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वो राष्ट्रपति जिनकी जीत का ऐलान जामा मस्जिद से हुआ था

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भारत के तीसरे राष्ट्रपति चुनाव में जब इंदिरा चारों तरफ से घिरी हुई थी. कम्युनिस्ट पार्टी और जनसंघ सहित पूरा विपक्ष जाकिर हुसैन के खिलाफ लामबंद था. प्रचार अभियान के दौरान विपक्ष ने इस बात का खूब प्रचार किया कि अगर जाकिर हुसैन चुनाव हारते हैं तो इंदिरा गांधी के पास अपने पद से इस्तीफा देने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा. इस बीच जाकिर हुसैन पर विपक्ष ने व्यक्तिगत हमले करने से गुरेज नहीं किया. ख़ास तौर पर जनसंघ की तरफ से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि एक मुस्लिम आदमी को देश के राष्ट्रपति के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता. हालात काफी नाजुक थे.

अंग्रेजी पत्रिका मेनस्ट्रीम ने छपे लेख में लिखा कि ज्यादातर कांग्रेसी इस डर में थे कि अगर जाकिर यह चुनाव हार जाते हैं तो केंद्र में कांग्रेस की सरकार गिरने का खतरा पैदा हो जाएगा. 1967 के निराशाजनक नतीजों के बाद कांग्रेस के लिए फिर से चुनाव में जाना आत्मघाती साबित हो सकता है. ऐसे में इंदिरा गांधी से असहमत होने के बावजूद वो क्रॉस वोटिंग नहीं कर सकते थे. इधर विपक्ष के नेताओं को भी पता था कि उनके पास जरूरी बहुमत नहीं है. इस वजह से उनका सारा गणित क्रॉस वोटिंग के भरोसे था. इस तरह से चुनाव राष्ट्रपति चुनाव कम, इंदिरा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ज्यादा बन गया था.

इस नाजुक घड़ी में जेपी इंदिरा के पक्ष में खड़े हुए. राजनीति से संन्यास ले चुके जेपी का एक बयान 22 अप्रैल को अख़बारों में छपा. इसमें उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों को संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए. अगर जाकिर साहब राष्ट्रपति नहीं चुने जाते तो यह देश की कौमी एकता के लिए ठीक नहीं होगा. देश टुकड़ों में बंट जाएगा. जेपी के इस बयान के बाद हिंदुस्तान टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा कि अगर एक सच्चा मुसलमान नेशनलिस्ट नहीं हो सकता तो एक सच्चा हिंदू कैसे हो सकता है. विदेशी मीडिया में इस चुनाव को भारत के सेक्युलर होने के लिटमस टेस्ट के तौर पर पेश किया जाने लगा.

जब ऑल इंडिया रेडियो ने अपना प्रसारण बीच में रोक दिया

6 मई 1967.शाम ढलने को थी. अचानक ऑल इंडिया रेडियो का प्रसारण रोक दिया गया. एक जरूरी सूचना थी जिसे बताया जाना जरूरी था. कुल 838,170 वोटों में से 471,244 वोट हासिल करके जाकिर हुसैन राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत चुके हैं. उनके निकटतम प्रतिद्वंदी के. सुब्बाराव को 363,971 वोट हासिल हुए. इस तरह देश को पहला मुस्लिम राष्ट्रपति मिला.

जाकिर हुसैन नतीजों के दिन अपने घर आराम कर रहे थे. इंदिरा गांधी उनके राष्ट्रपति बनने की खुशखबरी लेकर तेजी से उनसे मिलने पहुंचीं. नतीजे घोषित होने के बाद वो उनसे सबसे पहले मिलने वालों में से थीं. उत्साह से भरी इंदिरा उनके घर पहुंचीं और उन्हें इस खबर के बारे में बताया. जाकिर साहेब के चेहरे पर जिस खुशी को देखने की इंदिरा तमन्नाई थी वो उन्हें मिली नहीं. दरअसल राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने उन्हें पहले ही फोन करके बधाई दे दी थी.

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लोग इस चुनाव के नतीजे का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. राष्ट्रपति भवन के बाहर लोगों की भीड़ जमा थी. नतीजे घोषित होने पर लोगों ने जुलूस निकाल कर खुशियां मनाई. जामा मस्जिद से जाकिर हुसैन की जीत का ऐलान किया गया.13 मई को 1967, संसद के सेंट्रल हॉल में जाकिर हुसैन देश के तीसरे राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ले रहे थे.10 साल की उम्र में अपने पिता और 14 साल की उम्र में अपनी मां को खो देने वाले लड़के के लिए यह आसान सफ़र नहीं था.

पख्तूनों के आफरीदी कबीले से आने वाले जाकिर हुसैन की कॉलेज की पढ़ाई मुस्लिम एंग्लो ओरियंटल कॉलेज से हुई. इस कॉलेज को 1920 में अंग्रेजों ने यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया. इसे नया नाम मिला, ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी.’ खिलाफत और असहयोग आंदोलन से निकले कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इसे ब्रिटिश हुकूमत के हस्तक्षेप के तौर पर लिया. 18 लोगों ने मिलकर एक नई यूनिवर्सिटी बनाई, ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया.’ जर्मनी से पढ़ाई करके लौटे जाकिर हुसैन 29 साल की उम्र में इस यूनिवर्सिटी के वीसी बने.

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आजादी के बाद पहली राज्यसभा में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सदस्य मनोनीत किया गया. 1956 में उन्हें फिर से सदस्य बनाया गया लेकिन उन्हें अपना कार्यकाल बीच में छोड़ कर नई जिम्मेदारी संभालनी पड़ी. 1957 में उन्हें गवर्नर के तौर पर बिहार भेजा गया. जब पंडित नेहरू इस प्रस्ताव को लेकर उनके पास गए तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया था. उन्हें दिल का एक दौरा पड़ चुका था. डायबिटीज अपने चरम पर थी. ग्लूकोमा की वजह से आंखों ने जवाब देना शुरू कर दिया था. अंत में उन्हें राजी कर लिया गया.1962 में राधाकृष्णन के बाद उप राष्ट्रपति बनाया गया. इस समय वो अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के कुलपति हुआ करते थे.

तबियत ऐसी चीज थी जिसके बारे में उन्हें हमेशा सचेत रहना पड़ता. हर दिन उनका चेकअप किया जाता. 3 मई की सुबह एकदम सामान्य थी. सुबह ठीक 10.45 को उनका डॉक्टर उनका चेकअप करने आ गए. उन्होंने कहा कि बाथरूम से लौट कर वो चेकअप करवाएंगे. जब आधे घंटे तक दरवाजा नहीं खुला तो उनके असिस्टेंट इशाक ने दरवाजा खटखटाया. आधे घंटे के बाद राष्ट्रपति भवन और देश की हर सरकारी इमारत पर लहरा रहा तिरंगा झुका दिया गया. देश का पहला मुस्लिम राष्ट्रपति अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने वाला पहला राष्ट्रपति बन गया.


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