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शौचालय नहीं तो उम्मीदवारी नहीं, पर बात बस इतनी नहीं है

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Prakash K Rayये आर्टिकल लिखा है प्रकाश के रे ने. प्रकाश बरगद हैं. जेएनयू की जमीं पर उगे, बढ़े और बसे. आज भी कभी आप रात में गंगा ढाबा जाएं तो बहुत मुमकिन है कि वह नजर आ जाएं. एक पत्थर पर प्रकाश. और इर्द गिर्द कुछ बूढ़े गिद्ध, बाज, कपोत, पपीहा. यानी सब घाट के सब उमर के पंछी. वैसे दुनियादारी के लिहाज से इंट्रो दें तो प्रकाश सिनेमा के स्कॉलर हैं. बरगद नाम का एक ब्लॉग भी चलाते हैं. अस्तु.


बिहार में इस साल मई-जून में होने वाले पंचायत चुनाव में वे लोग उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे जिनके घरों में शौचालय नहीं हैं. पिछले साल राजस्थान और हरियाणा की सरकारों ने पंचायत चुनाव में उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता और शौचालय की शर्त निर्धारित किया था. राजस्थान सरकार के निर्णय के विरुद्ध देश की सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका लेने से मना कर दिया था, तो हरियाणा सरकार के फ़रमान को सही ठहराया था.

ख़ैर, हमारी राजनीति में एक सिद्धांत यह भी ख़ूब चलता है- तू डाल डाल, मैं पात पात. राष्ट्रवादी भाजपा सरकारों से मुक़ाबले में सामाजिक न्याय के चैंपियन नीतीश कुमार को क्यों पीछे रहना था! सो, पिछले साल पांच अगस्त को बिहार विधानसभा ने पंचायत राज (संशोधन) विधेयक ‘ध्वनि मत’ से पारित कर दिया. इसमें प्रावधान किया गया कि उम्मीदवारों के घर में जनवरी, 2016 तक शौचालय ज़रूर होना चाहिए, अन्यथा वे चुनाव में दावेदारी न कर सकेंगे.

इससे पहले राज्य सरकार ने घोषणा की थी कि ग़रीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले परिवारों को शौचालय बनवाने के लिए प्रति परिवार चार हज़ार रुपये की केंद्रीय सहायता के अलावा आठ हज़ार रुपये का अनुदान दिया जाएगा. लेकिन, इस घोषणा को इस संशोधन विधेयक का हिस्सा नहीं बनाया गया था. घोषणाएं अगर क़ानून बनने लगे, तो नेताओं के लिए मुश्किल हो जाएगी.
रही बात इस प्रोत्साहन राशि के ज़रूरतमंदों तक पहुँचने की, तो ख़ुद सरकार यह दावा नहीं कर सकती है कि आधे लोगों तक भी यह पैसा पहुंच सका है, और जहां पहुंचा है, वहां कितना पहुँचा है. फ़िलहाल, राज्य प्रशासन 2,58,772 सीटों के लिए होनेवाले चुनाव की तैयारी कर रहा है जिनमें 8,397 मुखिया, 8,397 कचहरी सरपंच, 11,4,650 ग्राम पंचायत सदस्य, 11,4,650 कचहरी पंच, 11,516 पंचायत समिति सदस्य और 1,162 ज़िला परिषद सदस्य के पद हैं.

भारतीय संविधान की एक बड़ी ख़ासियत है कि इसके लागू होने के साथ ही हर नागरिक को उम्मीदवार बनने और मतदान का अधिकार मिल गया था. इसी अधिकार के बदौलत कोई बेघरबार व्यक्ति भी चुनाव लड़ सकता है और मनपसंद प्रत्याशी को वोट कर सकता है. हालाँकि ऐसे कई कारक हैं जो अब भी लोकतंत्र की मज़बूती की राह में बाधक बने हुए हैं, पर उन्हें क़ानूनी वैधता प्राप्त नहीं है, मसलन- धन-बल का ज़ोर, अपराधीकरण आदि. लेकिन, अब जबकि देश के ग़रीब-वंचित तबके की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है, इसे रोकने के लिए ख़तरनाक क़ानून बनाये जाने लगे हैं.

दुर्भाग्य की बात यह है कि इस राजनीतिक षड्यंत्र में अदालतों के साथ बौद्धिकों की बड़ी जमात भी परोक्ष रूप से शामिल है या फिर चुप है. यदि समान लोकतांत्रिक अधिकारों के तर्क को कुछ देर के लिए हटा भी दें, तो ज़मीनी सच्चाईयाँ चीख़-चीख़ कर यह बता रही हैं कि पंचायत चुनाव के ये नये नियम किस हद तक बड़ी आबादी, जिसमें अधिकांश ग़रीब, दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों से हैं, को राजनीति और सशक्तीकरण की मुख्यधारा से बहिष्कृत कर रही हैं. यह आधुनिक अश्पृष्यता है, यह वैधानिक छुआछूत है.

सितंबर, 2014 में ग्रामीण विकास, पंचायती राज, पेयजल एवं स्वच्छता के केंद्रीय राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने जानकारी दी थी कि बिहार की लगभग 77 फ़ीसदी आबादी खुले में शौच करती है. इसका राष्ट्रीय औसत 60 फ़ीसदी है. उन्होंने कहा था कि ये जानकारी उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर दे रहे हैं और वास्तविकता कहीं अधिक शोचनीय हो सकती है.

अब ज़रा आँकड़ों की पड़ताल करें. ग्रामीण बिहार में करीब 3.58 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से नीचे के स्तर पर जीवन बिताते हैं. वर्ष 2004-05 के आकलन के अनुसार बिहार देश का सबसे ग़रीब राज्य था जहां की 54 फ़ीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे थी. दस सालों के द्रुत विकास के बाद दावा है कि सिर्फ़ 26 फ़ीसदी लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाला गया है. इएजी (एंपॉवर्ड एक्शन ग्रुप) राज्यों में उत्तर प्रदेश के बाद सबसे अधिक ग़रीब बिहार में ही हैं. इस ग्रुप की स्थापना 2001 की जनगणना के बाद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के तहत की गयी थी ताकि ‘जनसंख्या विस्फ़ोट’ से जूझ रहे आठ राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं उत्तरांचल- पर विशेष ध्यान दिया जा सके.

लगे हाथ पिछले साल जारी ऑक्सफ़ोर्ड के एक अध्ययन का उल्लेख करना उचित होगा कि दुनिया के 1.6 अरब निर्धनतम लोगों में 44 करोड़ आठ भारतीय राज्यों में बसते हैं. ये राज्य हैं- बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल. इन राज्यों के ग़रीबों की संख्या 25 अफ़्रीकी देशों के ग़रीबों के बराबर है. सरकारी आँकड़े बताते हैं कि आबादी के प्रतिशत के हिसाब से भारत में ग़रीबों की संख्या के मामले में बिहार तीसरे स्थान पर है. इसी अध्ययन में यह भी बताया गया है कि दक्षिण एशिया का सबसे ग़रीब इलाक़ा बिहार है. भारत में ग़रीब उसे माना जाता है जो गाँव में 26 रुपये और शहर में 31 रुपये प्रतिदिन से कम ख़र्च पर जीता है. शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोज़गारी दर के मामले में भी बिहार इएजी राज्यों में अव्वल है.

अब ज़रा शौचालय के आँकड़ों पर नज़र दौड़ाया जाये. स्वच्छ भारत अभियान के तहत 2012 की आधार-रेखा (वर्ष 2011 की जनगणना पर आधारित) के अनुसार जारी सूचनाएँ बताती हैं कि ग्रामीण बिहार में 98 फ़ीसदी परिवार के पास घर में शौचालय नहीं है. जनगणना के अनुसार, बिहार में 1.68 करोड़ ग्रामीण परिवार हैं और इनमें से 1.64 करोड़ के पास शौचालय नहीं हैं. हालाँकि 2014 में जारी योजना आयोग के आँकड़े के अनुसार बिहार के 17.6 फ़ीसदी ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय की ‘सुविधाएँ’ है. मेरा अनुमान है कि इस संख्या में सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित सामुदायिक शौचालयों को भी गिना गया है. अगर इस आँकड़े को सही भी मान लें, तब भी 82 फ़ीसदी से अधिक परिवार शौचालय की सुविधा से वंचित हैं.

सामाजिक-आर्थिक जनगणना, 2011 के पिछले वर्ष जारी आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण बिहार के 54.82 फ़ीसदी परिवार भूमिहीन हैं और उनकी आय का मुख्य ज़रिया मज़दूरी है. अनुसूचित जाति के भूमिहीन परिवारों की संख्या 76.32 फ़ीसदी है. जनजाति वर्ग में यह आँकड़ा 57.34 फ़ीसदी है. ऐसे 0.19 फ़ीसदी परिवार हैं जो भीख माँग कर गुज़ारा कर रहे हैं. फूस, प्लास्टिक, मिट्टी आदि से बने कच्चे घरों में ग्रामीण बिहार की 57.96 फ़ीसदी आबादी का बसेरा है.

इन आँकड़ों से साफ पता चलता है कि शौचालय या शिक्षा जैसी बाध्यताएँ समाज के बहुत बड़े हिस्से को लोकतांत्रिक संरचना के सबसे निचले स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने और स्वशासन में अपनी भागीदारी निभाने से सीधे वंचित कर रही हैं. ध्यान रहे, ऐसी बाध्यताएँ देश के राष्ट्रपति से लेकर विधायक जैसे पदों के लिए नहीं है, जहां से सुशासन का ढोल पीटा जाता है.

अगर लोग शिक्षित नहीं हैं या उनके पास शौचालय की सुविधा नहीं है, तो यह राज्य की असफलता है, उन लोगों की नहीं. और, फिर एक ही देश में चुनाव से संबंधित अलग-अलग नियम बनाने का क्या तर्क है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि राज्य क्रमशः लोगों के बुनियादी अधिकारों से अपना पिंड छुड़ाना चाहता है. आर्थिक स्तर पर बहिष्करण की व्यापक प्रक्रिया पहले ही गंभीर हो चुकी है, जहां देश के सबसे धनी 100 लोगों के पास आबादी के निचले 70 फ़ीसदी यानी करीब 75 करोड़ लोगों की संपत्ति से अधिक धन है.
आख़िर में यह भी बता दें कि उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और आँध्र प्रदेश के पंचायत चुनाव में कुष्ठ रोगी उम्मीदवार नहीं बन सकते हैं. वर्ष 1898 में कुष्ठ रोग से संबंधित क़ानून बना था जिसमें यह कोशिश की गयी थी कि कुष्ठ रोगी के साथ भेदभाव समाप्त हो. लेकिन, स्वतंत्र भारत में नज़ारा कुछ और है, और यह राज्य द्वारा किया जा रहा है. उड़ीसा में तो तपेदिक (टीबी) के मरीज़ को भी पंचायत चुनाव लड़ने का अधिकार भी नहीं है. एक बार फिर याद दिला दें कि ऐसी कोई शर्त राष्ट्रपति, सांसद या विधायक बनने के लिए नहीं है. दुर्भाग्य की बात है कि इन सभी फ़ैसलों पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर लगी हुई है जो संविधान का अभिभावक माना जाता है. जय हिंद!

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The indian problem of Defication in public, and electoral politics around it

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