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डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा क्यों और पेट्रोल-डीज़ल की कीमत चढ़ी क्यों?

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बात शुरू करते हैं पेट्रोल-डीज़ल से. बार-बार दो शब्द न लिखने-पढ़ने पढ़ें, इसलिए आगे हर जगह तेल लिखेंगे. समझ जाइएगा.

अब तेल हमारे यहां तो उगता नहीं है. हम सऊदी अरब, ईरान और कुवैत जैसे देशों से खरीदते हैं. उन्हें पेमेंट करना पड़ता है डॉलर में. क्यों? क्योंकि दुनियाभर में सप्लाई होने वाले कच्चे तेल की कीमत डॉलर में तय होती है. क्यों? क्योंकि डॉलर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा है. ये अमेरिका की करंसी है. अमेरिका को स्थिर देश माना जाता है कि वहां अचानक ऐसी कोई आर्थिक समस्या नहीं आ जाएगी कि पूरा देश ही चौपट हो जाए. इसीलिए डॉलर को स्थिर मुद्रा माना जाता है. ज़्यादातर देश डॉलर में पेमेंट लेते-देते हैं. हम भी तेल का पेमेंट डॉलर में करते हैं.

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अब मान लीजिए कि पिछले साल अमेरिका का एक डॉलर भारत के 65 रुपए के बराबर था और कच्चे तेल का एक ड्रम 100 डॉलर का था. तो हमें एक ड्रम कच्चा तेल खरीदने के लिए 100 डॉलर यानी 6500 रुपए चुकाने पड़ते थे. इस साल डॉलर हो गया 71 रुपए का और कच्चे तेल का ड्रम भी 110 डॉलर का हो गया. तो अब हमें एक ड्रम तेल खरीदने के लिए 110 डॉलर यानी 7,810 रुपए चुकाने होंगे.

तो जो चीज़ पिछले साल 6,500 रुपए की थी, वो इस साल 7,810 रुपए की हो गई. अब विदेश से तेल आएगा, रिफाइन होगा, सरकारें टैक्स लगाएंगी, डीलर कमीशन लेगा… तो पेट्रोल पंप पर मिलने वाला तेल महंगा तो हो ही जाएगा. और ये बढ़ा हुआ पैसा कहां से जाएगा? हमारी-आपकी जेब से.

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ये तो है तेल का फंडा. अब आप पूछेंगे कि ये डॉलर करीब 71 रुपए का क्यों हो गया! You are a good question but your question does not hurt me.

डॉलर के मुकाबले रुपया कमज़ोर होने की तीन वजहें हैं:

#1. ट्रेड वॉर

अमेरिका में जो ट्रंप अंकल हैं न, वो कुछ देशों पर भन्ना गए हैं. अब ये 1945 तो है नहीं, तो कहते हैं कि पैसे से मारेंगे. सबसे पहले उन्होंने निशाने पर लिया टर्की को. उस पर ढेर सारे आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया. अब ऐसे में होता क्या है कि मान लीजिए टर्की में बनी एक शर्ट अमेरिका में बिकने गई. अमेरिका में उतरने पर उस शर्ट पर इम्पोर्ट ड्यूटी यानी आयात शुल्क लगेगा. तो मान लीजिए 50 रुपए ड्यूटी लगकर शर्ट की कीमत हो गई 550 रुपए. अब ट्रंप अंकल ने क्या किया कि टर्की को सबक सिखाने के लिए ये इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर 300 रुपए कर दी. तो शर्ट की कीमत हो गई 800 रुपए. जबकि अमेरिका में पहले से अमेरिका में ही बनी शर्ट 500-600 रुपए में बिक रही है.

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अब क्या होगा कि लोग टर्की की महंगी हो चुकी शर्ट खरीदने के बजाय अमेरिका में बनी सस्ती शर्ट खरीदेंगे. इससे टर्की का घाटा है. जब उसकी चीज़ें बिकेंगी नहीं, तो उसके पास पैसा कम आएगा. पैसा कम होगा, तो बिजनेस के रास्ते कम होंगे. ऐसा होने पर विदेशी इन्वेस्टर टर्की से दूर भागने लगेंगे.

अब मसला ये है कि टर्की दुनिया के उन देशों में आता है, जिन्हें बड़े-बड़े इन्वेस्टर इमर्जिंग कंट्रीज़ कहते हैं. यानी वो देश, जहां व्यापार तेज़ी से फल-फूल रहा है. भारत भी इसी कैटेगरी में आता है. लेकिन अमेरिका, चीन, ईरान और टर्की जैसे देशों के बीच छिड़ी ये ट्रेड वॉर जैसे-जैसे बढ़ेगी, वैसे-वैसे विदेशी इन्वेस्टर इमर्जिंग कंट्रीज़ से दूर भागने लगेंगे, क्योंकि यहां धंधा जल्दी ठप होने का खतरा होगा. वो जाएंगे अमेरिका जैसे विकसित देशों के पास, क्योंकि वहां धंधा आसानी से बंद नहीं होगा. और होगा क्या… ये तो हो ही रहा है, जिसका असर भारत पर भी पड़ रहा है. इस ट्रेड वॉर के चक्कर में कई देशों को अपनी करंसी डिवैल्यू करनी पड़ी है.

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#2. तो इन्वेस्टर दूर भागने से रुपया कैसे कमज़ोर होगा

क्योंकि सारे इन्वेस्टर डॉलर बेचकर रुपए खरीदते हैं और उसके बाद ही निवेश करते हैं. इसे ऐसे समझिए कि 2016 में कोई विदेशी इन्वेस्टर भारत में निवेश करने आया. उसे लगा कि सरकार मज़बूत चल रही है और धंधा भी फल-फूल रहा है, तो इन्वेस्ट करते हैं. उसने 100 डॉलर निवेश करने का मन बनाया. भारत की मार्केट में निवेश करने के लिए उसे डॉलर को बेचकर रुपए खरीदने होंगे. वो 100 डॉलर बेचकर रुपए खरीदेगा और निवेश करेगा.

फिर 2018 में उसने देखा कि ट्रेड वॉर बढ़ रहा है और चुनाव भी आने वाले हैं. पता नहीं मार्केट फायदा दे पाएगा या नहीं. अगली सरकार भी न जाने किसकी बने. तो उसने पैसा निकालने का मन बनाया. ऐसा करने के लिए उसे रुपए बेचकर डॉलर खरीदने होंगे. तो जब एक साथ ढेर सारे इन्वेस्टर रुपए बेचकर डॉलर खरीदने लगेंगे, तो इंडिया की मार्केट में रुपए की ओवर सप्लाई हो जाएगी. और डिमांड और सप्लाई का नियम तो आप जानते ही हैं. डिमांड ज़्यादा होगी, तो कीमत उठेगी. सप्लाई ज़्यादा होगी, तो कीमत गिरेगी.

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#3. अमेरिका के रिज़र्व बैंक की ब्याज़ दर

हां हां… अमेरिका में भी रिज़र्व बैंक है. पर उसका नाम रिज़र्व बैंक नहीं, फेडरल रिज़र्व बैंक है. अभी के टाइम में उसने अपने देश में ब्याज़ दरें खूब बढ़ा रखी है. ब्याज दर बढ़ने से अभी अमेरिका में पैसा लगाना ज़्यादा फायदेमंद है, इसीलिए दुनियाभर में डॉलर की डिमांड बढ़ रही है. तो जो बिजनेसमैन अभी तक भारत में पैसा लगा रहे थे, वो अब अपना पैसा भारत से निकालकर अमेरिका में लगा रहे हैं.

अब ये लोग जो पैसा ले गए, वो डॉलर में बदलकर कराके ले गए. गणित में बताएं, तो अप्रैल से जून 2018 के बीच भारत से 9 अरब डॉलर निकाले गए. जुलाई में कुछ गया नहीं, तो कुछ आया भी नहीं. 29 अगस्त तक 1 अरब डॉलर के निवेश का आंकड़ा सामने आया, लेकिन ये इतना नहीं है कि हमारे रुपए का कुछ भला कर सके. अब जब इतने डॉलर देश से बाहर गए, तो फिर वही डिमांड-सप्लाई वाला नियम. डॉलर की डिमांड ज़्यादा है, तो वो महंगा है. डॉलर महंगा है, तो रुपए की वैल्यू गिरी है.

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अब आप कहेंगे कि जब सब कुछ अपने आप ही होना है, तो हमने ये सरकार क्या पकौड़े तलने के लिए बनवा रखी है? क्या सरकार तेल की कीमत कम और रुपए की वैल्यू ज़्यादा नहीं कर सकती? चलिए, ये भी बताते हैं.

#A. सरकार तेल की कीमत कम क्यों नहीं कर सकती?

क्योंकि तेल की खुदरा कीमत तीन चीज़ों पर तय होती है:

1. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत : जो 2014-15 के मुकाबले अभी ज़्यादा चल रही है
2. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोल-डीज़ल की कीमत : पिछले कुछ समय में गिरावट रही, लेकिन अभी फिर से तेज़ी है
3. रुपए की स्थिति : जो अभी बहुत डांवाडोल है

अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल या पेट्रोल-डीज़ल की कीमत क्या होगी, इस पर भारत सरकार का कोई ज़ोर नहीं है और न कभी हो सकता है. क्योंकि कच्चे तेल की कीमत तेल बेचने वाले देश और उनकी असोसिएशन तय करती है. इसमें डिमांड-सप्लाई वाला नियम भी लागू होता है. अब मान लीजिए कि अमेरिका के प्रतिबंध के बाद ईरान तेल नहीं बेच पाएगा, तो भारत में तेल की सप्लाई की दिक्कत आएगी. तो ये कच्चा तेल बेचने वाले देश जिस रेट पर तेल बेचेंगे, हमें उसी रेट पर खरीदना होगा.

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इसे ऐसे भी समझिए कि अप्रैल से अगस्त 2018 के बीच मई वो महीना था, जब कच्चे तेल की कीमत सबसे ज़्यादा थी- 75 डॉलर यानी करीब 5,100 रुपए प्रति बैरल. अभी ये कीमत 73-74 डॉलर यानी करीब 5,254 रुपए प्रति बैरल के आसपास घूम रही है. आप कहेंगे कि ये अंतर तो सिर्फ 1 डॉलर का है. तो सुनिए. एक आकलन के मुताबिक जब कच्चे तेल की कीमत 1 डॉलर बढ़ती है, तो अगली खरीदी पर भारत का इम्पोर्ट बिल 50 करोड़ डॉलर यानी 35 अरब रुपए से भी ज़्यादा बढ़ जाता है. तो जब सरकार को इम्पोर्ट बिल ज़्यादा देना होगा, तो हमें भी तेल के लिए ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी. इसमें न हम कुछ कर सकते हैं और न सरकार.

ये तो हुई कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की बात. कोढ़ में खाज तब हो जाती है, जब कच्चा तेल महंगा हो और रुपया भी कमज़ोर हो जाए. रुपया जितना कमज़ोर होगा, इम्पोर्ट बिल उतना बढ़ेगा, क्योंकि पेमेंट तो डॉलर में ही करना है न.

#B. सरकार डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत मज़बूत क्यों नहीं कर सकती?

कैसे करेंगे? 1- अगर देश में विदेशी इन्वेस्टर नया निवेश करेंगे नहीं. 2- जो पहले से किया हुआ है, वो भी निकाल ले जाएंगे. 3- और हमें विदेशों को लगातार डॉलर में पेमेंट करते रहना पड़ेगा. तो इससे देश में डॉलर की कमी हो जाएगी. डॉलर की मात्रा जितना कम होगी, रुपए की वैल्यू उतनी गिरती जाएगी.

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हमारा जो रिज़र्व बैंक है, उसके पास एक विदेशी मुद्रा कोष होता है. इस कोष का मकसद ये है कि जब देश में डॉलर की मात्रा बहुत कम हो जाए और रुपए के लुटने-पिटने की नौबत आ जाए, तो RBI विदेशी मुद्रा कोष से डॉलर निकालकर मार्केट में झोंक दे. लेकिन RBI ये कब तक करेगा? वैसे भी ये कोष उन हालात के लिए बनाया गया है कि अगर अर्थव्यवस्था एकदम चौपट होने की कगार पर आ जाए, तो RBI इस कोष से भारी मात्रा में डॉलर निकालेगा. अभी रुपए की जो हालत हो रखी है, उसे सजाने-संवारने के लिए तो विदेशी मुद्रा कोष खाली नहीं कर सकते न. वैसे भी, अभी डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 71 रुपए तक पहुंच चुका है. अब चीजें RBI के हाथ के बाहर हैं. डॉलर झोंकने से भी कुछ नहीं होगा.

आखिर में दिल जलाने वाली तीन बातें भी सुन लीजिए:

भारत में पेट्रोल 80 रुपए लीटर बिक रहा है, तो इसके पीछे बड़ी वजह है केंद्र सरकार का टैक्स और राज्य सरकारों का वैट. सरकारें चाहें, तो अपना टैक्स कम करके तेल की कीमतें घटा सकती हैं, लेकिन भारत सरकार का फिस्कल डेफिसिट यानी राजकोषीय घाटा इतना है कि सरकार चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकती. मूडी तो पहले ही कह चुकी है कि तेल की कीमतों के चलते भारत 2018-19 का अपना फिस्कल डेफिसिट का टारगेट पूरा नहीं कर पाएगा.

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सोशल मीडिया पर कुछ लोग मोदी सरकार के समर्थन में ये ज्ञान ठेल रहे हैं कि दूसरे देशों की करंसी के मुकाबले रुपया तो फिर भी डॉलर के सामने कम ही गिरा है. अरे भइया, रूस, ब्राजील, चीन और कनाडा वगैरह की करंसी चाहे जितना ज़्यादा गिर गई हों, लेकिन भारत को तो अमेरिकी डॉलर में ही पेमेंट करना होगा न. और हम वो डॉलर अपना रुपया बेचकर ही लाएंगे न. तो दूसरे देशों की करंसी से हमारा क्या लेना-देना.

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अब अगर कोई नेता या नीति-निर्माता ये दावा करे कि अगले डेढ़-दो महीने में ये हालात सुधर जाएंगे, तो ये सबसे संदिग्ध बात होगी. क्योंकि भारत में अगले साल चुनाव आने वाले हैं और डॉलर लगातार इन्वेस्टर्स को आकर्षित कर रहा है. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ बहुत चमत्कारिक न हो जाए, तो मान कर चलिए कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों और रुपए की वैल्यू में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आने जा रहा है.

बातें बहुत गंभीर हो गई हों, तो मनोरंजन के लिए पेश हैं मोदीजी:

मोदी जी कुछ मिनटों में सारे कारण गिना रहे हैं रुपये के रिकॉर्ड गिरने के | The Lallantopमोदी जी कुछ मिनटों में सारे कारण गिना रहे हैं रुपये के रिकॉर्ड गिरने के

Posted by The Lallantop on Friday, August 31, 2018


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