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महामहिम: राजेंद्र प्रसाद के दूसरी बार चुनाव लड़ने पर राधाकृष्णन ने क्या धमकी दी?

1952 में जब देश में पहली बार चुनाव हुआ. संसद में नए प्रतिनिधि आए. इसलिए राष्ट्रपति के चुनाव फिर से करवाए गए. 1950 में राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर तख्ता पलट झेल चुके नेहरू ने 1952 में शांत रहना ही ठीक समझा. हालांकि दोनों के संबंध में कोई ख़ास सुधार नहीं आया था. 1951 में हिन्दू कोड बिल को लेकर राजेंद्र बाबू और नेहरू में तलवारें खिंची हुई थीं. लेकिन ये ऐसा चुनाव था जिसे नेहरू टाल नहीं सकते थे.

पार्टियों का मानना था कि किसी निष्पक्ष आदमी को राष्ट्रपति बनना चाहिए. इसलिए उन्होंने प्रो. केटी शाह को अपना उम्मीदवार चुना. प्रो. शाह मजदूर संगठनों से जुड़े हुए थे. वो लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पढ़े हुए थे. 1938 में जब नेहरू के नेतृत्व में पहला प्लानिंग कमीशन बना था, तो प्रो. शाह भी इसके सदस्य थे.

ये लड़ाई सांकेतिक थी. 1952 के चुनाव में कांग्रेस को 489 में से 364 सीटें मिली थीं. कांग्रेस का उम्मीदवार होना ही राष्ट्रपति बनने की एकमात्र शर्त थी. इस चुनाव में राजेंद्र प्रसाद को 507,400 वोट हासिल हुए. केटी शाह को महज 92,827 वोट ही मिल पाए.

इस चुनाव का एक दिलचस्प पहलू ये भी है कि कांग्रेस के 65 सांसदों और 479 विधायकों ने वोट नहीं डाले थे. इसके बारे में बाद में कहा गया कि क्योंकि राजेंद्र बाबू की जीत तय थी इसलिए कई लोगों ने वोट डालने की जहमत नहीं उठाई.

एक बार नेहरू को फिर से निराश होना पड़ा

दिसंबर 1950 में सरदार पटेल इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे. 1952 के चुनाव में नेहरू ने पार्टी की इच्छा को मान लिया था. 1957 के चुनाव में उनके पास मौका था कि वो अपनी मर्जी का राष्ट्रपति बना सकें. इस बार उन्होंने सर्वपल्ली राधाकृष्णन पर दांव लगाया. वो उस समय उपराष्ट्रपति हुआ करते थे. कांग्रेस के एक बड़े धड़े का समर्थन राजेंद्र प्रसाद के साथ था. इसके अलावा मौलाना आजाद भी राजेंद्र बाबू के पक्ष में खड़े थे. नेहरू को एक बार फिर से निराश होना पड़ा.

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राधाकृष्णन इस बात से इतने खफा हुए कि उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया. उन्हें बाद में जैसे-तैसे ये कह कर मनाया गया कि 1962 में उन्हें राष्ट्रपति बना दिया जाएगा. 1957 के चुनाव में राजेंद्र प्रसाद के सामने किसी दूसरी पार्टी ने अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था. हालांकि कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों ने वोट डालने की औपचारिकता को बनाए रखा. इस चुनाव में राजेंद्र बाबू को 4,59,698 वोट मिले. उनके करीबी प्रतिद्वंद्वी चौधरी हरीराम थे. उन्हें 2672 वोट हासिल हुए. इस तरह राजेंद्र बाबू नेहरू के ना चाहते हुए भी दो बार देश के राष्ट्रपति बने.

जनता का राष्ट्रपति 

13 मई 1962, राजेंद्र प्रसाद अपना 12 साल का कार्यकाल पूरा करके पटना के सदाकत आश्रम लौट रहे थे. लेकिन हम तीन दिन पीछे चलते हैं. तारीख थी 10 मई 1962. रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ था. यह कोई राजनीतिक जलसा नहीं था. देश के लोग अपने पहले राष्ट्रपति को विदाई देने के लिए जुटे थे. बाद के दौर में 12 और राष्ट्रपति आए और रिटायर हो गए लेकिन ऐसी विदाई का सुख किसी को नहीं मिला.

महज 1100 रुपए की पेंशन के साथ रिटायर हुए राजेंद्र प्रसाद ने भारत-चीन युद्ध के वक़्त अपनी पत्नी के सारे गहने भारत के राजकोष में दान कर दिए. जिंदगी भर सादगी के साथ गांधी के बताए रास्ते पर चलने वाले राजेंद्र बाबू ने 28 फरवरी 1963 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

महामहिम की अगली कड़ी में पढ़िए किस्सा भारत के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन का. 


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