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महामहिम: प्रधानमंत्री इस डांसर को राष्ट्रपति क्यों बनाना चाहते थे?

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साल 1969 का राष्ट्रपति चुनाव देश का सबसे दिलचस्प राष्ट्रपति चुनाव था. कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार होने के बावजूद नीलम संजीव रेड्डी चुनाव हार गए. कांग्रेस दो भागों में बंट गई. रेड्डी कांग्रेस (ओ) के खेमे में थे. 1971 में पकिस्तान को धूल चटाने के बाद इंदिरा की लोकप्रियता आसमान छू रही थी. इंदिरा ने इस चुनाव को मौके की तरह लिया और कांग्रेस (ओ) के नेताओं को घेर कर खत्म करना शुरू किया. रेड्डी के साथ भी यही हुआ. कांग्रेस (ओ) के टिकट पर वो अपने गृह नगर अनंतपुर से 84 हजार वोटों से चुनाव हार गए. 1967 में उन्हें लोकसभा का अध्यक्ष चुना गया था. यह उनकी शर्मनाक विदाई थी.

चुनाव हारने के बाद नीलम संजीव रेड्डी ने सार्वजानिक जीवन से संंन्यास ले लिया. वो दिल्ली से अनंतपुर लौट गए और अपनी खानदानी जमीन पर खेती करने लगे. पर क्या ये उनकी राजनीतिक पारी का अंत था? जवाब है नहीं. पांच साल के भीतर ही वो फिर से सार्वजानिक मंच पर भाषण दे रहे थे. अपनी वापसी के बारे में वो अपनी आत्मकथा ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ में लिखते हैं-

“1975 में आपातकाल लगने से पहले जेपी को हैदराबाद में एक सभा में भाषण देना था. संयोग से मैं भी शहर में ही था. जेपी का भाषण सुनने की गरज से मैं भी सभा में पहुंच गया और आम जनता के बीच जाकर बैठ गया. इस बीच मंच पर जेपी के साथ बैठे हुए कुछ लोगों ने मुझे पहचान लिया और ये बात जेपी को बता दी. मुझे ना चाहते हुए भी जेपी के आग्रह पर मंच पर जाना पड़ा.”

मोरारजी नहीं चाहते थे कि रेड्डी राष्ट्रपति बनें

भारत के पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का आपातकाल के दौरान ही देहांत हो गया. 1977 के चुनाव में जनता पार्टी नाम के भानुमती के कुनबे को बहुमत मिला. इस बार राष्ट्रपति चुनने की चाबी जनता पार्टी के हाथ में थी. 1977 के राष्ट्रपति चुनाव में नीलम संजीव रेड्डी देश के इतिहास में अकेले ऐसे राष्ट्रपति रहे, जिन्होंने निर्विरोध चुनाव जीता. लेकिन ये आसान नहीं था. उनकी पार्टी में ही उनके नाम को लेकर सहमति बनाने में काफी जद्दोजहद हुई. वो उस समय लोकसभा के अध्यक्ष हुआ करते थे. ये कोई छिपी हुई बात नहीं है कि महज जेपी की मर्जी के चलते मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच पाए थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद मोरारजी और जेपी के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गई थी. नीलम संजीव रेड्डी की गिनती जेपी के करीबियों में हुआ करती थी. यही वजह थी कि नीलम संजीव रेड्डी के नाम को लेकर मोरारजी बहुत उत्साहित नहीं थे.

मोरारजी ने संसदीय बोर्ड की मीटिंग में प्रसिद्द भरतनाट्यम कलाकार रुक्मणि अरुन्दले का नाम आगे बढ़ाया. सरकार को बाहर से समर्थन दे रही सीपीएम ने इस नाम का विरोध किया और साफ़ कर दिया कि अगर अरुन्दले को उम्मीदवार बनाया जाता है तो वो अपना अलग प्रत्याशी खड़ा कर देगी. इधर द्रमुक और अन्नाद्रमुक भी अरुन्दले के नाम को लेकर सहमत नहीं थीं. इस तरह मोरारजी को अपना मन मार लेना पड़ा.

रेड्डी के पुराने साथी रहे निजलिंगप्पा की भी नजर 1, रायसीना हिल्स पर थी. उन्होंने अपनी इच्छा मोरारजी के सामने जाहिर की. निजलिंगप्पा जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य थे. ऐसे में वो भी मजबूत दावेदार थे. मामला एक जगह फंस गया. बीडी जत्ती और निजलिंगप्पा एक ही राज्य कर्नाटक से आते थे. जत्ती उस समय भारत के उपराष्ट्रपति थे. दोनों ही लिंगायत बिरादरी से थे. इसलिए निजलिंगप्पा की उम्मीदवारी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई.

इस बार वो दिल जीत कर राष्ट्रपति बनना चाहते थे

नीलम संजीव रेड्डी 1969 के चुनाव में कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार थे. इंदिरा के विरोध के कारण उन्हें एक शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे में उन्होंने तय किया कि वो इस बार राष्ट्रपति के पद के लिए तब ही अपनी दावेदारी पेश करेंगे, जब सभी दल उनके नाम पर सहमत हों. जब तक सहमति नहीं बन जाती वो लोकसभा अध्यक्ष के पद से इस्तीफा नहीं देंगे. वो लोकसभा के अध्यक्ष भी सर्वसम्मति से बने थे.

इंदिरा गांधी 1977 की हार के बाद कमजोर पड़ चुकी थीं. इधर चौधरी चरण सिंह इंदिरा और संजय को जेल में डालने की फिराक में थे. वो जीवन की सबसे विपरीत परिस्थितियों में खड़ी थीं. इस राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने साफ़ कर दिया कि अगर सरकार के सभी घटक दल किसी एक नाम पर सहमत हो जाते हैं, तो वो विरोध नहीं करेंगी.

नीलम संजीव रेड्डी और मोरारजी देसाई
नीलम संजीव रेड्डी और मोरारजी देसाई

7 जुलाई 1977. संसद का मानसून सत्र चल रहा था. नीलम संजीव रेड्डी लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे हुए थे. इस बीच एक मार्शल उनके पास एक पर्ची लेकर आया. ये पर्ची कांग्रेस के नेता करण सिंह की तरफ से आई थी. ये सब उस समय हो रहा था, जब संसद मॉनसून सेशन की सबसे तीखी बहस का गवाह बन रहा था. पर्ची का मजमून बांचने से पहले बात उस बहस की.

दरअसल मॉनसून सत्र के कुछ दिन पहले ही अंग्रेजी अखबार स्टेट्समैन में एक खबर छपी. इस खबर के साथ छपी एक फोटोकॉपी ने सदन में नई बहस खड़ी कर दी. अखबार में छपी इस फोटोकॉपी के मुताबिक संजय गांधी ने मनेका गांधी के लिए 25 हजार फ्रैंक (फ्रांस की मुद्रा) का स्विस बैंक ड्राफ्ट निकाला था. इस बात पर सत्ता पक्ष के लोग अपने ही वित्त मंत्री एच. एम. पटेल को घेरे हुए थे. पटेल लगातार कह रहे थे कि इस दस्तावेज की सत्यता नहीं स्थापित की जा सकती. सत्ता पक्ष के सदस्य पटेल की इस सफाई से संतुष्ट नहीं थे. सत्ता पक्ष के लोग संजय गांधी और उनके बहाने से इंदिरा गांधी को घेरने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाह रहे थे. इससे एक सप्ताह पहले ही संजय और मनेका की हवाई अड्डे पर सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हुई थी.

इस मामले में मनेका का पासपोर्ट जब्त कर लिया गया था. विपक्ष इसे एक मौके की तरह भुना लेना चाह रहा था. हालात यहां तक पहुंच गए कि लेफ्ट के ज्योतिर्मय बसु एक मैग्नीफाइंग ग्लास लेकर आए थे. बार-बार स्पीकर रेड्डी को कह रहे थे कि आप भी देखिए. सब नजर आ जाएगा. सदन में हो रहे इस हंगामे पर रेड्डी बिफर गए. उन्होंने सदस्यों को फटकार लगाते हुए कहा, “आप मुझे इससे बुरा सिर दर्द नहीं दे सकते.”

पर्ची पढ़ने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया

ऐसे माहौल में जब करण सिंह की पर्ची रेड्डी तक पहुंची, तो उन्हें लगा कि इसका संबंध संसद की फिलहाल की कार्यवाही से होगा. जब उन्होंने पर्ची खोली तो इसमें कांग्रेस के समर्थन की बात लिखी गई थी. मोरारजी देसाई उस समय संसद में ही थे और पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे. वो जान गए कि अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था. थोड़ी देर में मोरारजी देसाई की तरफ से एक पर्ची मार्शल को सौंपी गई. इस पर्ची में लिखा था, “आपकी उम्मीदवारी का जनता पार्टी समर्थन करती है.”

इसके बाद उन्होंने डीएमके के प्रमुख करुणानिधि से बात की. रेड्डी को उनकी तरफ से भी समर्थन का आश्वासन मिला. इसके बाद उन्होंने लोकसभा के सभापति के पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी मां का आशीर्वाद लेने अनंतपुर आंध्रप्रदेश के लिए निकल गए. उनका राष्ट्रपति बनना तय हो चुका था.

ऐसा नहीं था कि उस चुनाव में किसी और ने नामांकन दाखिल नहीं किया था. नीलम संजीव रेड्डी के अलावा 36 और नामांकन दाखिल किए गए थे. उस समय के रिटर्निंग ऑफिसर अवतार सिंह रिखी ने 36 नामांकन रद्द कर दिए थे. 21 जुलाई, 1977 को नामांकन वापिस लेने की आखिरी तारीख थी. 3 बजे दोपहर नीलम संजीव रेड्डी देश के छठे राष्ट्रपति घोषित कर दिए गए.


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