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दुनिया के सबसे विवादास्पद क्रांतिकारी की झकझोरने वाली कहानी

इस आदमी ने अमेरिका के 11 प्रेसिडेंटों को देखा है. साठ सालों में इन लोगों ने उसे 638 बार मारने की कोशिश की. पर हर बार जंग के धुएं से ये आदमी सिगार पीता हुआ निकल आता था. ये आदमी गांधी नहीं था. इस आदमी पर हत्यारा होने के आरोप लगे थे. अमेरिका से निबटने के लिये हर तरीका अपनाया था. 1953 में दिल को चीर देने वाली गहराई से कहा था- मेरी निंदा करो. इतिहास मुझे हर अपराध से मुक्त कर देगा.

फिदेल कास्त्रो. क्यूबा के चीफ. 90 साल की उम्र में गुजर गए. कोल्ड वॉर को अमेरिका की पिंडलियों के पास ले गये. जहां से अमेरिका के पैर कांपने लगे. हमें लग सकता है कि ये तरीका सही नहीं था. पर जब देश की जान पर बन आती है तो कौन सा तरीका सही है, नहीं पता. आप आसमान में तड़कती बिजलियों को हाथ में ले शहर रौशन कर दें, तो फिर वही तरीका सही है.

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एक करोड़ की आबादी वाला देश क्यूबा अमेरिका से सटा हुआ है. और अमेरिका की नाफरमानी करता रहा है. यही वजह थी कि फिदेल कास्त्रो बीसवीं शताब्दी के सबसे ताकतवर और प्रभावी इंटरनेशनल नेताओं में हमेशा शुमार रहे. 2006 में अपने भाई को सत्ता दे चुके थे. गंभीर बीमारी की वजह से. पर क्यूबा में उनकी छाप बनी रही. 8 जनवरी 1959 को उन्होंने बतिस्ता की सरकार को उखाड़ फेंका था और उस दिन से क्यूबा का प्रतीक बने रहे. उस दिन तानाशाह को उतारने के बाद हजारों की भीड़ के सामने स्पीच दी थी. वो स्पीच क्यूबा को आज भी याद है.

उस दिन कास्त्रो आवाज में खून मिलाकर बोल रहे थे. लोग रो रहे थे. क्यूबा की नई सुबह के नाम पर सफेद कबूतर उड़ाए गये. और एक कबूतर आकर कास्त्रो के कंधे पर बैठ गया. युद्ध से थके हुए क्यूबा को अपने दढ़ियल नेता का ये अंदाज भा गया. जनता फिदेल-फिदेल चिल्लाने लगी. पर किसी को ये नहीं पता था कि क्यूबा को लेकर क्या प्लान हैं कास्त्रो के. बस उनके इरादों पर भरोसा था.

फिदेल कास्त्रो के काम करने का अंदाज अमेरिका को पसंद नहीं आया था

Fidel Castro

कास्त्रो ने हर काम को पर्सनल लिया. जब बे ऑफ पिग्स में अमेरिका से जंग छिड़ी तो कास्त्रो टैंक के ऊपर बैठ कर ऑर्डर दे रहे थे. सैनिकों के यूनिफॉर्म के कलर से लेकर दूध पैदावार तक हर चीज में कास्त्रो का दखल था. खुद कई लोगों को जेल भी भेजा. क्यूबा के हर पहलू पर कास्त्रो का नियंत्रण था. इतना कि जब बीमार पड़े तो डॉक्टर को भी डायरेक्शन दे रहे थे कि दवा कितनी देनी है. पर इस कंट्रोल की वजह थी कि अपने देश को आगे करना था. इरादे सही थे. देश के किसी समुदाय के प्रति नफरत नहीं थी. पर इसी वजह से उनके जितने चाहने वाले बने, उतने ही नफरत करने वाले.

अमेरिका हमेशा कास्त्रो को तानाशाह कहता रहा. पर अब खुद की भी बारी आई है. ट्रंप के रूप में. फिदेल मरते वक्त एक बार तो जरूर मुस्कुराये होंगे. क्योंकि अमेरिका ने हमेशा फिदेल पर कड़े दिमाग का होने के आरोप लगाये हैं. दिसंबर 2014 में ओबामा और फिदेल के भाई रॉल कास्त्रो के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ जिसमें कैदी छोड़े गये थे. तब माना गया कि अमेरिका ने कास्त्रो को स्वीकर कर लिया है. जब 2016 में ओबामा क्यूबा जानेवाले पहले प्रेसिडेंट बने तब कास्त्रो ने कहा कि अमेरिका के प्रेम की कोई जरूरत तो नहीं है वैसे.

पूरे लैटिन अमेरिका और कैरेबियन एरिया में कास्त्रो से बड़ा नेता नहीं निकला. किसी भी सिद्धांत को ना मानने वाले कास्त्रो ने जब जिसकी जरूरत पड़ी वो किया. इकॉनमिक और पॉलिटिकल हर चीज में कॉमन सेंस से ही काम किया. वेनेजुएला के क्रांतिकारी ह्यूगो शॉवेज और मैक्सिको के मार्कोस कास्त्रो को अपना आइडियोलॉजिकल गॉडफादर मानते थे. जब कास्त्रो ने कम्युनिज्म अपना लिया तो अमेरिका ने उनको डेविल करार दे दिया. बे ऑफ पिग्स में जंग हुई. आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये गये. हत्याओं के अनगिनत प्रयास हुए. ये भी प्लान किया गया कि फिदेल की दाढ़ी काट दी जाये जिससे कि उनकी इमेज को धक्का लगे. फिदेल इमेज और मिथ के दम पर राज कर रहे थे क्यूबा में. घंटों स्पीच देने के मास्टर थे कास्त्रो. एक बार 7-8 घंटे स्पीच देने के बाद कहा था कि स्पीच तो छोटी ही होनी चाहिए.

कास्त्रो हमेशा इंटरव्यू देते रहते थे. पर उनकी योग्यता ये थी कि जो प्रश्न उनको सबसे ज्यादा परेशान करने के लिये बनता था, उसे वो अपने फेवर में घुमा लेते थे. एक बार प्लेबॉय मैगजीन के साथ इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि आपको तो तानाशाह समझा जाता है. तो कास्त्रो ने कहा कि अगर डिक्री से शासन करना तानाशाही है तो सबसे बड़े तानाशाह तो रोम के पोप हुए. हर चीज पर उनके विचार आते हैं.

क्यूबा की सत्ता लेने के बाद कास्त्रो रूस और लैटिन अमेरिका के साथ जुड़ा गये. कम्युनिज्म अपना लिया. पर 1991 में रूस के टूटने के बाद क्यूबा की इकॉनमी चरमरा गई. तब कास्त्रो ने बैन किये हुए डॉलर को चलवाने का फैसला किया. कास्त्रो ने एक बार कहा था कि क्यूबा दुनिया का एकमात्र देश है जिसे अमेरिका से बिजनेस करने की जरूरत नहीं है.

कास्त्रो शुरू से ही कड़े मिजाज के थे, उसी अंदाज में सत्ता भी ली

File photo of Fidel Castro relaxing a swimming pool in Romania

 

1926-27 के आस-पास जन्मे कास्त्रो का परिवार स्पेन से आया था. कहा जाता है कि इनके पिता स्पेन की सेना में थे. लड़ने आये थे. यहीं रह गये. और वहीं बिजनेस करने लगे. एक अमेरिकी कंपनी के साथ. जमींदार बन गये. फिदेल की पढ़ाई अच्छी हुई. राजधानी हवाना गए पढ़ने. कहा जाता है कि फिदेल शुरू से ही कड़े दिमाग के थे. हिम्मती भी. कॉलेज के दौरान पॉलिटिक्स में आये. देश पर तानाशाही चल रही थी. राफेल ट्रुजिलो के खिलाफ विरोध भी किया. उसके बाद राजनीति में उतरते चले गये. कॉलेज खत्म हो जाने के बाद भी कॉलेज की राजनीति में आते रहते थे. अभी ये कॉलेज की राजनीति से निकलकर चुनाव लड़ने ही वाले थे कि बतिस्ता ने पुरानी सरकार को गिराकर नई तानाशाही कायम कर ली. कास्त्रो अपनी लॉ डिग्री के भरोसे इसके खिलाफ केस करना चाहते थे, पर नहीं कर पाए.

26 जुलाई 1953 को अपने साथियों के साथ मिलकर सैंटियागो डी क्यूबा के बैरकों में हमला कर दिया कास्त्रो ने. पकड़े गए. ट्रायल में कहा: मैं नहीं डरता. इस क्रूर आदमी से तो कतई नहीं. मेरे सत्तर भाइयों को मारा है इसने. मेरी निंदा करो हमले के लिये. इतिहास मुझे हर अपराध से मुक्त कर देगा. कास्त्रो को 15 साल की सजा हुई. पर 1954 में बतिस्ता ने कास्त्रो को छोड़ दिया. उस समय बतिस्ता अपनी इमेज सुधार रहा था. उसे लगा था कि अब कोई विद्रोही हिमाकत नहीं करेगा.

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उसके बाद कास्त्रो मैक्सिको चले गए. वहां से अपने लिये आदमी और हथियार दोनों इकट्ठा किया. फिर गुरिल्ला लड़ाई करने लगे. बतिस्ता एकदम सनक गया. अपने सैनिकों को बोल दिया कि जब तक कास्त्रो को मार ना लेना, चैन ना लेना. पर कास्त्रो इमेज बनाने में उस्ताद थे. अमेरिका के अखबारों को इंटरव्यू देते. वो लोग उनकी इमेज ऐसी बनाते कि लगता कोई कॉमिक्स का हीरो है. 30 साल का लड़का दाढ़ी रखता और बड़ी-बड़ी बातें करता. घास खाता और क्यूबा को तानाशाही से आजाद करने के सपने देखता. कहता कि रूस से हमें कोई लेना-देना नहीं है. अमेरिका को बड़ी खुशी होती इससे.

ये इमेज इतनी बनती गई कि जनता का सपोर्ट बढ़ते गया. बतिस्ता अमेरिका से खार खाने लगा. अमेरिकी मीडिया उतना ही इमेज बनाती गई. 1959 में बतिस्ता देश छोड़कर भाग गया. और कास्त्रो के हाथ में सत्ता आ गई. पर उसी वक्त बतिस्ता के 500 अफसरों को कोर्ट मार्शल कर गोली मार दी गई. अब चौंकने की बारी सबकी थी. मारने के फोटो हर जगह छप रहे थे. पर कास्त्रो ने कहा कि बतिस्ता ने इन्हीं लोगों से हजारों लोगों को मरवाया था. मेरी कोई गलती नहीं है.

सत्ता लेने के बाद दुनिया की सांस रोक दी थी कास्त्रो ने

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1960 से कास्त्रो ने वो काम किये जिससे अमेरिका की त्यौरियां चढ़ गईं. रूस से तेल मंगवाने लगे. रिफाइनरी अमेरिका की थी. तो बदले में अमेरिका के प्रेसिडेंट आइजनहॉवर ने क्यूबा से चीनी खरीदना बंद कर दिया. अब कास्त्रो को मौका मिला. रूस से दोस्ती और बढ़ गई. 1961 में कास्त्रो ने ऑर्डर दिया कि अमेरिकी राजदूतावास में स्टॉफ की संख्या 60 से घटाकर 18 कर दी जाये. 48 घंटों में. इस बात से बौखलाए अमेरिका ने क्यूबा से सारे संबंध तोड़ लिये. ये संबंध फिर 2015 में बहाल हुआ है.

कास्त्रो की जिंदगी लड़ाई में बीती थी. सरकार चलाने का बहुत अनुभव नहीं था. तो एक कैबिनेट बनाये. एक इकॉनमिस्ट पैजोज को रखे. पर जब उसने आलोचना की तो उसे हटा दिये. उसके बाद लाये शे ग्वेरा को. अर्जेंटीना का डॉक्टर. जो एक अलग क्रांतिकारी था. कास्त्रो की नीतियों के खिलाफ क्यूबा में विद्रोह भी हुए पर कास्त्रो ने सेना की मदद से उसे दबा दिया. पर अमेरिका की सीआईए उनकी मदद कर रही थी. 17 अप्रैल 1961 को 1500 क्यूबा के क्रांतिकारियों ने बे ऑफ पिग्स में कदम रखा. पर इसके बारे में कास्त्रो को पता चल गया था. सारे मारे गये. अमेरिका ने एयर सपोर्ट करने का वादा किया था. नहीं किया. अब क्यूबा और अमेरिका में ठन गई. बे ऑफ पिग्स अमेरिका की बेइज्जती का निशान बन के रह गया.

पर फिदेल की सर्वमान्य इमेज थी, ऐसा नहीं था. उनके साथ काम किये मातोज ने जब कम्युनिज्म के नाम पर अति की आलोचना की तो उसे जेल में डाल दिया गया. 20 साल बाद वो लगभग अंधा होकर जेल से निकला और अमेरिका चला गया. फिदेल की बहन ने भी कहा कि फिदेल ने वो स्पीच देकर जनता को मूर्ख बनाया है. पर फिदेल की इमेज जनता में बनी रही. फिदेल ने कभी कम्युनिज्म को उसके रूप में नहीं अपनाया. अपने हिसाब से बदलते रहे. चीजें जो उनकी राजनीति और क्यूबा को सूट करती रहीं.

1962 में वो मौका आया जब पूरी दुनिया सांस रोके तमाशा देख रही थी. अमेरिका को पता लगा कि रूस क्यूबा में नेवी बेस बना रहा है. जहां न्यूक्लियर मिसाइल रखी जायेंगी. अमेरिका के प्रेसिडेंट थे जॉन एफ कैनेडी और रूस के थे निकिता ख्रुश्चेव. दोनों में ठन गई. अमेरिका ने भी अपने न्यूक्लियर मिसाइल तैनात कर दिये. दोनों तरफ के लोग कह रहे थे कि अब देर किस बात की प्रभु, दाग दो. जो होगा, देखा जाएगा. पर कुछ अफसरों की चालाकी और नेताओं की समझदारी से 13 दिनों तक चला ये मसला रूक गया. न्यूक्लियर मिसाइलें हटा ली गईं. अमेरिका टर्की से हट गया और रूस क्यूबा से.

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पर रूस के साथ रिश्ते बेहतर हो गये. इतने कि एक बार रूस ने ये भी कह दिया कि क्यूबा से पैदा होने वाला चीनी का हर कण हम खरीद के ले जायेंगे. 70 के दशक में चीनी पर निर्भरता से काम बिगड़ने लगा. तब कास्त्रो ने दूध की ओर ध्यान दिया. कोई अनुभव ना भी होने के बाद काम लगा दिया और सफल रहे. अमेरिका सहित कई देशों ने इसकी बड़ाई की. हेल्थ और एजुकेशन भी क्यूबा में अच्छा हो गया. तभी कास्त्रो ने एक बार कहा था कि क्रांति सफल रही है. हमारे यहां की वेश्याएं भी ग्रेजुएट हैं.

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कास्त्रो के लड़ाके मोजांबिक, अंगोला तक लड़ने जाते थे. पर ये भी कहा जाता है कि जिससे कास्त्रो को खतरा हुआ, वो मारा गया. कैमिलो क्यूबा का पॉपुलर नेता था. वो प्लेन क्रैश में मारा गया. शे ग्वेरा को रूस से दिक्कत थी. उसने कास्त्रो से रिश्ते तोड़ लिये. बोलीविया चला गया. 1967 में वहां क्रांति हुई और ग्वेरा मारा गया.

अमेरिका से रिश्ते बदलते रहे, क्यूबा में नये चौधरी आते रहे, पर फिदेल का रौला बना रहा

 

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कैनेडी की हत्या के बाद कई थ्योरियां आईं कि क्यूबा शामिल है हत्या में. इससे अमेरिका के साथ रिश्ते और बिगड़ गये. पर जब जिमी कार्टर अमेरिका के प्रेसिडेंट बने तो उन्होंने ढील दी. लोग आने-जाने भी लगे. उसके बाद रीगन बन गये. फिर माहौल खराब हो गया. पर रूस ने हर बार संभाल लिया. तेल और पैसे देते रहते. चीनी खरीदते रहते. फिदेल लंबी-लंबी तकरीरें करते रहते.

1994 में एक इंटरव्यू में फिदेल ने कहा था कि मेरे सामने सबसे बड़ा चैलेंज 60 की उम्र में आया था. ये बात थी 1991 में रूस के टूटने के बाद. क्योंकि फिदेल की हेल्प होने में समस्या आ रही थी. तेल, पैसे, चीनी सबकी दिक्कत हो गई थी. तब कास्त्रो ने अप्रत्याशित कदम उठाया. अमेरिका डॉलर ले आये देश में. टूरिज्म बढ़ा दिया. लोग घूमने आने लगे. पैसा आने लगा. पर दिक्कत बनी रही. टूरिज्म के सवाल पर ही कास्त्रो ने कहा था- जेंटनमेन, मुझे नहीं पता कि क्या होता है ये. मुझे तो ये भी नहीं पता कि कितना चार्ज करना है.

1994 में ही फिदेल के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे. क्योंकि देश में पैसे की कमी हो गई थी. और फिदेल का शासन लोगों के साथ कोई रियायत नहीं कर रहा था. हर चीज पर कंट्रोल रखा जाने लगा था. कितना पैसा है किसके पास, कितना खर्च हो रहा है. हर चीज का. बिल क्लिंटन ने क्यूबा के साथ रिश्ते सुधारने चाहे थे. पर तब तक प्लेन हादसे हो गये. दोनों देशों में फिर तल्खी बढ़ गई. 1998 में कास्त्रो ने कहा था कि अब हमारे पास एक इज्जत बची है. दुनिया के सबसे ताकतवर देश का दुश्मन होने का. ये हमारे लिये गर्व की बात है.

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कास्त्रो अमेरिका के लिये हमेशा नासूर बने रहे. जब 1998 में पोप क्यूबा गये तो लोगों को अंदाजा था कि पोप के सामने कास्त्रो की बेइज्जती होगी. पर कास्त्रो को डांट तो पड़ी, अमेरिका के बारे में भी पोप ने बोल दिया. तो हिसाब बराबर हो गया. फिर क्यूबा से बहुत सारे लोग रोजगार की तलाश में अमेरिका चले जाते थे. एक बार जाते वक्त नाव डूब गई. एक औरत मर गई. उसका बच्चा अमेरिका में रह गया. कास्त्रो ने इस चीज को मीडिया के सहारे खूब भुनाया. खूब दिखाया कि अमेरिका किस तरह लोगों की जिंदगियां बर्बाद करता है. अमेरिका ने हमेशा कास्त्रो के निजी जीवन के लेकर सवाल उठाया. कास्त्रो का तलाक तो 1955 में ही हो गया था. उनका एक बच्चा था. इसके बारे में खूब कहानियां बनाईं गईं. ये भी कहा जाता है कि कास्त्रो के बहुत सी औरतों के साथ संबंध थे. बहुत लोग हमेशा नये-नये खुलासे लेकर आते रहते. ये भी कहा जाने लगा कि क्यूबा में कास्त्रो के खिलाफ बहुत लोग खड़े होते हैं, पर किसी को जिंदा नहीं रहने दिया जाता.

इन सारी बातों के बीच कास्त्रो बूढ़े होने लगे थे. 2002 में स्पीच देते देते बेहोश हो गये. दो साल बाद स्पीच देते गिर गया. घुटना टूट गया. 2006 में कास्त्रो ने अपने भाई रॉल कास्त्रो को सत्ता सौंप दी. उसके बाद अमेरिका ने हाय-तौबा मचाया कि अभी भी तानाशाही चल रही है. डेमोक्रेसी नहीं आ रही. पर अमेरिका को ये जान के सुकून मिला कि रॉल अपने भाई की तरह नहीं हैं. उनको अमेरिका से उतनी नफरत नहीं है. रॉल ने बहुत सी पॉलिसीज चेंज की हैं. 2015-16 में अमेरिका और क्यूबा के बीच रिश्ते काफी अच्छे हुए हैं. ओबामा क्यूबा गये भी थे. ऐसा करने वाले पहले प्रेसिडेंट बने. अब फिदेल भी नहीं रहे. तो एक युग बीता है. देखते हैं, क्या होता है आगे.

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(न्यूयॉर्क टाइम्स से इनपुट)


 

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