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वो मुख्यमंत्री जिसने गुजरात में विधायकों के खरीद-फरोख्त की शुरुआत की

19 सितंबर 1965. राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता गुजरात से सटी पाकिस्तान सीमा पर पाकिस्तानी लड़ाकू विमान के निशाने पर आ गए. नया राज्य बनने के महज़ पांच साल बाद गुजरात नेतृत्वहीनता की स्थिति से गुज़र रहा था. बलवंतराय की त्रासद मौत के बाद सूबे के लिए नए मुख्यमंत्री की खोज शुरू हुई. यह वो दौर था जब इंदिरा कामराज के जरिए कांग्रेस के भीतर अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही थीं. इधर मोरारजी देसाई भी कांग्रेस में दूसरे नम्बर के नेता के तौर पर अपनी दावेदारी जता रहे थे.

बलवंतराय मेहता, जिन्हें भारत में पंचायती राज का जनक भी कहा जाता है
बलवंतराय मेहता, जिन्हें भारत में पंचायती राज का जनक भी कहा जाता है

हितेंद्र देसाई ऐसे नेता थे जिनके नाम पर कांग्रेस के दोनों धड़े सहमत थे. मोरारजी देसाई अपने भरोसेमंद सिपहसालार ठाकोर देसाई को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपना चाहते थे. मोरारजी अनुभवी राजनेता थे. उन्होंने दो वजहों से ठाकोर भाई के नाम के पीछे ख़ास जोर नहीं लगाया. पहला ठाकोर देसाई 1962 का विधानसभा चुनाव हार गए थे. इस लिहाज से वो बहुत लोकप्रिय नहीं कहे जा सकते थे. दूसरा हितेंद्र देसाई के पिता कन्हैय्या लाल उर्फ़ कानजी देसाई के साथ मोरारजी के अच्छे संबंध रहे थे. ऐसे में उन्हें हितेंद्र देसाई के नाम पर भी कोई ख़ास आपत्ति नहीं थी. इधर इंदिरा गांधी भी हितेंद्र के नाम पर सहमत थीं. हितेंद्र देसाई बलवंतराय मेहता के मंत्रिमंडल में गृह मंत्री थे. ऐसे में वो कार्यवाहक मुख्यमंत्री का दायित्व निभा रहे थे. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें इसी पद पर बनाए रखने का फैसला किया.

15 साल के लड़के की जेल यात्रा

नौ अगस्त 1915 के रोज़ सूरत में जन्मे हितेंद्र देसाई की परवरिश आजादी आंदोलन की छांव में हुई. उनके पिता कांग्रेस के नेता हुआ करते थे. 12 मार्च 1930 के दिन गांधी साबरमती से दांडी के लिए निकल पड़े. उनके साथ 77 और सत्याग्रही थे. आन्दोलनकारियों की इस टोली को हर दिन 10 मील की पैदल यात्रा करते हुए छह अप्रैल को सूरत जिले के दांडी गांव पहुंचना था. अप्रैल की पहली तारीख को गांधी सूरत पहुंचे. यहां उनका भव्य स्वागत हुआ. यहां उमड़ी भीड़ को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा,

“मैंने आज तक नहीं सुना कि दुनिया के किसी कोने में इस किस्म का कानून प्रचालन में हो. जो सम्राज्य इस तरह के कानून को लागू करता है, उसके सामने झुकना धर्म नहीं अधर्म है. कोई भी आदमी जो सुबह उठकर ईश्वर की पूजा करता है, वो इस तरह के शैतानी राज की पूजा नहीं कर सकता. उसे करना भी नहीं चाहिए. इस अमानवीय सरकार की खिलाफत धर्म का काम है.”

दांडी मार्च के दौरान गांधी
दांडी मार्च के दौरान गांधी

गांधी भाषण दे रहे थे और सामने बैठी भीड़ में एक 15 साल का किशोर उनकी हर बात को बड़े गौर से सुन रहा था. छह अप्रैल को गांधी दांडी पहुंचे. उन्होंने अपने हाथ से नमक बनाया. उनके बनाए हुए एक चुटकी नमक ने अंग्रेजी राज के मुंह का जायका बिगाड़ दिया. अप्रैल के अंत तक लाखों लोगों ने नमक कानून को तोड़ा. 60 हजार से ज्यादा सत्याग्रही जेल में डाल दिए गए. इनमें सूरत जिला कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष कानजी भाई देसाई का 15 वर्ष का लड़का भी था. सविनय अवज्ञा आंदोलन का ऐलान होने के साथ ही उसने स्कूल जाना छोड़ दिया. यह बतौर सत्याग्रही उसकी पहली जेल यात्रा थी. इस लड़के का नाम था हितेंद्र कन्हैय्या लाल देसाई. उसे दांडी मार्च के 35 साल बाद बतौर मुख्यमंत्री सूबे की कमान संभालनी थी.

1930 के सविनय अवज्ञा के बाद हितेंद्र की पढ़ाई फिर से शुरू हुई. 1933 में उन्होंने सूरत से मैट्रिक पास की. आगे की पढ़ाई के लिए बॉम्बे यूनिवर्सिटी भेजा गया. यहां से उन्होंने अर्थशास्त्र में बी. ए. किया. इसके बाद उस दौर की रवायत के मुताबिक उन्होंने कानून की पढ़ाई में दाखिला ले लिया. 1937 के साल में हितेंद्र बॉम्बे यूनिवर्सिटी से वकील बनकर निकले.

वो बॉम्बे हाईकोर्ट में वकील हो गए. वकालत चल निकली. इधर कांग्रेस में भी सक्रियता बनी रही. 1941 में जब गांधी जी ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान व्यक्तिगत सत्याग्रह की घोषणा की, हितेंद्र भाई देसाई भी उस आंदोलन में कूद पड़े. इसके चलते उन्हें फिर से जेल जाना पड़ा. करीब तीन महीने जेल में बिताने के बाद उन्हें छोड़ा गया.

नौ अगस्त 1942. बॉम्बे के गवालिया टैंक मैदान से भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा हुई. गांधी जी के मुताबिक यह आजादी के लिए आर-पार की लड़ाई थी. हितेंद्र देसाई बॉम्बे में थे. नौ अगस्त को गांधी जी को गिरफ्तार किए जाने के बाद बॉम्बे शहर में बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई. जवाब में अंग्रेज सरकार ने कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू किया. ऐसे में हितेंद्र देसाई ने खुद को फिर से जेल में पाया. करीब दो साल जेल में रहने के बाद हितेंद्र देसाई रिहा हुए. 1947 में आजादी मिलने के बाद उन्हें सूरत म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया. वो करीब 10 साल तक इस पद पर रहे. 1957 में महागुजरात आंदोलन के दौर में बॉम्बे प्रेसीडेंसी के चुनाव हुए. हितेंद्र देसाई सूरत की मांगरोल विधानसभा से इस चुनाव में उतरे. उनके सामने थे निर्दलीय उम्मीदवार दत्तात्रेय पंगारकर. देसाई ने यह चुनाव 14,404 के मुकाबले 32,672 वोटों से जीत लिया.

भारत छोड़ो आंदोलन की याद में 1967 में जारी किया गया डाक टिकट
भारत छोड़ो आंदोलन की याद में 1967 में जारी किया गया डाक टिकट

1960 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी से अलग गुजरात राज्य बनने के बाद जीवराज मेहता इसके पहले मुख्यमंत्री बने. जीवराज मेहता के मंत्रिमंडल में हितेंद्र देसाई को भी जगह मिली. उन्हें शिक्षा, कानून, कृषि, जंगलात, नशाबंदी, समाज कल्याण, पुनर्वास, राजस्व के मंत्रायल सौंपे गए. 1962 के विधानसभा चुनाव में वो ओलपाड सीट से मैदान में उतरे. उनके सामने थे स्वतंत्र पार्टी के बाबूभाई पटेल. हितेंद्र देसाई को मिले 22,201 वोट. वहीं बाबूभाई पटेल महज़ 12,266 का आंकड़े पर पहुंच पाए. वो फिर से जीवराज मेहता के काबीना में शामिल हुए. उन्हें राजस्व विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई. 1963 में हुए सत्ता परिवर्तन ने हितेंद्र देसाई का कद और बढ़ाया. मोरारजी के आशीर्वाद से सत्ता में आए बलवंतराय मेहता के मंत्रिमंडल में उन्हें गृह मंत्री का ओहदा दिया गया.

गुजरात में ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ की नींव डालने वाला शख्स

इस साल अगस्त में हुए राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के कद्दावर नेता शंकर सिंह वाघेला ने 20 साल के लंबे साथ के बाद पार्टी का दामन छोड़ दिया. ऐसे में कांग्रेस के लिए अहमद पटेल की राज्यसभा सदस्यता बचाना कड़ी चुनौती बनकर उभरा. इस समय कांग्रेस ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के इल्ज़ाम लगाए. कांग्रेस राजनीति की खरीद-फरोख्त की उसी परम्परा से सांसत में थी जिसकी नींव 1969 में उसने खुद डाली थी.

1967 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा झटका थे. यह बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए पहला लोकसभा चुनाव था. गुजरात में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हो रहे थे. लोकसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित हुए थे. 24 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस महज़ 11 के आंकड़े पर सिमट गई. स्वतंत्र पार्टी को मिली 12 सीटें और एक सीट निर्दल के खाते में गई.

इस विपरीत समय में हितेंद्र भाई देसाई अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहे. कुल 168 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने 93 सीट हासिल की. वहीं स्वतंत्र पार्टी को मिलीं 66 सीटें. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के खाते में गईं तीन सीटें और भारतीय जनसंघ महज़ एक सीट जीत पाया.

1967 के चुनाव में सी राजगोपालाचारी के नेतृत्व वाली स्वतंत्र पार्टी गुजरात में मजबूती से उभर कर आई
1967 के चुनाव में सी राजगोपालाचारी के नेतृत्व वाली स्वतंत्र पार्टी गुजरात में मजबूती से उभर कर आई

पांच विधायकों ने पार्टी छोड़ी

राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी की हार के बाद कांग्रेस का विभाजित होना तय माना जा रहा था. एक नवंबर को दिल्ली में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई. बैठक हुई तो लेकिन दो जगह. पहली मीटिंग 7, जंतर-मंतर रोड पर कांग्रेस के नेशनल हेडक्वॉर्टर पर और दूसरी 1, सफदरजंग रोड माने प्रधानमंत्री आवास पर. इस बैठक के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया.

इसके बाद कांग्रेस के दो फाड़ हो गए. पहला कांग्रेस के पुराने नेताओं (जिन्हें सिंडिकेट या ओल्ड गार्ड्स भी कहा था) के नेतृत्व में. इसे नाम दिया गया कांग्रेस (ओ) या कांग्रेस संगठन. दूसरा धड़ा गया इंदिरा के नेतृव में. इसे कांग्रेस (आर) या रूलिंग कांग्रेस कहा गया. कांग्रेस के ज्यादातर हिस्से में कांग्रेस के आम कार्यकर्ता इंदिरा गांधी के धड़े वाली कांग्रेस में शामिल हो गए लेकिन दो प्रदेश कांग्रेस समितियों में कांग्रेस (ओ) का बोलबाला रहा. पहला राज्य था कर्नाटक, कांग्रेस (ओ) के अध्यक्ष निजलिंगप्पा का गृह राज्य. दूसरा राज्य था गुजरात. कांग्रेस (ओ) के कद्दावर नेता मोरारजी देसाई का गृह राज्य.

नीलम संजीव रेड्डी और मोरारजी देसाई
नीलम संजीव रेड्डी और मोरारजी देसाई

ऐसा नहीं है कि गुजरात में कांग्रेस के सभी सदस्य कांग्रेस (ओ) के साथ बने रहे. कांग्रेस में रितु भाई अडानी के गुट ने इंदिरा गांधी का साथ देने का फैसला किया. इसके बाद 24 अगस्त 1969 के रोज कांतिलाल घिया के नेतृत्व में पांच कांग्रेसी विधायकों ने सरकार का साथ छोड़ दिया और कांग्रेस (आर) की सदस्यता ले ली.

168 की विधानसभा में हितेंद्र देसाई के पास 93 विधायकों का बहुमत था. पांच विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद यह संख्या 88 पर पहुंच गई. यह 85 के जादुई आंकड़े से महज़ तीन ज्यादा थी. हितेंद्र देसाई कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे. ऐसे में उन्होंने विधायकों की खरीद-फरोख्त शुरू की. आठ अक्टूबर 1969 को बनासकाठा जिला की राधनपुर विधानसभा से स्वतंत्र पार्टी के विधायक राम सिंह जड़ेजा ने कांग्रेस (ओ) की सदस्यता ली. इसके अगले ही दिन नौ अक्टूबर को बनासकाठा की ही वाव विधानसभा से स्वतंत्र पार्टी के विधायक जग प्रताप परमार भी सत्ताधारी पार्टी के खेमे में चले गए. इस तरह सदन में हितेंद्र भाई देसाई की सरकार को 90 विधयाकों का बहुमत प्राप्त हो गया.

इंदिरा गांधी, के.कामराज और मोरारजी देसाई
इंदिरा गांधी, के.कामराज और मोरारजी देसाई

आफत भरा कार्यकाल

1965 में जब हितेंद्र भाई देसाई मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने बलवंतराय मेहता से विरासत में मिले मंत्रिमंडल में कोई बदलाव नहीं किया. उस समय उनके मंत्रिमंडल में दो ऐसे मंत्री हुआ करते थे, जिन्हें आगे चलकर मुख्यमंत्री बनना था. ये नेता थे, बाबूभाई पटेल जो उस समय पीडब्लूडी मंत्री हुआ करते थे और चिमन भाई पटेल जिनके पास उस समय परिवहन मंत्रालय था.

1967 के विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने के बाद हितेंद्र देसाई की असल परीक्षा शुरू हुई 1969 में. अक्सर राजनीति के जानकार कहते हैं कि 2002 के बाद गुजरात के राजनीतिक नक्शे पर एक चीज बदल गई. चुनावों के दौरान जाति नहीं धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण होता है लेकिन गुजरात में साम्प्रदायिकता का लंबा इतिहास रहा है. कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारों में सूबे में सांप्रदायिक हिंसा हुई हैं.

1969 का दंगा : एक आसमानी किताब और एक होली काऊ

सितंबर 1969 में अहमदाबाद में भयंकर सांप्रदायिक दंगे हुए लेकिन इसकी भूमिका लिखी जानी शुरू हो गई थी दिसम्बर 1968 में. यह वो समय था जब संघ के दूसरे सरसंघ चालक माधव सदाशिव गोलवलकर अहमदाबाद आए. यहां उन्होंने स्वयंसेवकों को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाने की शपथ दिलाई. इसके बाद मुस्लिम बाहुल्य वाले इलाकों में मौलाना साहिबान की सक्रियता बढ़ गई. दोनों तरफ से एक-दूसरे पर ज़बानी हमले शुरू हो गए.

तीन मार्च 1969. कालूपुर इलाके में एक हिन्दू पुलिस इंस्पेक्टर एक मुस्लिम व्यापारी के ठेले को हटा रहा था. इस दौरान उस ठेले पर रखी कुरआन जमीन पर गिर गई. इससे नाराज़ मुस्लिम समुदाय ने हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिया. इसमें 12 पुलिस वाले घायल हुए. इसके कुछ महीनों बाद 31 अगस्त 1969 को फिलिस्तीन में अल-अक्सा मस्जिद को जलाने के विरोध में अहमदाबाद में मुसलमानों का बड़ा प्रदर्शन हुआ. इसने भी हिंसक मोड़ ले लिया.

1969 के दंगे हितेंद्र देसाई के कार्यकाल का सस्बे असफल दौर थे
1969 के दंगे हितेंद्र देसाई के कार्यकाल का सबसे असफल दौर था

18 सितम्बर के रोज अहमदाबाद के जमालपुर में सूफी संत बुखारी साहेब की दरगाह पर सालाना उर्स चल रहा था. इस बीच पास ही के जगन्नाथ मंदिर के संन्यासी अपनी गाएं लेकर मंदिर की तरफ लौट रहे थे. मुसलमानों का आरोप था कि इन गायों ने भीड़ भरी गली में कई महिलाओं को घायल कर दिया. इसके जवाब में कुछ उन्मादी मुस्लिम युवाओं ने साधुओं पर हमला बोल दिया. जगन्नाथ मंदिर के महंत इसके विरोध में अनशन पर बैठ गए. अगले दिन ए. एम. पीरजादा के नेतृत्व में मुसलमानों का 15 सदस्यीय दल महंत सेवादास के पास माफ़ी मांगने के लिए गया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

19 से 24 सितम्बर के दौरान अहमदाबाद में शुरू हुई हिंसा में 514 लोगों ने जान गंवाई. 6,123 घरों को आग के हवाले कर दिया गया. देखते ही देखते यह हिंसा मेहसाणा, वड़ोदरा, खेड़ासहित सूबे के कई हिस्सों में फ़ैल गई. इस सांप्रदायिक हिंसा की जांच के लिए एक सदस्यी जस्टिस जगनमोहन रेड्डी कमीशन का गठन हुआ. कमीशन की रिपोर्ट ने कांग्रेस सरकार को दंगा नियंत्रण में ढिलाई बरतने का आरोप लगाया. हालांकि जस्टिस रेड्डी के अनुसार यह ‘एरर ऑफ़ जजमेंट’ था. मसलन 19 तारीख के दिन से अहमदाबाद में कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई थी. जब 23 तारीख को इसमें तीन घंटे की ढील दी तो फिर से हिंसा भड़क गई. इसमें 30 और लोगों की जान चली गई. सरकार के पास दंगे से निपटने की कोई रणनीति नहीं थी.

1970 का भरूच भूकंप

1969 की सांप्रदायिक हिंसा से राज्य सरकार उबर ही रही थी कि 1970 में भरूच शहर भयंकर भूकंप की चपेट में आ गया. 23 मार्च 1970 को रात एक बजकर 52 मिनट पर भरूच में 5.4 तीव्रता वाला भूकंप आया. लोग घरों में सो रहे थे. करीब 2500 घर जमींदोज हो गए. 23 लोगों की मलबे में दबकर मौत हो गई. करीब एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हुए. हितेंद्र देसाई के लिए यह कुदरती आपदा नई चुनौती बनकर उभरा.
इतनी परेशानियों के बावजूद हितेंद्र देसाई का कार्यकाल एक चीज के लिए याद किया जा सकता है. उन्होंने आधुनिक गुजरात के औद्योगिकीकरण की नींव रखी. उन्होंने राज्य में राजकोट यूनिवर्सिटी, कृषि यूनिवर्सिटी और आयुर्वेद यूनिवर्सिटी शुरू की. महागुजरात आंदोलन के दौरान मारे गए लोगों की याद में शहीद स्मारक बनाया. गांधीनगर की बसावट की नींव रखी. राज्य में सिंचाई व्यवस्था कायम करने की शुरुआत करने का श्रेय भी उन्हीं को दिया जा सकता है.

भरूच: 1969 के दंगों के 1970 में आए भूकंप ने गुजरात की कमर तोड़ दी
भरूच: 1969 के दंगों के 1970 में आए भूकंप ने गुजरात की कमर तोड़ दी

नाटकीय तरीके से सत्ता से विदाई

1971 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के बाद इंदिरा फिर से लोकसभा चुनाव का सामना कर रही थीं. उन्हें कांग्रेस का परम्परागत चुनाव चिन्ह “दो बैलों का जोड़ा” नहीं मिला था. इसकी जगह उनके पास था “बछड़े को दूध पिलाती गाय.” कांग्रेस (ओ) ने स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ के साथ मिलकर महागठबंधन की घोषणा की. नाम रखा गया ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट’ इस गठबंधन का नारा था, “इंदिरा हटाओ.” गुजरात में कांग्रेस (ओ) का नेतृत्व इस गठबंधन के खिलाफ था. गुजरात के बड़े नेताओं मसलन हितेंद्र देसाई, जीनाभाई दारजी, विजुभाई शाह और सनत मेहता ने इसका जमकर विरोध किया. इधर मोरारजी गठबंधन के पक्ष में अड़ गए. ऐसे में इन नेताओं को मन मसोस कर रह जाना पड़ा.

एनडीएफ के इंदिरा हटाओ के खिलाफ इंदिरा गांधी ने नया नारा दिया, “गरीबी हटाओ.” यह नारा चुनाव में जादू कर गया. इंदिरा की कांग्रेस (आर) को 352 सीटों पर जीत हासिल हुई. कांग्रेस (ओ) महज 16 सीट पर सिमट गई. इंदिरा का जादू पूरे देश में चला लेकिन गुजरात में नहीं. कांग्रेस (ओ) को हासिल कुल 16 में से 11 सीटें गुजरात से थीं.

1971 का लोकसभा चुनाव: इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के परम्परगत निशान को छोड़ कर इस निशान पर चुनाव लड़ी थीं.
1971 का लोकसभा चुनाव: इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के परम्परगत निशान को छोड़कर इस निशान पर चुनाव लड़ी थीं.

इंदिरा गांधी के चुनाव जीतने के बाद गुजरात कांग्रेस (ओ) में भगदड़ मच गई. कई कर्यकर्ताओं और विधायकों ने अपनी वफादारियां कांग्रेस (आर) की तरफ झुका ली. 17 विधायकों ने कांग्रेस (ओ) की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. ऐसे में “DISQUALIFICATION ON GROUND OF DEFECTION” के आधार पर उनकी विधानसभा सदस्यता निरस्त हो गई. ऐसे में 31 मार्च 1971 को अपना कार्यकाल पूरा किए बगैर हितेंद्र देसाई को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

इसके बाद राज्यपाल पी. एन. भगवती ने कांग्रेस (आर) कांतिलाल घिया को नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. कांतिलाल बड़ी मशक्कत के बाद भी राज्यपाल के सामने बहुमत के लिए जरूरी विधायकों का समर्थनपत्र नहीं सौंप पाए. ऐसे में 13 मई 1971 के रोज सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. यह राष्ट्रपति शासन 17 मार्च 1972 तक चला. इसके बाद गुजरात में नए सिरे से विधानसभा चुनाव हुए. इन चुनाव के नतीजे कांग्रेस (आर) के पक्ष में गए लेकिन असल कहानी शुरू हुई विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद. मुख्यमंत्री की अगली कड़ी में जानिए 1972 के विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुए कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष की कहानी.


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