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साइकल, पौरुष और स्त्रीत्व

सिंतू 21 साल की हैं. मधुबनी में रहती हैं. इन चुनावों में पहली बार वोट डालेंगी. अंग्रेजी अखबार ‘द इकनॉमिक टाइम्स’ से बात करते हुए कहती है: साइकल से वोट डालने जाऊंगी. सिंतू की ‘रेंजर’ साइकल उसको नौंवीं क्लास में मिली थी. जब उसके पापा के अकाउंट में साइकल योजना के पैसे आए थे.

वोट डालना हमारे लिए आम बात है. साइकल चलाने जितना आम है. मगर दोनों का ही इतिहास, औरतों के केस में बहुत गहरा है. उतना ही गहरा है साइकल चलाती हुई औरत का इतिहास.

PP KA COLUMN

अंग्रेज इंडिया में कई चीजें लेकर आए. साइकल उनमें से एक थी. अंग्रेजों के लिए दु:ख की बात ये थी, कि जिन चीजों को वो इंडिया में लेकर आए, उन चीजों से भारतीय सब्जेक्ट को कंट्रोल नहीं कर पाए. साइकल पहले भारतीय पुरुष के पास पहुंची. फिर भारतीय औरत के पास. और तबसे, आजतक औरत के जीवन में आज़ादी का सबसे बड़ा साधन बनी हुई है.

सेक्स और साइकल

सेक्स, यानी लिंग. महिला या पुरुष. इसका साइकल से गहरा संबंध रहा. हर टेक्नोलॉजी और मॉडर्न उपकरण की तरह साइकल भी पहले पश्चिम में आई. अंग्रेज जब इंडिया में साइकल लाए, वो सिर्फ एक स्टेटस सिंबल ही नहीं थी. साइकल का मालिक होने का अर्थ ये भी था कि किस-किसकी चमड़ी सफ़ेद है.

मगर इंडिया के मौसम ने अंग्रेजों के साथ बड़ा धोखा किया. अपने देश में वो कई किलोमीटर साइकल चला सकते थे. पर इंडिया में बड़े-बड़े श्वेत अफसर जब साइकल चलाकर दफ्तर पहुंचते, उनके पसीने छूट चुके होते थे. चमड़ी धूप से अलग काली पड़ने लग रही थी. ऐसे समय में अंग्रेजों में धीरे-धीरे डर फैलने लगा कि जिन पर वो राज करते हैं, जिन्हें वो खुद से नीचे समझते हैं, अगर उन्हीं की तरह शारीरिक मेहनत करने लगेंगे तो उन्हें तो बड़ा नीच महसूस होगा.

अंग्रेज और वो अमीर भारतीय जो साइकल खरीद सकते थे, जब अपना शहर-ठिकाना बदलते, तो साइकल कम दामों पर बेच देते. इससे ये होता कि मिडिल क्लास लोग भी साइकल अफोर्ड कर सकने लगे. ये समय है पहले विश्व युद्ध के भी पहले का. तब तक साइकल रेयर थी. कई साल बाद 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई तो चुनाव चिह्न ‘साइकल’ को चुना गया. क्योंकि साइकल समाजवाद का सिंबल थी. आम आदमी की सवारी थी.

धीरे-धीरे अंग्रेज खूब साइकलें इंपोर्ट करवाने लगे. वजह थी, उनका खुद का काम. जितने सरकारी दफ्तर थे, उनके बाबुओं को साइकल देने से काम की स्पीड बढ़ गई. इंडिया में पूरी तरह बिजनेस करने आए अंग्रेजों के लिए इससे बेहतर क्या होता.

चूंकि अब मोटर कार आ चुकी थी, अंग्रेजों को अपना पौरुष और चमड़ी का अभिमान चोटिल होने का डर नहीं था.

साइकल और पौरुष

पौरुष को पुरुष होने से नहीं, एक आइडिया के तौर पर देखें. पुरुषवादी समाज में ‘अच्छे’ पुरुष का कर्तव्य अपनी स्त्री की रक्षा करना, उसे समझाना-पढ़ाना होता है. इसी वादे के साथ अंग्रेज इंडिया आए थे. हिंदुस्तान ही वो स्त्री थी जिसको उन्हें ‘सभ्य’ बनाना था. हाथ से निकलने नहीं देना था.

साइकल की पॉलिटिक्स बड़ी ही मजेदार. जबतक वो श्वेत पुरुष के हाथ में थी, वो श्वेत पौरुष का प्रतीक थी. जब भारतीय पुरुष के हाथ में आई, वो भारतीय पौरुष का प्रतीक बन गई.

मालगुडी डेज़ के टीवी एडैप्टेशन से स्टिल. आरके नारायण की ये किताब 1943 में छपी थी. इस सीन में पोस्टमैन, जिसका नाम थानप्पा है, ख़त बांटने जा रहा है.
टीवी शो मालगुडी डेज़ की फोटो. आरके नारायण की ये किताब 1943 में छपी थी. इस सीन में पोस्टमैन, जिसका नाम थानप्पा है, ख़त बांटने जा रहा है.

साइकल पूरी तरह से विदेशी थी. या पूरी विदेश में बनती थी. या विदेश के स्पेयर पार्ट्स इंडिया लाकर असेंबल किए जाते थे. पर यही साइकल भारतीयों के हाथ लगते ही भारतीयता का प्रतीक बन गई थी. अपने निबंध ‘साइकल ऑफ़ एम्पावरमेंट’ में डेविड आर्नल्ड और एरिक डी’वॉल्ड लिखते हैं, यूरोपीय लोगों के दिमाग में भारतीय पुरुष, खासकर बंगाली पुरुष की छवि बड़ी जनाना थी. उन्हें लगता था कि बंगाली पुरुष मेहनतकश नहीं हैं. बंगाली पुरुषों के ऊपर खुद को मर्दाना साबित करने का प्रेशर था. साइकल चलाने से काफी हद तक वो अपनी छवि बदल पाए. साइकल रेस और अन्य आउटडोर खेल खेलकर वो अपनी शारीरिक ताकत और पौरुष स्थापित कर पा रहे थे.

पर इसी समय पश्चिम में औरतें अपने साइकल चलाने के अधिकार के लिए लड़ रही थीं.

साइकल और स्त्रीत्व

किसी भी टेक्नोलॉजी की तरह, औरतें साइकल को भी इस्तेमाल कर देखना चाहती थीं. हर टेक्नोलॉजी की तरह, पुरुषवादी समाज उन्हें साइकल इस्तेमाल नहीं करने देना चाहता था. उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं के शुरुआती साल थे, जब औरतें साइकल ट्राय करना चाहती थीं.

पर पुरुष प्रधान मेडिकल साइंस ने औरतों को बता रखा था कि साइकल चलाना औरतों के लिए इतना हानिकारक हो सकता है कि उन्हें ख़त्म कर सकता है. अपने एक निबंध में सैरा हैलेनबेक लिखती हैं कि एक लंबे समय तक पश्चिम में माना जाता था कि औरतों की एनर्जी सीमित होती है. यानी एक सीमित एनर्जी लेकर वो दुनिया में आती हैं. जितना अधिक शारीरिक काम वो करेंगी, उनकी ये शक्ति उतनी ही कम पड़ती जाएगी. जबकि पुरुष के साथ इसका ठीक उल्टा होता है.

चूंकि साइकल पर बैठने में सीधे औरतों की जांघें और योनि के आसपास के हिस्से रगड़ खाते थे, ये कहकर उन्हें साइकल से दूर रखना बड़ा आसान था कि ये उनकी मसल्स पर बुरा असर डालेगा. जिससे उनकी बच्चेदानी और योनि खराब हो जाएंगे. अगर वो बच्चा न जन पातीं, तो आज से 150 पहले उनके होने का मतलब ही क्या होता.

साल 1900 में न्यू यॉर्क में साइकल चलातीं दो औरतें.
साल 1900 में न्यू यॉर्क में साइकल चलातीं दो औरतें.

भला हो बाजारवाद का, औरतें साइकल चला सकीं. सबसे पहले कुछ अमीर औरतों ने साइकल चलाना शुरू किया. वो उपन्यासों और मैगजीन्स का दौर था. उस समय की सबसे पुरानी अमेरिकी फैशन मैगज़ीन ‘हारपर्स बज़ार’ ने 1890 में एक लेख छापा. जो बताता था कि औरतों को साइकल चलानी चाहिए. हालांकि इसके बाद भी कई साल लगे, पश्चिम को ये मानने में कि औरतें साइकल चला सकती हैं.

कई औरतें जो घर पे ही दिन बिताती थीं, लगातार साइकल से जुड़े मिथक तोड़ते हुए लिखने लगीं. गोडी’ज़ मैगज़ीन में 1896 में छपे एक आर्टिकल में मेरी बिस्लैंड नाम की एक महिला लिखती हैं:

“तेज़ी से साइकल चलाते हुए ऐसा लगता है कि शरीर की एक-एक नस नई हो गई हो. एक निगाह सड़क पर और एक चारों ओर. रबड़ के ये टायर जब मुड़ते हैं, हर मोड़ पर लगता है कि सांसों से खून में ताज़ा ऑक्सीजन भर गई हो. लगता है सर से पांव तक एक-एक मांसपेशी आपके साथ हिल रही हो. जैसे-जैसे गति बढ़ती है, पांव पैडल पर तेज़-तेज़ घूमते हैं, दिमाग तैरने लगता है और मन का सारा मैल साफ़ हो जाता है.”

आने वाले समय में ऐसे आर्टिकल बढ़ते गए. इनमें ऐसी अलग-अलग ख़बरें रहती थीं जिसमें कभी किसी औरत के पीरियड से जुड़ी तकलीफें, किसी का मिलेनकोलिया (लंबी उदासी), किसी का कब्ज़, यहां तक किसी के पांवों की सूजन तक ठीक हो गए थे, महज साइकल चलाकर.

साइकल, स्त्रीत्व और इंडिया

पश्चिम की साइकल कंपनियों ने जब औरतों में अपना मार्केट बढ़ते हुए देखा, उन्होंने साइकल के स्वरूप बदल दिए. अब बीच में डंडा नहीं था. और औरतें स्कर्ट में साइकल चला सकती थीं.

पर इंडिया में अभी ऐसा होने में वक़्त था. कई लोगों का ऐसा मानना था कि साइकल चलाने से औरतों की ‘वर्जिनिटी’ चली जाती है और वो ब्याहने लायक नहीं बचतीं. एक बिंब के तौर पर देखें, तो पुरुषवादी समाज औरतों की खुली टांगों से आज भी डर रहा है. इसलिए औरतों के लिए आज भी गुलाबी रंग की लेडीबर्ड बनाई जा रही हैं. क्योंकि उनके कपड़े उठ जाएं, या वो पुरुषों की तरह पैंट पहन लें, ये दोनों ही उस वक़्त स्वीकार्य नहीं था.

'खेलें हम जी जान से' फिल्म में दीपिका. फिल्म की सेटिंग 1930 का चटगांव है.
‘खेलें हम जी जान से’ फिल्म में दीपिका. फिल्म की सेटिंग 1930 का चटगांव है.

एक लंबे समय तक साइकल का औरत के जीवन में एक ही काम था. कि उसकी शादी में उसके पति को दहेज में देने के काम आती थी.

पर 70 के दशक के बाद शहरी लड़कियों के लिए चीजें बदल गईं. अब साइकल बाहर से नहीं आ रही थीं. बल्कि एटलस और हर्क्युलीस कंपनी उन्हें इंडिया में बना रही थी. लड़कियों का साइकल चलाना उनके लिए भी अच्छा था और बाज़ार के लिए भी.

छत्तीसगढ़ के एक गांव में बचपन बिताने वाली 49 साल की भारती बताती हैं:

‘गांव से बाज़ार 4 किलोमीटर था. पैदल तो जाना मुश्किल था. कोई वाहन भी नहीं मिलता था. मगर साइकल आने के बाद मां 3-4 बार बाज़ार भेज देती थीं. मैं एक झोले में पत्थर के टुकड़े भरकर साइकल चलाया करती थी कि कोई छेड़खानी करे तो मारकर भाग जाऊंगी. साइकल थी तो न निकलने में डर लगता था, न मारने में.’

कुंवारी लड़कियां अब साइकल चला रही थीं. हालांकि शादीशुदा महिलाएं बड़े तौर पर साइकल का इस्तेमाल न तब कर रही थीं, न अब कर रही हैं. जिन लड़कियों के पांव साइकल पर खुले हैं, वो कुंवारी हैं. जिनके बंधे हैं, वो शादी शुदा हैं.

फिल्म पैडमैन में राधिका आप्टे का किरदार. नायिका पति के पीछे बैठती है, या आगे. दोनों ही सूरतों में उसके दोनों पांव एक तरफ होते हैं.
फिल्म पैडमैन में राधिका आप्टे का किरदार. नायिका पति के पीछे बैठती है, या आगे. दोनों ही सूरतों में उसके दोनों पांव एक तरफ होते हैं.

साइकल और स्कूल

2006 में बिहार सरकार ने साइकल योजना लॉन्च की थी. जिसके अंतर्गत लड़कियों के परिवार को साइकल खरीदने के लिए पैसे दिए जाते हैं. 2016 में इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक़ वो लड़कियां, जो 14 की उम्र के बाद स्कूल छोड़ देती थीं, साइकल योजना के बाद स्कूल जाने लगी हैं. यानी स्कूल अटेंड करने का रेट बढ़ गया है. जिन लड़कियों का सीनियर सेकेंडरी स्कूल 3 किलोमीटर से ज्यादा दूर था, उनमें लगभग 32 फीसद की बढ़त हुई थी. ये सर्वे केवल उन्हीं परिवारों पर था, जो योजना के लिए एलिजिबल थे.

गांवों में प्राइमरी स्कूल तो मिल जाते हैं. पर पिछड़े इलाकों में सीनियर स्कूल कई गांवों में एक ही होता है. ऐसे में ये लड़कियां साइकल से अपने भविष्य की ओर बढ़ रही हैं. आज से नहीं, कई साल से.
गांवों में प्राइमरी स्कूल तो मिल जाते हैं. पर पिछड़े इलाकों में सीनियर स्कूल कई गांवों में एक ही होता है. ऐसे में ये लड़कियां साइकल से अपने भविष्य की ओर बढ़ रही हैं. आज से नहीं, कई साल से.

‘छत्तीसगढ़ के भिलाई में, 90 के दशक की शुरुआत में पढ़ाई कर रहीं थीं भारती. वो बताती हैं: कॉलेज 11 किलोमीटर दूर था. एक दिन वापसी के लिए ऑटो ही नहीं मिला. लगा पढ़ाई ही छूट जाएगी. मां किसी तरह साइकल दिलाने को राज़ी हुईं. फिर मुड़कर नहीं देखा.’

*

-2016 में दो ईरानी महिलाओं को साइकल चलाने के लिए गिरफ्तार किया गया. साइकल चलाना ईरान में गैर-इस्लामिक मानते हैं. ईरानी औरतें कई साल से साइकल चलाने के अधिकार के लिए लड़ रही हैं.

-पुणे की वेदांगी कुलकर्णी ने बीते दिसंबर 159 दिनों में पूरी दुनिया का चक्कर साइकल से लगाया. वो हर दिन 300 किलोमीटर साइकल चलाती थी.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के गुजरते हुए काफ़िले को मिडिल फिंगर दिखाने वाली औरत जूली ब्रिस्कमैन साइकल पर थीं.

जूली ब्रिस्कमैन.
जूली ब्रिस्कमैन.
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