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नेहरू अगर ये झूठ न बोलते तो भारत-चीन युद्ध रुक जाता

claudeक्लॉड आर्पी मूल रूप से फ्रांस के हैं पर इंडिया में रहते हैं. बड़े समय से पत्रकारिता कर रहे हैं. इतिहासकार रहे हैं और तिब्बत पर की गई इनकी रिसर्च का लोहा दुनिया मानती है. तिब्बत पर कई किताबें भी लिख चुके हैं.

ये पीस क्लॉड ने मेल टुडे के लिए लिखा था. हम उसे ट्रांसलेट कर आपको पढ़ा रहे हैं.


 

सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी यानी CIA ने हाल भी लगभग 10 लाख से भी ऊपर रिपोर्ट, नोट्स, केबल और कुछ डॉक्यूमेंट रिलीज किए. जिनमें से हजारों डॉक्यूमेंट इंडिया और आस पास के देशों के बारे में हैं. इन टॉप सीक्रेट कागजों को देखते हुए मुझे एक नोट मिला. जिसे 15 जुलाई 1953 में लिखा गया था. इसमें इंडिया के उत्तरी बॉर्डर से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारी थी.

नोट का टाइटल था ‘चाइनीज कम्युनिस्ट ट्रूप्स, वेस्ट तिबेट, रोड कंस्ट्रक्शन, सिंकियांग टू तिबेट एंड लद्दाख’ (सिंकियांग से तिब्बत और लद्दाख तक सड़क का काम). ये उस बात पर मुहर लगाता है जिसका अनुमान आज तक कई इतिहासकार लगाते आए हैं: चीन ने भारत तक सड़क बनाने का काम 1950 के दशक में शुरू किया था. लेकिन नेहरू ने अगस्त 1959 तक इसे छिपाए रखा. और आखिरकार लोकसभा में खबर को बम की तरह गिरा दिया: ‘तिब्बत-सिंकियांग हाइवे बना दिया गया है.’

सच क्या था?

कुछ महीने पहले, नेहरू ने पार्लियामेंट में सच छिपाया था. उसी साल अप्रैल में जब बीजिंग ने अपने नक़्शे पर इंडिया के कुछ भाग को चीन का हिस्सा दिखाया था, दिल्ली ने ऐसी किसी भी सड़क के होने को नकार दिया था. उस समय एक सांसद ब्रज राज सिंह ने नेहरू से इसे लेकर सवाल भी किया था. कुछ अखबार की ख़बरें जो कह रही थीं कि चीन ने भारत का लगभग 30 हजार स्क्वायर मीटर का हिस्सा अपना बताया है, का हवाला देते हुए अक्साई चिन (वो हिस्सा जिसके पीछे चीन और भारत में लड़ाई हुई थी), पर सवाल किया था. नेहरू ने जवाब दिया था: ‘मैं सभी सदस्यों से कहूंगा कि इस तरह की ख़बरों पर ध्यान न दें. हमारे देश की ज़मीन पर कोई क्लेम नहीं किया गया है.’ नेहरू ने जानबूझकर ‘अक्साई चिन’ का नाम तक नहीं लिया.

अब CIA के कागजों से पता चलता है कि 1952 में 2 घुड़सेना रेजिमेंट, जिनका लीडर हान त्से-मिन था, का हेडक्वार्टर तिब्बत में था. रेजिमेंट में 800 घोड़े और 150 आदमी थे, सब रुतोक में रुके हुए. रुतोक पांगोंग ताल के पास है. पांगोंग तिब्बत और लद्दाख, दोनों का ही हिस्सा है.

इसी रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि एक रेजिमेंट तिब्बत-लद्दाख सीमा पर लद्दाख की तरफ तैनात थी. यानी कोयुल के करीब. इस अमेरिकी डॉक्यूमेंट के मुताबिक घुड़सेना के लीडर ने घोषणा की थी कि इलाके में सड़कें बनवाएंगे. एक सड़क खोतान से रुतोक तक होने वाली थी. दूसरी शहीदुल्ला तक. पहली सड़क 1953 में बन गई थी, इन कागजों के मुताबिक. ये सड़क अब ‘NH219’ कहलाने वाले मार्ग से थोड़ा हटकर थी. उस समय इसपर भारी वाहन नहीं जा सकते थे.

इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि चीनियों के भारत में तैनात होने की खबर इंडिया को नहीं थी. वो भी तब, जब ये खबर अमेरिकी एजेंसी को थी. हम ये भी न भूलें कि चीन के काश्गर शहर में भारत का दूतावास भी है. खबर मिलना कोई मुश्किल बात नहीं थी.

‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ वाली हवा तेज़ थी. और प्रधानमंत्री के साथी बढ़ते हुए चीन की जगह अपने बॉस को खुश करने में लगे थे. इनमें इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ बीएन मलिक भी शामिल थे. हान त्से-मिन ने कहा था, ‘जब ये सड़क बन गई, चीनी कम्युनिस्टों ने तिब्बत-लद्दाख बॉर्डर को व्यापार के लिए प्रयोग में लाना बंद कर दिया’. ये 1954 में पंचशील पर दस्तख़त होने के बाद हुआ था.

सोर्स: CIA, 2002
सोर्स: CIA, 2002

बात कागज़ की

CIA के कागज़ ये भी कहते हैं, ‘सिंकियांग में बैठे चीनी कम्युनिस्टों ने लोगों को बता दिया था कि लद्दाख अब सिंकियांग का हिस्सा हो चुका है.’ 10 दिनों बाद लिखे गए एक और नोट में ये भी लिखा है, ‘उत्तरी-पश्चिम तिब्बत में जो भी चीनी थे, सब कम्युनिस्ट थे. कम से कम 7-8 सौ की सेना तिब्बत-लद्दाख सीमा पर रहती थी. सबसे पहले ये लोग उत्तर-पश्चिमी तिब्बत में 1951 में खोतान के रस्ते आए थे.’

दिल्ली को इससे कोई मतलब नहीं था. दिल्ली में बैठी सरकार अगले कई सालों तक कुछ भी नहीं करने वाली थी. नतीजतन इंडिया का वो हिस्सा आज तक चीन ने कब्जिया रखा है.

6 अक्टूबर 1957 को चीनी अखबार कुआंग-मिंग जिह-पाओ ने हॉन्ग-कॉन्ग से लिखा: ‘दुनिया का सबसे ऊंचा हाईवे यानी सियांकांग तिब्बत हाईवे अब तैयार हो गया है. ट्रायल के लिए इसपर ट्रक चलाए जा रहे हैं…’

आखिकार नेहरू के पास कोई विकल्प नहीं बचा

1958 की शुरुआत में, इंडिया के फॉरेन सेक्रेट्री ने नेहरू को ख़त लिखकर कहा कि उन्हें एक सेना की एक टुकड़ी जांच के लिए भेजनी चाहिए. जो चेक करे कि सड़क बनी है या नहीं. नेहरू टुकड़ी भेजने के लिए तैयार तो हो गए. मगर उन्होंने कहा, ‘हवाई टुकड़ी भेजनी की कोई जरूरत नहीं है. बल्कि मुझे तो नहीं लगता कि जमीनी सेना को भी भेजकर कुछ होने वाला है.’

ये 1959 में हुआ, जब CRPF पट्रोल की 70 जवानों की एक टुकड़ी अक्साई चिन में देश की सीमा रेखा खींचने के लिए लनक पास को क्रॉस कर रहे थे, उन्हें PLA (पीपल्स लिबरेशन पार्टी) के लोगों ने रोक लिया. 20 अक्टूबर 1959 में चीनियों ने 3 भारतीयों को बंदी बना लिया. अगले दिन 9 जवान मार दिए और 7 को बंधक बना लिया. बात मीडिया में बड़ी हो गई. तब नेहरू के पास इस बात की घोषणा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा कि अक्साई चिन पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया है.

आज, CIA के कागज़ देखकर पता चलता है कि चीन के अक्साई चिन तक आने वाली सड़क को बहुत पहले ही बना लिया गया था. और हमें उसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलने दिया गया.


 

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