन्टेंट एक बेजोड़ कॉम्बिनेशन के रूप में उभरकर आता है. एक ओर देसीपन को मेंटेन करता है. वो देसीपन जिसका हिस्सा ‘भाभी’, ‘नौकरानी’, ‘दूधवाला’ जैसे किरदार हैं. और दूसरी ओर बेहतर प्रोडक्शन क्वालिटी वाली मॉडर्न सेंसिबिलिटी. जैसे बाथरूम में लगे कांच के दरवाज़े, पॉश इंडोर लोकेशन, ग्रूम किए हुए एक्टर और ‘क्लासी’ कॉस्टयूम.

पलायन

सेक्स होते देखना या यौन कहानियां पढ़ना दुनिया से पलायन है. मगर ये सिर्फ यौन सुख ही नहीं है जो ये कहानियां हमें देती हैं. ये हमें एक ऐसी दुनिया में ले चलती हैं जिसके सुख का हमें अंदाज़ा ही नहीं है. क्योंकि इस दुनिया में जात-पात और अमीरी-गरीबी का भेद नहीं है. कहने का अर्थ ये नहीं है कि ये कहानियां समाज सुधारक हैं और भेद कम करती हैं. बल्कि ये कहानियां कॉन्टेक्स्ट से मुक्त होती हैं. समाज में क्या चल रहा है, उनका इसपर फर्क नहीं पड़ता.

नल ठीक करने आए प्लंबर, दूध डिलीवर करने वाले आदमी, घर पे काम करने वाले नौकर या चोरी करने आए चोर से किसी अपर मिडिल क्लास की महिला का संबंध बनाना ऐसी चीज है जो हमें अपने आस पास शायद ही दिखती हो. इसका उल्टा ज़रूर दिखता है. कि पुरुष मालिक अपनी नौकरानी के साथ संबंध बनाए. मगर उसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं लगता.

यूट्यूब पर 'नौकर से प्यार' के टाइटल से मौजूद वीडियो में मालकिन और ड्राइवर के बीच संबंध दिखाए गए हैं.
यूट्यूब पर ‘नौकर से प्यार’ के टाइटल से मौजूद वीडियो में मालकिन और ड्राइवर के बीच संबंध दिखाए गए हैं.

जैसे ही सत्ता की ये इक्वेशन पलटती है, हम रोमांच से भर उठते हैं. असल जीवन में अपनी पत्नियों, बेटियों, बहनों, मांओं, हाउसहेल्प, महिला सहकर्मी और वेश्याओं को दबाने वाला पुरुषवादी समाज महिला को पॉर्न वीडियो में सत्ता में देख रोमांच से भर उठता है. उसे बिस्तर में देखना एक अल्टीमेट फैंटेसी जैसा है.

अरविंद अडिगा के उपन्यास ‘द वाइट टाइगर’ में कहानी का मुख्य किरदार बलराम जब अशोक का ड्राइवर बनता है. तो उसे सबसे ज्यादा रोमांच पिंकी मैडम को गाड़ी में घुमाते हुए ही होता है. कई जगह बलराम खुद को पिंकी मैडम को देखता हुआ पाता है. और अपनी मालकिन को देखते हुए पाठकों को ये भी बताता है कि किस तरह उसकी ‘चोंच’ उत्तेजित हो उठती है: “मैं जब भी सामने गाड़ी के शीशे में देखता, ड्रेस से बाहर आ रहे उनके स्तन दिख जाते.”

उपन्यास में बलराम तमाम कुंठाओं के साथ एक सेक्शुअल कुंठा से भी भरा हुआ है. हमारे बीच ये कुंठाएं दिखना आम है. यौनिकता के प्रेशर कुकर में ये सॉफ्ट पॉर्न सीटी की तरह आता है. यहां पुरुष वो हो जाता है जो असल जीवन में नहीं हो पाता.

जब हम सेक्स में पैसिव रूप से यानी कर्ता न होकर दर्शक के रूप में शामिल होते हैं, हम उन ज़िम्मेदारियों से भी बच जाते हैं जो असल जीवन में सेक्स के साथ आती हैं- सहमति, रिश्ते, प्रेम या पैसों का लेन-देन.

सहजता

चार साल पहले ऑनलाइन फोरम ‘रेडिट’ पर किसी ने एक सवाल पूछा: आप सॉफ्टकोर पॉर्न क्यों देखते हैं? लोगों के जवाब कुछ ऐसे थे-

पहला: ‘सेक्सी’ का अर्थ मेरे लिए हमेशा हार्डकोर ही नहीं होता. हालांकि मैं जितना पॉर्न देखता/देखती हूं उसमें 90 फीसद हार्डकोर की होता है. मगर कभी-कभी मन करता है एक अच्छा सॉफ्ट वीडियो देखने का. हालांकि ये ज़रूरी है कि ये सॉफ्ट वीडियो भी परफेक्ट तरीके से फिल्माया गया हो और पॉर्नस्टार बेहद अच्छे दिखते हों.

दूसरा: मैं लगातार हार्डकोर नहीं देख पाता/पाती. एक वक़्त आ ही जाता है जब नज़र हटानी पड़ती है.

तीसरा: हालांकि हार्डकोर में काफ़ी बदलाव हुए हैं. मगर अक्सर देखकर ऐसा लगता है जैसे गायनोकॉलोजी का पाठ हो. अरे मेरे अंदर कल्पनाशीलता है. मुझे संतुष्टि के लिए किसी 18 साल की लड़की के जननांग के अंदर नहीं झांकना.

ऐसी ही एक और थ्रेड पर जवाब:

पहला: क्योंकि स्टोरीलाइन मज़ेदार होती है.

दूसरा: क्योंकि मेरा लिंग उपलब्ध वीडियोज में भेदभाव नहीं करता.

तीसरा: क्योंकि मेरे दौर में हाई स्पीड इंटरनेट नहीं था और यही उपलब्ध था. मेरे लिए तस्वीरों से ऊपर उठ किसी भी वीडियो को देखना ही बहुत था.

चौथा: क्योंकि औरतों के लिए ढंग का पॉर्न नहीं बनता. नॉर्मल हार्ड पॉर्न में लड़कियों को वेश्या और बुरे-बुरे नामों से पुकारते हैं. कौन लड़की ऐसी चीज़ देखना चाहेगी जिसमें लड़कियों का अपमान हो रहा हो.

यूं तो दुनिया में बन रहा अधिकतर पॉर्न पुरुष-केंद्रित होता है. लेस्बियन पॉर्न तक पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है. लेकिन हार्डकोर पॉर्न में दिखने वाले कुछ वीभत्स दृश्य बहुत लोगों को असहज कर सकते हैं. जैसे:

– लड़की को पीटा जाना या रेप पॉर्न
– लड़के या लड़की को गुलाम बनाकर दिखाया जाने वाला स्लेव पॉर्न
– हिंसक पॉर्न
– स्ट्रेट कपल्स के बीच लंबा खिंचने वाला एनल सेक्स
– लंबे ओरल सेक्स के सीन
– पुरुष और महिला अंगों का अप्राकृतिक चित्रण
– फोरप्ले का अभाव
– नकली लगने वाली आवाज़ें और कामुकता
– स्टोरीलाइन न होना

हार्ड कोर पॉर्न साइट्स पर उपलब्ध लगभग पूरा कॉन्टेंट पुरुषों के लिए बनता है. इसकी इन्तेहां ये है कि लेस्बियन (जिन्हें पुरुष अंग से कोई वास्ता नहीं है) वो भी वीडियोज में कृत्रिम अंग (जैसे डिल्डो) के साथ दिखती हैं.
हार्ड कोर पॉर्न साइट्स पर उपलब्ध लगभग पूरा कॉन्टेंट पुरुषों के लिए बनता है. इसकी इन्तेहां ये है कि लेस्बियन (जिन्हें पुरुष अंग से कोई वास्ता नहीं है) वो भी वीडियोज में कृत्रिम पुरुष अंग (जैसे डिल्डो) के साथ दिखती हैं.

लगातार औरतों का शोषण दिखाने के चलते मेनस्ट्रीम पॉर्न का काफ़ी विरोध देखा गया है. मेनस्ट्रीम पॉर्न की दुनिया में एथिक्स और नैसर्गिकता की कमी देखते हुए, ‘एथिकल पॉर्न’ की एक मैगज़ीन शुरू करने वाली महिला हैं मैकेंज़ी पेक. मैकेंज़ी ने अंग्रेजी अखबार द इंडिपेंडेंट से बातचीत में मेनस्ट्रीम पॉर्न के बारे में अपने मन की बात कही. साल 2017 में:

‘पॉर्न इंडस्ट्री की कमी ये है कि ये अधिकतर लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाता है. दुनिया में जितने तरह के शरीर होते हैं, जितनी तरह की शारीरिक इच्छाएं होती हैं, वो मेनस्ट्रीम पॉर्न में दिखता ही नहीं है. लोग एक ही तरह के पॉर्न से बोर हो चुके हैं. वो कुछ नया देखना चाहते हैं. एक पॉर्न वीडियो, जो नकली न हो. जिसमें आत्मा हो. और वो सब कुछ हो, जो सेक्स के दौरान हम करते हैं.’

OTT पर दिखने वाले इरॉटिक सीरियल्स में कहानियां भले ही असलियत से कोसों दूर हों. मगर इनमें दिखने वाली स्टोरीज लोगों को ‘आगे क्या होगा’ के सवाल से भर देती हैं.

टैबू

गूगल पर ‘टैबू’ शब्द का अनुवाद खोजेंगे तो वो बताएगा कोई चीज़ जो निषिद्ध हो. कल्पनाओं में कुछ भी निषिद्ध नहीं होता. यही कल्पनाएं जब इरॉटिका या पॉर्न का रूप लेती हैं तो लड़का अपनी कज़िन के साथ, ससुर अपनी बहू के साथ, देवरानी अपनी जेठानी के साथ, देवर अपनी भाभी के साथ सेक्स संबंध बनाता दिखता है. हार्डकोर पॉर्न में ‘स्टेपमॉम’, ‘स्टेपडैड’ या ‘स्टेपब्रदर’ जैसी केटेगरी अक्सर देखने को मिलती हैं.

अमेरिकी राइटर और साइकॉलजिस्ट लॉनी बारबैक साल 2018 में ‘ईस्कवायर’ वेबसाइट से हुई बातचीत में कहती हैं:

‘पॉर्न का काम हदों को मिटाना है. बीते कई साल से पॉर्न अपना दायरा बढ़ा रहा है. ये दायरा बढ़ते-बढ़ते इंसेस्ट (परिवार के सदस्य के साथ सेक्स) तक पहुंच गया. कई साल पहले तक सेक्स ही अपने आप में एक बुरी चीज़ थी. उसे अपना लिया गया. तो पॉर्न अब इंसेस्ट की तरफ बढ़ गया है. हमेशा कोई ऐसी चीज़ तो होनी चाहिए जो निषिद्ध हो.’

चूंकि पॉर्न पलायन का एक साधन है, इसका असल जीवन से दूर होना ज़रूरी है. असलियत से दूरी इससे ज्यादा क्या होगी कि परिवार के अंदर संबंध बन रहे हों. 2011 में जब गेम ऑफ़ थ्रोन्स रिलीज हुआ, उसमें दिखाए गए सगे भाई-बहन के बीच संबंध और उससे पैदा हुए बच्चे का कहानी में होना, टीवी पर देखा गया. जेमी और सरसी लैनिस्टर से इतर जॉन स्नो और डेनेरिस टारगेरियन के बीच, यानी भतीजे और बुआ के बीच प्रेम संबंध देखे गए. हालांकि गेम ऑफ़ थ्रोन्स में और भी बहुत कुछ था जो ‘शॉक वैल्यू’ लेकर आया था.

'गेम ऑफ़ थ्रोन्स' में सरसी और जेमी. परिवार के खून को प्योर रखने के लिए सरसी चाहती है उसके भाई से पैदा हुआ बच्चा ही राजा बने.
‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ में सरसी और जेमी. परिवार के खून को प्योर रखने के लिए सरसी चाहती है उसके भाई से पैदा हुआ बच्चा ही राजा बने.

जब हम पॉर्न की ओर बढ़ते हैं, ‘ज्यादा शॉक’ वैल्यू की तलाश में होते हैं. एक क्रिया के तौर पर सेक्स में नया या अलग करने के लिए कुछ भी नहीं होता. केवल उसके इर्द-गिर्द बुनी गई चीजों को बदला जा सकता है. सेक्स तो सेक्स है. लेकिन पत्नी का पति के साथ होने के बजाय पड़ोसी या देवर के साथ होना दर्शक के लिए ज्यादा अपीलिंग है.

डायरेक्टर आज़ाद भारती बताते हैं:

‘हमने जब शुरुआती शो बनाए तो ऐसा कुछ नहीं दिखाया था. मगर फिर टीम को ईमेल आने लगे. लोगों की डिमांड आने लगी इस तरह का कॉन्टेंट दिखाने की. तब बहू-ससुर जैसे आइडियाज पर काम शुरू किया गया. इस तरह के वीडियो बनाने की सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह है, पब्लिक डिमांड.’

'कूकू' पर स्ट्रीम हो रही 'सुनो ससुरजी' से एक सीन. महज़ इस फिल्म के ट्रेलर के यूट्यूब पर करोड़ों व्यू हैं.
‘कूकू’ पर स्ट्रीम हो रही ‘सुनो ससुरजी’ से एक सीन. महज़ इस फिल्म के ट्रेलर के यूट्यूब पर करोड़ों व्यू हैं.

वहीं कई एक्सपर्ट इसे फ्रॉइड की थियरी से जोड़कर देखते हैं. साइकोएनालिसिस यानी मनोविश्लेषण की नींव रखने वाले सिगमंड फ्रॉइड ने दिमाग से जुड़ी तमाम थियरीज में ‘लिबिडो’ को काफी जगह दी है. ‘लिबिडो’ का ढीला अनुवाद होगा किसी भी इंसान को कुदरती तौर पर मिलने वाली सेक्स की इच्छा. फ्रॉइड के मुताबिक़ हमारा दिमाग सोच के स्तर पर तीन भागों में बंटा होता है. ‘इड’, ‘ईगो’ और ‘सुपरईगो’.

इड हमारी कुदरती इच्छाएं हैं. जैसे भूख, प्यास, मलत्याग या सेक्स. वहीं ‘सुपरईगो’ वो है जो हम समाज से सीखते हैं. बीच में है ‘ईगो’, यानी हमारी कुदरती इच्छाओं और समाज की अपेक्षाओं के बीच का भाग. जो हम असल में होते हैं.

फ्रॉइड के मुताबिक़ सेक्स हमारा कुदरती इंस्टिक्ट है और हम बचपन से ही यौनिक होते हैं. यानी पैदा होते ही. फ्रॉइड यौनिकता के दिमागी विकास को भी पांच भागों में बांटते हैं. मगर उसकी चर्चा फिर कभी.

कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंसेस्ट पॉर्न की ओर जाना महज़ अपने कुदरती इंस्टिंक्ट की ओर लौटना है. जो असल दुनिया में हम नहीं कर सकते हैं. पॉर्न एक्ट्रेस दाना वेस्पोली ‘माइक’ वेबसाइट से बात करते हुए कहती हैं:

‘इस तरह के पॉर्न का पॉपुलर होना ये दिखता है कि हम असल में क्या चाहते हैं. इस तरह के वीडियो देख लोग हस्तमैथुन करते हैं. ये कुदरती प्रतिक्रिया है. लोग इंसानी दायरों से लड़ते हैं. पॉर्न उन्हें एक ऐसी जगह देता है जहां वो सुरक्षित महसूस करते हैं. क्योंकि यहां वो कोई कानून नहीं तोड़ रहे हैं.’

कविता भाभी का किरदार करने वाली कविता राधेश्याम लल्लनटॉप से हुई बातचीत में कहती हैं:

‘कविता एक असल महिला हैं. जो फोन पर लोगों से बात करती थीं. उन्हीं पर हमने ये किरदार बेस किया. जब कविता इस बिजनेस में थीं, कोई मॉडर्न साधन नहीं थे चैट के. फ़ोन पर बात करके ही लोग आनंद लेते थे. इसपर रिसर्च करते हुए, उनकी कॉल रिकॉर्डिंग सुनते हुए मैंने पाया कि कुदरती फैंटेसी कभी नहीं बदलती. लोग तब भी यही कहानियां चाहते थे, अब भी यही चाहते हैं. आज के बच्चे बड़े होंगे कल, तब भी फैंटेसीज़ यही रहेंगी. भाभी, टीचर, पड़ोसन. कविता भाभी वो तार छेड़ रही है जो लोग छेड़ना नहीं चाहते.’

सीजन 3 की और बढ़ रहा कविता भाभी का शो हर एपिसोड में कविता भाभी को नए पार्टनर के साथ दिखाता है. देवर या जेठानी, यहां परिवार का कोई बंधन नहीं है.
सीजन 3 की और बढ़ रहा कविता भाभी का शो हर एपिसोड में कविता भाभी को नए पार्टनर के साथ दिखाता है. देवर या जेठानी, यहां परिवार का कोई बंधन नहीं है.

मगर एक्टर्स का क्या

देखने वालों के लिए OTT प्लैटफॉर्म्स एक सुरक्षित जगह हैं. मगर इन्हें देखने वालों तक लेकर आती है एक टीम. डायरेक्टर और एक्टर्स की. OTT पर सेक्स और यौनिकता को लेकर बढ़ती स्वीकार्यता और सहजता के क्या कुछ बुरे पक्ष भी हैं?

रोशान गैरी भिंडर उल्लू ऐप पर स्ट्रीम होने वाली सीरीज ‘डी-कोड’ की डायरेक्टर हैं. बीते साल इन्होंने उल्लू टीवी पर गंभीर आरोप लगाए. लल्लनटॉप से हुई एक बातचीत में वो कहती हैं:

जब मैंने स्टोरी पिच की थी, ये एकदम क्लीन स्टोरी थी. एक नॉर्मल स्टोरीलाइन थी, जिसमें मसाला था. मगर उन्होंने बोल्ड सीन्स की डिमांड की. ये कहते हुए कि ये डिमांड में है. कुछ उदाहरण दिखाए. तो हमने कहा कि थोड़ा बहुत करा देंगे. इंटिमेट सीन्स खूबसूरत होते हैं. उससे परहेज़ नहीं है. फिर शूटिंग के दौरान भी कुछ चीजें पुश करने की कोशिश की उन्होंने. कुछ मैंने नहीं माना, कुछ मान लिया. एक पॉइंट के बाद नहीं हो सकता. लेकिन एडिटिंग के वक़्त जो हुआ, उसे टॉर्चर कहा जाएगा. उल्लू को जब कॉन्टेंट बना के दे देते हैं, उसके बाद उसे डॉक्टर किया जाता है. फिर से एडिट किया जाता है.

लेकिन मैं प्रड्यूसर भी थी. पैसे लगा चुकी थी. पीछे हटना संभव नहीं था. इन्होंने टेलीकास्ट के पहले मुझे नहीं दिखाया. दो मिनट के सीन को बढ़ाकर छह मिनट का कर दिया. मुझसे कहते थे इसमें तो कुछ दिख नहीं रहा. फ्रंटल दिखाइए. जो लड़की पहले से ही बिकिनी में है, उसमें और क्या फ्रंटल दिखाऊं?

उल्लू टीवी के लिए ही ‘ब्लैक कॉफ़ी’ नाम की सीरीज में दिखने वाली एक्ट्रेस काजल ने हमें बताया:

जब मैंने सीन शूट किए तो आइडिया ही नहीं था कि एडिटिंग के बाद इस तरह दिखेगा. वल्गर और इरॉटिक के बीच बड़ी थिन लाइन है. कई रीटेक लिए जाते हैं परफेक्ट सीन के लिए. लेकिन वो सब दिखा दिया जएगा, इसके बारे में मुझे पता ही नहीं था. डायरेक्टर कहता है फुल सीन करो, जिससे बार-बार शॉट न देना पड़े. हमें क्या पता था फुल सीन लगा दिए जाएंगे. एक्टर्स डायरेक्टर पर भरोसा करते हैं. करना भी चाहिए. लेकिन ये भरोसा टूटना ठीक नहीं है.

इसके बाद भी चीजें नहीं रुकीं. पहले ब्लफ़ किया गया. फिर इन्हीं लोगों ने ये सीन्स पॉर्न साइट पर डाल दिए. कोई बाहरी करता तो भी इतना बुरा नहीं लगता.

मेरी क्लिप वॉट्सऐप पर वायरल हो गई. मैं एक छोटे शहर से हूं. मेरे पिता एक नेक इंसान हैं. उन्हें कोई आकर बताता है आपकी बेटी को ऐसे देखा. उन्हें कैसा लगता होगा. मैं डिप्रेशन में चली गई. महीने बीत गए. पिता को कभी समझा ही नहीं पाई.

'ब्लैक कॉफ़ी' से एक सीन. काजल के गंभीर आरोपों के बाद उल्लू टीवी को लेकर हंगामा हुआ था. हालांकि ये कॉन्टेंट आज भी ऐप और पॉर्न साइट्स, दोनों पर उपलब्ध है.
‘ब्लैक कॉफ़ी’ से एक सीन. काजल के गंभीर आरोपों के बाद उल्लू टीवी को लेकर हंगामा हुआ था. हालांकि ये कॉन्टेंट आज भी ऐप और पॉर्न साइट्स, दोनों पर उपलब्ध है.

वहीं ‘कविता भाभी’ का पॉपुलर किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस कविता राधेश्याम एक अलग तरह का अनुभव साझा करती हैं:

मेरे को-स्टार बहुत मदद करते रहे. फ्रैंकली, मुझे कोई भी सीन शूट करने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई. हमें स्क्रिप्ट पता थी, हम इसके लिए तैयार थे. अगर ऑथेंटिक रखना है तो वो भाषा इस्तेमाल करनी ही पड़ेगी जो लोग बोलते हैं. मेरे माइंड में ये था कि ये काम चुनौती भरा है और ये मुझे करना है. ये नहीं किया तो इंडस्ट्री में मैंने कुछ नहीं किया. इस पैशन से अपना किरदार किया.

शूट के पहले हम मीटिंग करते थे. फ्रेंडली माहौल था. कैमरामैन के सामने सीन करना है, कम्फर्ट लेवल तो बनाना ही पड़ेगा. बल्कि हम तो एक दूसरे की टांग खींचते थे. और हंसते-हंसते हालत खराब हो जाती थी. क्योंकि हमें पता है असली में तो हम कुछ नहीं कर रहे. लेकिन एक्सप्रेशन उस तरह के देने हैं. ये बड़ा हास्यास्पद था.

पॉर्न साइट्स पर कॉन्टेंट जाने को लेकर भी कविता एक पॉजिटिव सोच मेंटेन करती हैं:

एक चीज़ जो OTT पर आ चुकी है. उसको हम कहां तक रोकें. किसी का किसी पर जोर नहीं है. टेक्नोलॉजी पर कोई रोक नहीं है. हम सिर्फ एक कंप्लेंट डाल सकते हैं. रिपोर्ट कर सकते हैं. किसी एक्ट्रेस की क्लिप गई है तो ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. मैं इसे सपोर्ट नहीं करती. लेकिन कौन, क्या हैक कर, किस चीज़ को कहां ले जा रहा है, उसपर कैसे रोक लगा सकते हैं?

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‘दिखाना वही चाहिए, जो लोग देखना चाहते हों.’

फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर’ में रेशमा का किरदार निभा रहीं विद्या बालन ये डायलॉग बोलती हैं. रेशमा का किरदार सिल्क स्मिता पर आधारित है जो अपने ‘हॉट रोल्स’ के लिए जानी गईं. ये लंबे समय से बहस का विषय है. कि क्या दिखाया जाए. जो लोग देखना चाहते हैं. या जो लोगों को देखना चाहिए. दिखाने वालों के हाथ में सत्ता है. प्रोडक्शन की, डिस्ट्रीब्यूशन की. उसे असलियत दिखाने के लिए इस्तमाल करें, या इसलिए कि लोग असलियत को एस्केप कर सकें.

इरॉटिक और सॉफ्ट पॉर्न इंडस्ट्री ऐसे किसी द्वंद्व में नहीं है. इस दुनिया में सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं है. कॉन्टेक्स्ट नहीं है. किसी महाकाव्य की तरह ये समय के दायरे से बाहर है. संदर्भ-प्रसंग से दूर है. क्योंकि सेक्स था, है और रहेगा.

स्कूपवूप की डाक्यूमेंट्री ‘वैसी वाली पिक्चर’ में थिएटर में ‘सी-ग्रेड’ फिल्म देखने आया लड़का कह रहा है:

ऐसी पिक्चर घर पे थोड़े देख सकते हैं. परिवार है साथ में. ये गंदा पिक्चर है. सेक्स. इसके लिए थिएटर में मजा लेते हैं.’

आज इस लड़के के पास थिएटर चलकर मोबाइल में आ गया है. सस्ते OTT प्लेटफार्म के रूप में.


वीडियो: लड़कियों की फोटो लगाकर पॉर्न बेचता था, पकड़ा गया तो हवा गुम हो गई

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